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Saturday, March 17, 2012

अंजेल गोंजालेज : जो भी तुम चाहो

अंजेल गोंजालेज का परिचय और उनकी एक कविता आप इस ब्लॉग पर पहले पढ़ चुके हैं. आज प्रस्तुत है उनकी एक और कविता...  

 
जो भी तुम चाहो : अंजेल गोंजालेज 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

जब पैसे हों तुम्हारे पास, एक अंगूठी खरीद देना मेरे लिए, 
जब कुछ न हो, एक कोना दे देना अपने मुंह का, 
जब सूझ न रहा हो कुछ, आना मेरे साथ 
-- मगर यह मत कहना बाद में कि तुम्हें पता नहीं था क्या कर रही थी तुम.  

सुबह-सुबह तुम बटोरती हो जलाऊ लकड़ियों के गट्ठे 
और तुम्हारे हाथों में वे बदल जाती हैं फूलों में. 
पंखुड़ियों को थाम कर मैं उठाता हूँ तुम्हें, 
अगर तुम चली गई तो मैं खुशबू ले लूंगा तुम्हारी. 

मगर मैं पहले ही बता चुका हूँ तुम्हें: 
अगर जाना ही है तुम्हें तो यह रहा दरवाजा:
इसका नाम है अंजेल और यह खुलता है आंसुओं की तरफ. 
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Monday, August 1, 2011

मर चुके लोगों पर इल्जाम


स्पेन के कवि अंजेल गोंजालेज का जन्म 1925 में हुआ था. शुरूआती जीवन स्पेन के गृह युद्ध से आक्रान्त रहा जिसमें उन्होंने एक भाई को गँवा दिया और दूसरे भाई को देश छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा. वे एक वकील बने और मैड्रिड की सिविल सेवा में भी काम किया. 1956 में कविताओं की पहली किताब प्रकाशित हुई जिसकी काफी चर्चा हुई. अब तक कविता की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. कई कविता-संग्रहों का सम्पादन एवं आलोचना कार्य भी प्रकाशित.












मर चुके लोगों पर इल्जाम : अंजेल गोंजालेज 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

बहुत मतलबी होते हैं मर चुके लोग :
हमें इतना रुलाते हैं और जरा भी परवाह नहीं करते, 
चुपचाप पड़े रहते हैं सबसे बेढब जगहों पर, 
चलना भी नहीं चाहते, उन्हें ढोकर ले जाना पड़ता है 
कब्र तक अपने ऊपर लादकर 
जैसे कि छोटे से बच्चे हों वे. कितने वजनी !
अजीब ढंग से कठोर उनके चेहरे 
जैसे हमपर आरोप लगाते किसी बात का, या चेतावनी देते ;
बुरे दिल वाले होते हैं वे, बुरे नमूने, 
हमेशा, हमेशा हमारी ज़िंदगी की सबसे खराब चीजें. 
मर चुके लोगों के बारे में सबसे बुरी बात तो यह है 
कि किसी भी तरीके से आप उन्हें जान से नहीं मार सकते. 
उनका अनवरत विध्वंसक काम 
इसी वजह से बेहिसाब होता जाता है.
संवेदनहीन, उदासीन, जिद्दी, भावशून्य, 
अपने अक्खड़पन और खामोशी के साथ 
उन्हें एहसास भी नहीं होता कि वे क्या कुछ बिगाड़ रहे हैं. 
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