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Thursday, June 7, 2012

डब्लू. एस. मर्विन : गवाह

डब्लू एस मर्विन की एक और कविता...   

 
गवाह : डब्लू. एस. मर्विन 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मैं बताना चाहता हूँ 
कि किस तरह के होते थे जंगल. 

मुझे बोलना होगा 
एक विस्मृत भाषा में. 
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Tuesday, March 27, 2012

डब्लू. एस. मर्विन : जुदाई

डब्लू. एस. मर्विन की एक कविता...   

 
जुदाई : डब्लू. एस. मर्विन 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

तुम्हारी जुदाई गुजर गई है मेरे भीतर से 
जैसे धागा किसी सूई में से. 
इसी के रंग से सिला होता है मेरा हर काम.  
                    :: :: :: 

Monday, March 12, 2012

डब्लू. एस. मर्विन : जाना

डब्लू. एस. मर्विन की एक कविता...  

 
जाना : डब्लू. एस. मर्विन 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

केवल इंसान मानते हैं 
कि एक शब्द होता है खुदाहाफिज के लिए 
हर भाषा में होता है एक शब्द 
हमारे सीखे शुरूआती शब्दों में से एक 
यह बना होता है अभिवादन से 
मगर जा रहे होते हैं वे 
उठा हुआ हाथ, हिलता हुआ 
चेहरे, व्यक्ति, स्थान 
जीव-जन्तु, दिन 
और शब्द को पीछे छोड़ जाते हुए 
और उसे भी जो अभिप्राय था उस शब्द का. 
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