Tuesday, October 25, 2011

टॉमस ट्रांसट्रोमर : घर की ओर

टॉमस ट्रांसट्रोमर की एक कविता...


घर की ओर : टॉमस ट्रांसट्रोमर 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

फोन की एक बातचीत छलक गई रात में 
और जगमगाने लगी शहर और देहात के बीच 
होटल के बिस्तर पर करवटें ही बदलता रहा उसके बाद 
सूई की तरह हो गया मैं किसी दिशा सूचक यंत्र की 
जिसे लिए जंगलों से होकर भाग रहा हो कोई दौड़ाक  
धड़धड़ाते हुए दिल के साथ 
                    :: :: ::
Manoj Patel Translation, Manoj Patel Blog 

5 comments:

  1. "...और जगमगाने लगी शहर और देहात के बीच "...!!!

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  2. घर की याद और उसका प्रभाव .............अच्छी कविता मनोज जी ! ज्योति-पर्व की बधाई !

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  3. बहुत गहरे भाव लिये सुंदर कविता...

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