Tuesday, July 16, 2013

एमिली डिकिन्सन की कविता

एमिली डिकिन्सन की एक और कविता... 

तुम बुझा नहीं सकते हो आग को : एमिली डिकिन्सन 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

तुम बुझा नहीं सकते आग को 
जला सकने वाली कोई चीज 
बुझ सकती है खुद से ही, बिना किसी पंखे के 
सबसे धीमी रात को भी. 

ज्वार को लपेट कर 
तुम रख नहीं सकते किसी दराज में 
क्योंकि हवाओं को पता चल जाएगा उसका 
और वे बता देंगी तुम्हारे देवदार फर्श को. 
                 :: :: :: 

5 comments:

  1. 'जला सकने वाली कोई चीज़
    बुझ सकती है खुद से ही'

    सत्य... सुन्दर!

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन कर का मनका डाल कर ... मन का मनका फेर - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. बहुत सुंदर !

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  4. अच्छा अनुवाद .. छोटी से कविता .. सत्य कहती हुई

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  5. गहरे अर्थ लिए हुए

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