Monday, February 7, 2011

शकीरा पर मार्केज : जादूगरनी पर एक जादुई यथार्थवादी

(ज्यादातर लेखकों में किसी लोकप्रिय विधा या लोकप्रिय कलाकार पर लिखते हुए एक किस्म का संकोच ही होता है. लोकप्रिय होना अगंभीर और अछूत माना जाता है. इस लेख का महत्त्व इसलिए ही है कि मार्केज जैसे पाए के लेखक ने अपने से बहुत कम उम्र की हमवतन  पॉप गायिका शकीरा पर कलम चलाई है. मार्केज और शकीरा कोलंबिया के दो सबसे मशहूर लोगों में हैं. लेख आज से करीब नौ साल पुराना है और अन्य बहुत सी जगहों के साथ-साथ 8 जून 2002 के गार्जियन में प्रकाशित हुआ था.)


शायर और शहजादी 

शकीरा ने 1 फरवरी को मियामी से ब्यूनस आयर्स के लिए उड़ान भरी. उसका पीछा एक पत्रकार कर रहा था जो उससे एक रेडियो कार्यक्रम के लिए फोन पर सिर्फ एक सवाल पूछना चाहता था. तमाम वजहों से वह अगले 27 दिनों तक उससे संपर्क स्थापित करने में नाकाम रहा, फिर मार्च के पहले हफ्ते में वह स्पेन में उसका पता भी न लगा सका. उसके पास कुलजमा एक कहानी का आइडिया और उसके लिए एक शीर्षक था, "जब कोई उसे न ढूंढ़ पाए उस वक्त शकीरा क्या कर रही होती है ?" शकीरा हँसते-हँसते दोहरी हो उठी, डायरी हाथ में लिए हुए वह कहती है, "मजे कर रही होती हूँ मैं." 

शकीरा पहली फरवरी की शाम को ब्यूनस आयर्स पहुंची थी, और अगले दिन आधी रात तक काम करती रही ; आज उसका जन्मदिन था लेकिन इसे मनाने का उसके पास मौक़ा नहीं था. बुधवार को उसने वापस मियामी का रुख किया, जहां उसने एक बड़े प्रचार अभियान के लिए तस्वीरें उतरवाईं और कुछ घंटे अपने नए एल्बम के अंग्रेजी संस्करण की रिकार्डिंग में खर्च किए. शुक्रवार दो बजे दोपहर से वह शनिवार की सुबह तक रिकार्डिंग कराती रही, तीन घंटे सोई और फिर वापस स्टूडियो पहुँच गई जहां वह दोपहर के तीन बजे तक काम करती रही. उस रात, वह कुछ घंटे सोई और रविवार को तड़के ही लीमा की उड़ान में सवार हो गई. सोमवार की दोपहर वह एक लाइव टेलीविजन शो में नजर आई; चार बजे एक टेलीविजन विज्ञापन के लिए उसका फिल्मांकन हुआ, शाम को वह अपने प्रचारकों द्वारा दी गई एक दावत में शामिल हुई, और सुबह तक रुकी रह गई. अगले दिन 9 फरवरी को उसने सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक, आधे-आधे घंटे के 11 इंटरव्यू रेडियो, टेलीविजन और अखबारों को दिए. बीच में उसने दोपहर के खाने के लिए बस एक घंटे का अवकाश लिया था. उसे वापस मियामी में होना था लेकिन आखिरी  क्षणों में बोगोटा में एक घंटे का ठहराव आयोजित कर लिया जहां वह भूकंप पीड़ितों को दिलासा देने पहुंची.   

 उस रात, किसी तरह उसने मियामी की आखिरी उड़ान पकड़ने का बंदोबस्त किया जहां उसने चार दिन स्पेन और पेरिस के संगीत कार्यक्रमों की तैयारी में खर्च किए. ग्लोरिया एस्टीफन के साथ उसने शनिवार को दोपहर के खाने के समय से रविवार को सुबह 4:30 बजे तक अपने एल्बमों के अंग्रेजी संस्करण पर काम किया. सुबह होने पर वह अपने घर गई, एक काफी के साथ एक ब्रेड खाकर वह पूरे कपड़ों में ही सो गई. डेढ़ घंटे बाद उसे रेडियो इंटरव्यू की एक श्रृंखला के लिए जागना था. मंगलवार 16 तारीख को वह कोस्टा रिका के एक लाइव टी वी शो में नजर आई. बृहस्पतिवार को उसने मियामी और फिर कराकस के लिए उड़ान भारी जहां उसे टेलीविजन शो सेंसेशनल सेटरडे में भाग लेना था. 

वह बमुश्किल सो पाई - 21 को उसे ग्रेमी समारोह में शिरकत करने के लिए वेनजुएला से लॉस एंजिल्स की उड़ान भरनी थी. उसने पुरस्कार विजेताओं में से एक होने की उम्मीद लगाई थी मगर सभी मुख्य पुरस्कार अमेरिकी ही झटक ले गए. इतने पर भी उसकी रफ़्तार कम नहीं हुई : 25 को उसने स्पेन के लिए उड़ान भरी, जहां उसने 27 और 28 फरवरी को काम किया. 1 मार्च तक, जब वह किसी तरह मेड्रिड के एक होटल में पूरी रात सोने का वक़्त निकाल पाई, वह किसी पेशेवर विमान परिचारिका जितना हवाई सफ़र तय कर चुकी थी - एक महीने में 40000 किलोमीटर से भी ज्यादा.

ठोस धरातल पर शकीरा का काम इससे कम की मांग भी नहीं करता. उसके साथ सफ़र करने वाली टीम, जिसमें संगीतकार, लाईट टेक्नीशियन, मंच सहायक और साउंड इंजीनियर आदि होते हैं, किसी सैन्य टुकड़ी जैसी दिखती है. वह हर चीज पर खुद ही नजर रखती है. वह संगीत पढ़ती नहीं है, मगर उसकी अचूक आवाज़ और सम्पूर्ण ध्यान उसे और उसके संगीतकारों को हर स्वर ठीक-ठीक समझने की इजाजत देते हैं. वह अपनी टीम के सभी सदस्यों का व्यक्तिगत ध्यान रखती है. कभी-कभार ही वह अपनी थकान जाहिर होने देती है, लेकिन इससे आप कुछ और न समझें. 40 कार्यक्रमों वाले अर्जेंटीना के एक दौरे के आखिरी कुछ दिनों एक सहायक उसे बस में चढ़ने में मदद करने के लिए इंतज़ार कर रहा हो सकता है. वह अक्सर घबराहट और त्वचा संक्रमण की वजह से जलन आदि से बीमार हो जाती है.   

एमिलो एस्टीफन और उसकी बीवी ग्लोरिया के सहयोग से जारी होने वाले व्हेयर आर द थीव्स  एल्बम के अंग्रेजी संस्करण की विकट तैयारियों से हालात और भी संगीन हो गए. इसमें शकीरा अपनी ज़िंदगी के सबसे कठिन दबाव से होकर गुजरी : वह कामचलाऊ अंग्रेजी बोल लेती है, लेकिन उसने अपने उच्चारण पर बहुत मेहनत की, उसे ऎसी धुन सवार हुई कि वह अक्सर रात में सोते हुए अंग्रेजी बोला करती. अमेरिका में अपने प्रथम प्रदर्शन से पहले वाली रात उसे बुखार हो गया और वह सो नहीं पाई, "यह सोचकर कि मैं कुछ कर नहीं पाऊंगी मैं पूरी रात रोती रही." 

बरान्किला कोलंबिया के सोनार विलियम मेबारक और उनकी पत्नी नीडिया रिपोल्ल की इकलौती बेटी शकीरा का जन्म अरब वंश परम्परा वाले एक कलाप्रेमी परिवार में हुआ था. उसकी अकालपक्वता का ही नतीजा था कि उसने शुरुआती कुछ ही सालों में इतना कुछ सीख लिया जितना कि लोगबाग दशकों में सीख पाते हैं. 17 महीनों में ही वह अक्षरों का उच्चारण करने लगी थी; 3 साल में उसने गिनती सीख ली थी; चार साल की उम्र में वह अपने बरान्किला कान्वेंट स्कूल में बेले डांस करने लगी थी. इस स्कूल में 1930 के दशक में एक विलासी स्टाफ सदस्य ने शिरला टेम्पल पंथ का एक स्मारक खड़ा करवाना चाहा था. सात साल की उम्र तक शकीरा ने अपना पहला गाना लिख डाला था. आठ की होते-होते उसने कवितायेँ लिखना और दस की उम्र में उसने अपने मौलिक गीत लिखना और संगीतबद्ध करना शुरू कर दिया. इसी समय उसने अटलांटिक तट पर स्थित एल सेरेजान कोयला खदान के मजदूरों के मनोरंजन करने के अपने पहले अनुबंध पर दस्तखत किए. उसने अपनी माध्यमिक शिक्षा भी नहीं शुरू की थी जब एक रिकार्ड कम्पनी ने उसे साइन किया.   

   "मैं हमेशा से जानती थी कि मैं अत्यधिक रचनात्मक हूँ," वह बताती है, "मैनें प्रेम कवितायेँ कहीं, कहानियां लिखीं और गणित को छोड़कर हमेशा हर विषय में अच्छे नंबर लाकर दिखाए." जब उसके मम्मी-पापा के दोस्त उसके घर आते और उससे कुछ गाने के लिए कहते तो उसे अच्छा नहीं लगता था. "मुझे 30000 लोगों की भीड़ बेहतर लगती बनिस्बत कि पांच बुजुर्ग मुझे गाना गाते और गिटार बजाते सुन रहे हों." वह कमजोर लगती है, लेकिन उसे हमेशा यह पक्का पता था कि उसे विश्वप्रसिद्ध होना है. उसे यह नहीं मालुम था कि कैसे या किस चीज के लिए लेकिन इस बारे में उसे कभी तनिक भी संदेह नहीं रहा. यह तो उसकी नियति थी. 

आज उसके सपने सच से भी ज्यादा साबित हुए हैं. शकीरा का संगीत किसी और की तरह नहीं लगता और उसने एक तरह की मासूम ऐंद्रिकता का अपना ख़ास ब्रांड ईजाद किया है. "अगर मैं न गाऊँ तो मैं मर जाऊंगा", एक ऎसी बात है जो अक्सर हल्के में कह दी जाती है, लेकिन शकीरा के मामले में यह सच है : जब वह गा नहीं रही होती है तो बमुश्किल ही ज़िंदा होती है. आंतरिक शान्ति उसे भीड़ में भी अकेला होने की अपनी काबिलियत की वजह से हासिल होती है. वह कभी मंच-भय का शिकार नहीं हुई : वह महज मंच पर न होने से डरती है. "वहां मुझे वैसा ही लगता है", वह कहती है "जैसे जंगल में कोई शेर." यही वह जगह है जहां कि वह सचमुच अपने वास्तविक स्वरुप में आ सकती है.       

  भीड़ के भय से मुकाबला करने से बचने के लिए बहुत से गायक मंच से परे जगमग रोशनियों की तरफ देखा करते हैं. शकीरा इसका ठीक उलटा करती है, अपने सहायकों से वह कहती है कि वे सबसे जोरदार लाईट श्रोताओं की तरफ घुमा दें, ताकि वह उन्हें देख सके. "इससे पूरा संवाद होता है," वह बताती है. वह अनाम, अनुनमेय भीड़ को अपनी मर्जी और प्रेरणा के हिसाब से ढाल सकती है. "जब मैं लोगों के सामने गा रही होती हूँ तो उनकी आँखों में देखना पसंद करती हूँ." कभी-कभी दर्शकों को देखते हुए उसे कुछ ऐसे चेहरे नजर आते हैं जो उसने पहले कभी नहीं देखे, मगर उन्हें वह पुराने दोस्त के बतौर जानती होती है. एक बार उसने एक ऐसे शख्स को देखा जो सालों पहले मर चुका था. एक और समय उसे लगा कि कोई उसे किसी और जन्म से देख रहा है. "मैं पूरी रात उसके लिए गाती रही," वह कहती है. ऐसे चमत्कार बहुत से महान कलाकारों के लिए प्रेरणा - और अक्सर बर्बादी - का कारण रहे हैं.    

 शकीरा के बारे में सबसे विस्मयकारी बात है अधिकाँश बच्चों का उसकी दीवानगी में जकड़ जाना. 1996 में जब उसका एल्बम पायस डेस्कैल्जोस जारी हुआ, उसके प्रचारकों ने कैरेबियाई द्वीपों के लोक समारोहों के मध्यांतर के दौरान उसका प्रचार करने का फैसला किया. मगर जब बच्चों ने संगीत के साथ नाचते-गाते हुए यह मांग करना शुरू कर दिया कि वे पूरी शाम सिर्फ और सिर्फ शकीरा को ही सुनना चाहते हैं, तो उन्हें अपना रुख बदलना पड़ा. आज यह विषय शोध प्रबंध के लायक है. शकीरा की ही तरह के कपड़े, बातचीत और गाने गाते हुए, हर सामाजिक वर्ग के प्राथमिक स्कूलों की सभी बच्चियां उसकी प्रतिरूप बन चुकी हैं. छः वर्षीय लडकियां उसकी सबसे समर्पित प्रशंसक हैं.  

अवैध तरीके से तैयार किए गए एल्बम अवकाश के समय अदले-बदले जाते हैं और सस्ती दरों पर बेंचे जाते हैं. उसकी मालाओं, बालियों और बालों में लगाने के सामानों की नकलें दुकानों पर आते ही बिक जाते हैं. बाजार थोक के भाव लड़कियों को हेयर डाई बेंचता है ताकि वे शकीरा की नवीनतम शैली के अनुसार अपना रूप बदल सकें. वह लड़की जो सबसे पहले उसका नवीनतम एल्बम पा जाती है स्कूल की सबसे लोकप्रिय लड़की बन जाती है. सबसे अच्छी उपस्थिति वाले अध्ययन समूह वे होते हैं जो स्कूल के बाद लड़कियों के हास्टल में जुटते हैं - वहां होमवर्क पर एक सरसरी नजर डाली जाएगी, फिर कुछ हल्ला-गुल्ला मचेगा. जन्मदिन पार्टियां तमाम छोटी शकीराओं का बटोर होती हैं, सिर्फ उसी की धुन पर नाचते-गाते हुए बच्चे. सबसे खालिस दायरों में - और ऐसे बहुत से दायरे हैं - लड़कों को आमंत्रित नहीं किया जाता. 

अपनी असाधारण संगीत प्रतिभा और बाजार बोध के बावजूद शकीरा को यह मुकाम न हासिल होता यदि उसमें बेजोड़ परिपक्वता न होती. यह समझना बहुत मुश्किल है कि ऎसी अद्भुत रचनात्मक ऊर्जा ऎसी किसी लड़की में कैसे मौजूद हो सकती है जो रोज अपने बालों का रंग बदलती हो : कल काला, आज लाल और फिर कल हरा. वह अपने से अधिक उम्र की तमाम देवियों से ज्यादा पुरस्कार, ट्राफी और मानद उपाधियाँ पहले ही जीत चुकी है. आप कह सकते हैं कि वो ठीक वहीं है जहां कि वह चाहती है : बुद्धिमान, असुरक्षित, संकोची, प्यारी, अस्पष्ट, भावुक. अपने पेशे में शिखर पर होने के बावजूद वह बस बारान्किला की एक लड़की ही है; वह जहां कहीं भी रहे, मछली के अण्डों और मैनियोक की रोटी के लिए तरसती रहेगी. वह अभी तक अपने सपनों का घर खरीदने का बंदोबस्त नहीं कर पाई है, समुद्र तट पर एक शांत गुप्त स्थान, ऊंची छतों वाला और दो घोड़ों के साथ सुसज्जित. उसे किताबों से प्रेम है, वह उन्हें खरीदती और संजोती है, लेकिन उन्हें पढ़ने के लिए उसे उतना समय नहीं मिल पाता जितना कि वह चाहती है. वह हवाईअड्डों पर त्वरित विदाई के बाद पीछे छूट गए दोस्तों को याद तो करती है मगर उसे यह भी पता होता है कि उनसे फिर मिलना इतना आसान न होगा.    

   अपने द्वारा कमाए गए पैसों के बारे में, वह बताती है "यह उससे ज्यादा है जितना कि मैं क़ुबूल करती हूँ, लेकिन उससे कम जितना कि लोग सोचते हैं." संगीत सुनने की उसकी सबसे पसंदीदा जगह कार के भीतर है, जोर से बजता हुआ और शीशे पूरे चढ़े हुए ताकि किसी और को इससे दिक्कत न हो. "यह ईश्वर से बात करने के लिए सबसे आदर्श जगह है, खुद से बात करने और समझने की कोशिश करने के लिए भी." वह टेलीविजन से नफरत करती है. उसके अनुसार उसका सबसे बड़ा विरोधाभास अनंत जीवन में उसका विश्वास और मौत से उसका असहनीय डर है. 

वह बिना किसी बात को दोहराए एक दिन में 40 इंटरव्यू देने के लिए जानी जाती रही है. उसके पास कला, इस जीवन और अगले जीवन, ईश्वर के अस्तित्व, प्रेम और मृत्यु के बारे में अपने मौलिक विचार हैं. लेकिन उसके साक्षात्कारकर्ताओं और प्रचारकों ने उससे इन विचारों को स्पष्ट करवाने में इतनी मेहनत की है कि अब वह टाल-मटोल की विशेषज्ञ बन चुकी है, ऐसे जवाब देते हुए जो जाहिर करने के लिए कम और छुपाने के लिए ज्यादा उल्लेखनीय होते हैं. वह ऎसी किसी भी धारणा को खारिज करती है कि उसकी प्रसिद्धि अस्थायी है और ऎसी अटकलबाजी पर उत्तेजित हो उठती है कि अत्यधिक प्रयोग उसकी आवाज को नुकसान पहुंचा सकते हैं. "दिन की चमकीली धूप में, मैं सूर्यास्त के बारे में नहीं सोचना चाहती." हर हाल में, विशेषज्ञों का मानना है कि यह असम्भाव्य है क्योंकि उसकी आवाज में एक सहज प्राकृतिक विस्तार है जिसमें उसके अतिरेकों को बर्दाश्त करने की क्षमता है. बुखार से पीड़ित होते हुए भी उसे गाना पड़ा है ; वह अत्यधिक मेहनत और थकान से होकर भी गुजरी है ; लेकिन इस सबसे उसकी आवाज़ कभी प्रभावित नहीं हुई. "किसी गायक के लिए सबसे बड़ी निराशा," हमारे साक्षात्कार के आखिर में वह बेसब्री से कहती है, "यह है कि संगीत को अपना कैरियर चुनना और फिर सिर्फ इसलिए संगीत में कुछ न कर पाना क्यूंकि आप हमेशा इंटरव्यू ही दे रहे होते हैं."        

   उसका सबसे अनिश्चित विषय प्रेम है. वह इसको ऊंचा दर्जा देती है, इसका आदर्शीकरण करती है, यह उसके गीतों के पीछे की ताकत है मगर बातचीत में वह मजाक में इसकी व्याख्या करती है. "सच तो यह है," वह हँसते हुए कहती है "मैं मरने से भी ज्यादा शादी से डरती हूँ." उसके चार पुरुषमित्र रह चुके बताए जाते हैं और वह चिढ़ाने के अंदाज में स्वीकार करती है कि तीन और भी हैं जिनके बारे में कोई नहीं जानता. यह सभी उसी की उम्र के रहे हैं मगर उसके जितना परिपक्व कोई भी नहीं था. शकीरा उनका जिक्र प्यार से करती है, बिना दर्द के; जैसे उसके लिए वे अल्पायु भूत रहे हों जिन्हें उसने अपनी आलमारी में टांग रखा है. खुशकिस्मती से, हताश होने की कोई जरूरत नहीं है : अगली 2 फरवरी को, कुम्भ राशि में, शकीरा सिर्फ 26 साल की होगी.

(अनुवाद : मनोज पटेल)   
Gabriel Garcia Marquez on Shakira 

Friday, February 4, 2011

ओरहान पामुक : मैं स्कूल नहीं जाऊंगी


ओरहान पामुक के कथेतर गद्य संग्रह अदर कलर्स से कई टुकड़े आप इस ब्लॉग पर पढ़ चुके हैं. यहाँ प्रस्तुत मेरा यह अनुवाद पिछली 30 जनवरी को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ था, सोचा आपके साथ साझा करूँ. एक बेटी रुया के पिता ओरहान पामुक ने यह और अन्य काव्यात्मक रेखाचित्र एक पत्रिका Okuz (Ox) के लिए साप्ताहिक स्तम्भ के रूप में 1996 से 1999 के बीच लिखे थे. उनके अनुसार ऐसे ज्यादातर लेख एक ही बैठक में लिखे गए और इनमें मुझे अपनी बेटी और अपने दोस्तों के बारे में लिखते हुए बहुत मजा आया. यह दुनिया को शब्दों के माध्यम से देखने का उनका ख़ास तरीका था.   
तस्वीर मेरी बेटी लिपि की है, जब वह पहले दिन स्कूल जा रही थी और अभी उसे यह नहीं पता था कि हम उसे स्कूल में छोड़ के वापस आ जाने वाले हैं. - मनोज 

मैं स्कूल नहीं जाऊंगी 
मैं स्कूल नहीं जाने वाली. क्यूंकि निन्नी आ रही है मुझे. सर्दी लग गई है. स्कूल में मुझे कोई पसंद नहीं करता. 
मैं स्कूल नहीं जाने वाली. क्यूंकि दो बच्चे हैं वहां. मुझसे इत्ते बड़े. मुझसे ताकतवर. जब उनके बगल से गुजरती हूँ तो बाहें फैलाकर रास्ता रोक लेते हैं वे मेरा. डर लगता है मुझे. 
डर लगता है मुझे. मैं स्कूल नहीं जाने वाली. स्कूल में, वक़्त तो बस ठहर जाता है. सब कुछ छूट जाता है बाहर. स्कूल के गेट के बाहर. 
मिसाल के तौर पर घर का मेरा कमरा. मेरी मम्मी भी, और पापा, खिलौने मेरे. और बालकनी पर वो परिंदे. जब स्कूल में होती हूँ और उनके बारे में सोचती हूँ तो रोना आ जाता है मुझे. बाहर देखने लगती हूँ खिडकी से, वहां बादल होते हैं न. 
मैं स्कूल नहीं जाने वाली. क्यूंकि वहां कुछ भी अच्छा नहीं लगता मुझे. 
उस दिन एक पेड़ की तस्वीर बनाई थी मैनें. टीचर ने कहा, "यह सचमुच एक पेड़ ही है, बहुत अच्छे." मैनें फिर एक दूसरी बनाई. इसमें भी कोई पत्तियाँ नहीं थीं. 
फिर उन्हीं में से एक बच्चा मेरे पास आया और मेरा मजाक उड़ाने लगा. 
मैं स्कूल नहीं जाने वाली. रात को सोते समय जब अगले दिन स्कूल जाने के बारे में सोचती हूँ तो दहशत होती है बहुत. मैं कहती हूँ, "मैं स्कूल नहीं जाने वाली." वे बोलते हैं, "ऐसा कैसे कह सकती हो तुम ? स्कूल तो सभी लोग जाते हैं."
सभी लोग ? तो फिर जाने दो न सभी को. आखिर क्या हो जाएगा जो मैं घर पर ही रुक जाऊं ? कल गई थी न मैं, नहीं क्या ? कैसा रहेगा अगर मैं कल न जाऊं, और फिर उसके अगले दिन चली जाऊं ?
काश मैं घर पर होती अपने बिस्तर पर. या अपने कमरे में. काश कि मैं और कहीं भी होती सिवाय उस स्कूल के. 
मैं स्कूल नहीं जाने वाली, बीमार हूँ मैं. दिख नहीं रहा आपको ? जैसे ही कोई कहता है स्कूल  मैं बीमार हो जाती हूँ, पेट दर्द करने लगता है मेरा. वो दूध भी नहीं पीया जाता मुझसे. 
वह दूध नहीं पीना मुझे, मुझे कुछ नहीं खाना, और न ही स्कूल जाने वाली हूँ मैं. कितनी परेशान हो गई हूँ. मुझे कोई पसंद नहीं करता. वे दोनों बच्चे हैं वहां. बाहें फैलाकर रास्ता रोकते हैं वे मेरा. 
टीचर के पास गई थी मैं. टीचर ने कहा, "मेरे पीछे -पीछे क्यूं लगी हो ?" अगर आप नाराज न हों तो मैं आपको कुछ बताऊँ. मैं तो हमेशा टीचर के पीछे ही लगी रहती हूँ, और टीचर हमेशा यही बोलती रहती हैं कि "मेरे पीछे-पीछे न आओ."      
मैं स्कूल नहीं जाने वाली, कब्भी नहीं. क्यूं ? क्यूंकि मैं बस वहां जाना नहीं चाहती, इसीलिए और क्यूं. 
रेसेस के वक़्त मैं बाहर भी नहीं जाना चाहती. जब सब लोग मुझे भूल चुके होते हैं तभी रेसेस होता है. फिर सबकुछ एकदम से घाल-मेल हो जाता है, सभी भागने लगते हैं. 
टीचर मुझे घूर कर देखने लगती हैं, और बस इतना कहूंगी कि वे इतनी अच्छी नहीं लगतीं. मैं स्कूल नहीं जाना चाहती. वहां एक बच्चा है जो मुझे पसंद करता है, बस वही है जो मुझे अच्छे से देखता है. किसी से बताना मत,  लेकिन मुझे वह बच्चा भी नहीं पसंद. 
मैं बस वहां बैठी पड़ी रहती हूँ. कितना अकेलापन महसूस होता है मुझे. आंसू लुढ़कते रहते हैं मेरे गालों पर. मुझे स्कूल बिलकुल भी पसंद नहीं. 
मैं स्कूल नहीं जाना चाहती, कहती हूँ मैं. फिर सुबह हो जाती है और वे मुझे स्कूल ले जाते हैं. मैं हंस भी नहीं पाती. मैं अपने सामने एकदम सीधा देखती रहती हूँ, रोना आ जाता है मुझे. मैं अपनी पीठ पर फौजियों जितना बड़ा बस्ता लादे पहाड़ी पर चढ़ती हूँ, और निगाहें पहाड़ी चढ़ते हुए अपने नन्हें पैरों पर टिकाए रहती हूँ. कितना भारी है सबकुछ : मेरी पीठ पर लदा बस्ता, मेरे पेट में पड़ा गर्म दूध. रोना चाहती हूँ मैं. 
मैं स्कूल में दाखिल होती हूँ. लोहे का काला फाटक मेरे पीछे बंद होता है. मैं रो पड़ती हूँ, "मम्मी, देखो, तुमने मुझे भीतर लाकर छोड़ दिया."
फिर मैं अपनी कक्षा में जाकर बैठ जाती हूँ. बाहर उन बादलों में से कोई एक बादल हो जाना चाहती हूँ मैं.    
इरेजर्स, कापियां, और पेन : मुर्गियों को खिला दो यह सब ! 

(अनुवाद : मनोज पटेल)
Orhan Pamuk, Other Colours 

Wednesday, February 2, 2011

निकानोर पार्रा की लम्बी कविता


( निकानोर पार्रा का परिचय और उनकी कई कविताएँ आप इस ब्लॉग पर पहले ही पढ़ चुके हैं, आज उनकी एक लम्बी कविता "एक ताबूत की स्मृतियाँ".  - Padhte Padhte)

एक ताबूत की स्मृतियाँ 
एक शानदार बढ़ई की दूकान में जन्म हुआ था मेरा 
लेकिन दिलचस्प हिस्सा तो आता है बाद में 
यूं ही भटकता रहता था इधर-उधर बच्चा था जब 
मजाक उड़ाया करता था अस्थि-कलशों का 
बड़े धीर-गंभीर लगा करते वे मुझे 
शोरूम में कुछ महीने बिताने के बाद 
एक ऎसी ज़िंदगी जिसे मैं मजेदार ही कहूंगा 
क्यूंकि कोई चीज नहीं भंग करती थी शान्ति वहां की 
बहुत मजे किए मैंने वहां 
दूसरे ताबूतों की कीमत पर आप समझ ही सकते हैं 
- बस वार्निश की खराब गंध ही थी इकलौती खोट वहां - 
तो कुछ महीनों के बाद फिर से बताऊँ आपको 
मुझे खरीदा गया मातमी लिबास पहने एक स्त्री द्वारा 
और किसी पहियों वाली चीज पर लाकर पटक दिया गया 
गैस इंजन से चालित 
जो गुजरी शहर से होकर तेज रफ़्तार में 
एक अनुभव जो कभी नहीं भूलूंगा मैं 
क्यूंकि अचानक 
180 डिग्री की करवट ली मेरी ज़िंदगी ने 
पूर्ण जड़ अवस्था से 
शाश्वत गति की स्थिति में आ पहुंचा मैं 
जब तक की हम एक निजी मकान तक न आ पहुंचे 
जहां मुझे खाने के कमरे में एक मेज पर रख दिया गया 


घंटों बिताए होंगे मैंने वहां 
खाने के कमरे की उस मेज पर 
कितने घंटे पता नहीं क्यूंकि फ़ौरन ही सो गया मैं गहरी नींद 
थक गया था घुमावदार रास्तों में 
और अँधेरे से - इन सारे अनुभवों से - 
एक ऎसी दुनिया जो अब तक अनजान ही थी मेरे लिए 
एक घड़ी देखी मैंने लटकती हुई दीवार के बीचोबीच 
और मेज और कुर्सियां तमाम बिखरे हुए इधर-उधर 
हालांकि अपने दिल में कहीं गहरे अच्छा लग रहा था मुझे 
इतना कि ख़्वाबों में भी नहीं सोचा था होगा कभी मुमकिन 
जब जगा मैं तो बदल चुका था पूरा दृश्य 
मसलन ढंका हुआ था फूलों से मैं 
और देख सकता था कुछ भीमकाय शमादान अपने पैरों की तरफ 
चकाचौंध कर देने वाली रोशनी फेंकते 
आह, और काले परदे भी 
ढेर सारे रुपहले सितारों से सुसज्जित 
अंदाजा भी नहीं लगा सकते आप मेरी खुशी का 
जब महसूस किया मैनें कि मैं ही था 
इस शानदार दुनिया की निगाहों का केंद्र 
लोग आते और देखते मुझे एक छोटी खिड़की से 
वे गले लगाते मुझे बड़े परेशान से 
गतिविधियाँ जितना समझ सकता था मैं भरसक 
ऊबने लगा था उस सारे दृश्य से मैं 
जो वहां संपन्न होता लग रहा था बहुत धीमी गति से 
एक खुश आत्मा द्वारा जबकि कष्ट सह रहे हों बदकिस्मत लोग 
तभी अचानक हालात पलट गए पूरी तौर पर 
बाहर निकाला उन्होंने मुझे उस नामुराद कमरे से 
और रखा मुझे घोड़े से जुती एक बग्घी में 
अदब की पराकाष्ठा ही कहेंगे इसे 
वही काले लिबास वाली स्त्री 
लिपट गई मुझसे जी-जान से 
काफी मुश्किल करती हुई रिश्तेदारों का काम 
वह सबसे शानदार दिन था मेरी ज़िंदगी का 
क्यूंकि जब शहर से गुजर रहे थे हम 
एक ऎसी मंजिल को जो अनजान थी मेरे लिए 
रास्ते में मिलने वाले सभी पदयात्री 
सम्मान प्रकट करते अपना हैट उतारकर 
ऎसी इज्जत नहीं समझता खुद को जिसके काबिल 
आखिर आ पहुंचे हम एक छोटे शहर में 
दीवारों से घिरे जैसा की होता था पुराने जमाने में 
एक तमाशा शुरू हुआ वहां 
जिसने आँसू ला दिए मेरी आँखों में 
और अमिट किरदारों से उकेर लिया खुद को मेरी याददाश्त में 
मेरा इशारा उन अद्भुत भाषणों की तरफ है 
जो असंख्य लोगों ने दिए मेरे सम्मान में 
और बार-बार दुहराए गए प्रेम के प्रदर्शन की तरफ 
जो सुना किया मैनें अपने चारो ओर
जब तक नीचे नहीं उतार दिया उन्होंने मुझे भरसक सतर्कता बरतते हुए 
इस कमरे में जहां इस समय मौजूद हूँ मैं 
टन भर फूलों के नीचे 
इंतज़ार करता हुआ नई चीजें घटित होने का. 

(अनुवाद : Manoj Patel) 
Nicanor Parra, Memories of a Coffin 
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