Tuesday, May 24, 2011

फ़राज़ बयरकदार : जेल से एक कविता


फ़राज़ अहमद बयरकदार का जन्म 1951 में सीरिया में हुआ था. दमिश्क विश्विद्यालय से उन्होंने अरबी भाषा की शिक्षा ग्रहण किया. 1987 में वे सीरिया की खुफिया सेना द्वारा कम्युनिस्ट एक्शन पार्टी के सदस्य होने के संदेह में गिरफ्तार कर लिए गए. सात साल तक वे कारावास में रहे जहां उन्हें किसी से मिलने-जुलने की भी इजाजत नहीं थी. उन्हें यातना भी दी जाती थी. 1993 में उन्हें पंद्रह वर्षों के कारावास की सजा सुनाई गई. नवम्बर 2000 में उन्हें रिहा किया गया और 2005 से वे स्वीडन में रह रहे हैं. 
यह जेल में लिखी गई उनकी लम्बी कविता 'नामौजूदगी के आईने' के कुछ अंश हैं. मूल अरबी से अंग्रेजी में इसका अनुवाद कवि-कथाकार-अनुवादक सिनान अन्तून द्वारा किया गया है.   











नामौजूदगी के आईने : फ़राज़ बयरकदार 

(अनुवाद : मनोज पटेल)

ये आईने हो सकते थे 
खालिस बारिश 
या फिर खालिस खामोशी 
मगर चीजें पत्थर की बनी थीं 
देश और काल की झनझनाहट 
लहूलुहान थी 
उस चीज से जो पागलपन 
या ईश्वर से मिलती-जुलती थी 

शुक्रिया 
उसके लिए जिसे जाना है 
शुक्रिया 
उसके लिए जिसे आना है 
शुक्रिया 
उसके लिए जो शिकार हो जाता है खामोशी का 
और कभी नहीं लौटता 
कभी नहीं 

उसका दिल एक घंटी है 
उसकी देंह गिरजाघर 
आँखें बंद 
एक स्त्री पर 
जो पहने हुए है अपना ग़म 
आंसुओं की पूरी सभा थामे हुए 
उसकी वापसी के लिए 

वे फुसफुसाए 
पागल के सिवा और कौन 
सान धरता है गुलाब पर  
और चाकू पर करता है दया ?
खदीजा, तुम्हारी उदासी की कंदीलें !
काश कि जान पाती तुम 
चीर डाले मैनें 
कितने गुलाब 
और कितने चाकू 
और कितनों ने 
चीर डाला मुझको 

कोई आज़ादी नहीं है 
इस जगह के बाहर 
मगर यह रोता है 
जब कभी यह सुनता है चाभियों को 
अपने तालों में खिलखिलाते हुए 

10 
दीवार की सारी दरारें जो तुम देख रहे हो 
मेरी आँखों ने खोदी हैं 
सालों से 
इन्हें देख रही हैं ये 
कोई मतलब नहीं है इन्हें गिनने का 

11 
कोई समय 
बिना तारीखों का 
कोई जगह 
बिना दिशाओं की 
ऐ स्त्री 
बिजली की तरह घायल करती हुई 
लहूलुहान किसी गीत की तरह 
चली जाओ !
कुछ भी नहीं मौजूद 
नामौजूदगी के सिवा 

16 
सूरज नहीं है यहाँ 
अपने आप को नग्न पाता हूँ मैं 
बिना किसी छाया के 
कोई स्त्री भी नहीं यहाँ 
अपने आप को नग्न पाता हूँ मैं 
अपने आप के बिना 

23 
- यह किसका जनाजा है ?
चलते-चलते 
मैनें बूढ़े आदमी से पूछा 
- मेरे बेटे का 
उसने जवाब दिया 
और वहीं खड़ा हो गया 
कब्र के पत्थर की तरह 

31 
हाँ भगवान !
यह सीरिया है 
हम कैसे पहुंचाएं तुम तक 
अपनी संवेदनाएं 
किन बादलों से रोओगे तुम ?

34 
अब मेरी उम्र 46 नाच की हो चुकी है 
कब्र में पैर लटकाए 
उससे ज्यादा 
मुझे बयान नहीं करतीं मेरी कविताएँ 
जितना कि एक तीर बयान करता है 
अपने शिकार को 

37 
आज़ादी एक मातृभूमि है 
और निर्वासन है मेरा देश 
मैं अपना विलोम हूँ 
यह मेरा हलफ़नामा है 
मेरी माँ के दूध से लिखा हुआ 
और मेरी सारी बेड़ियों से मुहरशुदा 

38 
मैं कविता के भीतर छुप जाता हूँ 
और बाहर खोजता हूँ ख़ुद को 
मगर कभी-कभी बेईमानी करते हैं हम 
वह अपने बिस्तर पर बुलाती है मुझको 
मैं जाता हूँ 
वह अपने कपड़े उतारती है 
मैं, अपने 
वह मुझे पहन लेती है 
और मैं रह जाता हूँ नग्न 

सयदनाया जेल 1997-2000
                    :: ::
इस कविता का अगली किश्त यहाँ पढ़िए... 

3 comments:

  1. क्या कहूँ इन्हें, सिवा इसके कि बहुत अच्छी कवितायेँ हैं ये ! धूमिल के शब्दों में - घिरे हुए व्यक्ति के संक्षिप्त एकालाप -सी कवितायेँ ! मार्मिक प्रस्तुति के लिए मनोज जी का आभार !

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  2. manoj ji mai nirantar aapke blog ko follow karti hoon aur har baar mujhe pahle se behtar prastuti milti hai. aapka punh dhanyavaad itni sundar rachnaaye ham tak pahuchane ke liye. bahut khoobsoorat. saabhar.

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  3. brilliant.. Hatz off..
    Thanx for sharing :)

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