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Wednesday, May 23, 2012

टॉमस ट्रांसट्रोमर : पत्रों के जवाब

टॉमस ट्रांसट्रोमर की एक और कविता...  

 
पत्रों के जवाब : टॉमस ट्रांसट्रोमर 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

अपनी मेज की निचली दराज में मुझे एक पत्र मिला जो पहली बार छब्बीस साल पहले पहुंचा था. घबड़ाहट में लिखा गया एक पत्र, जो अब भी सांस ले रहा है जब यह दूसरी बार पहुंचा है. 

एक मकान में पांच खिड़कियाँ हैं: उनमें से चार से होकर दिन की रोशनी साफ़ और स्थिर चमकती है. पांचवी के सामने काला आसमान, बिजली की गड़गड़ाहट और तूफ़ान है. मैं पांचवी खिड़की पर खड़ा होता हूँ. वह पत्र. 

कभी-कभी मंगलवार और बुधवार के बीच एक अगाध गर्त खुल जाता है मगर छब्बीस साल एक पल में गुजर सकते थे. समय कोई सीधी रेखा नहीं है, यह एक भूलभुलैया जैसा है, और यदि तुम दीवार पर सही जगह कान लगाओ तो तुम तेज चलते क़दमों और आवाजों को सुन सकते हो, तुम अपने आप को दूसरी तरफ चलता हुआ सुन सकते हो. 

क्या उस पत्र का जवाब कभी दिया गया था? मुझे याद नहीं, यह बहुत पहले की बात है. समुद्र की असंख्य सीमारेखाएं प्रवास करती रहीं. ह्रदय ने पल-पल कूदना जारी रखा, अगस्त की एक रात गीली घास में मेढक की तरह.  

अनुत्तरित पत्रों का ढेर लगता जाता है, बर्फ के कणों से बने पतले बादलों की तरह खराब मौसम का आभास देते हुए. वे सूर्यकिरणों को कांतिहीन कर देते हैं. एक दिन मैं जवाब दूंगा. एक दिन जब मैं मर जाऊंगा और आखिरकार ध्यान केन्द्रित कर सकूंगा. या कम से कम यहाँ से इतनी दूर कि मैं खुद को फिर से पा सकूं. जब मैं नया-नया आया बड़े शहर में घूम रहा हूँ, १२५वीं सड़क पर, तेज हवा में नाचते हुए कचरे की सड़क पर. मैं जो भटकते फिरना और भीड़ में गायब हो जाना पसंद करता हूँ, पाठ के अंतहीन ढेर में एक कैपिटल टी. 
                                                         :: :: ::  

Wednesday, March 14, 2012

टॉमस ट्रांसट्रोमर : नीला मकान


आज पढ़ते हैं नोबेल पुरस्कार विजेता टॉमस ट्रांसट्रोमर को...     

नीला मकान : टॉमस ट्रांसट्रोमर 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

चमकते सूरज वाली रात है. घने जंगलों में खड़ा मैं, दूर धुंधली-नीली दीवारों वाले अपने मकान की तरफ देखता हूँ. मानो अभी-अभी मेरी मृत्यु हुई हो और मैं एक नए कोण से अपने मकान को देख रहा होऊँ. 

इसने अस्सी से भी अधिक गर्मियां झेली हैं. इसकी लकड़ी चार बार सुख और तीन बार दुख से रची-बसी है. मकान में रहने वाले किसी व्यक्ति की मृत्यु पर इसकी फिर से पुताई होती है. मृत व्यक्ति स्वयं भी पुताई करता है, बिना ब्रश के और भीतर से. 

मकान से परे, खुला मैदान है. यहाँ कभी बगीचा हुआ करता था, अब झाड़-झंखाड़ उग आई है. घास-फूस के तोड़क, घास-फूस के मंदिर. शुभकामना सन्देश, खर-पतवार के उपनिषद, झाड़-झंखाड़ का जलदस्युओं का एक बेड़ा, घास-फूस के ड्रैगनों के सर, भाले-बल्लम, घास-फूस का एक साम्राज्य! 

झाड़-झंखाड़ के इस बगीचे के उसपार बार-बार फेंके जाने वाले एक बूमरैंग की परछाईं फड़फड़ाती रहती है. इसका सम्बन्ध एक ऐसे व्यक्ति से है जो मुझसे बहुत पहले इस मकान में रहा करता था. वह लगभग एक बच्चा था. उससे एक आवेग आता है, एक विचार, संकल्प की तरह का एक विचार : "बनाओ... चित्रित करो..." जैसे वह अपनी नियति से बच निकलने के फेर में हो. 

मकान किसी बच्चे के बनाए चित्र की तरह है. एक स्थानापन्न बचपना जो इसलिए विकसित हुआ क्योंकि किसी ने -- काफी पहले ही -- बच्चे बने रहने का अपना मिशन त्याग दिया. दरवाजा खोलो, अन्दर आ जाओ! यहाँ भीतर, छत पर अशांति और दीवारों में शान्ति है. पलंग के ऊपर सत्रह पालों वाली एक नाव की पेंटिंग लगी है, उसमें फुफकारती हुई लहरों के शिखर और ऎसी हवाएं भी हैं जिन्हें सुनहरा फ्रेम अटा नहीं पा रहा है.  

यहाँ होना हमेशा समय से पहले होना होता है, चौराहों के पहले, अखण्डनीय विकल्पों के पहले. इस जीवन के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद! फिर भी मैं अन्य विकल्पों की कमी महसूस करता हूँ. सारे के सारे रेखाचित्र वास्तव में अस्तित्व में आना चाहते हैं. 

सुदूर समुद्र में एक जलयान गर्मियों की रात के क्षितिज को फैला देता है. ओस के सूक्ष्मदर्शी शीशे में सुख और दुख दोनों बढ़ जाते हैं. सचमुच बिना जाने ही हम अंदाजा लगा लेते हैं; हमारे जीवन के पास एक सहायक नौका है जो खामोशी से दूसरे रास्ते पर जा रही है. जबकि टापुओं के पीछे सूर्य धधक रहा है.   
                                                               :: :: :: 

Thursday, December 15, 2011

टॉमस ट्रांसट्रोमर : रेल की पटरियां

पिछली १० दिसंबर को २०११ का नोबेल साहित्य पुरस्कार टॉमस ट्रांसट्रोमर को प्रदान कर दिया गया. इस कार्यक्रम का वीडियो यहाँ उपलब्ध है. उधर मिनियापोलिस में उनके पुराने दोस्त और अनुवादक, कवि राबर्ट ब्लाय ने उन्हें नोबेल मिलने का जश्न मनाते हुए एक चर्च में उनकी कविताओं का पाठ किया. आज फिर से पढ़ते हैं टॉमस ट्रांसट्रोमर की एक कविता... 

Tomas Tranströmer receiving his Nobel Medal and Diploma
नोबेल पुरस्कार से समानित होते टॉमस ट्रांसट्रोमर


रेल की पटरियां : टॉमस ट्रांसट्रोमर    
(अनुवाद : मनोज पटेल)

रात के २ बजे : चांदनी छिटकी हुई. रेलगाड़ी रुक गई है 
बीच मैदान में. दूर किसी कस्बे से रोशनी के बिंदु,  
क्षितिज पर निरुत्साह टिमटिमाते हुए. 

जैसे कोई इंसान इतना गहरे डूब गया हो अपने स्वप्न में 
कि अपने कमरे में वापस लौटने पर 
उसे याद ही न आए कि वह कभी आया भी था वहां.

या जैसे कोई इंसान इतना गहरे धंस गया हो अपनी बीमारी में 
कि उसकी सारी ज़िंदगी कुछ टिमटिमाते बिन्दुओं सी हो जाए, 
क्षितिज पर कमजोर और उदास एक छत्ते जैसी. 

पूरी तरह स्थिर खड़ी है रेलगाड़ी. 
रात के २ बजे : चटक चांदनी छिटकी हुई, तारे थोड़े से.
                    :: :: :: 
Manoj Patel 

Sunday, December 4, 2011

टॉमस ट्रांसट्रोमर : कहीं कोई टेलीफोन बज रहा है

टॉमस ट्रांसट्रोमर की यह कविता उन्हें नोबेल पुरस्कार की घोषणा के बाद न्यूयार्कर में प्रकाशित हुई थी...  



सरदर्द का घर : टॉमस ट्रांसट्रोमर 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

मेरी नींद सरदर्द के भीतर खुली. सरदर्द एक कमरा है जहां मुझे रहना पड़ता है क्योंकि मैं किसी और जगह के किराए का खर्च नहीं उठा सकता. एक-एक बाल सफ़ेद होने की हद तक दुखता है. एक दर्द बना रहता है, उस पेचीदा गुत्थी में जिसका नाम दिमाग है और जो इतनी सारी दिशाओं में इतने सारे काम करना चाहता है. दर्द हल्के नीले रंग के आसमान में लटकता एक अर्ध-चन्द्र भी है; मेरे चेहरे का रंग उड़ गया है; मेरी नाक नीचे की तरफ  संकेत कर रही है; पानी का पता लगाने वाली पूरी छड़ी जमीन के नीचे के सोते की तरफ मुड़ रही है. मैं गलत जगह पर बने एक मकान में रहने लगा था; मेरे बेड के ठीक नीचे, ठीक मेरे तकिए के नीचे एक चुम्बकीय खम्भा है और जब आस-पास का मौसम बिगड़ जाता है तो बेड के ऊपर मैं आवेशित हो जाता हूँ. अक्सर मैं यह कल्पना करने की कोशिश करता हूँ कि कोई आकाशीय हड्डी बैठाने वाला मेरी गर्दन और रीढ़ के जोड़ पर एक करिश्माई पकड़ द्वारा मुझे चिकोट रहा है, एक ऎसी पकड़ जो हमेशा के लिए ज़िंदगी सुधार देगी. मगर सरदर्द का घर अभी बट्टे खाते में डाले जाने के लिए तैयार नहीं है. पहले मुझे इसके भीतर एक घंटे, दो घंटे, आधा दिन तक रहना होगा. अगर पहले मैनें इसे कमरा कहा हो तो उसे घर में बदल लीजिए. मगर अब सवाल यह है : क्या यह पूरा एक शहर ही नहीं है? यातायात असहनीय रूप से धीमा है. ब्रेकिंग न्यूज प्रसारित हो चुकी है और कहीं कोई टेलीफोन बज रहा है.
                                                        :: :: ::     
तोमस त्रांसत्रोमर Manoj Patel 

Wednesday, November 30, 2011

टॉमस ट्रांसट्रोमर : दो शहर


नोबेल पुरस्कार विजेता टॉमस ट्रांसट्रोमर की एक कविता...  


दो शहर : टॉमस ट्रांसट्रोमर 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

एक जलडमरूमध्य के दोनों तरफ, दो शहर  
एक दुश्मनों के कब्जे में, अँधेरे में डूबा हुआ 
और दूसरे में जल रही हैं बत्तियां. 
रोशन किनारा सम्मोहित करता है अँधेरे किनारे को. 

बेखुदी की हालत में तैरता हूँ 
झिलमिलाते काले समुद्र में. 
मंद-मंद गूंजती है एक तुरही. 
वह एक दोस्त की आवाज़ है, अपनी कब्र उठाओ और निकलो.  
                    :: :: :: 
Manoj Patel 

Sunday, November 27, 2011

टॉमस ट्रांसट्रोमर : दस्तखत


टॉमस ट्रांसट्रोमर की एक कविता...  


दस्तखत : टॉमस ट्रांसट्रोमर 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

मुझे पार करनी पड़ती है 
अँधेरे में डूबी चौखट.
एक हाल.
चमकता हुआ सफ़ेद दस्तावेज.
चलती-फिरती कई परछाइयां.
हर कोई दस्तखत करना चाहता है उस पर.

तब तक मुझसे आगे निकल जाता है प्रकाश 
और तह कर देता है समय को.  
                    :: :: :: 
तोमस त्रांसत्रोमर Manoj Patel 

Friday, November 11, 2011

टॉमस ट्रांसट्रोमर : शहर के नीचे से

नोबेल पुरस्कार विजेता टॉमस ट्रांसट्रोमर की एक और कविता...



जमीन में से देखना : टॉमस ट्रांसट्रोमर 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

सफ़ेद सूरज पिघल रहा है धुंध में 
टपक रही है रोशनी रास्ता बनाते हुए नीचे 

जमीन में दबी मेरी आँखों की तरफ 
जो शहर के नीचे से देख रही हैं ऊपर 

नीचे से देखना शहर को : सड़कों और इमारतों की नींव को 
जैसे युद्ध के दौरान किसी शहर का हवाई दृश्य 

जैसे उल्टी तरफ से -- एक खुफिया तस्वीर 
फीके रंगों की खामोश वर्गाकार आकृतियाँ 

यहाँ लिए जाते हैं फैसले 
और कोई फर्क नहीं कर पाता ज़िंदा और मुर्दा हड्डियों में 

तेज हो जाती है सूरज की रोशनी और 
भर जाती है हवाईजहाजों के काकपिट 
और मटर की फलियों के भीतर. 
                    :: :: :: 
Manoj Patel तोमस त्रांसत्रोमर 

Sunday, November 6, 2011

टॉमस ट्रांसट्रोमर : काले पोस्टकार्ड

टॉमस ट्रांसट्रोमर की एक और कविता...


काले पोस्टकार्ड : टॉमस ट्रांसट्रोमर 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

1
व्यस्तता से भरा हुआ कैलेण्डर, भविष्य अज्ञात. 
सन्देश गुनगुनाता हुआ एक बेवतन लोक गीत को. 
सीसे की तरह स्थिर समुद्र पर गिरती हुई बर्फ. गोदी पर 
                         कुश्ती लड़ती हुईं परछाईयाँ. 


2 
ऐसा होता है ज़िंदगी के बीच में कभी कि मौत आती है 
इंसान के नाप लेने की खातिर. भुला दिया जाता है 
यह आगमन और चलती रहती है ज़िंदगी. 
                         मगर सूट सिल जाता है चुपचाप.   
                    :: :: :: 
तोमास त्रांसत्रोमर की कविताएँ 

Thursday, November 3, 2011

टॉमस ट्रांसट्रोमर का संस्मरण : पुस्तकालय

नोबेल पुरस्कार विजेता टॉमस ट्रांसट्रोमर के संस्मरणों की किताब 'मेमोरीज लुक ऐट मी' से एक अंश 'झाड़-फूंक' आप इस ब्लॉग पर पहले पढ़ चुके हैं. राबिन फुल्टन के अंग्रेजी अनुवाद से आज प्रस्तुत है एक और अंश... 










पुस्तकालय : टॉमस ट्रांसट्रोमर 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

'सिटीजंस हाउस' नाम के उस भवन का निर्माण 1940 के आस-पास हुआ था. यह सोदेर शहर के बीचोबीच चार चौकोर भवनों का एक समूह था जो सुन्दर, उम्मीद जगाने वाला आधुनिक और क्रियाशील भी लगता था. हमारे निवास स्थान से तो यह केवल पांच मिनट की दूरी पर था. 

दूसरी कई चीजों के साथ-साथ इसमें एक सार्वजनिक स्विमिंग पूल और सिटी लाइब्रेरी की एक शाखा भी थी. मुझे आवंटित क्षेत्र, स्वाभाविक और प्राकृतिक कारणों से बच्चों का संभाग था जिसमें शुरूआत में तो मेरे पढ़ने के लिए काफी किताबें थीं. इनमें सबसे महत्वपूर्ण थी ब्रेह्म की लिखी लाइव्स आफ एनिमल्स. 

मैं अमूमन रोज पुस्तकालय जाया करता था. मगर यह प्रक्रिया पूरी तरह से कठिनाई से मुक्त नहीं हुआ करती थी. कई बार ऐसा हुआ कि मैनें जो किताबें ले जानी चाहीं उन्हें लाइब्रेरी में नियुक्त महिलाओं ने मेरी उम्र के उपयुक्त नहीं पाया. ऎसी ही एक किताब थी नुत होल्म्बे की लिखी द डिजर्ट इज बर्निंग.

"यह किताब किसे चाहिए?"
"मुझे..."
"अरे नहीं..."
"मैं..."
"तुम अपने पिता जी से बात करो, वे चाहें तो खुद आकर यह किताब ले जा सकते हैं."

और भी बुरा तो तब हुआ जब मैनें बड़े लोगों की किताबों वाले हिस्से में घुसने की कोशिश की. मुझे एक किताब चाहिए थी जो बच्चों वाले हिस्से में तो यकीनन नहीं थी. मुझे प्रवेश द्वार पर ही रोक दिया गया. 

"तुम्हारी उम्र क्या है?"
"ग्यारह साल."
"तुम्हें यहाँ से किताबें नहीं मिल सकतीं. कुछ सालों बाद तुम यहाँ आ सकते हो."
"ठीक है, मगर जो किताब मैं चाहता हूँ वह सिर्फ यहीं है."
"कौन सी किताब?"
"एकमैन की द एनीमल्स आफ स्कैंडिनेविया : ए हिस्ट्री आफ देयर माइग्रेशन."  यह महसूस करते हुए कि खेल ख़त्म हो चुका है, मैनें खोखली आवाज़ में जवाब दिया. खेल सचमुच ख़त्म हो चुका था. सवाल ही नहीं उठता. मेरा चेहरा लाल हो गया, मुझे बहुत गुस्सा आया. मैं उसे कभी माफ़ नहीं करूंगा!

ऐसे वक़्त पर बहुत कम बोलने वाले मेरे एक अंकल -अंकल एलाफ- का पदार्पण हुआ. उन्होंने मुझे वयस्कों के सेक्शन वाला अपना कार्ड दे दिया और हमने यह कहानी गढ़ी कि मैं उनके लिए किताबें ले जा रहा हूँ. अब मैं वहां जा सकता था जहां मैं जाना चाहता था.  

पुस्तकालय के वयस्कों वाले हिस्से की एक दीवार स्विमिंग पूल की तरफ थी. प्रवेशद्वार पर ही अन्दर से एक भभका सा आता महसूस होता था. हवा आने के लिए बनाई गई व्यवस्था के रास्ते से क्लोरीन की गंध बहती रहती और गूंजती हुई आवाजें ऐसे सुनाई पड़तीं मानो कहीं दूर से आ रही हों. स्विमिंग पूल और इस तरह की जगहों की ध्वानिकी अजीब सी होती है. यह एक उत्तम विचार था कि स्वास्थ्य और किताबों के मंदिर एक-दूसरे के पड़ोसी हों. मैं कई साल तक सिटी लाइब्रेरी की इस शाखा का निष्ठावान अतिथि बना रहा. मैं स्पष्ट रूप से इसे स्वेवाजेन के केन्द्रीय पुस्तकालय से बेहतर मानता था. स्वेवाजेन में वातावरण भारी हुआ करता था और हवा स्थिर, न तो क्लोरीन की गंध और न ही गूंजती आवाजें. यहाँ किताबों की भी गंध अलग तरह की थी जिससे मेरे सर में दर्द होने लगता था.  

एक बार पुस्तकालय की बागडोर निर्बाध रूप से पाने के बाद मैनें अपना ज्यादा ध्यान कथेतर साहित्य पर केन्द्रित किया. साहित्य को मैनें उसके हाल पर छोड़ दिया. इसी तरह अर्थशास्त्र और सामाजिक समस्याएँ नाम से अंकित आलमारियों पर भी मैं निगाह नहीं डालता था. हालांकि, इतिहास में मेरा मन रमता था. चिकित्सा संबंधी किताबों से तो डर लगता था. 

मगर भूगोल वाला कोना मुझे सबसे ज्यादा प्रिय था. खासतौर पर अफ्रीका वाले खानों का तो मैं भक्त था जो कि बहुत विस्तृत थे. मुझे अभी तक कुछ किताबों के नाम याद हैं, माउंट एल्गन, ए मार्केट ब्वाय इन अफ्रीका, डिजर्ट स्केचेज... पता नहीं इनमें से कोई किताब अब भी उन आलमारियों में होगी या नहीं. 

अलबर्ट श्वित्ज़र नाम के किन्हीं शख्स ने एक किताब लिखी थी जिसका नाम बड़ा प्यारा सा था बिटवीन वाटर एंड प्रिमेवल फारेस्ट. इसमें खासकर ज़िंदगी के बारे में अटकलों का जिक्र था. किन्तु श्वित्ज़र ने खुद को अपने ध्येय पर कोई काम करने से रोक लिया और वे बाहर नहीं निकले; वे एक अच्छे अन्वेषक नहीं थे. उदाहरण के लिए वे गोस्ता मोबर्ग की तरह नहीं थे जिसने नाइजर और चाद जैसे अनजाने प्रदेशों के आकर्षण में अंतहीन दूरियां तय की थीं. ये ऐसे क्षेत्र थे जिनके बारे में पुस्तकालय में बहुत कम जानकारी उपलब्ध थी. हालांकि कीनिया और तंजानिया अपने स्वीडिश बंदोबस्त के कारण कृपापात्र थे. ऐसे सैलानी किताबें लिखते थे जो नील नदी के जलमार्ग से होते हुए सूड क्षेत्र से फिर उत्तर की तरफ मुड़ जाते थे. मगर वे सैलानी किताबें नहीं लिखते थे जो सूडान के नीरस अंचल में जाने का साहस करते थे, न ही वे जो कुर्दुफान या दारफुर तक का रास्ता तय कर पाने में कामयाब हो जाते थे. अंगोला और मोजाम्बिक की पुर्तगाली कालोनियां भी, जो नक़्शे पर इतनी बड़ी दिखती थीं, पुस्तकालय में अफ्रीका की आलमारियों के लिए अनजाने और उपेक्षित क्षेत्र थे जिससे उनका आकर्षण और भी बढ़ जाता था.       

मैनें पुस्तकालय में बैठे-बैठे ही ढेर सारी किताबें पढ़ डाली थीं -- मैं घर पर एक ही तरह की कई किताबें या एक ही किताब लगातार कई बार नहीं ले जाना चाहता था. मुझे लगता था कि पुस्तकालय के कर्मचारी मेरी आलोचना करेंगे और यह ऎसी चीज थी जिससे हर हाल में बचा जाना चाहिए था.  

एक साल गर्मियों में --मुझे याद नहीं कि कौन सी गर्मियों में-- मैं अफ्रीका से सम्बंधित एक विस्तृत और स्थायी दिवास्वप्न में खोया रहा. मैं पुस्तकालय से बहुत दूर रुन्मारो नामक द्वीप पर था. मैं एक कल्पना में चला गया जिसमें मैं मध्य अफ्रीका में एक अभियान दल का नेतृत्व कर रहा था. मैं रुन्मारो के जंगलों में पैदल ही भटकता रहता था और अफ्रीका के एक बड़े से नक़्शे पर बिन्दुओं की एक रेखा के माध्यम से इस बात का हिसाब रखा करता कि मोटा-मोटी मैं कितनी दूरी तय कर चुका था. पूरे अफ्रीका महाद्वीप का यह नक्शा भी मैनें ही खींचा था. उदाहरण के लिए यदि मैं रुन्मारो द्वीप पर किसी सप्ताह के दौरान 120 किलोमीटर चलता था तो मैं नक़्शे पर 120 किलोमीटर तक निशान लगा लेता था. कोई ख़ास दूरी नहीं.   

पहले मैनें अपने अभियान की शुरूआत पूर्वी तट से करने का विचार किया था, लगभग उसी जगह से जहां से कि स्टैनले ने शुरू किया था. मगर तब सबसे मजेदार जगहों तक पहुँचने के लिए मुझे बहुत अधिक दूरी तय करनी पड़ती. फिर मैनें अपना इरादा बदल दिया और कल्पना किया कि अलबर्ट न्यान्सा तक की दूरी मैनें कार से तय कर डाली है. इस जगह आकर वास्तव में पैदल अभियान की शुरूआत हुई. अब मेरे पास गर्मियां ख़त्म होने के पहले इतूरी वनप्रदेश को नाप डालने का मुनासिब मौक़ा था. 

यह सामान ढोने वाले वाहक वगैरह के साथ उन्नीसवीं शताब्दी का एक अभियान दल था. हालांकि मैं पूरी तरह से अवगत नहीं था कि अब यह यात्रा का अप्रचलित और लुप्तप्राय तरीका है. अफ्रीका बदल चुका था. ब्रिटेन संरक्षित सोमाली प्रदेश में युद्ध जारी था; वह सुर्ख़ियों में था. युद्ध में टैंक संलग्न थे. वास्तव में वह पहला ऐसा क्षेत्र था जहां मित्र राष्ट्र बढ़त होने का दावा कर सकते थे --मैनें निस्संदेह इस बात पर उचित ध्यान दिया-- और अबिसीनिया धुरी राष्ट्रों से मुक्त कराया जाने वाला पहला देश बना था. 

कुछ सालों के बाद जब अफ्रीका का मेरा सपना फिर से लौटा तो उसका आधुनिकीकरण हो चुका था और अब वह लगभग यथार्थवादी था. मैं एक कीटविज्ञानी बनने और अफ्रीका से कीट एकत्रित करने के बारे में विचार कर रहा था. अब मैं नए रेगिस्तानों की बजाय नई प्रजातियों को खोज निकालना चाहता था. 
                                                                 :: :: :: 
तोमस त्रांसत्रोमर Tomas Transtromer Memories Look At Me Translated in Hindi by Manoj Patel 

Wednesday, November 2, 2011

टॉमस ट्रांसट्रोमर : विस्मृति के नर्क में

टॉमस ट्रांसट्रोमर की एक गद्य कविता...














नाम : टॉमस ट्रांसट्रोमर 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

कार के सफ़र के दौरान मैं ऊंघने लगता हूँ और उसे सड़क के किनारे पेड़ों के नीचे ले जाकर खड़ी कर देता हूँ. फिर पिछली सीट पर जाकर मैं गुच्छा-मुच्छा होकर सो जाता हूँ. कितनी देर तक? घंटों. अंधेरा घिर आता है. 

अचानक मैं जाग जाता हूँ और जान नहीं पाता कि मैं कहाँ हूँ. पूरी तरह से जाग जाता हूँ मगर इससे भी कोई फायदा नहीं होता. मैं कहाँ हूँ? कौन हूँ? मैं कोई चीज भर हूँ जो पिछली सीट पर जाग गई है और घबराहट में कसमसा रही है जैसे बोरे में बंद कोई बिल्ली. मैं कौन हूँ?

आखिरकार मेरे प्राण वापस आ जाते हैं. मेरा नाम किसी देवदूत की तरह प्रकट होता है. दीवारों के बाहर तुरही का एक संकेत बजता है (लिओनोरा ओपेरा की शुरूआत की तरह) और लम्बी सीढ़ियों पर होशियारी से उतरते राहत दिलाने वाले क़दमों की आवाज़ सुनाई देती है. यह मैं हूँ! मैं हूँ!

मगर मुख्य सड़क से कुछ मीटरों की दूरी पर जहां बत्तियां जलाए हुए गाड़ियां तेजी से गुजर रही हैं, विस्मृति के नर्क में गुजरे उन पंद्रह सेकेंडों के संघर्ष को भुला पाना नामुमकिन है.
                                                     :: :: :: 
  Manoj Patel Translations, Manoj Patel's Blog  तोमास त्रांसत्रोमर की कविताएँ   

Tuesday, November 1, 2011

टॉमस ट्रांसट्रोमर : सुबह के पंछी

टॉमस ट्रांसट्रोमर की एक कविता...



सुबह के पंछी : टॉमस ट्रांसट्रोमर 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

मैं जगा देता हूँ कार को 
जिसकी विंडशील्ड पर 
एक परत जमा हो गई है पराग की.
चढ़ा लेता हूँ अपना धूप का चश्मा   
और गाढ़ा हो जाता है पंछियों का गीत.

ठीक उसी समय रेलवे स्टेशन पर 
एक दूसरा शख्स खरीदता है अखबार 
एक बड़ी सी माल गाड़ी के पास 
जो पूरी लाल हो गई है जंग से 
और झिलमिलाती हुई खड़ी है धूप में.

कहीं कोई खाली जगह नहीं है यहाँ.

सीधा बसंत की गर्माहट से होता हुआ एक सर्द गलियारा
कोई दौड़ते हुए आता है वहां 
और बताता है कि कैसे ऊपर मुख्यालय में 
उन्होंने अपमान किया है उसका.

भूदृश्य के पिछले दरवाजे से 
उड़ते हुए आती है 
श्वेत-श्याम चिड़िया मुटरी.  
और इधर-उधर फुदकती रहती है श्यामा चिड़िया 
हर चीज हो जाती है जैसे कोयले से बना चित्र 
सिवाय तार पर सूखते सफ़ेद कपड़ों के 
संगीतकार पलेसत्रिना के समूहगान की तरह.

कहीं कोई खाली जगह नहीं है यहाँ.

अद्भुत है महसूस करना अपनी कविता को फैलते हुए 
जबकि सिकुड़ रहा होता हूँ खुद मैं.
वह फैलती जाती है और जगह ले लेती है मेरी 
कर देती है किनारे,  
घोंसले के बाहर फेंक देती है मुझे 
और तैयार हो जाती है कविता. 
                    :: :: :: 
Manoj Patel Translations, Manoj Patel's Blog  तोमास त्रांसत्रोमर  

Monday, October 31, 2011

टॉमस ट्रांसट्रोमर : अन्तरिक्ष में पुल


टॉमस ट्रांसट्रोमर की एक कविता...










हिमपात  : टॉमस ट्रांसट्रोमर 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

आती रहती हैं अंत्येष्टियाँ 
अधिकाधिक संख्या में 
जैसे बढ़ती जाती है संख्या यातायात संकेतों की 
ज्यों-ज्यों हम करीब पहुँचते जाते हैं किसी शहर के.

टकटकी लगाए हुए हजारों लोग 
लम्बी परछाइयों के देश में.

धीरे-धीरे 
एक पुल निर्माण करता है स्वयं का 
सीधा अन्तरिक्ष में.
                    :: :: :: 
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Tuesday, October 25, 2011

टॉमस ट्रांसट्रोमर : घर की ओर

टॉमस ट्रांसट्रोमर की एक कविता...


घर की ओर : टॉमस ट्रांसट्रोमर 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

फोन की एक बातचीत छलक गई रात में 
और जगमगाने लगी शहर और देहात के बीच 
होटल के बिस्तर पर करवटें ही बदलता रहा उसके बाद 
सूई की तरह हो गया मैं किसी दिशा सूचक यंत्र की 
जिसे लिए जंगलों से होकर भाग रहा हो कोई दौड़ाक  
धड़धड़ाते हुए दिल के साथ 
                    :: :: ::
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Monday, October 17, 2011

टॉमस ट्रांसट्रोमर : उदासी के महीनों में

टॉमस ट्रांसट्रोमर की एक कविता...



आग की लिखाई : टॉमस ट्रांसट्रोमर 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

उदासी के महीनों में 
केवल तुमसे प्यार करते समय ही 
खुशी झिलमिलाई जीवन में 
जैसे जुगनू जलता है और बुझता है, जलता है और बुझता है 
और इन झलकियों में 
अँधेरे में भी हमें पता चल जाता है 
जैतून के पेड़ों के बीच उसकी उड़ान का 

उदासी के महीनों में आत्मा सिमटी पड़ी रही, बेजान 
मगर देह गई सीधे तुम्हारे पास 
गरजता रहा रात में आकाश 
चोरी-चोरी हमने दुह लिया ब्रह्माण्ड को 
और बचे रहे 
                    :: :: :: 
तामस त्रांसत्रोमर, Manoj Patel Translation  

Sunday, October 16, 2011

टॉमस ट्रांसट्रोमर : हाइकू


टॉमस ट्रांसट्रोमर के कुछ हाइकू... 

 

बीस हाइकू : टॉमस ट्रांसट्रोमर
(अनुवाद : मनोज पटेल)

रात - बारह पहियों वाली गाड़ी 
गुजरती है लोगों के स्वप्नों को 
कंपकंपाते हुए. 
* * * 

कुहरे में गुनगुनाहट.
स्थल से दूर मछली पकड़ने की एक नाव 
-- लहरों पर ट्राफी.
* * *

बाल्कनी पर 
खड़ा हुआ हूँ सूर्यकिरणों के एक पिंजरे में 
इन्द्रधनुष की तरह.
* * * 

सूर्य उतर आया है नीचे 
हमारी परछाईयाँ गोलियथ हैं 
शीघ्र ही सब कुछ परछाईं होगा.
* * *

अन्धकार से जन्मा.
मैं मिला एक बहुत बड़ी परछाईं से 
एक जोड़ी आँखों में.
* * * 

जाओ, वर्षा की तरह शांत  
मिलो सरसराती हुई पत्तियों से 
सुनो क्रेम्लिन की घंटियों को !
* * * 

जगमगाते शहर :
गीत, गल्प, गणित --
मगर अलग तरह से.
* * * 

जड़वत विचार, मानो 
रंगीन पत्थरों की पच्चीकारी 
राजमहल के प्रांगण में.
* * * 

निराशा की दीवार...
इधर-उधर मंडराते कबूतर 
बिना चेहरों वाले.
* * * 

झूलते बगीचों वाला 
एक लामा मठ.
युद्ध-दृश्यों के कुछ चित्र.
* * *

नवम्बर का सूरज --
तैरती हुई मेरी विशाल छाया 
मरीचिका बनती हुई.
* * *

वे मील के पत्थर, हमेशा 
कहीं जाते हुए. सुनो 
-- एक कबूतर की पुकार. 
* * *

मृत्यु झपट्टा मारती है मुझपर.
मैं एक समस्या हूँ शतरंज में. 
उसके पास समाधान है.
* * *

मूर्खों के पुस्तकालय की
आलमारी में पड़े हुए
अनछुए धर्मोपदेश. 
* * *

देखो मैं कैसे बैठा हुआ 
जैसे जमीन पर खींच लाई गई डोंगी.
मैं प्रसन्न हूँ यहाँ. 
* * *

वीथियाँ चलती हुईं दुलकी चाल 
सूर्यकिरणों की लगाम से 
किसी ने पुकारा क्या ?
* * *

कुछ घटित हुआ.
चंद्रमा ने प्रकाश से भर दिया कमरा.
ईश्वर जानता था इस बारे में.
* * *

छत टूट गई 
और मृत लोग देख सकते हैं मुझे 
देख सकते हैं मुझे. वह चेहरा.
* * *

वर्षा की सनसनाहट सुनो.
ठीक उसके भीतर पहुँचने के लिए 
मैं बुदबुदाता हूँ एक राज.
* * *

स्टेशन के प्लेटफार्म का दृश्य.
कितनी अप्रत्याशित शान्ति -- 
यह भीतर की आवाज है. 
                    :: :: :: 
तामस त्रांसत्रोमर, विश्व कविता के हिन्दी अनुवाद  
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