रोक डाल्टन की एक और कविता...
संगीतकार मारियानो की मौत : रोक डाल्टन
(अनुवाद : मनोज पटेल)
अब परिंदे नहीं हैं वहां, जहां पियानो पड़ा रहता था इंतज़ार में
बस एक बेनाम सी सिहरन की आकृतिहीन स्मृतियाँ.
अब धूल झड़ रही है
अपने रास्ते में आबनूस के उस बुत को पाए बगैर.
अब नहीं खुला करता बगीचे का फाटक.
कभी-कभी सोचता हूँ मैं
कि हमारे मर जाने पर क्या मकान भी नहीं सहते
विधवाओं जितनी ही तकलीफ.
कम अज कम तब, जब किसी ने गाया हो
या रची हों मीठी धुनें उनके भीतर
मारियानो की तरह...
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रोके दालतोन
