Wednesday, February 2, 2011

निकानोर पार्रा की लम्बी कविता


( निकानोर पार्रा का परिचय और उनकी कई कविताएँ आप इस ब्लॉग पर पहले ही पढ़ चुके हैं, आज उनकी एक लम्बी कविता "एक ताबूत की स्मृतियाँ".  - Padhte Padhte)

एक ताबूत की स्मृतियाँ 
एक शानदार बढ़ई की दूकान में जन्म हुआ था मेरा 
लेकिन दिलचस्प हिस्सा तो आता है बाद में 
यूं ही भटकता रहता था इधर-उधर बच्चा था जब 
मजाक उड़ाया करता था अस्थि-कलशों का 
बड़े धीर-गंभीर लगा करते वे मुझे 
शोरूम में कुछ महीने बिताने के बाद 
एक ऎसी ज़िंदगी जिसे मैं मजेदार ही कहूंगा 
क्यूंकि कोई चीज नहीं भंग करती थी शान्ति वहां की 
बहुत मजे किए मैंने वहां 
दूसरे ताबूतों की कीमत पर आप समझ ही सकते हैं 
- बस वार्निश की खराब गंध ही थी इकलौती खोट वहां - 
तो कुछ महीनों के बाद फिर से बताऊँ आपको 
मुझे खरीदा गया मातमी लिबास पहने एक स्त्री द्वारा 
और किसी पहियों वाली चीज पर लाकर पटक दिया गया 
गैस इंजन से चालित 
जो गुजरी शहर से होकर तेज रफ़्तार में 
एक अनुभव जो कभी नहीं भूलूंगा मैं 
क्यूंकि अचानक 
180 डिग्री की करवट ली मेरी ज़िंदगी ने 
पूर्ण जड़ अवस्था से 
शाश्वत गति की स्थिति में आ पहुंचा मैं 
जब तक की हम एक निजी मकान तक न आ पहुंचे 
जहां मुझे खाने के कमरे में एक मेज पर रख दिया गया 


घंटों बिताए होंगे मैंने वहां 
खाने के कमरे की उस मेज पर 
कितने घंटे पता नहीं क्यूंकि फ़ौरन ही सो गया मैं गहरी नींद 
थक गया था घुमावदार रास्तों में 
और अँधेरे से - इन सारे अनुभवों से - 
एक ऎसी दुनिया जो अब तक अनजान ही थी मेरे लिए 
एक घड़ी देखी मैंने लटकती हुई दीवार के बीचोबीच 
और मेज और कुर्सियां तमाम बिखरे हुए इधर-उधर 
हालांकि अपने दिल में कहीं गहरे अच्छा लग रहा था मुझे 
इतना कि ख़्वाबों में भी नहीं सोचा था होगा कभी मुमकिन 
जब जगा मैं तो बदल चुका था पूरा दृश्य 
मसलन ढंका हुआ था फूलों से मैं 
और देख सकता था कुछ भीमकाय शमादान अपने पैरों की तरफ 
चकाचौंध कर देने वाली रोशनी फेंकते 
आह, और काले परदे भी 
ढेर सारे रुपहले सितारों से सुसज्जित 
अंदाजा भी नहीं लगा सकते आप मेरी खुशी का 
जब महसूस किया मैनें कि मैं ही था 
इस शानदार दुनिया की निगाहों का केंद्र 
लोग आते और देखते मुझे एक छोटी खिड़की से 
वे गले लगाते मुझे बड़े परेशान से 
गतिविधियाँ जितना समझ सकता था मैं भरसक 
ऊबने लगा था उस सारे दृश्य से मैं 
जो वहां संपन्न होता लग रहा था बहुत धीमी गति से 
एक खुश आत्मा द्वारा जबकि कष्ट सह रहे हों बदकिस्मत लोग 
तभी अचानक हालात पलट गए पूरी तौर पर 
बाहर निकाला उन्होंने मुझे उस नामुराद कमरे से 
और रखा मुझे घोड़े से जुती एक बग्घी में 
अदब की पराकाष्ठा ही कहेंगे इसे 
वही काले लिबास वाली स्त्री 
लिपट गई मुझसे जी-जान से 
काफी मुश्किल करती हुई रिश्तेदारों का काम 
वह सबसे शानदार दिन था मेरी ज़िंदगी का 
क्यूंकि जब शहर से गुजर रहे थे हम 
एक ऎसी मंजिल को जो अनजान थी मेरे लिए 
रास्ते में मिलने वाले सभी पदयात्री 
सम्मान प्रकट करते अपना हैट उतारकर 
ऎसी इज्जत नहीं समझता खुद को जिसके काबिल 
आखिर आ पहुंचे हम एक छोटे शहर में 
दीवारों से घिरे जैसा की होता था पुराने जमाने में 
एक तमाशा शुरू हुआ वहां 
जिसने आँसू ला दिए मेरी आँखों में 
और अमिट किरदारों से उकेर लिया खुद को मेरी याददाश्त में 
मेरा इशारा उन अद्भुत भाषणों की तरफ है 
जो असंख्य लोगों ने दिए मेरे सम्मान में 
और बार-बार दुहराए गए प्रेम के प्रदर्शन की तरफ 
जो सुना किया मैनें अपने चारो ओर
जब तक नीचे नहीं उतार दिया उन्होंने मुझे भरसक सतर्कता बरतते हुए 
इस कमरे में जहां इस समय मौजूद हूँ मैं 
टन भर फूलों के नीचे 
इंतज़ार करता हुआ नई चीजें घटित होने का. 

(अनुवाद : Manoj Patel) 
Nicanor Parra, Memories of a Coffin 

13 comments:

  1. बहुत अच्छी कविता.. ताबूत भी सोचते हैं !

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  2. बहुत अच्छी कविता.....

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  3. भ्रम केवल इंसानों को ही नहीं होते !

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  4. आज ४ फरवरी को आपका अनुवाद और यह सुन्दर कविता यह सुन्दर ब्लॉग चर्चामंच पर है... आपका धन्यवाद ..कृपया वह आ कर अपने विचारों से अवगत कराएं

    http://charchamanch.uchcharan.com/2011/02/blog-post.html

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  5. बहुत दिनो बाद इतनी अच्छी कविता पढने को मिली /तुम्हारा अनुवाद उम्दा है/तुम अनुवाद काबहुत जरूरी काम कर रहे हो /एक छोटे कस्बे को विश्व कविता का केंद्र बना दिया है /
    बहुत बधाई और शुभकामनाये
    स्वप्निल श्रीवास्तव

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  6. बहुत वेहतरीन कविता और अनुवाद के क्या कहने /तुमने एक छोटे कस्बे को विश्व कविता का केंद्र
    बना दिया है /मै तुम्हारे ब्लाग को नियमित पढता हुं
    बहुत शुभकामनाये
    स्वप्निलश्रीवास्तव

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  7. बहुत दिनो बाद इतनी मार्मिक कविता पढने को मिली /उम्दा अनुवाद
    तुमने एक छोटे कस्बे को विश्व कविता का केंद्र बना दिया है
    शुभकामनाये
    स्वप्निल श्रीवास्तव

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  8. achchi kavita hai or utna hi behtar aubaad ,aapko sadhubaad

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  9. achchi kavita hai jo anubaad se or adhik bodhgamya hui hai dhanyabaad

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