Friday, April 12, 2013

चार्ल्स सिमिक की कविता

चार्ल्स सिमिक की एक और कविता... 

बेलग्रेड की इसी सड़क पर : चार्ल्स सिमिक 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

तुम्हारी माँ ले आई थीं तुम्हें 
एक इमारत के सुलगते खंडहरों से बाहर 
और नीचे रखा था तुम्हें इस फुटपाथ पर 
झुलसे हुए चिथड़ों में लिपटी किसी गुड़िया जैसी, 
सालों बाद, जहां तुम खड़ी हो इस वक़्त 
एक बेघर कुत्ते से बतियाते हुए, 
जो आधा छिपा है एक कार के पीछे, 
उम्मीद से लबालब उसकी आँखें 
जबकि धीमे-धीमे बढ़ता है वह आगे, 
तैयार बुरे से बुरे के लिए. 
               :: :: ::

Tuesday, April 9, 2013

अफ़ज़ाल अहमद सैयद की कविता


अफ़ज़ाल अहमद सैयद की एक और कविता...  

दरियाए सिंध हमारे दुख बहा क्यों नहीं ले जाता : अफ़ज़ाल अहमद सैयद 
(लिप्यान्तरण : मनोज पटेल) 

उस तमाम खून से 
जो बहा 
चार्ल्स नेपियर 
अपनी निगाह में बरीउज्जिमा था 
जैसा कि डेढ़ सौ साल बाद तक 
उसके जानशीन साबित हुए 

इसके अलावा भी 
सब कुछ उसी तरह था 

सिर्फ 
जिस्मानी रिमांड में आई हुई ख़वातीन पर 
खराब पिसी हुई मिर्च की बजाए 
हस्सास इदारों में 
'टोबास्को सास' का इस्तेमाल किया गया 

कारकर्दगी बेहतर हो जाने की वजह से 
लोगों को चंद मिनटों में 
एक ख़ूबसूरत मेज तक पहुंचाना मुमकिन हुआ 
जिसपर 
उनकी तबई मौत के 
दस्तख़त किए हुए सर्टिफिकेट जमा थे 
                 :: :: :: 

बरीउज्जिमा  :  दोषमुक्त 
जानशीन  :  उत्तराधिकारी 
हस्सास इदारों  : संवेदनशील अंगों 
कारकर्दगी  :  कार्यक्षमता 
तबई  :  प्राकृतिक, स्वाभाविक  

Friday, April 5, 2013

हेनरिक डोपट की कविता

डेनमार्क के कवि हेनरिक डोपट (Henrik Nordbrandt) की एक कविता... 

ढलते मार्च के दिन : हेनरिक डोपट 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

दिन एक दिशा में चलते हैं 
और चेहरे उल्टी दिशा में. 
बराबर वे उधार लिया करते हैं एक-दूसरे की रोशनी. 

कई सालों बाद मुश्किल हो जाता है पहचानना 
कि दिन कौन से थे 
और कौन से चेहरे... 

और दोनों चीजों के बीच की दूरी 
और भी दुर्गम लगती जाती है 
दिन ब दिन और चेहरा दर चेहरा 

यही मैं देखता हूँ तुम्हारे चेहरे में 
ढलते मार्च के इन चमकीले दिनों को. 
                    :: :: :: 
(Nordbrandt का उच्चारण यहाँ से) 
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