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Friday, January 30, 2015

पर्स में रखा एक खत

(पिछले सप्ताह मिस्र के तहरीर चौक पर पुलिस की गोली से सोशलिस्ट एक्टिविस्ट शाइमा अल-सबा की मृत्यु हो गई. वे एक कवयित्री भी थीं. प्रस्तुत है उनकी एक कविता…)  


पर्स में रखा एक खत : शाइमा अल-सबा 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

पूरे यकीन से तो नहीं कह सकती, सचमुच 
वह एक पर्स ही तो था 
मगर खो जाने के बाद एक दिक्कत खड़ी हो गई 
कि बिना उसके कैसे करूँ दुनिया का सामना 
इसलिए 
क्योंकि सड़कें हम दोनों को साथ-साथ ही पहचानती थीं 
दुकानें उसे जानती थीं मुझसे भी ज्यादा 
आखिर वही तो देता था पैसे 
पहचानता था मेरे पसीने की गंध और पसंद करता था उसे 
जानता था तमाम बसों को 
और उनके ड्राइवरों से अपने अलग ताल्लुक थे उसके 
याद रहते थे उसे टिकट के दाम 
और हमेशा पूरे छुट्टे पैसे होते थे उसके पास 
जब एक बार मैंने वह परफ्यूम खरीदा जो उसे नहीं था पसंद 
तो उसने गिरा दिया सारा का सारा 
और मुझे नहीं करने दिया उसका इस्तेमाल 
और हाँ 
मेरे घर के सारे लोगों को वह करता था प्यार 
और हमेशा साथ रखता था उन सबकी एक तस्वीर 
जिन्हें प्यार करता था वह 

कैसा लग रहा होगा उसे इस वक़्त 
शायद डर? 
या नाराज़ किसी अनजान शख्स के पसीने की बू से  
नई-नई सड़कों से चिढ़ा हुआ? 
और गर वह गया होगा किसी ऐसे स्टोर में 
जहाँ हम जाया करते थे साथ-साथ 
क्या उन्हीं चीजों को पसंद किया होगा उसने? 
बहरहाल, घर की चाभियाँ हैं उसके पास 
और मुझे इंतज़ार है उसका 
                     :: :: :: 

Tuesday, January 27, 2015

ट्विटर पर ईश्वर

(दोस्तों, Twitter भी क्या मजेदार जगह है. यहाँ भगवान भी Tweet करते हैं. जी हाँ, God नाम के ट्विटर हैंडल (@TheTweetOfGod) से खूब मजेदार ट्वीट किए जाते हैं. मैंने आपके लिए कुछ चुनिंदा Tweets का अनुवाद किया है.)


















God के ट्वीट 
(अनुवाद: मनोज पटेल)
 
मुझे पढ़ना चर्च जाने के बराबर है, रीट्वीट करना मिशनरी काम करने के बराबर, और मुझे ऐसे सवाल ट्वीट करना जिनका मैं जवाब नहीं देता बराबर है प्रार्थना करने के.
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इसे रीट्वीट करने पर आप अपनी मर्जी का पाप कर सकते हैं.
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सऊदी अरब के शाह अब्दुल्ला का निधन हो गया. 50 मिलियन सालों में वे तेल हो जाएंगे. 
**  **  **

मैं ईश्वर हूँ, तुम्हारा भगवान, ब्रह्माण्ड का स्वामी, सर्वशक्तिमान, दिक एवं काल का रचयिता. और हाँ, हँसी-मजाक बर्दाश्त कर सकता हूँ मैं. 
** ** ** 

आज #मैंशार्लीहूँ के समर्थन में मेरी इज्जत का कचरा कर डालो लोगों. 
** ** ** 

ऐसे ही वक्तों पर मैं सोचता हूँ कि काश मैं सचमुच होता.
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अमेरिका की नई संसद में 80% श्वेत हैं, 80% पुरुष, 92% ईसाई और 99% 1%. 
** ** ** 

यदि मेरा अस्तित्व है तो इसे रीट्वीट मत करना.
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अत्यधिक ताकत के साथ अत्यधिक गैर-जिम्मेदारी आती है. 
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"बाल यौन शोषण के सजायाफ्ता अपराधी ने 30 लाख की फ्लोरिडा लॉटरी जीती." लेकिन मेरा अस्तित्व है, कसम से. 
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अगली बार मैं बिना चमड़ी वाले इंसान बनाऊंगा. न नस्लभेद रह जाएगा, न मुंहासे. 
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बता दूँ, ताकि सनद रहे कि मैं हजारों साल से हंगर गेम्स चला रहा हूँ. 
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अगली बार कोई किताब लिखूं तो शायद मैं नॉन-फिक्शन पर हाथ आजमाऊँ. 
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मजेदार बात यह है कि ग्लोबल वॉर्मिंग को मनगढ़ंत मानने वाले तकरीबन सभी लोग मुझे मनगढ़ंत नहीं मानते.  
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यदि इस पर विश्वास करना बेतुका है कि मैं ट्विटर के 140 कैरेक्टर्स के माध्यम से दुनिया से संवाद स्थापित करता हूँ तो इस पर विश्वास करना बेतुका क्यों नहीं कि मैंने छह दिन में दुनिया बना डाली.
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इसे रीट्वीट करने पर आपको जन्नत मिलेगी. जी हाँ, अब स्टैण्डर्ड इतना ही गिर गया है. 
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अपने भीतर कहीं गहरे मुझे भी पता है कि मैं नहीं हूँ. 
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Monday, September 22, 2014

बिलावल भुट्टो के नाम एक खुला पत्र

(बिलावल भुट्टो के कश्मीर वाले बहुचर्चित बयान पर अमरीकन देसी डॉट कॉम नामक वेबसाइट पर उनके नाम एक खुला पत्र प्रकाशित हुआ है. मौजूं लगा तो उसका अनुवाद कर आपके सामने पेश कर रहा हूँ.) 
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बिलावल भुट्टो के नाम एक खुला पत्र : अमरीकन देसी 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

प्रिय बिलावल, 

पहले तो तुम्हें जन्मदिन की बहुत-बहुत मुबारकबाद. 26! बड़ी ख़ास उम्र होती है यह. मुझे भी अपना वह दौर याद आ गया जब मैं नौजवान और बेवकूफ था, पर शायद इतना भी नहीं. अपनी सालगिरह पर बतौर एक ख़ास तोहफा तुम सोशल मीडिया पर चर्चा में हो और हर हिन्दुस्तानी तुम्हारे बारे में बात कर रहा है. पड़ोसियों की मुहब्बत समझकर शुक्रिया कहो. यार तहजीब कहाँ गई तुम्हारी?  

मैंने वह वीडियो क्लिप बड़ी दिलचस्पी से देखी. वही जिसमें तुमने कश्मीर का एक-एक इंच पाकिस्तान के लिए लेने की बात की थी. बॉस इतनी कम उम्र में ऐसा पक्का इरादा फ़क्र की बात है. तुम्हें इस उम्र में ऐसे स्पष्ट विचार रखने के लिए अपनी पीठ थपथपानी चाहिए जब तुम्हारी उम्र के ज्यादातर हिन्दुस्तानी जावा और एसक्यूएल के सिद्धान्तों का रट्टा मारने और गुड़गांव की किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी में 50 फीसदी बढ़ोत्तरी वाली नौकरी हथियाने में जुटे रहते हैं. इससे तुम गलत प्राथमिकताओं की बाबत भी जान सकते हो.  

फिर से तुम्हारे भाषण की बात करें. जिस अनगढ़ जोश और उत्साह से तुमने अपनी बात रखी वह मुझे अच्छा लगा. 'लेंगे लेंगे…कश्मीर…पूरा का पूरा कश्मीर…पाकिस्तान का कश्मीर…लेंगे'.  क्या तो तुमने अपने हाथ ताने, अपनी आवाज ऊंची की और बिल्कुल किसी डब्ल्यूडब्ल्यूई उद्घोषक की तरह बोले. फर्क बस यह था कि तुम्हारी आवाज़ अभी फटी नहीं है जिससे वह डरावनी की बजाए प्यारी लग रही थी. और तुम्हारी इस क़ातिल खूबसूरती को क्या कहूँ, बॉस अगर मैं वहाँ होता तो तुम्हारे गालों को चूमता और निःस्वार्थ प्रेम के वशीभूत तुम्हारे उन चमकते गालों पर चुटकी काटता. चालाक लोमड़ी, तुम्हें खूबसूरत होने के चलते औरतों के वोट मिलेंगे और इस भाषण के चलते मर्दों के.               

बॉस, कश्मीर तो नहीं मिल पाएगा. मतलब तुम क्यूट वगैरह तो हो ही, तुम्हारा उस खूबसूरत महिला मंत्री से चक्कर भी रहा होगा जिसके हैण्डबैग की कीमत बाक़ी के पाकिस्तान से ज्यादा हुआ करती है, मगर ज़िंदगी सब पर इतनी मेहरबान तो होती नहीं. तुम्हें कश्मीर चाहिए. यो यो हनी सिंह को ग्रैमी अवार्ड चाहिए. मुझे एक आईफोन 6 चाहिए. मगर हाय री क़िस्मत ! 

लेकिन हम तुम्हारे लिए दूसरा तोहफा जुगाड़ सकते हैं. एक टाइम मशीन. या बेबी, तुमने बिल्कुल ठीक सुना. मैं भविष्य में झाँकने में तुम्हारी मदद कर सकता हूँ ताकि तुम देख सको कि तुम्हारी ज़िंदगी में आगे क्या होने वाला है. 

वहाँ एक शख्स है. उम्र 44 साल, तुम्हारी ही तरह फेयर एण्ड लवली, तुम्हारी ही तरह नौजवान दिलों की धड़कन, तुम्हारी ही तरह इंग्लैण्ड में तालीमयाफ्ता, तुम्हारी ही तरह सियासी खानदान का चश्मो-चिराग़, और अपने लोगों के लिए उसके भी बोल हँसी और संजीदगी का सटीक घालमेल होते हैं. मैं तुम्हारे सामने राहुल गांधी को पेश करता हूँ. वह 18 साल बाद के तुम हो. वह तुम्हारी टाइम मशीन है. तुम क्या बनने वाले हो यह देखने के लिए बस उसे देख लो. तुम्हारा स्वागत है. 

तुम्हें पता है कि आज पूरा हिन्दुस्तान क्या सोच रहा है? कि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान बिल्कुल एक जैसे हैं. हमारी तहजीब एक है. हम वही रोटी और बटर चिकन खाते हैं. हम एक ही पायरेटेड बॉलीवुड म्यूजिक सुनते हैं. हमारी क्रिकेट टीमें एक जैसी अस्थिर और आसानी से लालच में फंसने वाली हैं. कभी हमारी हॉकी टीमों का बोलबाला था मगर अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ज्यादातर उनकी भद ही पिटती है. हमारे नेता एक जैसे जोकरों के समूह हैं. अपने ख़ास अंदाज में शाहरुख खान के बाहें फैलाने पर सरहद के दोनों ही तरफ की लड़कियाँ बेहोश हो जाती हैं. 

हमारे पास राहुल हैं. उनके पास तुम हो. सेम टू सेम. 

फिर से कश्मीर पर आते हैं. कम ऑन यार. इतने परेशान मत हो. ठीक है, हम एक चीज आजमा सकते हैं. तुम अर्णव जी के न्यूज ऑवर में पैनल डिस्कशन के लिए क्यों नहीं आ जाते? वहाँ आकर तुम समझाओ कि तुम्हें क्यों वह सूबा चाहिए जिसके लिए पिछले साठेक सालों में भारत चार बार तुम्हारे देश की मिट्टी पलीद कर चुका है. ठीक है न? 

अगर उनके शो में तुम बगैर किसी बाधा के दस पूरे वाक्य बोल ले गए तो कश्मीर तुम्हारा. बोलो चलेगा? शर्त बस यही है कि नाकाम रहने पर तुम्हें एक महीने तक लगातार अरबाज खान का 'माँ तुझे सलाम' देखना पड़ेगा और हर बार उसके 'दूध मांगोगे तो खीर देंगे, कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगे' कहने पर तुम्हें चिकन-डांस करना होगा. 
                                                                         :: :: ::

Thursday, August 8, 2013

दूरी

नत्त रोज़न्स्का की एक कविता... 

नत्त रोज़न्स्का की कविता  
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

तुम 
हाथ भर की दूरी पर हो मुझसे 
बस मेरा हाथ 
अपनी रजाई की तहों के भीतर नहीं 
दुनिया के एक नक़्शे पर पड़ा है 
और मुमकिन नहीं मेरे लिए  
कि समंदर लपेटकर अपने चारों ओर 
दुबक जाऊँ तुम में 
          :: :: :: 

Thursday, July 11, 2013

मुहम्मद अल-गज्जी कविता

मुहम्मद अल-गज्जी की एक कविता... 








कलम : मुहम्मद अल-गज्जी 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

एक कलम थामो अपनी कांपती उँगलियों से 
और विश्वास करो, भरोसा रखो पूरा 
कि आसमानी रंग की एक तितली है पूरी दुनिया 
और जाल हैं शब्द उसे पकड़ने के लिए. 
                   :: :: ::

Tuesday, June 18, 2013

एन पोर्टर : जाड़े की सांझ

एन पोर्टर (Anne Porter) की एक कविता...   
जाड़े की सांझ : एन पोर्टर 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 
 
जाड़े की किसी साफ़ सांझ 
दूज का चाँद 

और बलूत के ठूँठ पर लगा 
गिलहरी का गोल घोंसला 

बराबर के ग्रह होते हैं. 
          :: :: ::

Monday, May 13, 2013

क्रांतिकारी कवि लिओनेल रुगामा की कविता

लिओनेल रुगामा का जन्म 1949 में निकारागुआ में हुआ था. 1967 में वे, वहां के तानाशाह सोमोज़ा के विरुद्ध भूमिगत संघर्ष चला रही सांदिनीस्ता नेशनल लिबरेशन फ्रंट में शामिल हो गए और 15 जनवरी 1970 को बीस वर्ष की अल्पायु में सोमोज़ा की फौज से लड़ते हुए उनकी मृत्यु हो गई. यहाँ प्रस्तुत है उनकी एक कविता... 

पृथ्वी चंद्रमा की एक उपग्रह है  :  लिओनेल रुगामा  
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

अपोलो 2 ज्यादा महँगा था अपोलो 1 के मुकाबले 
अपोलो 1 बहुत महँगा था. 

अपोलो 3 ज्यादा महँगा था अपोलो 2 के मुकाबले 
अपोलो 2 ज्यादा महँगा था अपोलो 1 के मुकाबले 
अपोलो 1 बहुत महँगा था. 

अपोलो 4 ज्यादा महँगा था अपोलो 3 के मुकाबले 
अपोलो 3 ज्यादा महँगा था अपोलो 2 के मुकाबले 
अपोलो 2 ज्यादा महँगा था अपोलो 1 के मुकाबले 
अपोलो 1 बहुत महँगा था. 

अपोलो 8 ने तो भट्ठा ही बैठा दिया था, मगर किसी ने एतराज नहीं जताया 
क्योंकि अन्तरिक्ष यात्री प्रोटेस्टैंट थे 
उन्होंने बाइबिल का पाठ किया चंद्रमा पर 
और अचंभित और खुश कर दिया हर इसाई को 
और उनके लौटने पर पोप पॉल छंठे ने दुआ दी उन्हें. 

अपोलो 9 इन सबकी सम्मिलित लागत से भी अधिक महँगा था 
अपोलो 1 सहित, जो कि बहुत महँगा था. 

अकावालिंका के लोगों के परदादा-दादी  
भूख से कम पीड़ित थे, उनके दादा-दादी के मुकाबले. 
उनके परदादा-दादी मरे थे भूख से. 
अकावालिंका के लोगों के दादा-दादी 
भूख से कम पीड़ित थे, उनके माता-पिता के मुकाबले. 
उनके दादा-दादी मरे थे भूख से.  
अकावालिंका के लोगों के माता-पिता 
भूख से कम पीड़ित थे, वहाँ के लोगों के बच्चों के मुकाबले. 
उनके माता-पिता मरे थे भूख से. 

अकावालिंका के लोग भूख से कम पीड़ित हैं 
वहाँ के लोगों के बच्चों के मुकाबले. 
अकावालिंका के लोगों के बच्चे जन्मे नहीं हैं भूख के कारण 
वे भूखे हैं जन्म लेने के लिए, सिर्फ भूख से मर जाने के लिए ही. 
खुशकिस्मत हैं गरीब कि उन्हें चंद्रमा मिलेगा विरासत में. 
                                    :: :: ::

Friday, May 10, 2013

डान सोशिउ : चीन जितनी बड़ी

रोमानियाई भाषा के कवि डान सोशिउ की एक कविता... 

चीन जितनी बड़ी  : डान सोशिउ 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

और हम बैठ गए पत्थर की गीली बेंचों पर 
पुराने अखबार दबाए अपने चूतड़ों के नीचे 
हम में से एक ने कहा सुनो मेरी सचमुच बड़ी इच्छा है 
सिगरेट की ठूँठों से अपने लिए एक माला बनाने की 

वह '95 का कोई दिन था 
क्योंकि दूसरी बोतल खाली करने के बाद 
हमने उसे टिका दिया था पहली वाली के ऊपर 
और गिरी नहीं थी वह बोतल 

फिर एक लड़की आ गई थी वायलिन लिए हुए 
सिर्फ एक ही धुन आती थी उसे 
और उसने दो बार बजाया था उसे हमारे लिए 

ऊब, चीन जितनी बड़ी किसी ने कहा था 
चलो चमकाकर उन्हें लटका लेते हैं अपनी गर्दनों में किसी ने कहा था 
                           :: :: ::

Friday, April 5, 2013

हेनरिक डोपट की कविता

डेनमार्क के कवि हेनरिक डोपट (Henrik Nordbrandt) की एक कविता... 

ढलते मार्च के दिन : हेनरिक डोपट 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

दिन एक दिशा में चलते हैं 
और चेहरे उल्टी दिशा में. 
बराबर वे उधार लिया करते हैं एक-दूसरे की रोशनी. 

कई सालों बाद मुश्किल हो जाता है पहचानना 
कि दिन कौन से थे 
और कौन से चेहरे... 

और दोनों चीजों के बीच की दूरी 
और भी दुर्गम लगती जाती है 
दिन ब दिन और चेहरा दर चेहरा 

यही मैं देखता हूँ तुम्हारे चेहरे में 
ढलते मार्च के इन चमकीले दिनों को. 
                    :: :: :: 
(Nordbrandt का उच्चारण यहाँ से) 

Thursday, February 14, 2013

लेविस कैरोल की कविता

लेविस कैरोल की एक कविता... 


एक जोड़ : लेविस कैरोल 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

तुम्हें दे तो दिया सब  
अब और कहाँ से लाऊँ, 
अलबत्ता तुम्हें थोड़ा ही मिला हो शायद: 
दो आधे, तीन तिहाई, और चार चौथाई 
कुल इतना ही तो दिया था तुम्हें.  
            :: :: :: 

Tuesday, February 5, 2013

रुथ फेनलाईट : हैण्डबैग

अमेरिकी कवयित्री रुथ फेनलाईट (1931) की एक कविता... 


हैण्डबैग : रुथ फेनलाईट 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मेरी माँ का पुराना हैण्डबैग, 
उन चिट्ठियों से ठुंसा हुआ 
जिन्हें वह साथ रखे रही पूरे युद्ध भर.  
गंध मेरी माँ के हैण्डबैग की : पेपरमिंट 
और लिपस्टिक और फेस पाउडर. 
उन चिट्ठियों की हालत, नरम 
और किनारों पर कटी-फटी हुई, खोली गईं,  
पढ़ी गईं, और फिर से मोड़ी गईं कितनी बार. 
चिट्ठियाँ मेरे पिता की. चमड़े 
और पाउडर की गंध, तभी से  
जिनका मतलब है स्त्रीत्व,  
और प्यार, और पीड़ा, और युद्ध. 
                   :: :: :: 

Saturday, February 2, 2013

लारेंस फरलंगएरी : खुशी का नुस्खा

अमेरिकी कवि, पेंटर और प्रकाशक लारेंस फरलंगएरी (1919) की एक कविता...   


ख़बारुस्क या किसी भी जगह पर खुशी का नुस्खा : लारेंस फरलंगएरी 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

दरख्तों वाली एक शानदार सड़क,  
धूप में एक बढ़िया कैफ़े 
और बहुत छोटे-छोटे प्यालों में कड़क ब्लैक काफ़ी. 

एक पुरुष या स्त्री, जिसे मुहब्बत हो आपसे 
कोई जरूरी नहीं कि बहुत ख़ूबसूरत ही. 

एक अच्छा सा दिन. 
             :: :: :: 
ख़बारुस्क : मास्को से लगभग 5000 मील और चीन की सीमा से महज 20 मील दूर रूस के पूर्वी छोर पर बसा एक शहर. 

Saturday, January 26, 2013

डोरोथी पार्कर : सामाजिक टिप्पणी


अमेरिकी कवयित्री डोरोथी पार्कर (1893 -- 1967) की एक कविता...  


सामाजिक टिप्पणी : डोरोथी पार्कर 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मोहतरमा, यदि आप मिलें किसी से 
बहुत चौकस हों जिसके तौर-तरीके,  
जो बड़बड़ाता रहता हो कि उसकी बीवी 
ध्रुवतारा है उसकी ज़िंदगी की, 
जो भरोसा दिलाता रहे आपको 
कि उसने कभी नहीं की बेवफाई, 
कि किसी और से कभी नहीं किया प्यार... 

मोहतरमा, भाग लीजिए उसके पास से!  
                :: :: :: 

Tuesday, January 22, 2013

ई बी व्हाईट : प्राकृतिक इतिहास

अमेरिकी लेखक ई. बी. व्हाईट (1899 -- 1985) ने कहा है, "एक बार आप मकड़ों को देखना शुरू कर दें तो आपके पास कुछ और करने के लिए समय नहीं रह जाता". यहाँ प्रस्तुत कविता उन्होंने 1929 में अपनी शादी के कुछ हफ़्तों बाद टोरंटो के किंग एडवर्ड्स होटल से अपनी पत्नी को भेजी थी.   


प्राकृतिक इतिहास : ई बी व्हाईट 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

टहनी से गिरता हुआ मकड़ा 
एक डोर खोलता जाता है अपनी हिकमत की; 
एक महीन, जाना-समझा औजार 
चढ़ाई में इस्तेमाल करने के लिए. 

और अधर से होती 
शांत उतराई की इस पूरी यात्रा में 
सच्चे दिल से वह बना डालता है एक सीढ़ी 
सफ़र की शुरूआत की जगह तक. 

इसी तरह मैं निकला बाहर, जैसे निकलते हैं मकड़े 
एक सच निरखता हुआ मकड़े के जाले में 
तुमसे जोड़े रहा एक रेशमी धागा 
अपने लौटने के लिए. 
            :: :: :: 

Saturday, January 12, 2013

येहूदा हालेवी : शराब के बगैर प्याले

येहूदा हालेवी (1075 -- 1141) की एक कविता...  













शराब के बगैर प्याले : येहूदा हालेवी 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मामूली चीज होते हैं शराब के बगैर प्याले 
जैसे जमीन पर फेंका हुआ कोई बर्तन, 
पर रस से छलछलाते, चमकते हैं वे 
जैसे शरीर और आत्मा. 
           :: :: :: 

Monday, January 7, 2013

ईयावगेनी बनीमोविच की कविता

1954 में जन्मे ईयावगेनी बनीमोविच मास्को में रहते हैं. कविताएँ लिखने के अतिरिक्त वे एक स्तंभकार और राजनीतिक भी हैं तथा मास्को सिटी डूमा के सदस्य रह चुके हैं. यहाँ प्रस्तुत है उनकी एक कविता...   


बहाना और सफाई : ईयावगेनी बनीमोविच 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मैं कोई कवि नहीं हूँ, 
जीते-जागते कवि जैसी कोई चीज सच में होती है क्या 

मैं एक स्कूल टीचर हूँ 
गणित पढ़ाता हूँ,  
कम्प्यूटर साइंस,  
नैतिक शास्त्र और गृहस्थ जीवन का मनोविज्ञान भी 

इस सबसे बढ़कर रोज लौट आता हूँ घर 
अपनी बीवी के पास 

जैसा कि रूमानी झुकाव वाले एक पायलट ने कभी कहा था,  
प्रेम तब नहीं होता जब दो लोग एक-दूसरे को देखते रहें 
बल्कि तब होता है जब वे दोनों देखा करें एक ही दिशा में 

यह हमारे बारे में ही है 

दस बरसों से मैं और मेरी बीवी 
एक ही दिशा में देखते रहे हैं 

टेलीविजन की तरफ 

आठ सालों से हमारा बेटा भी उसी तरफ देख रहा है 

मैं कोई कवि नहीं हूँ,  
ऊपर बताए गए 
चौबीसों घंटे के पक्के सबूत में कोई सुराख तो नहीं है न 

गलतफहमियों और संयोगों का मेल,  
जो यदा-कदा पत्र-पत्रिकाओं में 
मेरी कविताओं के प्रकाशन में फलित होता है,  
मुझे अपना गुनाह क़ुबूल करने के लिए मजबूर करता है 

मैं कविता तभी लिखता हूँ जब वह अपरिहार्य हो जाए 
जब मैं निगरानी करता होता हूँ कक्षा की आंतरिक परीक्षाओं की 
तमाम पब्लिक स्कूल सुधारों के बावजूद 
कुछ विद्यार्थी अब भी करते हैं नक़ल 

इसे रोकने के लिए 

मुझे मजबूरन बैठना होता है गर्दन उचका कर 
आँखें फैलाए और सतर्क 
निर्निमेष निगाहें, फर्श के ठीक ऊपर किसी जगह पर टिकी हुईं 

यह मुद्रा अनिवार्य रूप से 
ले जाती है कविता रचने की ओर 

जो कोई भी चाहे जांच सकता है इसे 

मेरी कविताएँ छोटी होती हैं 
क्योंकि 45 मिनट से अधिक की नहीं होतीं कक्षा की आंतरिक परीक्षाएं 

मैं कोई कवि नहीं हूँ, 

और शायद 
इसीलिए दिलचस्प हूँ मैं 
               :: :: :: 
व्लादिमिर मायकोवस्की की आत्मकथा 'आई माइसेल्फ़' में एक वाक्य आता है "मैं एक कवि हूँ और इसीलिए मैं दिलचस्प हूँ."  

Thursday, January 3, 2013

लंदन में चंद्रमा की अवस्थाएं

जार्डन के कवि अमजद नसीर की एक कविता... 













लंदन में चंद्रमा की अवस्थाएं : अमजद नसीर 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

हम दोनों मौसम के बारे में बात कर रहे थे, वही ज़ंग खाई हुई कुंजी जिससे यहाँ लंदन में बातचीत के दरवाजे खुलते हैं. हमारी पुरानी पड़ोसन मिसेज मारिसन अब हमारी सड़क पर आखिरी अंग्रेज औरत बची हैं क्योंकि जैसे-जैसे इधर एशियाई आप्रवासियों की संख्या बढ़ती गई, वैसे-वैसे अंग्रेज यहाँ से अपना बोरिया-बिस्तर समेटते गए. वे बोलीं: "पहले लंदन का आसमान ऐसा नहीं बल्कि वैसा ही हुआ करता था जैसा कि आपके हिन्दुस्तान का आसमान होता होगा." 

मैंने उन्हें दुरुस्त किया: "मैं जार्डन का हूँ," लेकिन उन्होंने मेरी इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया. शायद उन्होंने इसे दुरुस्ती के रूप में देखा ही न हो. वे उसी अंग्रेजी लहजे में बोलती गईं जिसमें भावनात्मक प्रतिध्वनियों को समझना मुश्किल होता है, कि वे सब भी सितारों को देखा करते थे और चंद्रमा की अवस्थाओं का पता करते रहते थे. 

मैं कायल तो नहीं हुआ मगर अंग्रेजी शिष्टता के लबादे को ओढ़े हुए बोला: "किस वजह से चाँद और सितारे गायब हो गए और आसमान, मुर्गे की आँखों जैसी साफ़ रातों में भी, एक गंदे सोख्ता कागज़ में बदल गया?" 

"मैं नहीं जानती," उन्होंने कहा. "शायद मौसम में बदलाव, बिजली के हमारे अति इस्तेमाल या इस अत्यधिक शहरीकरण की वजह से. हम धरती को रोशन करते हैं और आसमान गायब हो जाता है. इस मामले में हिन्दुस्तान में आप शायद बेहतर स्थिति में हैं." 

"जार्डन में," मैंने कहा. 

एक बार फिर, मेरी इस बात पर उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया.   

वे मुस्कराईं और उस ट्राली को उन्होंने अपने घर की ओर धकेलना शुरू कर दिया जिसे वे अपनी रोजाना की खरीदारी के लिए इस्तेमाल करती थीं. यह बातचीत के अंत का एलान था जिसे शराफ़त ने दो ऐसे पड़ोसियों पर लाद दिया था जो अन्यथा दरवाजे पर मिलने पर एक-दूसरे से बचने की हर संभव कोशिश किया करते हैं.     

मैं उन्हें बताना चाहता था कि फ़ौजी हुकूमत और भ्रष्टाचार से कराह रहे पूर्वी शहरों के आसमानों का भी यही हाल है, कि वे सितारे भी गुम हो चुके हैं जो हमारे बचपन पर धूमकेतुओं की चित्तियाँ बनाया करते थे, मगर मुझे डर था कि मैं उस इकलौती सौगात को खो बैठूंगा जिसके चलते वे मुझसे ईर्ष्या करती हैं. 
                                                                :: :: :: 

Thursday, November 8, 2012

लोला हास्किंस : मुहब्बत

लोला हास्किंस की एक कविता...   



मुहब्बत : लोला हास्किंस 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

वह पहन कर देखती है उसे, किसी कपड़े की तरह 
और तय करती है कि वह ठीक नहीं आ रही उस पर, 
फिर उसे शुरू करती है उतारना 
उतर आती है उसकी चमड़ी भी.
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Monday, October 29, 2012

ज़ाक प्रेवेर : किसी चिड़िया की तस्वीर बनाने के लिए

फ़्रांसीसी कवि ज़ाक प्रेवेर (Jacques Prevert) की एक कविता...   


किसी चिड़िया की तस्वीर बनाने के लिए : ज़ाक प्रेवेर 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

सबसे पहले तो एक पिंजरा बनाना 
छोटे से खुले दरवाजे वाला 
फिर बनाना कोई आकर्षक चीज 
सहज सी 
कोई सुन्दर चीज 
ऎसी जो फायदे की हो चिड़िया के लिए 
इस तस्वीर को रख देना एक पेड़ पर 
किसी बगीचे में 
किसी पार्क 
या किसी जंगल में 
खुद को छिपा लेना पेड़ के पीछे 
चुपचाप 
अचल... 

कभी-कभी चिड़िया आ जाती है जल्दी ही 
मगर कभी-कभी तो सालों लग जाते हैं 
हताश मत होना 
इंतज़ार करना 
गर जरूरत पड़े तो सालों करना इंतज़ार 
उसके आगमन की शीघ्रता या धीमेपन का 
कोई सम्बन्ध नहीं है 
तस्वीर की अच्छाई से 

जब आ जाए चिड़िया 
गर आए वह 
बनाए रखना बहुत गहरी खामोशी 
इंतज़ार करना जब तक चिड़िया अन्दर न आ जाए पिंजरे के 
और जब वह दाखिल हो जाए अन्दर 
धीरे से बंद कर देना दरवाजे को ब्रश से 
फिर एक-एक कर हटा देना सारे सींखचों को 
ध्यान रखना कि हाथ न लगने पाए चिड़िया के किसी पंख से 

फिर बनाना पेड़ की तस्वीर 
सबसे खूबसूरत डाली चुनना 
चिड़िया के लिए 
हरे पल्लव बनाना और हवा की शीतलता 
धूप में तैरते कण बनाना और गर्मियों के ताप में 
दूब के कीड़ों की आवाज़ 
और फिर, इंतज़ार करना चिड़िया के गाने का 

अगर चिड़िया नहीं गाती 
तो यह अपशकुन होगा 
इसका मतलब गड़बड़ है तस्वीर 
लेकिन यदि वह गाने लगती है तो यह अच्छा शकुन है 
इसका मतलब तुम कर सकते हो अपने दस्तखत 

तब तुम बड़े प्यार से खींचना 
चिड़िया से एक पंख 
और तस्वीर के एक कोने में लिख देना अपना नाम. 
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Monday, October 15, 2012

पीटर चर्चेस : चोरी करने की बीमारी

चोरी करने की बीमारी से पीड़ित एक चौर्योन्मादी. पीटर चर्चेस की एक और कविता... 


चौर्योन्मादी : पीटर चर्चेस 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

वह चोरी करने की बीमारी से पीड़ित थी. जब वह देख नहीं रहा होता तो अनजाने में ही वह टुकड़े-टुकड़े उसको चुराया करती और उन्हें अपने शरीर में छिपा लिया करती. उधर उसे पता था कि वह कम होता जा रहा है, लेकिन यह नहीं समझ पाता था कि कैसे और क्यों. और लो, अचानक वह गायब हो गया. मगर दिल से वह कोई चोर नहीं थी. जब उसे एहसास हुआ कि उसने क्या कर डाला है तो उसने आलिंगन समाप्त कर दिया और उसे, उसको लौटा दिया. 
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