Friday, February 4, 2011

ओरहान पामुक : मैं स्कूल नहीं जाऊंगी


ओरहान पामुक के कथेतर गद्य संग्रह अदर कलर्स से कई टुकड़े आप इस ब्लॉग पर पढ़ चुके हैं. यहाँ प्रस्तुत मेरा यह अनुवाद पिछली 30 जनवरी को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ था, सोचा आपके साथ साझा करूँ. एक बेटी रुया के पिता ओरहान पामुक ने यह और अन्य काव्यात्मक रेखाचित्र एक पत्रिका Okuz (Ox) के लिए साप्ताहिक स्तम्भ के रूप में 1996 से 1999 के बीच लिखे थे. उनके अनुसार ऐसे ज्यादातर लेख एक ही बैठक में लिखे गए और इनमें मुझे अपनी बेटी और अपने दोस्तों के बारे में लिखते हुए बहुत मजा आया. यह दुनिया को शब्दों के माध्यम से देखने का उनका ख़ास तरीका था.   
तस्वीर मेरी बेटी लिपि की है, जब वह पहले दिन स्कूल जा रही थी और अभी उसे यह नहीं पता था कि हम उसे स्कूल में छोड़ के वापस आ जाने वाले हैं. - मनोज 

मैं स्कूल नहीं जाऊंगी 
मैं स्कूल नहीं जाने वाली. क्यूंकि निन्नी आ रही है मुझे. सर्दी लग गई है. स्कूल में मुझे कोई पसंद नहीं करता. 
मैं स्कूल नहीं जाने वाली. क्यूंकि दो बच्चे हैं वहां. मुझसे इत्ते बड़े. मुझसे ताकतवर. जब उनके बगल से गुजरती हूँ तो बाहें फैलाकर रास्ता रोक लेते हैं वे मेरा. डर लगता है मुझे. 
डर लगता है मुझे. मैं स्कूल नहीं जाने वाली. स्कूल में, वक़्त तो बस ठहर जाता है. सब कुछ छूट जाता है बाहर. स्कूल के गेट के बाहर. 
मिसाल के तौर पर घर का मेरा कमरा. मेरी मम्मी भी, और पापा, खिलौने मेरे. और बालकनी पर वो परिंदे. जब स्कूल में होती हूँ और उनके बारे में सोचती हूँ तो रोना आ जाता है मुझे. बाहर देखने लगती हूँ खिडकी से, वहां बादल होते हैं न. 
मैं स्कूल नहीं जाने वाली. क्यूंकि वहां कुछ भी अच्छा नहीं लगता मुझे. 
उस दिन एक पेड़ की तस्वीर बनाई थी मैनें. टीचर ने कहा, "यह सचमुच एक पेड़ ही है, बहुत अच्छे." मैनें फिर एक दूसरी बनाई. इसमें भी कोई पत्तियाँ नहीं थीं. 
फिर उन्हीं में से एक बच्चा मेरे पास आया और मेरा मजाक उड़ाने लगा. 
मैं स्कूल नहीं जाने वाली. रात को सोते समय जब अगले दिन स्कूल जाने के बारे में सोचती हूँ तो दहशत होती है बहुत. मैं कहती हूँ, "मैं स्कूल नहीं जाने वाली." वे बोलते हैं, "ऐसा कैसे कह सकती हो तुम ? स्कूल तो सभी लोग जाते हैं."
सभी लोग ? तो फिर जाने दो न सभी को. आखिर क्या हो जाएगा जो मैं घर पर ही रुक जाऊं ? कल गई थी न मैं, नहीं क्या ? कैसा रहेगा अगर मैं कल न जाऊं, और फिर उसके अगले दिन चली जाऊं ?
काश मैं घर पर होती अपने बिस्तर पर. या अपने कमरे में. काश कि मैं और कहीं भी होती सिवाय उस स्कूल के. 
मैं स्कूल नहीं जाने वाली, बीमार हूँ मैं. दिख नहीं रहा आपको ? जैसे ही कोई कहता है स्कूल  मैं बीमार हो जाती हूँ, पेट दर्द करने लगता है मेरा. वो दूध भी नहीं पीया जाता मुझसे. 
वह दूध नहीं पीना मुझे, मुझे कुछ नहीं खाना, और न ही स्कूल जाने वाली हूँ मैं. कितनी परेशान हो गई हूँ. मुझे कोई पसंद नहीं करता. वे दोनों बच्चे हैं वहां. बाहें फैलाकर रास्ता रोकते हैं वे मेरा. 
टीचर के पास गई थी मैं. टीचर ने कहा, "मेरे पीछे -पीछे क्यूं लगी हो ?" अगर आप नाराज न हों तो मैं आपको कुछ बताऊँ. मैं तो हमेशा टीचर के पीछे ही लगी रहती हूँ, और टीचर हमेशा यही बोलती रहती हैं कि "मेरे पीछे-पीछे न आओ."      
मैं स्कूल नहीं जाने वाली, कब्भी नहीं. क्यूं ? क्यूंकि मैं बस वहां जाना नहीं चाहती, इसीलिए और क्यूं. 
रेसेस के वक़्त मैं बाहर भी नहीं जाना चाहती. जब सब लोग मुझे भूल चुके होते हैं तभी रेसेस होता है. फिर सबकुछ एकदम से घाल-मेल हो जाता है, सभी भागने लगते हैं. 
टीचर मुझे घूर कर देखने लगती हैं, और बस इतना कहूंगी कि वे इतनी अच्छी नहीं लगतीं. मैं स्कूल नहीं जाना चाहती. वहां एक बच्चा है जो मुझे पसंद करता है, बस वही है जो मुझे अच्छे से देखता है. किसी से बताना मत,  लेकिन मुझे वह बच्चा भी नहीं पसंद. 
मैं बस वहां बैठी पड़ी रहती हूँ. कितना अकेलापन महसूस होता है मुझे. आंसू लुढ़कते रहते हैं मेरे गालों पर. मुझे स्कूल बिलकुल भी पसंद नहीं. 
मैं स्कूल नहीं जाना चाहती, कहती हूँ मैं. फिर सुबह हो जाती है और वे मुझे स्कूल ले जाते हैं. मैं हंस भी नहीं पाती. मैं अपने सामने एकदम सीधा देखती रहती हूँ, रोना आ जाता है मुझे. मैं अपनी पीठ पर फौजियों जितना बड़ा बस्ता लादे पहाड़ी पर चढ़ती हूँ, और निगाहें पहाड़ी चढ़ते हुए अपने नन्हें पैरों पर टिकाए रहती हूँ. कितना भारी है सबकुछ : मेरी पीठ पर लदा बस्ता, मेरे पेट में पड़ा गर्म दूध. रोना चाहती हूँ मैं. 
मैं स्कूल में दाखिल होती हूँ. लोहे का काला फाटक मेरे पीछे बंद होता है. मैं रो पड़ती हूँ, "मम्मी, देखो, तुमने मुझे भीतर लाकर छोड़ दिया."
फिर मैं अपनी कक्षा में जाकर बैठ जाती हूँ. बाहर उन बादलों में से कोई एक बादल हो जाना चाहती हूँ मैं.    
इरेजर्स, कापियां, और पेन : मुर्गियों को खिला दो यह सब ! 

(अनुवाद : मनोज पटेल)
Orhan Pamuk, Other Colours 

10 comments:

  1. बहुत अच्छी और आत्मीय पोस्ट ...

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  2. पार्टनर, बिटिया की तस्वीर देख उससे मिलने बतियाने का मन कर रहा है. बाकी अनुवाद तो माशाल्लाह, बेहद खूबसूरत है.

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  3. school yaad dila diya .. tab bhi jab chhoti thi aur ab bhi jab teacher thi...

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  4. मनोज भाई इस गद्य अंश ने आँखें नम कर दी.. हम बच्चो को उनकी जरूरतों को कहाँ समझ पा रहे हैं.. आपका अनुवाद उत्कृष्ट होता है चाहे वह गद्य हो या पद्य..

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  5. मुझे भी स्कूल नहीं जाना..कितना बोरिंग होता है जाना...वहां ... कितने बहाने बनाये ना जाने के...लेकिन घर के बड़े हर बार किसी ना किसी बहाने भेज ही देते हैं....मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगता स्कूल जाना...मुझे नहीं जाना स्कूल./....कुछ कुछ अपनी छवियाँ भी हैं इस कविता में हाँ...''लिपि'' की फोटो भी काफी अच्छी है..कितनी क्यूट है ना.

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  6. बच्चों की दुनिया में भी डर होते हैं, फिर भी हम बड़े होकर कहते हैं कोई लौटा दे मेरा बचपन?

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  7. एक इसी "मुझे स्कूल नहीं जाना" वाले उम्र का बेटा है और अपने समय की सारी बातें याद नहीं भी हैं तब भी उसे देखते और इसे पढ़ते लग रहा है कि जब खुद उस उम्र में रहा होऊंगा तो मैं भी यही कहता होऊंगा "मुझे स्कूल नहीं जाना".
    दिल को छू लेने वाला गद्य.
    बिटिया की आँखों से दिख रहा है कि उसे ये तो आभास हो ही गया था कि कुछ ऐसा नया होने वाला है जो उसे पसंद नहीं आने वाला. उसके भविष्य की मंगलकामनाओं के साथ आपको सुंदर अनुवाद के लिये बधाई और धन्यवाद.

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  8. स्मृति को संरक्षित करता हुआ बहुत ही कोमल भाव... हमलोगो के बचपन में ऐसा सोचना भी अनैतिक था...

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  9. BAHUT ACHHI POST MANOJ BHAI.... ABHAR...

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  10. बहुत सुन्दर....जितनी तारीफ़ की जाय, कम है

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