Tuesday, May 31, 2011

एक वायस मेल है कविता : वेरा पावलोवा

वेरा पावलोवा की इन कविताओं का मेरा अनुवाद सर्वप्रथम अक्टूबर 2010 में नई बात पर प्रकाशित हुआ था. 

















वेरा पावलोवा की आठ कविताएँ 

(अनुवाद : मनोज पटेल) 

1)
अगर ख्वाहिश है कोई,
तो लाजिमी है अफ़सोस.
अफ़सोस है कोई अगर,
तो जरुर बाक़ी होगी याद.
अगर बाक़ी है कोई याद,
तो क्या था अफ़सोस को.
अफ़सोस नहीं था अगर,
तो ख्वाहिश ही कहाँ थी.
               * * *
2)
नामवरों से गुफ्तगू करने के लिये
चढ़ा लेना उनका चश्मा ;
यकसां होने को किताबों से
लिखने बैठ जाना उन्हें फिर से ;
संपादन करना पाक फरमानों का
और कायनात की तनहा कैद में
आधी रात के पहर
दीवाल थपथपाते बातें करना घड़ी से
               * * *
3)
आओ स्पर्श करें एक-दूसरे को
जब तक हैं हमारे हाथ,
हथेली और कुहनियाँ...
प्यार करें एक-दूसरे से
दुःख पाने के लिये,
दें यातना और संताप
कुरूप करें और अपंग
ताकि याद रखें बेहतर,
और बिछ्ड़ें तो कम हो कष्ट
               * * *
4)
खून की रवानी के खिलाफ
जूझता है जोश जन्म लेने को,
ज़बान की रवानी के खिलाफ
लफ्ज़ तोड़ देते हैं पतवार,
ख़यालों की रवानी के खिलाफ
बहती है ख्वाबों की कश्ती,
बच्चे की तरह हाथ चलाते तैरती हूँ मैं
आंसुओं की रवानी के खिलाफ.
               * * *
5)
उसने ज़िंदगी दी तोहफे में मुझे.
मैं क्या दे सकती हूँ बदले में उसे ?
अपनी कविताएँ.
कुछ और है भी तो नहीं मेरे पास.
लेकिन फिर क्या सचमुच वे हैं मेरी ही ?
वैसे ही जैसे बचपन में
माँ के जन्मदिन पर देने के लिए
मैं चुना करती थी कोई कार्ड
और कीमत चुकाती थी पिता के पैसों से.
               * * *
6)
एक वायस मेल है कविता :
कहीं बाहर चला गया है कवि
बहुत मुमकिन है न आए कभी लौटकर
कृपया अपना सन्देश छोड़ें
गोली की आवाज़ के बाद.
               * * *
7)
सर्दियों में होती हूँ कोई जानवर,
एक बिरवा बसंत में,
गर्मियों में पतंगा,
तो परिंदा होती हूँ पतझड़ में.
हाँ औरत भी होती हूँ बाक़ी के वक़्त.
               * * *
8)
बस इतना जान पाती कि किस जुबान का
तर्जुमा है तुम्हारा ‘आई लव यू’ ,
और पा जाती वह असल,
तो देखती शब्दकोष
जानने को कि तर्जुमा है चौकस
कि तर्जुमा-नवीस की नहीं है कोई खता.
               * * * 

Monday, May 30, 2011

वेरा पावलोवा : जागती है जो तुम्हारे बाएँ


वेरा पावलोवा की तीन कविताएँ... 


















आत्मवृत्त 

मैं 
वही 
हूँ 
जागती है जो 
तुम्हारे 
बाएँ. 
               * * * 

धूप सेंकी, 
चिड़ियों का चहचहाना सुना, 
बारिश की बूंदों को चाटा, 
उड़ान भरते समय ही 
पत्ती ने देखा पेड़ को 
और समझ पाई 
कि वह क्या हुआ करती थी. 
               * * *

दोनों प्यार करते हैं और खुश हैं.
वह कहता है :
"जब तुम यहाँ नहीं होती,
ऐसा लगता है जैसे तुम 
अभी-अभी बाहर निकली हो 
और मौजूद हो बगल के कमरे में." 
वह कहती है :
"जब तुम बाहर निकलते हो 
और मौजूद होते हो बगल के कमरे में,
ऐसा लगता है जैसे 
अब अस्तित्व ही नहीं रहा तुम्हारा." 
               * * * 

(अनुवाद : मनोज पटेल) 

निज़ार कब्बानी : ताकि याद रख सकूं अपनी कविता का शिल्प


आज फिर निज़ार कब्बानी की कविता...












तुम्हारे साथ-साथ वक़्त भी चला जाता है : निज़ार कब्बानी 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

आह स्त्री कभी जो हुआ करती थी मेरा प्यार 
मैं टहलता रहा 
तुम्हारे चेहरे की गलियों में. 
मैनें पता किया अपने पुराने होटल के बारे में,
उस दूकान के बारे में 
जहां खरीदा करता था अखबार, 
और लाटरी टिकट 
जिन्हें कभी नहीं जीत पाया. 
न तो मुझे होटल मिला.
न ही दूकान.
पता चला कि 
अखबार छपना ही बंद हो गए 
तुम्हारे जाने के बाद से,
कि कहीं और चले गए 
शहर और फुटपाथ, 
कि सूरज ने अपना ठिकाना बदल लिया,
और बिक गए वे सितारे 
जिन्हें हम भाड़े पर लिया करते थे 
गर्मियों के दौरान. 
पेड़ों भी दर-बदर कर गए,
दूर देश उड़ गए परिंदे 
अपने बच्चों और संगीत के साथ. 
और समुन्दर मर गया 
अपनी लहरों पर पटक कर खुद को.   
                    ॹ 

आह स्त्री किसी पेड़ की तरह जड़ें जमाए हुए मेरी चमड़ी में 
बंद करो उगना मेरे भीतर 
मदद करो मेरी 
उन आदतों से निजात पाने में 
जो पड़ गईं एक-दूसरे के साथ की वजह से,
मदद करो 
पर्दों, किताबों की आलमारी,
और कांच के गुलदानों को
अपनी गन्ध से आज़ाद करने में. 
मदद करो मेरी 
उस नाम को याद करने में 
जिससे पुकारा जाता था मुझे स्कूल में. 
मदद करो 
कि याद रख सकूं तुम्हारी देंह के आकार में ढलने से पहले का 
अपनी कविता का शिल्प. 
मदद करो 
कि फिर से पा सकूं अपनी भाषा 
जो नहीं बोली जाती किसी और स्त्री से 
तुम्हारे सिवाय. 
                    ॹ 

तुम्हारी आवाज़ की बरसाती गलियों में 
मैं भटकता रहा 
एक छाते की तलाश में.
अपने साथ लिए फिर रहा था उस शहर का नक्शा 
जहां प्यार किया था तुमसे,
उन नाईटक्लबों के नाम 
जहां नाचा था तुम्हारे साथ, 
मगर पुलिस वालों ने मेरी हँसी उड़ाई 
और बताया 
कि जिस शहर की तलाश में था मैं 
उसे निगल गया था समुन्दर 
दसवीं सदी में. 
                    :: :: ::    
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