Monday, January 7, 2013

ईयावगेनी बनीमोविच की कविता

1954 में जन्मे ईयावगेनी बनीमोविच मास्को में रहते हैं. कविताएँ लिखने के अतिरिक्त वे एक स्तंभकार और राजनीतिक भी हैं तथा मास्को सिटी डूमा के सदस्य रह चुके हैं. यहाँ प्रस्तुत है उनकी एक कविता...   


बहाना और सफाई : ईयावगेनी बनीमोविच 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मैं कोई कवि नहीं हूँ, 
जीते-जागते कवि जैसी कोई चीज सच में होती है क्या 

मैं एक स्कूल टीचर हूँ 
गणित पढ़ाता हूँ,  
कम्प्यूटर साइंस,  
नैतिक शास्त्र और गृहस्थ जीवन का मनोविज्ञान भी 

इस सबसे बढ़कर रोज लौट आता हूँ घर 
अपनी बीवी के पास 

जैसा कि रूमानी झुकाव वाले एक पायलट ने कभी कहा था,  
प्रेम तब नहीं होता जब दो लोग एक-दूसरे को देखते रहें 
बल्कि तब होता है जब वे दोनों देखा करें एक ही दिशा में 

यह हमारे बारे में ही है 

दस बरसों से मैं और मेरी बीवी 
एक ही दिशा में देखते रहे हैं 

टेलीविजन की तरफ 

आठ सालों से हमारा बेटा भी उसी तरफ देख रहा है 

मैं कोई कवि नहीं हूँ,  
ऊपर बताए गए 
चौबीसों घंटे के पक्के सबूत में कोई सुराख तो नहीं है न 

गलतफहमियों और संयोगों का मेल,  
जो यदा-कदा पत्र-पत्रिकाओं में 
मेरी कविताओं के प्रकाशन में फलित होता है,  
मुझे अपना गुनाह क़ुबूल करने के लिए मजबूर करता है 

मैं कविता तभी लिखता हूँ जब वह अपरिहार्य हो जाए 
जब मैं निगरानी करता होता हूँ कक्षा की आंतरिक परीक्षाओं की 
तमाम पब्लिक स्कूल सुधारों के बावजूद 
कुछ विद्यार्थी अब भी करते हैं नक़ल 

इसे रोकने के लिए 

मुझे मजबूरन बैठना होता है गर्दन उचका कर 
आँखें फैलाए और सतर्क 
निर्निमेष निगाहें, फर्श के ठीक ऊपर किसी जगह पर टिकी हुईं 

यह मुद्रा अनिवार्य रूप से 
ले जाती है कविता रचने की ओर 

जो कोई भी चाहे जांच सकता है इसे 

मेरी कविताएँ छोटी होती हैं 
क्योंकि 45 मिनट से अधिक की नहीं होतीं कक्षा की आंतरिक परीक्षाएं 

मैं कोई कवि नहीं हूँ, 

और शायद 
इसीलिए दिलचस्प हूँ मैं 
               :: :: :: 
व्लादिमिर मायकोवस्की की आत्मकथा 'आई माइसेल्फ़' में एक वाक्य आता है "मैं एक कवि हूँ और इसीलिए मैं दिलचस्प हूँ."  

Saturday, January 5, 2013

अफ़ज़ाल अहमद सैयद : मैं कुछ न कुछ बच जाता था

अफ़ज़ाल अहमद सैयद की एक और कविता...   


मैं कुछ न कुछ बच जाता था : अफ़ज़ाल अहमद सैयद 
(लिप्यान्तरण : मनोज पटेल) 

मुझे फ़ाक़ों से तक़्सीम किया गया 
मैं कुछ न कुछ बच गया 

मुझे तौहीन से तक़्सीम किया गया 
मैं कुछ न कुछ बच गया 

मुझे नाइंसाफ़ी से तक़्सीम किया गया 
मैं कुछ न कुछ बच गया 

मुझे मौत से तक़्सीम किया गया 
मैं पूरा पूरा तक़्सीम हो गया 
               :: :: ::
तक़्सीम करना : भाग देना, विभाजित करना 

Thursday, January 3, 2013

लंदन में चंद्रमा की अवस्थाएं

जार्डन के कवि अमजद नसीर की एक कविता... 













लंदन में चंद्रमा की अवस्थाएं : अमजद नसीर 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

हम दोनों मौसम के बारे में बात कर रहे थे, वही ज़ंग खाई हुई कुंजी जिससे यहाँ लंदन में बातचीत के दरवाजे खुलते हैं. हमारी पुरानी पड़ोसन मिसेज मारिसन अब हमारी सड़क पर आखिरी अंग्रेज औरत बची हैं क्योंकि जैसे-जैसे इधर एशियाई आप्रवासियों की संख्या बढ़ती गई, वैसे-वैसे अंग्रेज यहाँ से अपना बोरिया-बिस्तर समेटते गए. वे बोलीं: "पहले लंदन का आसमान ऐसा नहीं बल्कि वैसा ही हुआ करता था जैसा कि आपके हिन्दुस्तान का आसमान होता होगा." 

मैंने उन्हें दुरुस्त किया: "मैं जार्डन का हूँ," लेकिन उन्होंने मेरी इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया. शायद उन्होंने इसे दुरुस्ती के रूप में देखा ही न हो. वे उसी अंग्रेजी लहजे में बोलती गईं जिसमें भावनात्मक प्रतिध्वनियों को समझना मुश्किल होता है, कि वे सब भी सितारों को देखा करते थे और चंद्रमा की अवस्थाओं का पता करते रहते थे. 

मैं कायल तो नहीं हुआ मगर अंग्रेजी शिष्टता के लबादे को ओढ़े हुए बोला: "किस वजह से चाँद और सितारे गायब हो गए और आसमान, मुर्गे की आँखों जैसी साफ़ रातों में भी, एक गंदे सोख्ता कागज़ में बदल गया?" 

"मैं नहीं जानती," उन्होंने कहा. "शायद मौसम में बदलाव, बिजली के हमारे अति इस्तेमाल या इस अत्यधिक शहरीकरण की वजह से. हम धरती को रोशन करते हैं और आसमान गायब हो जाता है. इस मामले में हिन्दुस्तान में आप शायद बेहतर स्थिति में हैं." 

"जार्डन में," मैंने कहा. 

एक बार फिर, मेरी इस बात पर उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया.   

वे मुस्कराईं और उस ट्राली को उन्होंने अपने घर की ओर धकेलना शुरू कर दिया जिसे वे अपनी रोजाना की खरीदारी के लिए इस्तेमाल करती थीं. यह बातचीत के अंत का एलान था जिसे शराफ़त ने दो ऐसे पड़ोसियों पर लाद दिया था जो अन्यथा दरवाजे पर मिलने पर एक-दूसरे से बचने की हर संभव कोशिश किया करते हैं.     

मैं उन्हें बताना चाहता था कि फ़ौजी हुकूमत और भ्रष्टाचार से कराह रहे पूर्वी शहरों के आसमानों का भी यही हाल है, कि वे सितारे भी गुम हो चुके हैं जो हमारे बचपन पर धूमकेतुओं की चित्तियाँ बनाया करते थे, मगर मुझे डर था कि मैं उस इकलौती सौगात को खो बैठूंगा जिसके चलते वे मुझसे ईर्ष्या करती हैं. 
                                                                :: :: :: 
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