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Tuesday, April 2, 2013

ज़िबिग्न्यू हर्बर्ट : स्वर्ग से रपट

ज़िबिग्न्यू हर्बर्ट की एक और कविता... 

स्वर्ग से रपट : ज़िबिग्न्यू हर्बर्ट 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

स्वर्ग में हफ्ते में तीस घंटे निर्धारित हैं काम के 
तनख्वाहें ऊँची हैं और कीमतें गिरती जाती हैं लगातार 
शारीरिक श्रम थकाऊ नहीं होता (गुरुत्वाकर्षण कम होने की वजह से) 
टाइपिंग से ज्यादा मुश्किल नहीं है लकड़ी चीरना 
सामाजिक व्यवस्था सुदृढ़ है और शासक बुद्धिमान 
सच में किसी अन्य देश से बेहतर है जीवन स्वर्ग में 

शुरू में इसे अलग होना था 
आभामंडल कीर्तन-मंडली और अमूर्तन के दर्जे 
मगर वे ठीक से अलग नहीं कर सके 
आत्मा को शरीर से, इसलिए वह यहाँ आ गई 
चर्बी की एक बूँद और मांसपेशी के एक रेशे के साथ 
जरूरी था नतीजों का सामना करना 
मिट्टी का एक कण मिलाना परम के एक कण में 
सिद्धांत से एक और विचलन, आखिरी विचलन 
सिर्फ जॉन ने इसे पहले ही भाँप लिया था: फिर से धरनी पड़ेगी तुम्हें देह 

बहुत लोग नहीं देख पाते ईश्वर को 
सिर्फ उन लोगों के लिए है वह जिनमें होती है 100 प्रतिशत आत्मा 
बाक़ी सुनते हैं चमत्कारों और प्रलयों की घोषणाओं को 
किसी दिन सबको दिखेगा ईश्वर 
कोई नहीं जानता कि कब होगा ऐसा 

फिलहाल हर शनिवार की दोपहर 
मधुरता से गूंजते हैं साइरन 
और कारखानों से निकल पड़ते हैं अलौकिक मजदूर 
काँखों में अजीब ढंग से दबाए अपने डैने, वायलिनों की तरह 
                            :: :: :: 

Friday, March 22, 2013

ज़िबिग्न्यू हर्बर्ट की कविताएँ

ज़िबिग्न्यू हर्बर्ट की दो गद्य कविताएँ... 
ज़िबिग्न्यू हर्बर्ट की दो गद्य कविताएँ 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

चाँद 
मैं समझ नहीं पाता कि तुम चाँद के बारे में कविताएँ कैसे लिख लेते हो. वह मोटा और फूहड़ है. वह चिमनियों की नाक खोदता रहता है. उसका पसंदीदा काम है पलंग के नीचे घुसकर तुम्हारे जूते सूँघना. 
                                                            :: :: :: 

दीवार 
हम दीवार के सामने खड़े हैं. हमारी जवानी किसी मुजरिम की कमीज़ की तरह हमसे छीन ली गई है. हम इंतज़ार करते हैं. स्थूलकाय गोली के हमारी गर्दन में पैबस्त होने के पहले दस या बीस साल गुजर जाते हैं. दीवार ऊंची और मजबूत है. दीवार के पीछे एक पेड़ और एक सितारा है. पेड़ अपनी जड़ों से दीवार को खोद रहा है. सितारा किसी चूहे की तरह पत्थर को कुतर रहा है. सौ-दो सौ सालों में वहां एक छोटी सी खिड़की बन जाएगी. 
                                                            :: :: ::

Wednesday, March 20, 2013

ज़िबिग्न्यू हर्बर्ट : दो गद्य कविताएँ

ज़िबिग्न्यू हर्बर्ट की दो गद्य कविताएँ... 
ज़िबिग्न्यू हर्बर्ट की दो कविताएँ 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

कप्तान की दूरबीन 
मैंने इसे नेपल्स के एक बिसाती से खरीदा. बताते हैं कि यह दूरबीन मारिया  के कप्तान की थी जो एक साफ़ चमकीले दिन गोल्ड कोस्ट के बिल्कुल पास रहस्यमय परिस्थितियों में डूब गया था. 

एक अजीब सा औजार. इसे मैं चाहे जिस चीज पर केंद्रित करूँ, मुझे बस दो नीली पट्टियां ही दिखती हैं --एक गहरे नीले रंग की और दूसरी आसमानी नीले रंग की. 
                                                            :: :: :: 

वायलिन 
एक वायलिन नंगी होती है. उसकी दुबली-पतली नन्ही-नन्ही बाहें होती हैं. उनसे वह आधे-अधूरे ढंग से खुद को ढंकने की कोशिश करती है. शर्म और ठंड की वजह से वह रोती है. इस कारण से, न कि जैसा संगीत समीक्षक कहते हैं उसे और खूबसूरत बनाने के लिए. यह सच नहीं है. 
                                                            :: :: :: 

Saturday, March 16, 2013

ज़िबिग्न्यू हर्बर्ट : कंकड़

ज़िबिग्न्यू हर्बर्ट की एक और कविता... 
कंकड़ : ज़िबिग्न्यू हर्बर्ट 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

कंकड़ 
एक पूर्ण प्राणी है 

अपने बराबर 
अपनी सीमाओं के प्रति सचेत 

पूरा भरा हुआ 
एक कंकड़ीले अर्थ से 

एक ऐसी गंध से भरा जो किसी को कुछ भी याद नहीं दिलाती 
वह किसी को डराकर नहीं भगाता और न कोई इच्छा ही जगाता है 

उसका उत्साह और ठंडापन 
सच्चे और गरिमा से भरे हैं 

मैं भारी पछतावे से भर उठता हूँ 
जब उसे पकड़ता हूँ अपने हाथों में 
और उसका शानदार शरीर 
झूठी गर्माहट से ओत-प्रोत हो जाता है 

-- कंकड़ों को वश में नहीं किया जा सकता 
अंत तक वे देखते रहेंगे हमारी तरफ 
शांत और बिल्कुल साफ़ नज़र से 
                  :: :: :: 

Friday, September 7, 2012

ज़िबिग्न्यू हर्बर्ट : गुलाबी कान

ज़िबिग्न्यू हर्बर्ट की एक और कविता...   

 
गुलाबी कान : ज़िबिग्न्यू हर्बर्ट 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मुझे लगता था 
कि बहुत अच्छी तरह जानता हूँ मैं उसे 
इतने सालों से हम रह रहे हैं साथ 

जानता हूँ 
उसका चिड़ियों जैसा सर 
गोरी बाहें 
और पेट 

उस वक़्त तक रहा यह गुमान 
जब सर्दियों की एक शाम 
वह बैठी थी मेरे बगल 
और हमारे पीछे से पड़ रही 
लैम्प की रोशनी में 
मैंने देखा एक गुलाबी कान 

त्वचा की एक मौजूं पंखुड़ी 
अपने भीतर प्रवाहमान रक्त भरे 
एक सीपी 

मैंने कुछ नहीं कहा उस वक़्त -- 
बेहतर होगा एक कविता लिखना 
गुलाबी कान के बारे में 
पर ऎसी नहीं कि लोग कहें 
कैसा विषय चुना है उसने 
सनकी दिखना चाहता है वह. 

ऎसी कि हंस भी न सके कोई 
ऎसी कि उन्हें लगे 
एक रहस्य को प्रकट किया मैंने 

मैंने कुछ नहीं कहा उस वक़्त 
मगर उस रात जब हम साथ-साथ थे बिस्तर में 
बड़ी कोमलता से मैं जांचता रहा 
एक गुलाबी कान के 
विलक्षण स्वाद को. 
               :: :: :: 

Wednesday, June 6, 2012

ज़िबिग्न्यू हर्बर्ट : दो बूँदें

ज़िबिग्न्यू हर्बर्ट की एक और कविता...    

 
दो बूँदें : ज़िबिग्न्यू हर्बर्ट 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

          जब जंगल जल रहे हों, तो गुलाबों के लिए शोक करने का वक़्त कहाँ. 
                                                                                 - जूलियस स्वेवस्की 

जंगलों में आग लगी थी -- 
फिर भी उन्होंने 
बाहों में भर लिया था अपनी गरदनों को 
गुलदस्तों की तरह 

लोग भागे पनाहगाह की तरफ -- 
उसने कहा ऐसे हैं मेरी पत्नी के बाल 
कि छिपा जा सकता है उनकी गहराइयों में 

एक कम्बल के नीचे 
वे फुसफुसाते रहे निर्लज्ज शब्द 
वही प्रेमियों का कीर्तन 

जब स्थिति ज्यादा बिगड़ गई 
वे कूद पड़े एक-दूसरे की आँखों में 
और मूँद लिया उन्हें जोर से 

इतनी जोर से कि उन्हें एहसास भी न हुआ लपटों का 
जब वे पहुँचने लगीं उनकी बरौनियों तक 

वे अंत तक रहे बहादुर 
वे अंत तक रहे वफादार 
अंत तक रहे वे वैसे ही 
एक चेहरे के कगार पर ठहरी 
दो बूंदों की तरह 
                    :: :: :: 
कविता के पूर्व स्वेवस्की का उद्धरण अनुवादकों चेश्वाव मिवोश एवं पीटर डेल स्काट की तरफ से. 

Friday, May 18, 2012

ज़िबिग्न्यू हर्बर्ट : मछली

ज़िबिग्न्यू हर्बर्ट की एक और कविता...    

 
मछली : ज़िबिग्न्यू हर्बर्ट 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मछली की नींद कल्पना से परे है. एक तालाब के सबसे अँधेरे कोने में भी, जलबेंत के बीच, उनका आराम एक जागरण होता है: वे अनंतकाल तक एक ही मुद्रा अपनाए रहती हैं; और उनके बारे में कुछ कहना बिल्कुल असंभव है: यह कि उनका सर तकिए के आगोश में चला गया है. 

उनके आंसू भी निर्जन में रूदन जैसे होते हैं--असंख्य. 

मछलियाँ अपनी हताशा को किसी भाव द्वारा नहीं व्यक्त कर पातीं. यह उस भोथरे चाकू को सही ठहराता है जो उनकी पीठ पर उतरकर उनकी चमड़ी के सलमे-सितारे उजाड़ देता है. 
                                                            :: :: ::

Saturday, May 12, 2012

ज़िबिग्न्यू हर्बर्ट : हाथी

ज़िबिग्न्यू हर्बर्ट की एक और कविता...   

 
हाथी : ज़िबिग्न्यू हर्बर्ट 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

वास्तव में, हाथी बहुत संवेदनशील और बेचैन प्राणी होते हैं. उनके पास अत्यधिक कल्पनाशक्ति होती है जिसके कारण कभी-कभी वे अपना आकार-प्रकार भूल जाते हैं. जब वे पानी में जाते हैं तो अपनी आँखें बंद कर लेते हैं. अपने खुद के पैरों को देखकर वे हताश हो रोते हैं. 

मैं एक हाथी को जानता हूँ जिसे एक मर्मर चिड़िया से प्यार हो गया. उसका वजन घट गया, नींद उड़ गई, और अंत में वह दिल टूट जाने से मर गया. हाथियों के स्वभाव से अनजान लोगों ने कहा: वह बहुत मोटा था.  
                                                               :: :: ::     

Tuesday, February 14, 2012

जिबिग्न्यु हर्बर्ट : प्यार करता हूँ तुमसे

जिबिग्न्यु हर्बर्ट की एक और कविता... 










वाकया : जिबिग्न्यु हर्बर्ट 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

हम चल रहे हैं समुन्दर के किनारे 
मजबूती से थामे अपने हाथों में 
एक आदिम बातचीत के दो सिरे 
-- क्या तुम मुझसे प्यार करते हो?
-- प्यार करता हूँ तुमसे 

भौहें सिकोड़े 
अपना सारा ज्ञान खंगाल डालता हूँ मैं 
दोनों टेस्टामेंटों का   
ज्योतिषियों पैगम्बरों  
बागों के दार्शनिकों 
और आश्रम में रहने वाले दार्शनिकों का 

और कुछ ऐसा ध्वनित होता है : 
-- रोओ मत 
-- बहादुर बनो 
-- देखो सबलोग कैसे 

अपने होंठ सिकोड़कर बोलती हो तुम 
-- तुम्हें तो कोई पुजारी होना चाहिए था 
और चली जाती हो झल्लाकर 
कोई प्यार नहीं करता पुजारियों से 

          क्या कहूं मैं 
          इस छोटे से मृत सागर के किनारे पर 

          धीरे-धीरे पानी भर जाता है 
          उन पैरों के निशान में जो अब जा चुके हैं 
                    :: :: :: 
जिब्ग्न्यू हरबर्ट, ज़्बीग्न्येव हेर्बेर्त 

Thursday, February 9, 2012

जिबिग्न्यु हर्बर्ट : एक ब्यौरे की कोशिश

जिबिग्न्यु हर्बर्ट की एक और कविता...

 
एक ब्यौरे की कोशिश : जिबिग्न्यु हर्बर्ट 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

पहले तो मैं अपना ब्यौरा दूंगा 
अपने सर से शुरू करते हुए 
या बेहतर होगा कि अपने पैर से 
या फिर हाथ से ही 
अपने बाएँ हाथ की सबसे छोटी उंगली से शुरू करते हुए 

बहुत स्नेहिल है 
मेरी छोटी उंगली 
थोड़ा अन्दर की तरफ मुड़ी 
एक नाखून पर ख़त्म होती 
तीन हिस्सों में बनी है यह 
सीधे मेरी हथेली से निकली हुई 
अगर इसका बस चलता तो 
एक बड़ा सा कीड़ा हो गई होती यह 

एक निराली उंगली है यह 
पूरी दुनिया में अनूठी बाएँ हाथ की छोटी उंगली 
सीधे मुझे प्रदान की गई 

बाएँ हाथ की दूसरी छोटी उंगलियाँ 
भावशून्य अमूर्तन हैं 
मेरी उंगली की 
हमारा एक ही जन्म-दिवस है 
एक ही मृत्यु-दिवस 
और एक ही अकेलापन 

सिर्फ धूमिल पुनरुक्तियों के परीक्षण में लगा 
खून ही 
एक-दूसरे से जोड़ता है दो पृथक किनारों को 
आपसी सहमति के एक सूत्र से 
                    :: :: :: 
जिब्ग्न्यू हरबर्ट, ज़्बीग्न्येव हेर्बेर्त  

Tuesday, February 7, 2012

जिबिग्न्यु हर्बर्ट : मुर्गी कुछ ख़ास कवियों की याद दिलाती है

जिबिग्न्यु हर्बर्ट की एक और कविता... 

 
मुर्गी : जिबिग्न्यु हर्बर्ट 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मुर्गी इस बात की बेहतरीन मिसाल है कि इंसानों के साथ लगातार रहने का क्या नतीजा हो सकता है. वह एक पक्षी का हल्कापन और खूबसूरती पूरी तरह से गँवा चुकी है. एक बहुत बड़े हैट के रूप में उसकी पूँछ उसके पुट्ठों पर भद्दे तरीके से पड़ी रहती है. उसके परमानंद के दुर्लभ क्षण, जब वह एक टाँग पर खड़ी होकर अपनी गोल आँखों को झिल्लीदार पलकों से चिपका लेती है, गैरमामूली ढंग से घिनौने लगते हैं. ऊपर से उसका भोंड़ा गीत, उसकी गला-फाड़ मिन्नतें एक ऎसी चीज की खातिर जो अकथनीय रूप से हास्यास्पद है : एक गोल, सफ़ेद, गंदगी में लिथड़ा हुआ अंडा. 

मुर्गी कुछ ख़ास कवियों की याद दिलाती है. 
                                                     :: :: :: 
Manoj Patel Blog, ज़्बीग्न्येव हेर्बेर्त 

Friday, January 20, 2012

जिबिग्न्यु हर्बर्ट की तीन गद्य कविताएँ

जिबिग्न्यु हर्बर्ट की तीन गद्य कविताएँ... 









जिबिग्न्यु हर्बर्ट की तीन गद्य कविताएँ
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

शहजादी 

शहजादी को जो बात सबसे ज्यादा पसंद है, वह है मुंह के बल फर्श पर लेट जाना. फर्श से धूल, मोम और खुदा जाने किस-किस चीज की गंध आती रहती है. शहजादी दरारों में अपना खजाना छुपाया करती है -- एक लाल मूंगे की माला, चांदी की एक लड़ी, इसके अलावा कुछ और जो मैं आपको बता नहीं सकता क्योंकि मैनें एक कसम खाई है. 
                                                            :: :: :: 

शराबी 

शराबी ऐसे लोग होते हैं जो एक घूँट में ही तलछट तक पी जाते हैं. मगर वे झिझकते इसलिए हैं क्योंकि तलछट में वे फिर से खुद को देख लेते हैं. बोतल के कांच से वे बहुत दूर के ग्रहों को देखते हैं. यदि वे थोड़ा मजबूत खोपड़ी  और थोड़ा बेहतर रूचि वाले होते, तो वे खगोलशास्त्री होते. 
                                                            :: :: :: 

बौने 

बौने जंगल में उगते हैं. उनकी एक ख़ास गंध और सफ़ेद दाढ़ी होती है. वे अकेले दिखाई पड़ते हैं. यदि उनका कोई झुण्ड इकट्ठा किया जा सके और सुखाकर दरवाजे पर लटकाया जा सके तो हमें कुछ सुकून हासिल हो सकता है. 
                                                            :: :: :: 
Manoj Patel, parteparte, parhteparhte, padtepadte  ज़्बीग्न्येव हेर्बेर्त

Tuesday, January 17, 2012

जिबिग्न्यु हर्बर्ट : चीजें

जिबिग्न्यु हर्बर्ट की एक और कविता...














चीजें : जिबिग्न्यु हर्बर्ट 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

बेजान चीजें हमेशा सही होती हैं और दुर्भाग्य से उन पर किसी बात का लांछन नहीं लगाया जा सकता. मैनें कभी किसी कुर्सी को एक पाए से दूसरे पाए पर अपना वजन खिसकाते, या किसी पलंग को पिछले पायों पर खड़ा नहीं देखा. और मेजें, थके होने के बाद भी अपने घुटने मोड़ने की हिम्मत नहीं करतीं. मुझे लगता है कि चीजें नसीहत देने के विचार से, हमारी अस्थिरता के लिए हमें धिक्कारते रहने के लिए ऐसा करती हैं. 
                                                           :: :: :: 
Manoj Patel, 9838599333, parte parte, parhte parhte, padte padte 

Tuesday, January 3, 2012

जिबिग्न्यु हर्बर्ट की कविता

जिबिग्न्यु हर्बर्ट की एक और कविता...

 
मेज के साथ सावधान : जिबिग्न्यु हर्बर्ट 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

मेज पर आपको चुपचाप बैठना चाहिए और खयाली पुलाव नहीं पकाने चाहिए. चलिए याद करते हैं कि अपने आप को शांत गोलाकार तरंगों में बदलने के लिए तूफानी समुद्री लहरों को कितनी मेहनत करनी पड़ी होगी. असावधानी का एक पल सारे किए-धरे पर पानी फेर देता. मेज के पायों को रगड़ना भी वर्जित है क्योंकि वे बेहद संवेदनशील होते हैं. मेज पर सबकुछ शांतिपूर्वक तथ्यात्मक ढंग से निपटाया जाना चाहिए. चीजों पर पूर्ण रूप से विचार किए बिना आप यहाँ नहीं बैठ सकते. खयाली पुलाव पकाने के लिए हमें लकड़ी की बनी अन्य चीजें प्रदान की गई हैं, जैसे : जंगल, पलंग.
                                                          :: :: :: 
Manoj Patel, Blogger & Translator, Akbarpur - Ambedkarnagar (U.P.) 

Thursday, December 29, 2011

जिबिग्न्यु हर्बर्ट : हृदय

जिबिग्न्यु हर्बर्ट की एक और कविता...

 

हृदय : जिबिग्न्यु हर्बर्ट 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

सभी मनुष्यों के आंतरिक अंग गंजे और चिकने होते हैं. अमाशय, आंतें और फेफड़े गंजे होते हैं. सिर्फ हृदय में केश होते हैं - लाल रंग के, घने और कभी-कभी काफी लम्बे भी. यह एक समस्या है. हृदय के केश, जलीय पौधों की तरह रक्त के प्रवाह में बाधा डालते हैं. केश प्रायः कीटों से भरे होते हैं. आपको अपनी प्रेमिका के हृदय के केशों से इन फुर्तीले परजीवियों को निकालने के लिए बहुत गहराई से प्यार करना होगा. 
                                                         :: :: :: 
Manoj Patel, Blogger & Translator 

Sunday, December 11, 2011

जिबिग्न्यु हर्बर्ट : कोई और सेवा महोदय

जिबिग्न्यु हर्बर्ट की एक और कविता...



कोई और सेवा महोदय : जिबिग्न्यु हर्बर्ट 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

जरूर, कई काम हैं 
खिड़की खोल दो 
तकिया ठीक कर दो 
चाय उड़ेलो कप में 

-- यही सब 
-- बस इतना ही 

दोनों है यह, ज्यादा भी 
और कुछ ख़ास नहीं भी 

क्योंकि 
बहुत ध्यान से 
किया जाना है इसे 

खिड़की खोलना है समूचे बसंत की तरफ 
और तकिए के हिसाब से करना है सर 
                    :: :: :: 
Manoj Patel 

Friday, December 9, 2011

जिबिग्न्यु हर्बर्ट : हत्थेदार कुर्सियां

पोलिश कवि जिबिग्न्यु हर्बर्ट की एक कविता...



हत्थेदार कुर्सियां : जिबिग्न्यु हर्बर्ट 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

किसने कभी सोचा होगा कि जोश से भरी एक गर्दन किसी दिन कुर्सी का एक हत्था हो जाएगी, या खुशी से उड़ने के लिए बेकरार पाँव चार साधारण पायों के रूप में तन कर खड़े हो जाएंगे? हत्थेदार कुर्सियां पहले सीधी-साधी पुष्प-भक्षी जीव हुआ करती थीं. जाने कैसे उन्होंने खुद को बड़ी आसानी से पालतू हो जाने दिया और आज वे चौपायों की सबसे अधम प्रजाति हैं. उन्होंने अपना सारा जिद्दीपन और साहस गँवा दिया है. वे महज विनम्र हैं. उन्होंने कभी किसी को न तो कुचला है, न ही कभी किसी के साथ सरपट दौड़ लगाई है. उन्हें निश्चित रूप से अपनी निरर्थक ज़िंदगी के बारे में पता है. 

हत्थेदार कुर्सियों की हताशा उनकी चरचराहट से जाहिर होती है. 
                                                          :: :: :: 
Manoj Patel 
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