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Sunday, June 5, 2011

फ़राज़ बयरकदार की कविता


फ़राज़ बयरकदार की एक और कविता... 

















जब तक तुम हो, मैं हूँ : फ़राज़ बयरकदार 

(अनुवाद : मनोज पटेल)


तुम भीतर आ सकते हो 
बगैर इजाजत 
और बगैर इजाजत जा भी सकते हो 
जब तक खुला हुआ है मेरा दिल 
और मैं रह सकता हूँ तुम्हारा कुबूलनामा 
जब तक तुम हो मेरी माफी,
तुम्हारा सवाल है 
मेरा जवाब,
तुम्हारी बारिशें हैं... 
मेरी बिजली की कौंध,
तुम्हारा समय...
मेरा स्थान - 
तो क्या मुझे माफी मांगनी होगी 
अगर अँधेरे में घिरी है 
तकदीर मेरी 
और मेरी ज़िंदगी घिरी है कविता से ? 
                    :: :: ::

Wednesday, May 25, 2011

फ़राज़ बयरकदार : जेल से एक कविता - 2

फ़राज़ बयरकदार की जेल में लिखी लम्बी कविता नामौजूदगी के आईने का पहला हिस्सा आप पढ़ चुके हैं. आज प्रस्तुत है इसी कविता के कुछ और अंश. 










नामौजूदगी के आईने : फ़राज़ बयरकदार 
(अनुवाद : मनोज पटेल)


40 
यह न तो तरफदारी है 
न ही शेखी 
इस दुनिया में या 
इसके बाद की दुनिया में 
इससे बड़ा 
और कोई कब्रिस्तान नहीं :
जिसे मैं कहता हूँ 
अपना देश 

41 
क्या होता है 
जब वे फाटक खोलते हैं ?
क्या होता है 
जब वे फाटक बंद करते हैं ?
जैसे कांच का एक भारी आसमान 
फाड़ दिया जाता हो सातवें आसमान से 
इसका गिरना पीसता है कानों को 
और कुछ नहीं सिर्फ खामोशी के बुलबुले 
और खनखनाहट 
समय के गले में 

42 
अगर खुद पर ही नहीं अख्तियार मेरा 
मुझे क्यों नहीं उम्मीद रखनी चाहिए 
असंभव से ?

47
भाग्यशाली हो तुम स्त्री 
पंख नहीं है मेरे पास 
कैसे तस्वीर बनाऊंगा मैं आकाश की ? 
आकाश नहीं है मेरे पास 
क्या करूंगा मैं पंख का ?

54 
एक अकेली चिड़िया ही काफी है 
आसमान को 
गिरने से रोकने के लिए 

57 
उसके होंठों पे मुस्कान है 
और आँखों में आंसू 
तस्वीर में से 
पुकारती है वह :
डैडी !

68 
एक-दो बार दम लेने के बाद 
बीते वक़्त की याद का प्याला 
छलकने और टूटने के बाद 
एक ईश्वर 
एक कुत्ते 
या एक तानाशाह के बाद 
मेरी माँ तह करेगी 
चौदह आसमान 
मेरी नामौजूदगी के बाद 

78 
वैज्ञानिक और पुजारी 
इतिहासकार और दार्शनिक 
भविष्यवक्ता, नेता और ज्ञानी 
धर्म,
पार्टियां, 
और सेनाएं 
मगर सत्य नहीं  

92 
काश कि मैं एक साथ पी पाता 
चार सिगरेटें :
जन्म 
प्रेम 
आजादी 
और मौत, 
जेलर 
मुझे पीने दो इन्हें !
और जारी रखो हमसे बातचीत 

93 
थोड़ी देर पहले 
मैनें एक संतरा निचोड़ा 
अपने दिल की तरह का 
उसमें दहकती हुई कुछ अल्कोहल मिलाई 
अतीत की तरह की 
एक गहरी सांस ली 
एक लम्बी और पतली सी सिगरेट सुलगाई 
जिसका धुंआ उस स्त्री की स्मृति की तरह है 
जिसे मैं कभी जानता था 
और फिर मुस्कराया 
खुद को हैरत में डालने के लिए 
नमस्कार ज़िंदगी 
नमस्कार दोस्तों 
नमस्कार मुझे भी 
आज रात मैनें न्योता है आप सबको 
अपनी कैद के 
पन्द्रहवें साल के उदघाटन के लिए 
आपमें से कौन 
काटेगा यह फीता 
कांटेदार बाड़ का ?
मेरी उदासी के लिए मुझे दोषी न ठहराइए !
मैं अपने लिए उदास नहीं हूँ 
बस दुखी हूँ कि 
कितने बच्चे जन्म ले चुके हैं इस बीच 
पीना चाहता था उनकी तंदरुस्ती के नाम 
और रोना चाहता था 
बीते वक़्त की याद में 

99 
मैं दाखिल हुआ था जेल में 
मरने के लिए 
पूरी तरह तैयार 
अब, जाने कितने सालों के बाद 
ख्वाब सजाया है मैनें विदाई का 
पूरी तरह तैयार होकर ज़िंदगी के लिए 

सयदनाया जेल 1997-2000 
                    :: :: :: 

Tuesday, May 24, 2011

फ़राज़ बयरकदार : जेल से एक कविता


फ़राज़ अहमद बयरकदार का जन्म 1951 में सीरिया में हुआ था. दमिश्क विश्विद्यालय से उन्होंने अरबी भाषा की शिक्षा ग्रहण किया. 1987 में वे सीरिया की खुफिया सेना द्वारा कम्युनिस्ट एक्शन पार्टी के सदस्य होने के संदेह में गिरफ्तार कर लिए गए. सात साल तक वे कारावास में रहे जहां उन्हें किसी से मिलने-जुलने की भी इजाजत नहीं थी. उन्हें यातना भी दी जाती थी. 1993 में उन्हें पंद्रह वर्षों के कारावास की सजा सुनाई गई. नवम्बर 2000 में उन्हें रिहा किया गया और 2005 से वे स्वीडन में रह रहे हैं. 
यह जेल में लिखी गई उनकी लम्बी कविता 'नामौजूदगी के आईने' के कुछ अंश हैं. मूल अरबी से अंग्रेजी में इसका अनुवाद कवि-कथाकार-अनुवादक सिनान अन्तून द्वारा किया गया है.   











नामौजूदगी के आईने : फ़राज़ बयरकदार 

(अनुवाद : मनोज पटेल)

ये आईने हो सकते थे 
खालिस बारिश 
या फिर खालिस खामोशी 
मगर चीजें पत्थर की बनी थीं 
देश और काल की झनझनाहट 
लहूलुहान थी 
उस चीज से जो पागलपन 
या ईश्वर से मिलती-जुलती थी 

1 
शुक्रिया 
उसके लिए जिसे जाना है 
शुक्रिया 
उसके लिए जिसे आना है 
शुक्रिया 
उसके लिए जो शिकार हो जाता है खामोशी का 
और कभी नहीं लौटता 
कभी नहीं 

4 
उसका दिल एक घंटी है 
उसकी देंह गिरजाघर 
आँखें बंद 
एक स्त्री पर 
जो पहने हुए है अपना ग़म 
आंसुओं की पूरी सभा थामे हुए 
उसकी वापसी के लिए 

7 
वे फुसफुसाए 
पागल के सिवा और कौन 
सान धरता है गुलाब पर  
और चाकू पर करता है दया ?
खदीजा, तुम्हारी उदासी की कंदीलें !
काश कि जान पाती तुम 
चीर डाले मैनें 
कितने गुलाब 
और कितने चाकू 
और कितनों ने 
चीर डाला मुझको 

9 
कोई आज़ादी नहीं है 
इस जगह के बाहर 
मगर यह रोता है 
जब कभी यह सुनता है चाभियों को 
अपने तालों में खिलखिलाते हुए 

10 
दीवार की सारी दरारें जो तुम देख रहे हो 
मेरी आँखों ने खोदी हैं 
सालों से 
इन्हें देख रही हैं ये 
कोई मतलब नहीं है इन्हें गिनने का 

11 
कोई समय 
बिना तारीखों का 
कोई जगह 
बिना दिशाओं की 
ऐ स्त्री 
बिजली की तरह घायल करती हुई 
लहूलुहान किसी गीत की तरह 
चली जाओ !
कुछ भी नहीं मौजूद 
नामौजूदगी के सिवा 

16 
सूरज नहीं है यहाँ 
अपने आप को नग्न पाता हूँ मैं 
बिना किसी छाया के 
कोई स्त्री भी नहीं यहाँ 
अपने आप को नग्न पाता हूँ मैं 
अपने आप के बिना 

23 
- यह किसका जनाजा है ?
चलते-चलते 
मैनें बूढ़े आदमी से पूछा 
- मेरे बेटे का 
उसने जवाब दिया 
और वहीं खड़ा हो गया 
कब्र के पत्थर की तरह 

31 
हाँ भगवान !
यह सीरिया है 
हम कैसे पहुंचाएं तुम तक 
अपनी संवेदनाएं 
किन बादलों से रोओगे तुम ?

34 
अब मेरी उम्र 46 नाच की हो चुकी है 
कब्र में पैर लटकाए 
उससे ज्यादा 
मुझे बयान नहीं करतीं मेरी कविताएँ 
जितना कि एक तीर बयान करता है 
अपने शिकार को 

37 
आज़ादी एक मातृभूमि है 
और निर्वासन है मेरा देश 
मैं अपना विलोम हूँ 
यह मेरा हलफ़नामा है 
मेरी माँ के दूध से लिखा हुआ 
और मेरी सारी बेड़ियों से मुहरशुदा 

38 
मैं कविता के भीतर छुप जाता हूँ 
और बाहर खोजता हूँ ख़ुद को 
मगर कभी-कभी बेईमानी करते हैं हम 
वह अपने बिस्तर पर बुलाती है मुझको 
मैं जाता हूँ 
वह अपने कपड़े उतारती है 
मैं, अपने 
वह मुझे पहन लेती है 
और मैं रह जाता हूँ नग्न 

सयदनाया जेल 1997-2000
                    :: ::
इस कविता का अगली किश्त यहाँ पढ़िए... 
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