Friday, June 3, 2011

येहूदा आमिखाई की दो कविताएँ


येहूदा आमिखाई की दो कविताएँ... 















किसी खूबसूरत जगह पर सैर सपाटा  

एक यहूदी लड़की के साथ 
जिसकी आँखों में अमेरिकी उम्मीद है 
और जिसकी नाक अब भी बहुत संवेदनशील 
यहूदी-विरोधी वाद को सूंघने में. 

"तुमने ऎसी आँखें कहाँ से पाईं ?"
जन्म के समय तो नहीं मिलतीं किसी को ऎसी आँखें -- 
इतना रंग और इतनी उदासी. 

उसने किसी फ़ौजी का कोट पहन रखा था, सेवामुक्त 
या मृत, किसी घिसी-पिटी जंग की 
जीत या हार में. 

"जलाई जा रही चिट्ठियों की आग में 
एक कप काफी बनाना भी नामुमकिन है." 

इसके बाद चलते चले जाना 
किसी खूबसूरत, गुप्त जगह की ओर 
जहां किसी अक्लमंद और तजुर्बेकार फील्ड कमांडर ने 
रख छोड़ी होंगी अपनी मोर्टारें. 

"तुम्हारे चले जाने के बाद, गर्मियों में,
ये पहाड़ियां ढँक जाती हैं एक मुलायम ख़याल से." 
                    :: :: :: 

हे भगवान, जो आत्मा 

हे भगवान, जो आत्मा 
तुमने दी मुझे 
धुंआ है --
प्रेम की स्मृतियों के दिए 
अंतहीन जलने के जख्मों से. 

जिस क्षण हम जन्म लेते हैं 
हम इसे जलाना शुरू कर देते हैं 
और जलाते रहते हैं 
जब तक धुंआ 
ख़त्म न हो जाए धुंए की तरह. 
                    :: :: :: 

(अनुवाद : मनोज पटेल) 

Thursday, June 2, 2011

फदील अल-अज्ज़वी की कविताएँ


1963 में बाथ पार्टी के सत्ता में आने के बाद फदील अल-अज्ज़वी इराक के उन हज़ारों बुद्धिजीवियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं में से एक थे जिन्हें बदनाम अल-हिल्ला जेल में डाल दिया गया था. जेल में जब क्षमता से ज्यादा कैदी हो गए तो अधिकारियों ने फांसी देने के कमरे को छंटाई घर बना दिया. उस कमरे में ले जाए जाने वाले बंदियों के बारे में तरह-तरह की बातें प्रचलित थीं. दरअसल वहां ले जाकर कैदियों को मार दिया जाता था. फदील अल-अज्ज़वी उस समय चौबीस साल के थे और उन्होंने अपनी जीवनी 'अल-रूह अल-हया' में उस दौर का दिल दहला देने वाला खाका खींचा है. 










जेल में 

चाभी के छेद से चीखने की हलकी आवाजें आ रही थीं. जैतून की लकड़ी से बनी चहारदीवारी पर हथियारबंद फौजियों की परछाईं पड़ रही थी. आधीरात के वक़्त एक संतरी आया. उसने कुछ नाम पुकारे : वे सभी डर से कांप रहे थे. वह चिल्लाया, "चलो !" 

नौजवान लड़का अपनी माँ को याद कर रहा था. "मेरे जूते कहाँ हैं," उसने संतरी से पूछा. "जूते-वूते छोड़ो, जल्दी करो !" और वे चले गए. आखिरकार रात की आवाज़ सन्नाटे में खो गई. 

फिर हमने अँधेरे को चीरती हुई गोली की दस आवाजें सुनीं. मैं मौन खड़ा हो गया और यादगार में उसके जूते पहन लिए. 
                      :: :: :: 

खुशी 

"उन्होंने मेरे लिए यह खिड़की छोड़ रखी है जिससे मैं पेड़ों को देखता रह सकूं,"
जेल की अपनी कोठरी की तरफ बढ़ते हुए कवि ने खुद से कहा.
उन्होंने एक बढ़ई बुलवाकर खिड़की को बंद करवा दिया. 

"कितनी खुशी की बात है ! हवा से पेड़ों के हिलने की आवाज़ सुनना ही काफी होगा," 
कवि ने कहा.
उन्होंने एक लकड़हारे को बुलवाकर पेड़ ही कटवा दिया. 

"हवा की आवाज़ ही मेरे लिए बहुत है,"
कवि ने कहा.
उन्होंने दीवालें इतनी ऊपर उठवा दीं कि हवा उसे पार ही न कर पाए.

"यही बहुत है कि मैं ज़िंदा हूँ." 

उन्होंने अहाते में एक फांसी का तख्ता बनवा दिया.
कवि हंसा,
"अपनी मौत की सीढियां चढ़ते हुए,
मैं लिखूंगा कविताएँ भविष्य की स्मृति में." 
                    :: :: ::

(अनुवाद : मनोज पटेल) 

Wednesday, June 1, 2011

नाजिम हिकमत : तुम नहीं हो उन छः औरतों में


इब्राहिम बलबन की इस पेंटिंग 'द प्रिजन गेट्स' पर नाजिम हिकमत ने यह अद्भुत कविता लिखी थी...  

इब्राहिम बलबन : 'द प्रिजन गेटस'













इब्राहिम बलबन की पेंटिंग "जेल के फाटक" पर : नाजिम हिकमत 

(अनुवाद : मनोज पटेल)

छः औरतें इंतज़ार करती हुईं लोहे के फाटक के बाहर,
पांच बैठी जबकि एक खड़ी हुई ;

आठ बच्चे इंतज़ार करते हुए लोहे के फाटक के बाहर,
इतने छोटे कि हंस भी नहीं सकते. 

छः औरतें इंतज़ार करती हुईं लोहे के फाटक के बाहर, 
सब्रवान पैरों और ग़मज़दा हाथों के साथ ; 

आठ बच्चे इंतज़ार करते हुए लोहे के फाटक के बाहर, 
कपड़ों में लिपटे नवजात, पूरी खुली आँखों के साथ. 

छः औरतें इंतज़ार करती हुईं लोहे के फाटक के बाहर, 
नजर नहीं आ रहे उनके समेटे हुए बाल ;

आठ बच्चे इंतज़ार करते हुए लोहे के फाटक के बाहर, 
एक के हाथ मजबूती से जुड़े हुए. 

एक चौकीदार खड़ा हुआ लोहे के फाटक के बाहर, 
न दोस्त न दुश्मन ; दूर देखते हुए, और दिन गर्म. 

एक खच्चर है लोहे के फाटक के बाहर :
लगता है अभी रो पड़ेगा वह.

एक कुत्ता भी है लोहे के फाटक के बाहर -- 
पीले रंग का और काले नथुने वाला. 

बेंत की टोकरियाँ हैं हरी मिर्च भरी हुई, लहसुन 
और प्याज भरे हुए झोलों में, और कोयले के थैले.

छः औरतें इंतज़ार करती हुईं लोहे के फाटक के बाहर, 
और भीतर - यही कोई पांच सौ आदमी ; 

तुम नहीं हो उन छः औरतों में से एक,
मगर मैं हूँ एक, इन पांच सौ आदमियों में. 
                                                                     28 दिसंबर 1949 
                                                                              बरसा जेल 
                           :: :: :: 
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