Monday, June 6, 2011

रोक डाल्टन : चोर बाज़ार में जनता की संपत्ति का बंटवारा


आज रोक डाल्टन की यह कविता... 


















चोर बाज़ार में जनता की संपत्ति का बंटवारा  :  रोक डाल्टन 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

उन्होंने हमें बताया कि पहली शक्ति है 
कार्यपालिका शक्ति, 
और विधायी शक्ति दूसरी शक्ति है 
जिसे ठगों के एक गिरोह ने 
"सत्ता पक्ष" और "विपक्ष" में बाँट रखा है, 
और चरित्र भ्रष्ट हो चुका (फिर भी माननीय) सुप्रीम कोर्ट 
तीसरी शक्ति है.

अखबारों, रेडियो और टी. वी. ने खुद को 
चौथी शक्ति का दर्ज़ा दे रखा है और वाकई 
वे बाक़ी तीनों शक्तियों के हाथ में हाथ डाले चलते हैं.

अब वे हमें यह भी बता रहे हैं कि 
नई लहर वाले युवा पांचवी शक्ति हैं.

और वे हमें यह भी भरोसा दिलाते हैं कि सभी चीजों और शक्तियों के ऊपर 
ईश्वर की महान शक्ति है. 

"और अब चूंकि सभी शक्तियों का बंटवारा हो चुका है 
-- वे निष्कर्ष रूप में हमें बताते हैं --
किसी और के लिए कोई शक्ति नहीं बची है 
और अगर कोई कुछ और सोचता है 
तो उसके लिए फौज और नेशनल गार्ड हैं."  

शिक्षाएं : 
1) पूंजीवाद शक्तियों की एक बड़ी मंडी है 
जहां केवल चोर अपना धंधा करते हैं 
और सच्ची शक्ति की वास्तविक मालिक 
यानी आम जनता की बात करना जानलेवा हो सकता है. 

2) शक्ति के वास्तविक मालिक को उसका 
हक़ दिलाने के लिए यह जरूरी होगा 
कि चोरों को व्यापार के मंदिरों से लतिया कर केवल बाहर ही न कर दिया जाए 
क्योंकि वे बाहर जाकर फिर संगठित हो जाएंगे ;
बल्कि बाज़ार को व्यापारियों के 
सर तक ले आना होगा.
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Sunday, June 5, 2011

फ़राज़ बयरकदार की कविता


फ़राज़ बयरकदार की एक और कविता... 

















जब तक तुम हो, मैं हूँ : फ़राज़ बयरकदार 

(अनुवाद : मनोज पटेल)


तुम भीतर आ सकते हो 
बगैर इजाजत 
और बगैर इजाजत जा भी सकते हो 
जब तक खुला हुआ है मेरा दिल 
और मैं रह सकता हूँ तुम्हारा कुबूलनामा 
जब तक तुम हो मेरी माफी,
तुम्हारा सवाल है 
मेरा जवाब,
तुम्हारी बारिशें हैं... 
मेरी बिजली की कौंध,
तुम्हारा समय...
मेरा स्थान - 
तो क्या मुझे माफी मांगनी होगी 
अगर अँधेरे में घिरी है 
तकदीर मेरी 
और मेरी ज़िंदगी घिरी है कविता से ? 
                    :: :: ::

Saturday, June 4, 2011

यूसफ अल-सा'इघ की कविताएँ


1932 में जन्में यूसफ अल-सा'इघ बग़दाद में रहते हैं. उन्होंने बग़दाद विश्विद्यालय से अरबी भाषा में एम ए करने के बाद विभिन्न कालेजों में अध्यापन कार्य किया. कविता के अलावा कहानियां, नाटक, निबंध आदि भी लिखे हैं. अभी तक चौदह किताबें प्रकाशित. उपनिवेशवाद और मध्यपूर्व में पश्चिमी हस्तक्षेप के विरुद्ध लगातार संघर्ष. 











एक इराकी शाम  

एक इराकी शाम में 
युद्धभूमि के कुछ दृश्य :
एक अमनपसंद घर 
दो लड़के 
अपना होमवर्क करते हुए 
एक छोटी बच्ची 
रद्दी कागज़ पर 
अनमनेपन से कुछ अजीब तस्वीरें बनाते हुए 
-- ताजा ख़बरें थोड़ी देर में. 
पूरा घर कान बन जाता है 
दस इराकी आँखें चिपक जाती हैं टेलीविजन के परदे से एक दहशतज़दा खामोशी में. 
अलग-अलग तरह की गंध मिलने लगती हैं आपस में :
युद्ध की गंध 
और गंध ताजी सिंकी रोटी की.
माँ की निगाहें उठतीं हैं दीवार पर लटकी एक तस्वीर की तरफ 
वह बुदबुदाती है 
-- खुदा हिफाज़त करे तुम्हारी 
और खाना बनाना शुरू करती है 
चुपचाप 
और उसके दिमाग में सावधानी से चुने गए 
युद्धभूमि से परे के दृश्य चलने लगते हैं 
उम्मीद के पक्ष में. 
                    :: :: :: 

आदत 

हर रोज घर लौटने पर 
मैं यह घंटी बजाया करता था,
जो अब खामोश है. 
हालांकि मुझे पता है कि घर पर कोई नहीं है 
फिर भी मैं इसे बजा देता हूँ क्योंकि 
सालों से किसी ने नहीं बजाया इस बेचारी, अभागी घंटी को. 
                    :: :: :: 

समय-समय पर 

बहुत घनीभूत था दु:स्वप्न 
आज रात का :
एक खाने की मेज 
एक शराब की बोतल 
तीन गिलास 
और तीन आदमी बिना सर के. 
                    :: :: :: 

(अनुवाद : मनोज पटेल)
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