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Tuesday, August 6, 2013

पाब्लो नेरुदा : कुछ सवाल

पाब्लो नेरुदा की 'सवालों की किताब' से कुछ और सवाल... 

कुछ सवाल : पाब्लो नेरुदा   
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

इत्ते बड़े-बड़े हवाई जहाज 
क्यों नहीं उड़ा करते अपने बच्चों के साथ? 

कौन सी पीली चिड़िया 
नींबुओं से भर लेती है अपना नीड़? 

हेलीकाप्टरों को वे सिखाते क्यों नहीं  
शहद चूस लेना धूप से? 

आज रात कहाँ छोड़ दिया है 
पूनम के चाँद ने आटे का अपना बोरा? 
                   :: :: ::

Monday, December 31, 2012

पाब्लो नेरुदा : यदि हर दिन

पाब्लो नेरुदा की एक और कविता...    


यदि हर दिन : पाब्लो नेरुदा 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

यदि हर दिन पड़े 
हर रात के भीतर, 
तो एक कुआँ होगा वहां 
जहां कैद होगी स्पष्टता. 
बैठना होगा हमें 
अंधकार के कुएँ की जगत पर 
और जाल डालकर पकड़ना होगा गिरी हुई रोशनी 
धैर्य के साथ. 
:: :: :: 

Sunday, April 8, 2012

पाब्लो नेरुदा : जिन्होनें एक उंगली भी नहीं डुबोई मेरे खून में

पाब्लो नेरुदा की 'सवालों की किताब' से कुछ और सवाल... 

 

कुछ सवाल : पाब्लो नेरुदा 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

आज के सौ साल बाद 
पोलैंड के लोग क्या सोचेंगे मेरे हैट के बारे में?

वे क्या कहेंगे मेरी कविताओं के बारे में 
जिन्होनें कभी एक उंगली भी नहीं डुबोई मेरे खून में? 

कैसे नापा जाए भला 
मेरी बीयर के मग से गिरते हुए झाग को? 

क्या करती है वह मक्खी 
जो कैद है पेत्रार्क के एक सानेट में? 
                    :: :: :: 

अपना रास्ता भूल जाने वाली रेलगाड़ियाँ 
हो सकता है मर गईं हों शर्म से? 

किसने नहीं देखा है कभी कड़ुवा घीकुंवार? 

कहाँ बोई गईं थीं 
कामरेड पाल एलुआर की आँखें? 

गुलाब की झाड़ी से उन्होंने पूछा 
क्या कुछ काँटों के लिए जगह है तुम्हारे पास? 
                    :: :: :: 

Thursday, February 9, 2012

पाब्लो नेरुदा : क्या बयान करती हैं पत्तियाँ

पाब्लो नेरुदा के कुछ और सवाल... 
 
कुछ सवाल : पाब्लो नेरुदा 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

कितने दिन जिएगा गैंडा 
वह अगर नर्म-दिल हो जाए

क्या बयान करती हैं पत्तियाँ 
आने वाले बसंत के बारे में? 

सर्दियों में क्या पत्तियाँ 
जड़ों में रहती हैं चोरी-छिपे? 

पृथ्वी के बारे में क्या जाना पेड़ ने 
आसमान से बताने के लिए? 
               :: :: ::  
Manoj Patel Blog, vishv kavita 

Friday, January 27, 2012

नेरुदा-क्रोनिन : सवाल-जवाब

पाब्लो नेरुदा की 'सवालों की किताब' से कुछ सवाल आप इस ब्लॉग पर पढ़ते रहे हैं. आस्ट्रेलियाई कवियत्री एम टी सी क्रोनिन ने 'नेरुदा के सवालों से बातचीत' की है. क्रोनिन का जन्म १९६३ में हुआ था. क्वीन्सलैंड में रहने वाली क्रोनिन पेशे से अधिवक्ता हैं. उनके कई कविता-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं.  













नेरुदा-क्रोनिन सवाल-जवाब 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

पाब्लो नेरुदा 
अगर मैं मर चुका हूँ और अनजान हूँ इस बात से 
तो भला कौन बताएगा मुझे वक़्त? 

फ़्रांसीसी बसंत कहाँ से पाता है 
इतनी सारी हरी-भरी पत्तियाँ?

मधुमक्खियों से हैरान अंधा आदमी 
कहाँ बना सकता है अपना बसेरा? 

अगर ख़त्म हो गया है सारा पीलापन 
तो हम रोटी किस चीज से बनाएंगे भला? 
                    :: :: :: 

एम टी सी क्रोनिन 
अगर आप मर चुके हैं और अनजान हैं इस बात से 
तो वक़्त पूछिए किसी गर्भवती घड़ी का. 

बसंत में फ्रांस 
सिनेमा से पाता है अपनी पत्तियाँ. 

मधुमक्खियों से हैरान अंधे आदमी को 
शांत लकड़ी का बनाना चाहिए अपना घर. 

अगर ख़त्म हो जाए सारा पीलापन 
तो हम खिलखिलाहट से बनाएंगे रोटियाँ.  
                    :: :: :: 

पाब्लो नेरुदा 
बताओ मुझे, क्या गुलाब सचमुच नंगा है 
या उसके कपड़े पहनने का तरीका ही यही है? 

पेड़ भला क्यों छिपाते हैं 
अपनी जड़ों की शान? 

कौन कान देता है 
गुनहगार मोटरकार के प्रायश्चित पर? 

बारिश में गतिहीन खडी रेलगाड़ी से ज्यादा उदास 
कोई चीज है क्या दुनिया में? 
                    :: :: :: 

एम टी सी क्रोनिन 
मैं बताती हूँ, न तो नंगा है न ही कपड़े पहने है गुलाब 
बल्कि सिर्फ इंसान का दिल ही उतारता है उसके कपड़े. 

पेड़ छिपाते हैं अपनी जड़ों की शान 
क्योंकि उन्हें बढ़ना है हर हालत में. 

सिर्फ नई-नवेली सड़क ही कान देती है 
गुनहगार मोटरकार के प्रायश्चित पर. 

बारिश में गतिहीन खडी रेलगाड़ी से ज्यादा उदास 
कोई चीज है क्या दुनिया में? एक माँ. 
                    :: :: :: 
Manoj Patel, Parte Parte, Parhte Parhte, Padte Padte

Monday, January 9, 2012

पाब्लो नेरुदा : क्या पृथ्वी किसी झींगुर की तरह गाती है

पाब्लो नेरुदा की 'सवालों की किताब' से कुछ और सवाल...

 

कुछ सवाल - 2 : पाब्लो नेरुदा 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

क्या ४ हमेशा ४ ही होता है सभी लोगों के लिए?
क्या बराबर होते हैं सारे ७? 

जब कैदी सोचते हैं रोशनी के बारे में 
क्या यह वही होती है जो रोशन करती है तुम्हारी दुनिया को? 

क्या कभी सोचा तुमने कि 
बीमार के लिए किस रंग की होती होगी अप्रैल? 

कौन सा पश्चिमी राज-तंत्र 
पोस्तों से बना लेता है अपना झंडा?
                    :: :: :: 

सूरज और संतरों के बीच 
मोटा-मोटी कितनी होगी दूरी? 

कौन जगाता होगा सूरज को 
जब वह सो जाता है अपने दहकते बिस्तर पर? 

क्या पृथ्वी किसी झींगुर की तरह गाती है 
स्वर्गलोक के संगीत में? 

क्या यह सच है कि उदासी गाढ़ी होती है 
और विषाद पतला? 
                    :: :: :: 
Manoj Patel, Blogger and Translator, Akbarpur, Ambedkarnagar, Phone : 098385993333 

Thursday, January 5, 2012

पाब्लो नेरुदा : कुछ सवाल

पाब्लो नेरुदा की 'सवालों की किताब' से कुछ सवाल...

 

कुछ सवाल : पाब्लो नेरुदा 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

जब मैंने एक बार फिर से देखा समुद्र को 
समुद्र ने मुझे देखा होगा या नहीं?
लहरें क्यों मुझसे पूछती हैं वही सवाल 
जो मैं पूछता हूँ उनसे?
और वे क्यों टकराती हैं चट्टानों से 
इतने निरर्थक जुनून के साथ? 
क्या वे थक नहीं जातीं दुहराते हुए 
रेत के प्रति अपनी घोषणा? 
                    :: :: ::

क्या तुम्हें भरोसा नहीं कि ऊँट 
चांदनी रखे होते हैं अपने कूबड़ में? 
क्या वे इसे बोते नहीं रहते रेगिस्तान में 
रहस्यमय जिद के साथ?
और क्या समुद्र भाड़े पर नहीं दिया गया है 
पृथ्वी को थोड़े से समय के लिए? 
और क्या हमें उसे लौटा नहीं देना होगा 
उसकी लहरों समेत चंद्रमा को? 
                    :: :: ::
Manoj Patel, Akbarpur, Ambedkarnagar (U.P.)

Thursday, November 18, 2010

पाब्लो नेरुदा की दो कवितायेँ

मलिका 
मैनें नाम दिया है तुम्हें मलिका.
हालांकि लम्बी और भी हैं तुमसे ज्यादा 
और पाकीजा भी
और तुमसे ज्यादा प्यारी भी.

लेकिन तुम्हीं हो मलिका.

जब चलती हो तुम सड़कों पर 
कोई पहचानता नहीं तुम्हें 
देख नहीं पाता तुम्हारा बिल्लौरी मुकुट,
नहीं देख पाता कोई उस लाल सोने के कालीन को 
जिस पर कदम रखती हो तुम 
वहां से गुजरते हुए,
उस बेवजूद कालीन को कोई देख नहीं पाता.

और जब दिखती हो तुम
गूंजने लगती हैं मेरे बदन में सारी नदियाँ,
आसमान हिला देती हैं घंटियाँ,
और एक स्तुति से भर उठती है दुनिया.

केवल तुम और मैं
मैं और तुम मेरी जान 
सुनो तो सही इसे. 

कुम्हार 
पूर्णता और सुकुमारता तुम्हारी देह की 
बदी हुई थी मेरे लिए.

जब फिराता हूँ अपने हाथ ऊपर 
दोनों हाथों में आ जाते हैं एक-एक कपोत 
जिन्हें तलाश थी मेरी ही,
मानो, मेरी प्यारी,
कच्ची मिट्टी से बनाया था उन्होंने तुम्हें 
मुझ कुम्हार के हाथों के लिए.

तुम्हारे घुटने, तुम्हारे स्तन 
कमर तुम्हारी
लापता अंग हैं मेरे 
प्यासी धरती के बिलों की तरह 
जिससे अलग कर दी थी उन्होंने एक आकृति,
और हम दोनों मिलकर 
एक नदी की तरह होते हैं पूर्ण,
पूर्ण, रेत के एक कण की तरह.

(अनुवाद : Manoj Patel)
Pablo Neruda, Padhte Padhte
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