Tuesday, May 3, 2011

माइआ अंजालो : गुजरता वक़्त


आज अश्वेत अमेरिकी कवियत्री माइआ अंजालो की यह छोटी सी कविता आपके सामने पेश कर रहा हूँ जो मुझे बहुत पसंद है... 














गुजरता वक़्त  : माइआ अंजालो 

(अनुवाद : मनोज पटेल)

तुम्हारी चमड़ी जैसे सुबह 
मेरी जैसे शाम.

एक प्रतीक है उस शुरूआत का 
जिसका अंत निश्चित है.

दूसरी, उस अंत का 
जिसकी शुरूआत निश्चित है.  






Monday, May 2, 2011

माइआ अंजालो की कविता


माइआ अंजालो की एक और कविता... 
















वे पूछते हैं क्यों : माइआ अंजालो 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

किसी ख़ास शख्स को ताज्जुब होता था कि 
मेरे जैसी लम्बी-चौड़ी और मजबूत इरादों वाली लड़की 
सामान्य वेतन वाली 
कोई नौकरी क्यों नहीं करती.
थोड़ा वक़्त लिया मैनें उसे समझाने में 
और हर पृष्ठ पढ़कर उसे सुनाने में.
न्यूनतम लोग भी 
न्यूनतम वेतन पर गुजारा नहीं कर सकते. 

किसी ख़ास शख्स को ताज्जुब होता था कि 
क्यों मैं पूरे हफ्ते तुम्हारा इंतज़ार करती हूँ.
मेरे पास लफ्ज़ नहीं थे 
तफसील से सिर्फ यह बयान करने के लिए भी कि तुम क्या करते हो.
मैनें कहा कि समुद्र की गति है 
तुम्हारी चाल में,
और जब तुम बूझते हो मेरी पहेलियाँ 
तुम्हें मुंह से कुछ बोलना तक नहीं पड़ता. 

गिओर्गि गस्पदीनव की कविता


1968 में जन्मे बुल्गारिया के प्रसिद्द कवि-कथाकार-नाटककार गिओर्गि गस्पदीनव की कविताओं की पिछली पोस्टों को इस ब्लॉग पर बहुत पसंद किया गया. आज पेश है उनकी एक और कविता. गस्पदीनव अपने उपन्यास नेचुरल नावेल के लिए विश्वविख्यात हैं. वे बुल्गारिया की एक साहित्यिक पत्रिका के सम्पादक और न्यू बुल्गारियन यूनिवर्सिटी, सोफिया में प्रोफ़ेसर भी हैं.  


प्रेम खरगोश : गिओर्गि गस्पदीनव 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

मुझे ज्यादा देर नहीं लगेगी, वह बोली,
और दरवाजे को अधखुला छोड़कर चली गई.
यह एक ख़ास शाम थी हमारे लिए,
खरगोश का स्ट्यु गैस चूल्हे पर धीमे-धीमे पक रहा था,
उसने कुछ प्याज और लहसुन बारीक काट रखे थे 
और गाजर को छोटे गोल टुकड़ों में.
उसने कोट नहीं लिया 
और न ही कोई लिपस्टिक लगाई. मैंने पूछा भी नहीं 
कि वह कहाँ जा रही थी.
ऎसी ही है वह.
उसे वक़्त का कभी कोई अंदाजा ही नहीं रहता,
हमेशा देर हो जाती है उसे ; बस इतना ही 
कहा था उसने उस शाम :
मुझे ज्यादा देर नहीं लगेगी ;
उसने दरवाज़ा भी बंद नहीं किया था.
छः साल बाद 
मैं उससे गली में मिलता हूँ (अपनी नहीं)
और वह अचानक फिक्रमंद दिखाई पड़ने लगती है, जैसे किसी को अचानक याद आया हो 
कि वह इस्त्री का प्लग निकालना भूल गया था,
या जैसे...
तुमने गैसचूल्हा तो बंद कर दिया था न, वह पूछती है.
अभी तक तो नहीं, मैं जवाब देता हूँ,
बहुत सख्तजान होते हैं ये खरगोश. 
Georgi Gospodinov Poems in Hindi Translation
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