Sunday, June 16, 2013

अफ़ज़ाल अहमद सैयद : सुर्ख़ पत्तों का एक दरख़्त

अफ़ज़ाल अहमद सैयद की एक और कविता...   
सुर्ख़ पत्तों का एक दरख़्त : अफ़ज़ाल अहमद सैयद 
(लिप्यंतरण : मनोज पटेल) 
 
नहीं देखा होगा तुमने अपने आपको छत से लगे हुए आईने में 
सुर्ख़ पत्तों से भरे एक दरख़्त के नीचे 

नहीं बढ़ाई होंगी तुमने अपनी उंगलियाँ 
दरख़्त से पत्ते और अपने बदन से लिबास उतारने के लिए 

"आदमी दरख़्त से ज्यादा ख़ूबसूरत है" 
नहीं कहा होगा किसी ने तुम्हें चूमकर 
दरख़्त को टुकड़े टुकड़े करने के बाद 

नहीं उठाया होगा तुमने लकड़ी का गट्ठर 
नहीं जाना होगा तुमने कटी हुई शाख़ में पानी का वजन 

"आग दरख़्त से ज्यादा ख़ूबसूरत है" 
नहीं कहा होगा किसी ने अलाव के क़रीब तुम्हें अपने सीने से लगाकर 

नहीं दिया होगा तुम्हें किसी ने अपना दिल 
सुर्ख़ पत्तों का एक दरख़्त 
                     :: :: ::

10 comments:

  1. नहीं दिया होगा किसी ने तुम्हे अपना दिल
    सुर्ख पत्तों से भरा एक दरख्त !

    मार्मिक और जटिल .

    ReplyDelete
  2. waaaaaaaaah waaaaaaaaaaaaaah hot khub ye ruh ko chune vale shabd hai bhot khubt

    ReplyDelete
  3. सुर्ख पत्तों वाले दरख़्त जैसे दिल को जिस्म के आगे कौन पूछता है .....बहुत अच्छी कविता । सुन्दर अनुवाद ।

    ReplyDelete
  4. सुर्ख पत्तों वाले दरख़्त जैसे दिल को जिस्म के आगे कौन पूछता है .....बहुत अच्छी कविता । सुन्दर अनुवाद ।

    ReplyDelete
  5. अच्छी कविता है
    कृति
    https://kritisansar.noblogs.org/

    ReplyDelete
  6. शानदार कविता .............घनीभूत संवेदना साथ बहा ले जाती है . समुचित अनुवाद !

    ReplyDelete
  7. superb poem manoj ji...

    thanks
    anu

    ReplyDelete

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...