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Wednesday, December 19, 2012

माइआ अंजालो की कविता


कोई दो साल पहले यह अनुवाद 'नई बात' ब्लॉग पर प्रकाशित हुआ था. आज इसे फिर से साझा करने का मन हुआ...    


मैं हूँ कि उठती जाती हूँ : माइआ अंजालो 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

तुम दर्ज कर सकते हो मेरा नाम इतिहास में
अपने तीखे और विकृत झूठों के साथ
कुचल सकते हो मुझे गन्दगी में
लेकिन फिर भी धूल की तरह
मैं उड़ती जाउंगी.

क्या मेरी बेबाकी परेशान करती है तुम्हें ?
क्यों घिरे बैठे हो उदासी में ?
क्योंकि मैं यूँ इतराती चलती हूँ
गोया कोई तेल का कुआं उलीच रहा हो तेल
मेरी बैठक में.

जैसे उगते हैं चाँद और सूरज
जैसे निश्चितता से उठती हैं लहरें
जैसे उम्मीदें उछलती हैं ऊपर
उठती जाउंगी मैं भी.

क्या टूटी हुई देखना चाहते थे तुम मुझे ?
झुका सर और नीची निगाहें किए ?
आंसुओं की तरह नीचे गिरते कंधे
अपने भावपूर्ण रुदन से कमजोर.

क्या मेरी अकड़ से ठेस पहुँचती है तुम्हें ?
क्या तुम पर बहुत भारी नहीं गुजरता
कि यूँ कहकहे लगाती हूँ मैं
गोया मेरे घर के पिछवाड़े सोने की खदान में हो रही हो खुदाई

तुम शब्दों के बाण चला सकते हो मुझ पर
चीर सकते हो मुझे अपनी निगाहों से
अपनी नफरत से कर सकते हो क़त्ल
फिर भी हवा की तरह
मैं उड़ती जाउंगी.

क्या मेरी कामुकता परेशान करती है तुम्हें ?
क्या तुम्हें ताज्जुब होता है कि
मैं यूँ नाचती फिरती हूँ
गोया हीरे जड़े हों मेरी जांघों के संधि-स्थल पर ?

इतिहास के शर्म के छप्परों से
मैं उड़ती हूँ
दर्द में जड़ जमाए अतीत से
मैं उगती हूँ

एक सियाह समंदर हूँ मैं उछालें मारता और विस्तीर्ण
जज़्ब करता लहरों के उठने और गिरने को

डर और आतंक की रातों को पीछे छोड़ते
मैं उड़ती हूँ
आश्चर्यजनक रूप से साफ़ एक सुबह में
मैं उगती हूँ

उन तोहफों के साथ जो मेरे पुरखों ने मुझे सौंपा था
मैं उठती हूँ

मैं ही हूँ सपना और उम्मीद गुलामों की
मैं उड़ती हूँ
मैं उगती हूँ
मैं उठती हूँ. 
               :: :: :: 

Sunday, June 3, 2012

माया एंजेलो : स्त्रियों के लिए नसीहतें


माया एंजेलो की कुछ नसीहतें, विपिन चौधरी के सौजन्य से...    

स्त्री समाज के लिए माया एन्जेलो की मजेदार नसीहतें 
(अनुवाद : विपिन चौधरी) 

लेखिका माया एंजेलो का सम्पूर्ण जीवन एक दस्तावेज है. जिसे माया ने सार्वजनिक किया है और इस तरह से वे पहले-पहल अश्वेत महिलाओं के लिए एक आदर्श की तरह उभरी और फिर संसार भर की महिलाओं में लोकप्रिय हुई, एक सजग महिला होने के नाते वे अपने आस- पास की महिलाओं की समस्याओं से अच्छी तरह से परिचित थी. महिलाओं के लिए लिखे गए उनके कूट वाक्य काफी सराहे जाते रहे हैं. स्त्रियों को समर्पित माया की इन मज़ेदार सलाहों की बानगी देखें.

१. एक औरत के पास अपने नियंत्रण में पर्याप्त पैसा होना चाहिये ताकि बाहर जाते वक्त या खुद के लिए एक जगह किराए पर लेकर वह रह सके, भले ही वह कभी यह सब करना नहीं चाहती हो या उसे कभी उसे इन सबकी जरूरत भी ना हो.

२. स्त्री के पास युवावास्था की वह रसदार सामग्री होनी चाहिये जिसे वह अपने पीछे छोड़ आई हो और जिसे वह अपने आने वाले बुढ़ापे में खूब आनंद के साथ सुना सके.

३. हर स्त्री के पास पेचकस का सैट , एक तार रहित ड्रिल, और एक काले फीते वाली ब्रा होनी चाहिए.

४. औरत के पास एक ऐसा दोस्त होना चाहिये जो हमेशा उसे हँसाता रहे और जो उसे रोने में मदद करता हो.

५. एक स्त्री के पास ऐसा बढ़िया फर्नीचर का पीस होना चाहिए जो उसके परिवार में किसी ने पहले नहीं ख़रीदा हो.

६. सभी औरतों के पास अपने भाग्य पर नियंत्रण की भावना होनी चाहिए.

७. एक औरत के पास आठ प्लेट का सेट,वाइन के लंबे पकड़ने वाले ग्लास, और भोजन के लिए शानदार नुस्खा होना चाहिए ताकि वह अपने मेहमानों के सामने अच्छे से पेश हो सके.

८. एक औरत को पता होना चाहिए कि कैसे एक नौकरी को छोड़ देना है, प्रेमी के साथ को कैसे तोड़ना है और दोस्ती को बिना बर्बाद किये हुए दोस्त का सामना किस प्रकार करना है.

९. हर औरत को पता होना चाहिए कि कब उसे कठिन प्रयास करते रहना है और कब उनसे दूर चला जाना है.

१०. स्त्री को जानकारी होनी चाहिए ...कि वह बछड़ों की लंबाई, अपने कूल्हों की चौड़ाई, या अपने माता पिता की प्रकृति को नहीं बदल सकती है.

११. हर औरत को समझना चाहिए ...कि उसका बचपन कुछ खास नहीं था पर अब क्या हो सकता हैं --बचपन तो अब खत्म हो चुका है.

१२. सभी स्त्रियों को पता होना चाहिए ... कि उसे अपने प्यार के लिये क्या करना चाहिए और इसके लिये वह क्या कर सकती है.

१३. एक औरत को पता होना चाहिए ...कि अकेले कैसे रहा जाए -- भले ही उसे अकेले रहना पसंद न हो.

१४. स्त्री को मालूम होना चाहिए ...कि वह किस पर भरोसा करे और किस पर नहीं और करे भी तो क्यों ? और इसे मसले को व्यक्तिगत रूप से नहीं लेना चाहिए.

१५. स्त्री को पता होना चाहिए ...कि उसे कहाँ जाना चाहिए-- अपने पक्के दोस्त की रसोई- घर की मेज़ पर नहीं तो लकड़ी की आकर्षक सराय में चले जाना चाहिए जहाँ उसकी आत्मा को सूकुन महसूस हो सके.

१६. स्त्री को अपने जीवन के क्यों और क्यों नहीं के फंडे मालूम होने चाहिए और उन फंडों को दिन, महीने या एक साल में सिद्ध करके दिखाना चाहिए. 
                                                                  :: :: :: 
विपिन चौधरी के दो कविता-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. उनसे vipin.choudhary7@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है. 

Saturday, June 2, 2012

शेफ के अवतार में माया एन्जेलो


बहुत कम लोगों को पता होगा कि अमेरिकी लेखिका माया एंजेलो एक पाक-कला विशेषज्ञ भी हैं. वे लिखती हैं, "अगर कोई ख़ास मौक़ा हो और उस समय आप जो भोजन कर रहे हों वह भी उत्कृष्ट हो, तो भोजन आपको वह मौक़ा याद रखने में मददगार हो सकता है और वह मौक़ा उस भोजन को याद रखने में."  माया के इस पहलू से हमें परिचित करा रही हैं कवियत्री विपिन चौधरी...  











लेखिका माया एन्जेलो, शेफ के अवतार में  
(अनुवाद : विपिन चौधरी) 

हमारे भारतीय समाज में ही नहीं वरन पूरे संसार में परंपरागत चीज़ों से हट कर कुछ करने का जोखिम उठाने वाले विरले ही लोग होते हैं. दूसरी तरफ धरती पर हमेशा से ऐसे खब्ती लोग भी रहे हैं जो लीक से हट कर कुछ कर गुज़रने का जज्बा अपने भीतर सजोयें रखते हैं और समय आने पर करके भी दिखाते हैं.
विश्व साहित्य की सबसे प्रभावशाली आवाज़ो में से एक,  अमेरिकी लेखिका माया एंजेलो ने जब पाक- कला पर किताबें लिखने की ठानी तो उनके शुभचिंतकों ने उन्हें रोका, पर दृढ़ स्वभाव की माया कहाँ रुकने वाली थी. उन्होंने अपने लेखन को व्यापक विस्तार देते पाक-कला पर दो पुस्तकें लिखीं. 
यह तो माया एन्जेलो के ही अलहदा जज्बे की उपज है जिसकी वजह से उन्हें रसोईघर  में  काम करना और नए नए भोजन बना कर अपने दोस्तों को परोसना एक सच्चा  सुख  देता है. ८३  वर्षीय  माया को आत्मकथा के साथ कविता लेखन,  इतिहास, शिक्षा  और नागरिक अधिकारों के प्रति जुनून के लिए जाना जाता है. एक रचनाकार होते हए मुझे  माया एन्जेलो के लेखन के इस अनोखे और व्यापक  पक्ष में शामिल हो कर इन ( tried and tested ) व्यंजन विधियों का अनुवाद करके खुशी हो रही है. 

१. केक बनाने की इस विधि  को माया एंजेलो की पाक-कला पर पहली लिखी पुस्तक ‘Hallelujah! The Welcome Table’ से लिया गया है. चाहे तो  लेखिकाएं और लेखक भी खुशी-खुशी इन्हें आजमा सकते हैं...  

सामग्री
1/2 कप मक्खन
1 1/4 कप चीनी 
1/4 कप चाश्नी
2 कप बेकिंग पाउडर
2 कप छना आटा
1 कप दूध
2 बड़े अंडे
कैरेमल फ्रोस्टिंग                

विधि
1. सबसे पहले ओवेन को 375 डिग्री पर गर्म कर लें और 8 इंच गोल केक के बर्तन को चिकना कर रख लें.
2. अब मक्खन को फेंट लें और धीर-धीरे उसमें 1 कप  चीनी डालें और फेंटते रहें जब तक कि वह् हलका और झागदार ना हो जाये. अब इसमें चाश्नी डालें और फिर से फेंटें.
4. एक दूसरे बर्तन में आटा और बेकिंग पाउडर, और चुटकी भर नमक छाने, इस आटे के मिश्रण को दूध डालते हुए मक्खन के मिश्रण में मिला दें.
5. किसी तीसरे बर्तन में अंडों को फेंटें और उसमें बची हुई ¼  कप चीनी मिला लें और तब तक फेंटते रहें जब तक कि वह् गाढ़ा हो जाये. फिर उसमें फेंटा आटा मिला दें और फिर फेंटें ताकि पूरा मिश्रण एकरस हो जाय.
6. चिकनाई लगे बेकिंग मोल्ड्स में मिश्रण को बराबर-बराबर भरें और तब तक बेक करें कि वह् बीच से दबाने पर 25 मिनट में वापिस न उठ जाय. यदि केक वापिस ऊपर नहीं उठता है, तब फिर से ओवन में रख कर 10 मिनट तक पकाएँ. 
7. केक को उन्हीं बर्तनों में 10 मिनट तक ठंडा होने दें. फिर रेक पर रख ठंडा कर कमरे के तापमान तक आने दें.
कैरेमल फ्रोस्टिंग की तहें लगा कर ठंडा या कमरे के तापमान  पर ही परोसें. 

२. माया द्वारा बनाई गयी दूसरी व्यंजन विधि.
(केले का  व्यंजन) 
सामग्री 
3/4 कप +1 बड़ा चम्मच चीनी
1/3 कप कॉर्न स्टार्च
चुटकी भर नमक
3 कप दूध
8 अंडे पीला,सफेद भाग अलग किए हुए
3 बड़े चम्मच मक्खन
1 चम्मच वैनीला एसेंस
3 कप वैनीला वेफर 
4 पके बड़े केले
1/2 चम्मच टार्टर क्रीम 

विधि:
1. ओवन को 350 डिग्री फरेन्हाइट पर गर्म करें. बड़े बर्तन में 1/3 कप चीनी, कॉर्न स्टार्च और नमक को तब तक छाने कि वे अच्छी तरह मिल जाएँ फिर दूध मिलाएं. 
2. मध्यम आँच पर पकाएँ धीरे-धीरे तब तक मिलाते रहें कि वह् उबलते हुए गाढ़ा कस्टर्ड हो जाये. 1 मिनट और उबालें.
3. एक छोटे बर्तन में अंडे की जर्दी फेंटें, फिर इसे 1/2 कप गर्म कस्टर्ड में अच्छी तरह मिलाएं.  इस पीले भाग के मिश्रण को कस्टर्ड के बर्तन में पलट दें, माध्यम आँच पर हिलाते हुए 2 मिनट तक पकाएँ.
4. वैनीला वेफर को एक उथले बर्तन में फैलाएँ. ऊपर केले के टुकड़े डालें और साथ में कस्टर्ड भी डाल दे, इस तरह तह लगाती जाएँ.
5. बड़े बर्तन में अंडों की सफेदी और 1/4 कप चीनी फेंटें उसमें टार्टर क्रीम मिला कर फिर अच्छी तरह पकाएं ताकि ऊपर से भूरा हो जाये
6. पुडिंग को ओवन से निकाल एक घंटे तक ठंडा करें. फिर 4 घंटे तक फ्रिज में रखें. ठंडा होने पर परोसें. 
                        :: :: :: :: 
विपिन चौधरी के दो कविता-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. उनसे vipin.choudhary7@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है. 

Tuesday, May 3, 2011

माइआ अंजालो : गुजरता वक़्त


आज अश्वेत अमेरिकी कवियत्री माइआ अंजालो की यह छोटी सी कविता आपके सामने पेश कर रहा हूँ जो मुझे बहुत पसंद है... 














गुजरता वक़्त  : माइआ अंजालो 

(अनुवाद : मनोज पटेल)

तुम्हारी चमड़ी जैसे सुबह 
मेरी जैसे शाम.

एक प्रतीक है उस शुरूआत का 
जिसका अंत निश्चित है.

दूसरी, उस अंत का 
जिसकी शुरूआत निश्चित है.  






Monday, May 2, 2011

माइआ अंजालो की कविता


माइआ अंजालो की एक और कविता... 
















वे पूछते हैं क्यों : माइआ अंजालो 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

किसी ख़ास शख्स को ताज्जुब होता था कि 
मेरे जैसी लम्बी-चौड़ी और मजबूत इरादों वाली लड़की 
सामान्य वेतन वाली 
कोई नौकरी क्यों नहीं करती.
थोड़ा वक़्त लिया मैनें उसे समझाने में 
और हर पृष्ठ पढ़कर उसे सुनाने में.
न्यूनतम लोग भी 
न्यूनतम वेतन पर गुजारा नहीं कर सकते. 

किसी ख़ास शख्स को ताज्जुब होता था कि 
क्यों मैं पूरे हफ्ते तुम्हारा इंतज़ार करती हूँ.
मेरे पास लफ्ज़ नहीं थे 
तफसील से सिर्फ यह बयान करने के लिए भी कि तुम क्या करते हो.
मैनें कहा कि समुद्र की गति है 
तुम्हारी चाल में,
और जब तुम बूझते हो मेरी पहेलियाँ 
तुम्हें मुंह से कुछ बोलना तक नहीं पड़ता. 

Saturday, April 30, 2011

माइआ अंजालो : बेचारी लड़की


माइआ अंजालो की कविताओं के क्रम में आज उनकी यह कविता... 











बेचारी लड़की  :  माइआ अंजालो

(अनुवाद : मनोज पटेल) 

तुम्हें कोई और प्रेमिका मिल गई है 
मैं जानती हूँ यह बात 
कोई जो पूजा करती है तुम्हारी 
बिलकुल मेरी तरह 
तुम्हारे शब्दों को चुनती हुई 
जैसे कि सोना हों वे 
यह मानती हुई कि वह समझती है 
तुम्हारा मन 
बेचारी लड़की 
बिलकुल मेरी तरह.

तुम तोड़ रहे हो एक और दिल 
मैं जानती हूँ यह बात 
और कुछ नहीं कर सकती मैं 
इस बारे में 
अगर उसे बताने की कोशिश करूँ 
जो मैं जानती हूँ तुम्हारे बारे में 
वह मुझे गलत समझेगी 
और मुझे निकाल बाहर करेगी 
बेचारी लड़की 
बिलकुल मेरी तरह.

तुम उसे भी छोड़ दोगे 
मैं जानती हूँ यह बात 
वह कभी नहीं जान पाएगी 
कि तुम क्यों चले गए 
रोया करेगी वह और सोचेगी 
कहाँ गड़बड़ हो गई 
फिर वह शुरू करेगी 
इस गीत को गाना 
बेचारी लड़की 
बिलकुल मेरी तरह. 

Thursday, April 28, 2011

माइआ अंजालो : ताजुब्ब


माइआ अंजालो की यह छोटी सी कविता देखिए... 















ताजुब्ब : माइआ अंजालो 

(अनुवाद : मनोज पटेल) 


एक दिन 
वर्तमान के अमृत को 
पीकर 
अपना रास्ता बुनता है 
तमाम वर्षों के बीच से 
खुद को रात के 
मामूली घर में सुला देने 
और फिर कभी न देखे जाने के लिए.

क्या मैं 
कुछ कम मरी होऊंगी 
क्योंकि मैनें यह कविता लिख डाली 
या तुम कुछ ज्यादा 
क्योंकि इसे पढ़ा तुमने 
अब से सालों बाद.  
Maya Angelou ki Kavita ka Hindi Anuvad 

Wednesday, April 27, 2011

माइआ अंजालो : मर्द


आज माइआ अंजालो की एक और कविता...















मर्द  :  माइआ अंजालो 

(अनुवाद : मनोज पटेल) 


जब मैं छोटी थी, परदे के पीछे से 
देखा करती थी मर्दों को 
सड़क से आते-जाते. पियक्कड़ मर्द, बूढ़े मर्द.
जवान मर्द सरसों की तरह तेज.
उन्हें देखो. मर्द हमेशा 
कहीं न कहीं जा रहे होते हैं. 
उन्हें पता होता था मेरी मौजूदगी के बारे में.
पंद्रह साल की और उनके लिए तड़पती हुई. 
वे ठिठकते मेरी खिड़की के पास,
ऊंचे उठे हुए उनके कंधे जैसे 
किसी जवान लड़की के वक्ष,
उनकी जैकेट का पिछ्ला हिस्सा जैसे 
धौल जमाता हुआ पीछे वालों को,
मर्द. 
किसी दिन वे तुम्हें थामते हैं अपनी 
हथेलियों में, आहिस्ता से, जैसे तुम 
आखिरी कच्चा अंडा होओ इस दुनिया की. फिर 
वे कड़ी करते हैं अपनी पकड़. बस थोड़ी सी. पहला 
दबाव अच्छा लगता है. एक फुर्तीला आलिंगन.
तुम्हारी असहायता में बहुत कोमल. थोड़ा और.
अब तकलीफ शुरू होती है. ओढ़ लो एक मुस्कराहट 
जो फिसलती है डर के आस-पास. जब हवा गायब हो जाती है,
तुम्हारा दिमाग तड़क जाता है, तेजी से फटता हुआ,
थोड़ी देर के लिए ही सही,
जैसे किसी माचिस की तीली का सिरा. चूर-चूर.  
यह तुम्हारा रस है 
जो बहता है उनकी टांगों से. दाग लगाता हुआ उनके जूतों पर.
जब पृथ्वी फिर से सही कर लेती है खुद को,
और जुबान पर लौटने की कोशिश करता है स्वाद,
तुम्हारी देंह जोर से बंद हो जाती है. हमेशा के लिए. 
जिसकी कोई चाभी नहीं होती वजूद में.

तब खिड़की पूरी तरह खुलती है 
तुम्हारे दिमाग पर. वहां, बस झूलते परदे से परे,
मर्द चल रहे हैं.
कुछ जानते हुए.
कहीं जाते हुए.
मगर इस बार, तुम बस 
देखा करोगी चुपचाप खड़ी. 

शायद.  
Maya Angelou Poems in Hindi Translation 

Sunday, April 24, 2011

आज छोड़ ही दूंगी ज़िंदा रहना
















आखिरी फैसला  :  माइआ अंजालो 

(अनुवाद : मनोज पटेल)


इतनी छोटी छपाई, तकलीफदेह है मेरे लिए.
पृष्ठ पर अस्थिर सी काली चीजें.
कुलबुलाते हुए मेढक हर ओर.
जानती हूँ कि यह मेरी उम्र की वजह से है.
मुझे पढ़ना छोड़ ही देना पड़ेगा.

इतना गरिष्ट है भोजन, मेरा मन फेर देता हुआ.
इसे गर्मागर्म निगलूँ या फिर जबरन ठूंस लूं ठंडा करके,
और पूरे दिन इंतज़ार करूँ जबकि यह अटका पड़ा हो मेरे हलक में. 
थक गई हूँ मैं, पता है कि बूढ़ी हो गई हूँ.
मुझे भोजन करना छोड़ ही देना पड़ेगा. 

मुझे थका दे रही है अपने बच्चों की सहानुभूति.
मेरे बिस्तर के पास खड़े हो वे हिलाते हैं अपने होंठ,
और मैं एक शब्द भी नहीं सुन पाती.
मुझे छोड़ ही देना होगा सुनना. 

इतनी आपा-धापी है ज़िंदगी में, मुझे पस्त कर देती है यह.
सवाल और जवाब और बोझिल विचार.
मैं कर चुकी हूँ जोड़, घटाव और गुणा सब,
और सारी गणनाओं का नतीजा शून्य ही निकला है.
आज छोड़ ही दूंगी ज़िंदा रहना.   

Tuesday, April 12, 2011

माइआ अंजालो : कफस के पंछी का गीत


पढ़ते-पढ़ते पर आप माइआ अंजालो की कविताएँ पढ़ते रहे हैं. आज मनीषा कुलश्रेष्ठ के सौजन्य से उनके गद्य की एक बानगी  -  कफस के पंछी का गीत  












कफस के पंछी का गीत : माइआ अंजालो 
(अनुवाद : मनीषा कुलश्रेष्ठ) 

मेरी मां के प्रेमी मि. फ्रीमैन हमारे साथ रहा करते थे या हम उनके साथ रहा करते थे, तब मैं इस बारे में ठीक से नहीं जानती थी. वे भी दक्षिणी थे, विशालकाय और कुछ थुलथुल. जब भी वे बनियान में घूमा करते, मुझे उनका सीना देख कर शर्मिन्दगी होती, वह औरतों की सपाट छातियों जैसा था.
यदि मेरी मां इतनी सुंदर स्त्री न भी होती - गोरी, सीधे बालों वाली. तब भी वह उन्हें पाकर भाग्यशाली होते यह वह खूब जानते थे. वे शिक्षित थीं और एक प्रतिष्ठित परिवार से सम्बध्द थीं, आखिरकार वह सेन्ट लुईस की पैदाईश नहीं थीं क्या! फिर वे खुशमिजाज थीं. वे हरदम हंसती रहतीं और चुटकुले सुनातीं. वे आभारी थे. मेरे ख्याल से वे मां से उम्र में काफी बडे रहे होंगे. अन्यथा उन्हें सुस्त किस्म की हीन भावना क्यों होती जो कि एक अधेड़  आदमी को अपने से जवान औरत से विवाह करके होती है. वे उनकी हर हरकत, हर गति पर निगाह गाड़े रखते, जब वे कमरे से चली जातीं तो उनकी आंखें उन्हें बेमन से जाते देखतीं.

मैं ने तय कर लिया था कि सेंट लुईस मेरा अपना देश नहीं है. मैं टॉयलेट में तेज ग़ति में फ्लश चलने की आवाज या डब्बाबन्द खानों की और दरवाजों की घंटियों, कारों, रेलों - बसों के शोर की आदी नहीं हो सकी थी,जो कि दीवारों को फोड़ता हुआ या दरवाजों से रेंगता हुआ अन्दर आता था. मेरे दिमाग के हिसाब से, मैं केवल कुछ ही सप्ताह सेंट लुईस में रही होऊंगी. जैसे ही मुझे अहसास हो गया कि मैं अपने घर पर नहीं या ये सब मेरे नहीं है मैं कायरों की तरह रॉबिन हुड के जंगलों और ऐली ओप की वादियों में जा उतरती थी, जहां वास्तविकता अवास्तविकता में बदल जाती थी और यहां तक कि वह हर दिन बदलती रहती थी. मैं यह सुरक्षा कवच हमेशा साथ रखती थी, बल्कि इसे स्टांप की तरह इस्तेमाल करती थी कि - मैं यहां रहने नहीं आई हूँ.

मेरी मां हमें सर्व सुख - सुविधाएं देने में सक्षम थी. इसका मतलब यह भी लगा सकते हैं कि अगर किसी को पटा कर हमें सब कुछ मुहैय्या करवाना ही क्यों न हो. हालांकि वह नर्स थी, लेकिन जब तक हम उसके साथ रहे उसने अपने पेशे से सम्बध्द तो कोई काम नहीं किया. मि. फ्रीमैन जरूरतों की पूर्ति के लिए लाए गए थे और हमारी मां ने जुआघरों में पोकर खेलकर अतिरिक्त पैसा बना लिया था. सीधी - सादी आठ से पांच की दुनिया उनको आकर्षित करने के लिए नाकाफी थी. यह उसके बीस साल बाद की बात है जब मैं ने उन्हें पहली बार नर्स की पोशाक में देखा था.

मि. फ्रीमैन दक्षिण पैसिफिक यार्ड में फोरमैन थे और कभी कभी देर से घर लौटा करते थे. मां के चले जाने के बाद. वे स्टोव से अपना रात का खाना उठाते, जिसे मां ने ध्यान से ढककर रखा होता था, हमारे लिए इस अपरोक्ष चेतावनी के साथ कि तुम्हें इस सब की परवाह करने की जरूरत नहीं है. वे चुपचाप रसोई में खाना खाते जबकि मैं और बैली अलग - अलग और एकदम लालचियों की तरह अपनी - अपनी 'स्ट्रीट एंड स्मिथ' नामक घटिया किस्म की किताबें पढा करते. अब जबकि हम अपना पैसा खर्चते ही थे,तो हम ऐसी सचित्र पेपरबैक किताबें खरीदते जिनमें भडक़ीली तस्वीरें होतीं. जब मां घर पर नहीं होतीं तो हमें एक सुविधाजनक व्यवस्था बनानी होती थी. हमें होमवर्क खत्म करके, खाना खाकर, प्लेटें धोनी होती थीं ताकि हम ' द लोन रेंजर', 'क्राईम बस्टर्स' या 'द शेडो' पढ़ या सुन सकें.

मि. फ्रीमैन सौजन्यता के साथ ऐसे अन्दर आते जैसे एक बडा भूरा भालू और कभी - कभार ही हमसे बात करते. वे बस मम्मी का इंतजार करते और खुद को समूचा उनके इंतजार में झौंक देते. वे कभी अखबार नहीं पढते थे और न ही रेडियो के संगीत पर अपने पैर थिरकाते थे. वे प्रतीक्षा करते थे. बस सिर्फ यही.

अगर वे हमारे बिस्तरों में घुसने से पहले घर लौट आतीं तो हम उस व्यक्ति को जीवंत पाते. वे बडी क़ुर्सी से ऐसे उठते जैसे कोई आदमी नींद से उठता है, मुस्कुराते. तब मुझे याद आता कि कुछ ही सैकेण्ड पहले मुझे कार के दरवाजे बन्द होने की आवाज सुनाई दी थी, फिर मम्मी के कदमों की आहट का संकेत. जब मम्मी की चाबी दरवाजे में घूमती मि. फ्रीमैन आदतन वही अपना प्रश्न पहले ही पूछ चुके होते थे - 'हे, बिब्बी, समय अच्छा बीता?'
उनका यह सवाल हवा में अटका रह जाता, तब तक मां लपक कर उनके होंठों का चुंबन ले रही होती थीं. फिर वे बैली और मेरी तरफ अपने लिप्स्टिक लगे चुम्बनों के साथ मुड्तीं , '' तुमने अभी तक होमवर्क नहीं किया?'' अगर हम पढ़ रहे होते तो कहतीं - '' अच्छा अपनी प्रार्थनाएं बोलो और सोने चलो.'' अगर हम पढ़ नहीं रहे होते तो कहतीं - '' चलो अपने कमरे में जाओ, अपना काम पूरा अपनी प्रार्थनाएं बोलो और सो जाओ.''

मि. फ्रीमैन की मुस्कान में कभी घटा - बढ़ी नहीं हुई, वह लगभग उतनी ही सघन बनी रही. कभी - कभी मम्मी उनकी गोद में चढ़ क़र बैठ जाती तो उनके चेहरे की मुस्कान ऐसे लगती कि जैसे वह उनके चेहरे पर सदा के लिए चिपक गयी है.

हम अपने कमरों से ग्लासों के टकराने की और रेडियो चलाए जाने की आवाज सुन पाते थे. मैं सोचती थी कि वे जरूर सोने से पहले उनके लिए नाचती थीं, क्योंकि उन्हें नाचना नहीं आता था. लेकिन अकसर नींद में डूबने से पहले मुझे नृत्य की ताल पर पैरों की थिरकन सुनाई देती.

मुझे मि. फ्रीमैन पर तरस आता. मुझे मि फ्रीमैन पर वैसा ही तरस आता जैसा कि आर्केनसास में अपने घर के पिछवाड़े बने सुअरबाड़े में जन्मे सुअर के नन्हें बच्चों पर आता था. हम उन सुअरों को पूरे साल खिला - पिला कर सर्दियों की पहली बर्फबारी में काटे जाने के लिए मोटा करते, हालांकि उन प्यारे नन्हें कुलबुलाते जीवों के लिए मैं ही थी जो दुखी होती थी, और मैं यह भी जानती थी कि ताजा सॉसेजेज और सुअरों के भेजे का मजा भी मैं ही लेने वाली हूँ, जो कि उनके मरे बिना मुझे नहीं मिलने वाला है.

हमारी पढ़ी हुई उन सनसनीखेज क़हानियों और हमारी प्रबल कल्पनाओं या शायद हमारी संक्षिप्त मगर बहुत तेज रफ्तार जिन्दगी की यादों की वजह से बैली और मुझ पर बुरा असर पडा था - उस पर शारीरिक तौर पर, मुझ पर मानसिक तौर पर. वह हकलाने लगा था और मैं भयानक सपनों से पसीने - पसीने हो जाया करती थी. उसे लगातार समझाया जाता कि - धीरे - धीरे बोलो और फिर से बोलना शुरु करो. मेरी उन विशेष बुरी रातों में मम्मी मुझे अपने अपने साथ, उस विशाल बिस्तर पर मि. फ्रीमैन के साथ सोने के लिए ले जाती. स्थायित्व की आवश्यकता के लिए बच्चे जल्दी ही आदतों के आदी जीव बन जाते हैं. तीन बार मां के बिस्तर पर सोने के बाद मुझे लगने लगा था कि वहां सोने में कुछ भी अजीब नहीं है.

एक सुबह, एक शीघ्र बुलावे पर वे बिस्तर से जल्दी उठ गयीं और मैं दुबारा सो गयी थी. लेकिन एक दबाव और अपने दांए पैर पर एक अजीब से स्पर्श से मैं जाग गयी. वह हाथ से कहीं मुलायम था, और वह कपडे क़ा स्पर्श बिलकुल नहीं था. वह जो भी था वैसे उद्दीपन का अनुभव मुझे मां के साथ इतने वर्षों सोते हुए कभी महसूस नहीं हुआ था. वह हिल नहीं रहा था और मैं दम साधे हुए थी. मैंने मि. फ्रीमैन को देखने के लिए अपना सिर जरा सा बायीं तरफ घुमाया कि वे उठ कर चले गए कि नहीं,लेकिन उनकी आंखें खुली थीं और दोनें हाथ चादर के ऊपर थे. मुझे पता था, जैसे कि मैं हमेशा से जानती होऊं, कि यह उनकी वह 'चीज' थी जो मेरे पैर पर सटी थी.
उन्होंने कहा, '' ऐसे ही लेटी रहो, रिटी, मैं तुम्हें चोट नहीं पहुंचाऊंगा.''
मैं डर नहीं रही थी, शायद कुछ आशंकित सी थी मगर डरी तो नहीं थी. हाँ, बेशक जानती थी, बहुत से लोग 'ये' किया करते थे और वे अपना काम पूरा करने के लिए, अपनी इस ' चीज' क़ो इस्तेमाल करते थे, लेकिन, मैं कभी ऐसे किसी को नहीं जानती थी जिसने इसे किसी और के साथ किया हो. मि. फ्रीमैन ने मुझे अपने पास खींच लिया और अपना हाथ मेरे पैरों के बीच डाल दिया. उन्होंने चोट नहीं पहुंचाई, मगर मम्मी ने मेरे दिमाग में यह बात अच्छी तरह से डाल रखी थी कि, '' अपनी टांगे हमेशा भींच कर रखनी हैं और किसी को भी अपनी 'पॉकेट बुक' देखने नहीं देनी है.''
'' देखो, मैंने तुम्हें अभी चोट नहीं पहुंचाई ना, डरो मत.'' उन्होंने कम्बल पीछे को पटक दिया और उनकी वह 'चीज' भूरे भुट्टे की तरह सीधी खड़ी थी. उन्होंने मेरा हाथ पकडा और कहा, '' इसे महसूस करो.'' वह ताजे कटे हुए मुर्गे की अन्दरूनी हिस्से की तरह लिजलिजी और गिलगिली थी.
फिर उन्होने मुझे अपने सीने के ऊपर अपनी बांई बांह से खींच लिया, उनका सीधा हाथ इतना तेज चल रहा था और उनका दिल इतना तेज धड़क रहा था कि मुझे डर लगा कि वे मरने वाले हैं. भूतों की कहानियों में होता है कि किस तरह मरने वाले लोग, अपने मरते वक्त जिस किसी चीज क़ो पकड़े होते हैं उसे जकड़ लेते हैं. मैं आतंकित थी कि अगर मि. फ्रीमैन मुझे जकड़े - जकड़े ही मर गया तो मैं कैसे मुक्त हो पाऊंगी? क्या मुझे छुड़ाने के लिए लोग उनकी बांह तोड़ डालेंगे ?

अंतत: वे शांत हो गए, फिर एक अच्छी बात हुई, उन्होंने मुझे बहुत नर्म तरीके से आलिंगित किया कि मेरा मन करने लगा कि वे मुझे कभी न छोड़ें. मुझे अपना - सा महसूस हुआ. जिस तरह उन्होंने मुझे सहेजा हुआ था, मैं जानती थी कि वे मुझे कभी नहीं जाने देंगे या कभी मेरे साथ कुछ बुरा नहीं होने देंगे. हो सकता है कि यही मेरे पिता हों और आखिरकार हमने एक दूसरे को पा लिया हो. लेकिन फिर वे पलटे और मुझे गीले स्थान पर छोड क़र उठ गए.

'' मुझे तुमसे बात करनी है रिटी.'' उन्होंने अपने शॉर्ट्स को ऊपर खींचा जो कि उनकी एड़ियों में जा गिरा था और बाथरूम में जा घुसे. ये सच था कि बिस्तर गीला था, लेकिन मुझे पता था कि मैं 'बिस्तर गीला करने' जैसा कुछ भी नहीं किया है. हो सकता है मि फ्रीमैन के साथ ऐसा हो गया हो जब वे मुझे जकड़े हुए थे. वे एक ग्लास पानी के साथ वापस लौटे और मुझसे खीजी हुई आवाज में कहा , '' उठो तुमने बिस्तर में सूसू कर दिया है.''
उन्होंने गीले हिस्से पर पानी डाला, और मेरे वाले गद्दे पर वह निशान कई सुबहों तक वैसा ही दिखता रहा.

दक्षिणी अनुशासन में रहने के कारण मैं जानती थी कि कब बड़ों के सामने चुप रहना है, लेकिन मैं उनसे पूछना चाहती थी कि उन्होंने ये क्यों कहा कि मैं ने बिस्तर गीला किया है, जबकि मुझे पक्का पता था कि उन्हें खुद भी इस बात का यकीन नहीं था. मगर उन्होंने यह सोच लिया कि मैं बदतमीज हूँ तो, इसका मतलब, क्या वे मुझे फिर कभी उस प्यार से गले नहीं लगाएंगे?  या कभी यह नहीं जताएंगे कि वे ही मेरे पिता है. मैं ने उन्हें अपने बारे में शर्मिन्दा कर दिया है.

''रिटी, क्या तुम बैली से प्यार करती हो?'' वे बिस्तर पर बैठ गए और मैं उछलती - कूदती हुई उनके पास आई  - '' हाँ.''
वे झुक कर अपने मोजे पहन रहे थे, उनकी पीठ इतनी विशाल और दोस्ताना - सी थी कि मेरा मन चाहा कि मैं उस पर अपना सिर टिका दूं.
''अगर तुमने किसी से भी कहा कि हमने क्या किया है, तो मुझे बिली को मार डालना पडेग़ा.''
हमने क्या किया? हमने! जाहिर है उनका मतलब मेरे बिस्तर पर सूसु कर देने से तो नहीं है. मैं समझी नहीं, न ही मेरी हिम्मत हुई उनसे पूछने की. जरूर इसका मतलब मुझे गले लगाने से होगा. लेकिन मैं बैली से भी पूछ नहीं सकती थी, क्योंकि उसे वह सब बताना पड़ता जो हमने किया था. वह बैली को मार सकता है, यह विचार ही मुझे सहमा गया था. उनके कमरे से जाने के बाद मैं ने मम्मी को यह बताने की सोची कि मैं ने बिस्तर गीला नहीं किया था, लेकिन अगर उन्होंने पूछा कि हुआ क्या था तो मुझे उन्हें मि. फ्रीमैन के सीने से लगाने की बात बतानी पडेग़ी, और उससे बात नहीं बनेगी.

अब यह वही पुराना असमंजस था, जिसे मैं ने हमेशा जिया था. यहां बड़ों की फौज थी, जिनके इरादे और हरकतें मैं समझ ही नहीं पाती थी और जिन्होंने मेरी बातें समझने की कोई जहमत तक नहीं उठाई. मेरे मि. फ्रीमैन को नापसंद करने का कोई प्रश्न नहीं था, शायद मैं बस उन्हें समझने में नाकाम रही.

कई हफ्तों बाद तक उन्होंने कुछ नहीं कहा, केवल उन उजड्ड से नमस्ते के जवाबों के सिवा जो उन्होंने मेरी तरफ देखे बिना दिए थे.

यह पहला ही राज था जिसे मैंने बैली से छिपाया था और कभी कभी मैंनें सोचा कि वह इसे मेरे चेहरे पर पढ़ लेगा लेकिन उसे कुछ पता नहीं चला.

मैं मि. फ्रीमैन और उनकी बड़ी - बड़ी बांहों के घेरे के बिना अकेला महसूस करने लगी थी. इसके पहले बैली, खाना, मम्मी, दुकान, किताबें पढ़ना और अकंल विली ही मेरा संसार हुआ करते थे. अब पहली बार मैंने इसमें शारीरिक स्पर्श को शामिल किया था.

मैंने मि. फ्रीमैन के यार्ड से लौट कर आने का इंतजार करना शुरु कर दिया था, लेकिन जब वे आते तो मेरी तरफ ध्यान ही नहीं देते थे, हालांकि मैं ढेर सा अपनत्व भर कर उन्हें '' गुडईवनिंग, मि फ्रीमैन.'' जरूर कहती.

एक शाम, जब मैं अपना मन कहीं नहीं लगा पा रही थी तो मैं उनके पास जाकर उनकी गोद में चढ़ क़र बैठ गई.वे पहले की तरह मम्मी का इंतजार कर रहे थे. बैली 'द शैडो' सुन रहा था और उसे मेरी जरूरत नहीं थी. पहले तो मि. फ्रीमैन स्थिर बैठे रहे, मुझे बिना जकड़े या बिना कुछ किए, तभी मुझे अपनी जांघों के नीचे एक मुलायम मांसल पिण्ड के हिलने का अहसास हुआ. वह मुझसे हल्के - हल्के टकरा रहा था और कड़ा होता जा रहा था. तब उन्होंने मुझे अपने सीने पर खींच लिया. उनमें से कोयले के बुरादे और ग्रीस की महक आ रही थी, और इतना करीब थे कि मैंने अपना सिर उनकी कमीज में धंसा लिया था और उनके दिल की धड़कन सुन रही थी, वह सिर्फ मेरे लिए धड़क रहा था. केवल मैं उस धमक को सुन पा रही थी, मैं उसकी उछाल को अपने चेहरे पर महसूस कर पा रही थी.उन्होंने कहा, '' टिक कर बैठो, कुलबुलाओ मत.'' लेकिब पूरे वक्त, वे ही तो मुझे अपनी गोदी में धक्का देते रहे थे, फिर अचानक वे खड़े हो गए और मैं फर्श पर फिसल गई. वे बाथरूम की तरफ भागे.

महीनों के लिए उन्होंने फिर से मुझसे बात करना बन्द कर दिया था. मैं आहत थी और एक समय के लिए तो मैं पहले से कहीं ज्यादा अकेला महसूस करने लगी थी. लेकिन फिर में उनके बारे में भूल चुकी थी, यहां तक कि उनके मुझे गले लगाने का वह प्रिय अहसास भी बचपन की आंखों पर बंधे पट्टे के पीछे के उन सहज अंधेरों में पिघल कर खो गया था.

मैं पहले से ज्यादा पढ़ने लगी, और अपनी आत्मा में यह प्रार्थना करती कि काश मैं लड़का बनकर पैदा हुई होती. होरेशियो एल्गर विश्व के महान लेखक थे. उनके नायक हमेशा अच्छे होते थे, हमेशा जीता करते थे और हमेशा लड़के ही होते. मैं स्वयं में पहले दो गुण तो विकसित कर सकती थी, लेकिन लड़का बनना असंभव नहीं तो निश्चित तौर पर आसान तो नहीं था.

' द सण्डे फनीज' मुझे प्रभावित करते थे, हालांकि मुझे शक्तिशाली नायक पसंद थे जो हमेशा अंत में विजय पाया करते थे. मैं स्वयं को 'टाइनी टिम' से जोड़ा करती. बाथरूम में जहां मैं अखबार ले जाया करती थी, वहां उसके गैरजरूरी पन्ने हटाना और देखना यंत्रणादायी होता था कि मैं जान सकूं कि अंतत: कैसे वह अपने नए विरोधी से जीत सका. मैं हर इतवार इस राहत से रोया करती कि वह दुष्ट आदमियों के चंगुल से बच निकला और अपनी संभावित हार की सीमाओं से फिर बाहर आ खड़ा हुआ, हमेशा की तरह प्यारा और सौम्य. ' द कैटजेनजेमर किड्स' मजेदार थे क्योंकि वे वयस्क लोगों को मूर्ख साबित कर दिया करते थे. लेकिन मेरी रुचि के विपरीत वे कुछ ज्यादा ही चतुर - चालाक थे.

जब सेंट लुईस में बसंत आया, तो मैं ने अपना पहला लाईब्रेरी कार्ड बनवाया, और जब से मैं और बैली अलग - अलग बड़े होने लगे थे, मैं ने अपने ज्यादातर शनिवार लाईब्रेरी में ( बिना व्यवधान के ) निर्धन, बूट पॉलिश करने वाले लड़कों की दुनिया में सांस लेते हुए बिताए थे, जो कि अपनी नेकी और लगातार मेहनत के साथ अमीर, बेहद अमीर बनते हैं और छुट्टी के दिन डलिया भर - भर कर सामान गरीबों में बांटते हैं. एक छोटी राजकुमारी जिसे गलतफहमी में नौकरानी समझ लिया गया था, खोए हुए बच्चे जिन्हें लावारिस समझ लिया गया था मेरे लिए अपने घर, अपनी मम्मी, स्कूल और मि. फ्रीमैन से ज्यादा वास्तविक हो चले थे.

उन महीनों के दौरान, हम अपने नाना - नानी और मामाओं से मिले. ( हमारी एकमात्र मौसी कैलीफोर्निया में अपना भविष्य बनाने चली गई थीं.) लेकिन वे ज्यादातर एक ही प्रश्न पूछते - '' तुम अच्छे बच्चे बने रहे न?'' जिसके लिए हमारे पास एक ही उत्तर था. यहां तक कि बैली भी कभी 'ना' कहने का दु:साहस न कर सका.


मनीषा कुलश्रेष्ठ

जन्म : 26 अगस्त 1967, जोधपुर
शिक्षा – बी.एससी., एम. ए. (हिन्दी साहित्य), एम. फिल., विशारद ( कथक)
प्रकाशित कृतियाँ –
कहानी संग्रह - कठपुतलियाँ, कुछ भी तो रूमानी नहीं, बौनी होती परछांई
केयर ऑफ स्वात घाटी (संग्रह शीघ्र प्रकाश्य)
उपन्यास-  शिगाफ़ ( कश्मीर पर), ‘शालभंजिका’
नया ज्ञानोदय में इंटरनेट और हिन्दी पर लिखी लेखमाला की पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य.
अनुवाद – माया एँजलू की आत्मकथा ‘ वाय केज्ड बर्ड सिंग’ के अंश, लातिन अमरीकी लेखक मामाडे के उपन्यास ‘हाउस मेड ऑफ डॉन’ के अंश, बोर्हेस की कहानियों का अनुवाद
अन्य : हिन्दीनेस्ट के अलावा, वर्धा विश्वविद्यालय की वेबसाईट ‘हिन्दी समय. कॉम’ का निर्माण, संगमन की वेबसाईट ‘संगमन डॉट कॉम’ का निर्माण व देखरेख.
पुरस्कार व सम्मान :  चन्द्रदेव शर्मा नवोदित प्रतिभा           पुरस्कार – वर्ष 1989 ( रा. साहित्य अकादमी)
कृष्ण बलदेव वैद फैलोशिप – 2007
डॉ. घासीराम वर्मा सम्मान – वर्ष 2009
रांगेय राघव पुरस्कार वर्ष 2010 ( राजस्थान साहित्य अकादमी)
संप्रति – स्वतंत्र लेखन और इंटरनेट की पहली हिन्दी वेबपत्रिका ‘हिन्दीनेस्ट’ का दस वर्षों से संपादन.
ई – पता – 
manisha@hindinest.com
 

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