Wednesday, August 27, 2014

गिओर्गि गस्पदीनव की कविता

बुल्गारिया के कवि गिओर्गि गस्पदीनव की एक और कविता… 

 ओडियन  : गिओर्गि गस्पदीनव   
(अनुवाद : मनोज पटेल) 
 
किसी दिन ठंडे पड़ जाएंगे हम भी 
जैसे ठंडी हो रही है चाय की प्याली 
पिछवाड़े बरामदे में बिसराई हुई 
जैसे कीचड़ में गिरे लिली के फूल 
जैसे पुराने वाल-पेपर के ऑर्किड 
धुंधला जाएंगे हम भी किसी दिन 
मगर इतनी शान से नहीं 
और किन्हीं दूसरी फिल्मों में 
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Monday, March 24, 2014

दुन्या मिखाइल : दुनिया का आकार

"कविता दवा नहीं होती -- वह एक्सरे होती है. वह जख्म को देखने और समझने में आपकी मदद करती है."  -- दुन्या मिखाइल 
दुन्या मिखाइल के शीघ्र प्रकाश्य कविता संग्रह 'द इराकी नाइट्स' से एक कविता… 


 
दुनिया का आकार  : दुन्या मिखाइल  
(अनुवाद : मनोज पटेल) 
 
अगर चपटी होती दुनिया 
किसी जादुई कालीन की तरह,  
तो हमारे दुख का कोई आदि होता और कोई अंत. 

अगर चौकोर होती दुनिया,  
तो किसी कोने में छुप जाते हम 
जब "लुका-छुपी" खेलती जंग. 

अगर गोल होती दुनिया, 
तो चर्खी झूले पर चक्कर लगाते हमारे ख्वाब, 
और एक बराबर होते हम. 
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Sunday, March 9, 2014

एडीलेड क्रेप्सी की कविता

एडीलेड क्रेप्सी (1878 - 1914) की एक कविता...   
 

मौसम की मार खाए पेड़ों को देखकर  : एडीलेड क्रेप्सी   
(अनुवाद : मनोज पटेल) 
 
क्या इतना ही साफ़-साफ़ दिखता है हमारे जीने में 
झुकाव और घुमाव से, कि किस ओर बही है हवा?  
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