Monday, May 30, 2011

वेरा पावलोवा : जागती है जो तुम्हारे बाएँ


वेरा पावलोवा की तीन कविताएँ... 


















आत्मवृत्त 

मैं 
वही 
हूँ 
जागती है जो 
तुम्हारे 
बाएँ. 
               * * * 

धूप सेंकी, 
चिड़ियों का चहचहाना सुना, 
बारिश की बूंदों को चाटा, 
उड़ान भरते समय ही 
पत्ती ने देखा पेड़ को 
और समझ पाई 
कि वह क्या हुआ करती थी. 
               * * *

दोनों प्यार करते हैं और खुश हैं.
वह कहता है :
"जब तुम यहाँ नहीं होती,
ऐसा लगता है जैसे तुम 
अभी-अभी बाहर निकली हो 
और मौजूद हो बगल के कमरे में." 
वह कहती है :
"जब तुम बाहर निकलते हो 
और मौजूद होते हो बगल के कमरे में,
ऐसा लगता है जैसे 
अब अस्तित्व ही नहीं रहा तुम्हारा." 
               * * * 

(अनुवाद : मनोज पटेल) 

5 comments:

  1. क्या कवितायेँ हैं ? बेहद खूबसूरत ! आभार मनोज जी !

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  2. बहुत बढिया सा..

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