Thursday, May 5, 2011

फदील अल-अज्ज़वी की कविता


फदील अल-अज्जवी की दो कविताएँ आप इस ब्लॉग पर पहले पढ़ चुके हैं. आज उनकी एक और कविता... 











अपने खाली समय में : फदील अल-अज्ज़वी 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

अपने लम्बे और उबाऊ खाली समय के दौरान 
मैं पृथ्वी के गोले से खेलने बैठ जाता हूँ.
मैं कुछ मुल्क बनाता हूँ बगैर पुलिस या किसी गुट के 
और कुछ को निकाल देता हूँ जो अब उपभोक्ताओं को आकर्षित नहीं करते.
बंजर रेगिस्तानों से मैं गुजार देता हूँ कल-कल बहती नदियाँ 
और बनाता हूँ कुछ महाद्वीप और समुद्र 
जिसे बचा कर रख लेता हूँ भविष्य के लिए कि क्या पता.   

मैं मुल्कों का एक नया रंग-बिरंगा नक्शा बनाता हूँ :
जर्मनी को लुढ़का देता हूँ व्हेलों से भरे प्रशांत महासागर में
और कुहरे में उसके किनारों पर 
गरीब शरणार्थियों को करने देता हूँ यात्रा 
अवैध जहाज़ों पर 
सपना देखते हुए बावरिया में वादा किए गए बागों का. 
इग्लैंड को बदल देता हूँ अफगानिस्तान से 
ताकि उसके नौजवान मुफ्त में पी सकें हशीश 
हर मैजेस्टी की सरकार के सौजन्य से उपलब्ध कराई गई. 
बाड़ लगी और बारूदी सुरंगें बिछी सरहदों से, कुवैत को 
मैं चुपके से पहुंचा देता हूँ 
ग्रहण के चंद्रमा के द्वीप समूह कोमोरो तक 
उसके तेल के भण्डार समेत. 
साथ-साथ, नगाड़ों की ऊंची आवाज़ के बीच 
मैं बग़दाद को उठा ले जाता हूँ 
ताहिती द्वीपों तक.
सऊदी अरब को मैं दुबका बैठा रहने देता हूँ अपने अंतहीन रेगिस्तान में 
उसके अच्छी नस्ल के ऊंटों की शुद्धता को सुरक्षित रखने के लिए. 
फिर मैं इंडियंस को वापस सौंप देता हूँ अमेरिका 
इतिहास को वह इंसाफ देने के लिए 
जिससे वह बहुत दिनों से वंचित था. 

मुझे पता है कि दुनिया बदलना इतना आसान नहीं 
मगर फिर भी यह जरूरी है बहुत-बहुत. 
                        :: ::

Wednesday, May 4, 2011

निकानोर पार्रा : भिखारी


निकानोर पार्रा की कविताओं के क्रम में आज उनकी कविता भिखारी 













भिखारी  :  निकानोर पार्रा 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

आप इस शहर में नहीं रह सकते 
गुजर-बसर के लिए किसी जाहिर आमदनी के बगैर :
ऐसा क़ानून है पुलिस का.

कुछ लोग सैनिक हैं 
जो अपने देश के लिए अपना खून बहाते हैं 
(ऐसा उद्धृत किया जाता है)
कुछ और लोग मक्कार कारोबारी हैं 
जो एक किलो आलूबुखारे में 
दो-तीन ग्राम काट लेते हैं.
और उसके बाद पुजारी हैं 
जो अपने हाथों में एक किताब लिए फिरते हैं.

इनमें से हर एक अपना धंधा जानता है.
और आपको क्या लगता है कि मैं क्या करता हूँ ?

गाते हुए 
           मैं ताकता रहता हूँ बंद खिड़कियों को 

यह देखने के लिए कि क्या कोई उन्हें खोलेगा 
और 
        मेरी तरफ 
                      फेंकेगा 
                                 कोई 
                                        सिक्का.  

Tuesday, May 3, 2011

निकानोर पार्रा की दो कविताएँ


निकानोर पार्रा की कविताओं के क्रम में आज उनकी दो कवितायेँ...












आत्मा को शान्ति मिले 

आत्मा को शान्ति मिले -- पक्का 
मगर इस सीलन का क्या करें ?
                           और यह जो काई लगी है ?
                                         और कब्र के पत्थर का बोझ ?
और नशे में धुत्त कब्र खोदने वाले ?
और लोग जो गुलदस्ते चुरा ले जाते हैं ?
और ताबूतों को कुतरते चूहे ?
और ये कमबख्त कीड़े 
चारो ओर रेंगते हुए 
मौत मुहाल किए हुए हैं वे हमारी 
या क्या तुम्हें सचमुच यही लगता है 
कि हमें नहीं पता क्या चल रहा है ...

बड़े आराम से कह दिया तुमने कि आत्मा को शान्ति मिले 
जबकि तुम्हें पता है कि यह कमबख्त नामुमकिन है 
बस बोल देते हो बिना सोचे-विचारे यूं ही 

और तुम्हारी सूचना के लिए 
हमें पता है कि क्या चल रहा है 
मकड़ियां दौड़ लगा रही हैं हमारे पैरों पर 
शक की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ते हम 

चलो फालतू की बकवास बंद करें 
जब तुम खड़े होओ एक खुली हुई कब्र के सामने 
तो यह वक़्त बिना लाग-लपेट के बात करने का होता है :
तुम अपने गम गलत कर सकते हो शराब में 
हम तो फंसे हुए हैं इस गड्ढे के तल पर.  
                    :: :: ::

कुछ प्रस्ताव 

मैं दुखी हूँ मेरे पास खाने के लिए कुछ नहीं है
कोई मेरी परवाह नहीं करता 
भिखमंगे नहीं होने चाहिए 
यही बात मैं सालों से कहता आ रहा हूँ 

मैं प्रस्ताव करता हूँ कि तितलियों की बजाए 
बागों में केकड़े घूमने चाहिए 
-- मुझे लगता है कि यह बहुत बेहतर रहेगा --
क्या तुम भिखमंगों के बिना एक दुनिया की कल्पना कर सकते हो ?

मैं प्रस्ताव करता हूँ कि हम सभी कैथोलिक हो जाएं 
या कम्युनिस्ट या जो भी आप चाहें 
यह केवल शब्दों का खेल है 
मैं प्रस्ताव करता हूँ कि हम पानी को शुद्ध करें 

अपनी भिखमंगों वाली छड़ी द्वारा दिए गए अधिकार से 
मैं प्रस्ताव करता हूँ कि पोप मूंछे रख लें 

भूख की वजह से मैं बेहोशी महसूस करने लगा हूँ 
मैं प्रस्ताव करता हूँ कि वे एक सैंडविच मुझे दे दें 
और एकरसता को ख़त्म करने के लिए मेरा प्रस्ताव है 
कि सूरज को पश्चिम में उगना चाहिए. 
                    :: :: ::

(अनुवाद : मनोज पटेल) 
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