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Monday, May 28, 2012

एंतोनियो पोर्चिया की आवाजें

एंतोनियो पोर्चिया की कुछ और कविताएँ...  

 
आवाजें : एंतोनियो पोर्चिया 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

तुम उनसे बंधे हो और यह नहीं समझ पाते कि कैसे, 
क्योंकि वे तुमसे नहीं बंधे हैं. 
:: :: :: 

वह सब कुछ जो मैं जानता हूँ, उसे जानने तक में मेरी कोई मदद नहीं करता. 
:: :: :: 

हर चीज थोड़ा सा अँधेरे की होती है, रोशनी भी. 
:: :: :: 

कुछ चीजें अपने अस्तित्व के अभाव को मुझे दिखलाने के लिए, मेरी हो गईं. 
:: :: :: 

सूरज रात को रोशन करता है, उसे रोशनी में नहीं बदल देता. 
:: :: :: 

एक बड़े दिल को बहुत कम से भरा जा सकता है. 
:: :: :: 

Wednesday, March 28, 2012

राबर्तो हुआरोज़ : पोर्चिया की स्मृति में

आज प्रस्तुत है एंतोनियो पोर्चिया की स्मृति में लिखी गई राबर्तो हुआरोज़ की 'एलेवेंथ वर्टिकल पोएट्री' में संकलित यह कविता...   

 
राबर्तो हुआरोज़ की कविता 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

हर कविता हमें मजबूर करती है पिछली कविता को भूलने के लिए, 
मिटा देती है सारी कविताओं का इतिहास, 
मिटा देती है अपना इतिहास 
और यहाँ तक कि मनुष्य का इतिहास भी 
शब्दों का एक चेहरा हासिल करने के लिए 
जिसे मिटा न पाए रसातल.  

कविता का हर शब्द भी 
हमें मजबूर करता है पिछले शब्द को भूलने के लिए, 
भाषा के बहुरूपी संदूक से 
काट देता है एक पल को 
और उसके बाद पुनः भिड़ता है दूसरे शब्दों से 
एक अन्य भाषा के उदघाटन की 
अनिवार्य रस्म को पूरा करने के लिए. 

और कविता की हर खामोशी भी 
कविता के इस महान विस्मरण में  
हमें मजबूर करती है पिछली खामोशी को भूलने के लिए 
और तब तक सिमटती जाती है शब्द दर शब्द, 
जब तक कि दुबारा उभरकर वह ढँक नहीं लेती कविता को 
किसी सुरक्षा लबादे की तरह 
जो बचाए रहता है उसे किसी अन्य कथन से. 

यह अजीब नहीं है. 
गहराई से देखें तो, 
हर व्यक्ति हमें मजबूर करता है पिछले व्यक्ति को भूलने के लिए, 
मजबूर करता है सभी अन्य व्यक्तियों को भूल जाने के लिए. 

अगर कोई चीज दुबारा वही नहीं रहती, 
तो सभी चीजें अंतिम हैं. 
अगर कोई चीज दुबारा वही नहीं रहती, 
तो सभी चीजें पहली हैं. 
                                                    (एंतोनियो पोर्चिया की अमिट स्मृति में) 
                    :: :: ::

Tuesday, March 27, 2012

एंतोनियो पोर्चिया के साथ एक मुलाक़ात


एंतोनियो पोर्चिया के साथ इनेस मालिनोव की एक मुलाक़ात...   


एंतोनियो पोर्चिया के साथ एक मुलाक़ात : इनेस मालिनोव 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

"मैं कविता की तलाश नहीं करता; वह मेरे पास आती है." 
                                                        -- एंतोनियो पोर्चिया 

ओलीवस स्थित एंतोनियो पोर्चिया के छोटे से घर के बगीचे में एक रहस्यमयी काली बिल्ली हमें देख रही है. दिन के ग्यारह बजे हैं. चार साफ़-सुथरे कमरों में तमाम पेंटिंग्स लगी हैं. पोर्चिया बताते हैं, "मेरे कई दोस्त पेंटर हैं... यह उसी की फसल है." उनकी कोई पत्नी या बच्चे नहीं हैं. वे खुद भी किसी चीज के बारे में बहुत आश्वस्त नहीं हैं. वे अपनी किताब के बारे में बातें करते हैं. आप इसे आवाजें  क्यों कहते हैं? वे जवाब देते हैं, "बड़ा मुश्किल है कुछ कहना. हर चीज सुनी जाती है. लोग भी हर चीज को सुनते हैं." पोर्चिया इसी तरह आम तौर पर सूक्तिपूर्ण ढंग से ही कोई बात कहते हैं. उनके हाथ कांपा करते हैं. वे माफी मांगते हैं, "मैं नर्वस हो रहा हूँ. मैं हमेशा नर्वस रहता हूँ." हालांकि माफी तो दरअसल हमें मांगनी चाहिए, हम यानी एक पत्रकार और एक फोटोग्राफर जो एक ऎसी भरपूर और गहरी ज़िंदगी को दर्ज करने के लिए बेचैन हैं जो शायद ही कभी लोगों तक पहुंची हो. यह कोई सनसनी नहीं, बल्कि एक राज है. कवि बताता है, "ज़िंदगी का राज? चीजें बदलती हैं, हम सभी बदल जाते हैं. कोई राज नही है. कौन जान सकता है इसे?" और "कोई कभी नहीं जान पाता, और बहुत कम जानना भी चाहता है जिससे कि बेचैनी की व्याख्या हो जाए." उनका चेहरा एक ऎसी रोशनी से चमक उठता है जिसने बहुत कुछ देखा है; वे हँसते हैं और एक किताब उठाकर पढ़ने लगते हैं. उन्हें अपने ख्यालों को पढ़ना पसंद है. वे शुरू करते हैं, "किसी समय, किसी अनंतता में, क्या ऐसा हो सकता है कि चीजें, चीजें ही रही हों न कि चीजों की स्मृति?" खुद को बिलकुल सहज-सरल तरीके से अभिव्यक्त करने के लिए वे किसी अभिनेता की तरह पढ़ते हैं, मगर फिर भी हमेशा, तब भी जब वे एक क्षण के लिए किताब पर गौर करने लगते हैं, ऐसा ही लगता है कि मानो वे अपने शब्दों को कहीं तलाशते रहते हों, शायद अपनी स्मृति में. वे अपने विचार को रटने के बाद बोलते हैं. उनके लिए पढ़ने का यही मतलब है. "मुझे नहीं लगता कि मैं अतियथार्थवादी हूँ. मुझे नहीं पता कि मैं खुद को कैसे परिभाषित करूँ क्योंकि मैं, कभी खुद मैं होता ही नहीं. हर कोई चीजों की एक अनंतता होता है. जहां तक निश्चितता की बात है... किसके पास है यह?"  वे अस्तित्व, समय, यथार्थता पर सवाल खड़े करते हैं. दस्तखतों से भरे एक बड़े से कागज़ पर लिखा हुआ है : "दार्शनिक एंतोनियो पोर्चिया के लिए." शायद यही कुंजी है: पोर्चिया अपने कवि जितने ही गूढ़ दार्शनिक भी हैं. अध्ययन और चिंतन उनके विचारों में झलकता है. "मैनें बहुत कम और बहुत बेतरतीबी से पढ़ा है." वे जल्दी से बताते हैं. उनमें बहुत शर्मीलापन और आत्मविश्वास है. वे कहते हैं, "मेरी किताब आवाजें लगभग मेरी आत्मकथा है. और वही लगभग सभी लोगों की है." और फिर वे अपनी ज़िंदगी के बारे में बताने लगते हैं. 

एंतोनियो पोर्चिया का जन्म १८८५ में इटली में हुआ था. वे पचास साल से अर्जेंटीना में रह रहे हैं. अब तक आपने अपनी जीविका कैसे कमाई? "मैं बहुत छोटा था जब मेरे पिता की मृत्यु हो गई. वे पचास साल के थे. इसीलिए मैनें कहा: 'मेरे पिता जब गए, मेरे बचपन को आधी सदी का तोहफा दे गए'. मैं कई भाई-बहनों में सबसे बड़ा था और मैनें बहुत काम किया. मेरी माँ मुझे बहुत प्यार करती थीं. मगर उसकी अच्छाई ने मुझे बहुत नुकसान पहुंचाया है. उसकी वजह से मैनें बहुत तकलीफें सही हैं. इसीलिए मैनें लिखा: 'मैं कोई चीज दुबारा नहीं चाहूंगा. माँ भी नहीं.' मैनें हर तरह के काम किए... और फिर अपने भाई के छापाखाने पर भी काम किया."  जब पोर्चिया बोलते हैं तो वह मर्मस्पर्शी होता है. वे सबकुछ जानने वाले और सबसे मासूम एक साथ लगते हैं. प्यार के बारे में उनका कहना है: "हाँ, मुझे पता नहीं. मुझे दो बार हुआ. ऎसी चीजें होती हैं, वे किसी एक के भीतर समाई हुई आती हैं. चूंकि वे तार्किक या सुव्यवस्थित नहीं होतीं इसलिए वे असंभव के भीतर आती हैं. असंभव अपने आपको अकेला कर लेता है, कोई उसे करता नहीं... मगर यही एक चीज है जिसका कोई महत्त्व है."  वे याद करते हैं कि यह उदासी और दूसरे का अकेलापन था जो उन्हें आकर्षित करता था. वे दोनों ऎसी स्त्रियाँ थीं जिनसे वे शुरूआत में प्यार नहीं कर पाए.. --फिर खासतौर पर पहली वाली को-- वे जीवनभर प्यार करते रहे. मगर उन्होंने कभी अकेला नहीं महसूस किया. "मेरे ढेर सारे दोस्त हैं. लोगों के साथ घुलना-मिलना मेरे लिए हमेशा बहुत आसान रहा है. कभी-कभी मैं तब अकेला महसूस करता हूँ जब कोई मेरे साथ होता है. जो कोई नहीं होता." 

दोपहर के समय को वे सेब खाने का समय मानते हैं. वे एक प्लेट में दो सेब लेकर आते हैं जिसे उन्होंने खुद पकाया है. सेब बहुत स्वादिष्ट हैं. वे उनमें चीज लगाते हैं. उनके वाक्य छोटे और सारगर्भित होते हैं. वे फिर से बताते हैं: "मैनें बहुत थोड़ा और बहुत बेतरतीब ढंग से पढ़ा है. मुझे चीजों से सुझाव मिला करते थे. मगर वह हर किसी के लिए नहीं है." वे सच कह रहे हैं; भले ही यह जानते-बूझते न हो, मगर वे अलग हैं. एक तरह से उन्हें पता है कि वे मूल्यवान हैं क्योंकि उनके अनुभव सबके अनुभव हैं. अस्तित्व अनंतता को ही दर्ज करता है. वे एक कलाकार हैं, अमूर्त वास्तविकताओं और मानव ह्रदय के जटिल और संवेदनशील अन्वेषक. मुझे उनसे पूछना पड़ता है, "पोर्चिया, क्या आप ईश्वर में भरोसा करते हैं?" वे मुस्कराते हुए जवाब देते हैं, "मैं ईश्वर में भरोसा नहीं करता मगर मैं उन्हें प्यार करता हूँ." 

वे मुझे बिलकुल नई Voices की पांडुलिपि दिखाते हैं. बिलकुल साफ़-सुथरी हस्तलिपि में उन्होंने अपनी कविताओं, अपने विचारों को लिख रखा है. वे स्कूल के दिनों की, रोशनाई में डुबो कर लिखने वाली एक कलम से लिखते हैं. वे ध्यान दिलाते हैं, "आप मेरे बारे में इतना कुछ जानते हैं मगर मुझे समझते नहीं. जानना, समझना नहीं होता. हो सकता है हम सबकुछ जानते हों मगर समझते कुछ भी न हों."  "ज्यादातर हमारा स्वयं होने का डर ही हमें आईने तक ले जाता है." "क्योंकि वे उसका नाम जानते हैं जो मैं ढूंढ़ रहा हूँ, उन्हें लगता है कि वे जानते हैं कि मैं क्या ढूंढ़ रहा हूँ." "यह पल अभी, अनंतता बाद में. पल और अनंतता. केवल पल ही समय है, अनंतता समय नहीं है. अनंतता पल की स्मृति है." "जो आग से आग तक घूमता रहता है, ठण्ड से मर जाता है." 

एंतोनियो पोर्चिया मर्मस्पर्शी और अद्भुत हैं. सब के बारे में उदारतापूर्वक बात करते हुए वे अपनी सहज करुणा, अपनी बुद्धिमत्ता, अपने मानवीय पहलू को उद्घाटित करते रहते हैं. जैसा कि वे विदा करते हुए कहते हैं, "मैं उम्मीद करता हूँ कि कम से कम एक बेहतर पैराग्राफ के लिए मैं जरूर मदद कर पाया होऊंगा." गैस चूल्हा जलाकर मेट  तैयार करने के लिए केतली गर्माते हुए वे ओलीवस के अपने छोटे से मकान में अकेले रह जाते हैं. वे एक ऎसी आवाज़ हैं जो भावनाओं और ब्रह्माण्ड की विविधता से भरी हुई है. 
                                                            :: :: :: 

Friday, March 16, 2012

पोर्चिया की सोहबत में हुआरोज़

पोर्चिया पर राबर्तो हुआरोज़ का यह छोटा सा संस्मरण पढ़िए जो उन्होंने पोर्चिया की किताब Voices के फ्रेंच संस्करण के लिए लिखा था:  

 
किसी की सोहबत में होना : राबर्तो हुआरोज़ 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

मुझे उनके कुछ शब्द याद हैं जो उन्होंने एक दोपहर ला बोका की सड़कों पर घूमते हुए मुझसे कहे थे. यह ब्यूनस आयर्स के निर्धनतम इलाकों में से एक और उनका पसंदीदा मुहल्ला था, रंग-बिरंगे मकानों, परदेशी माहौल, पास में ही बहती नदी, जहाज़ों के सायरन और पुराने शराबघरों वाला एक इलाका जहां नाविक और गोदी के मजदूर शराब और संगीत के साथ न जाने क्या-क्या याद करने या भुलाने आया करते थे. पोर्चिया अस्पताल से लौट रहे थे, अपने एक पुराने प्यार से मिलकर जो अब बूढ़ी, बीमार और अकेली अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी थी. उन्होंने मुझे वह 'सूक्ति' सुनाई जिसे सुनाकर उन्होंने उस स्त्री को खुश करने की कोशिश की थी: 

किसी की  सोहबत में होना किसी के साथ होना नहीं होता, 
किसी के भीतर होना होता है.  

अचानक मुझे लगा --जैसा कि मुझे अक्सर उनके साथ होने पर महसूस होता था-- कि विवेक अभी पूरी तरह से मृत नहीं हुआ है, और यह कि ब्यूनस आयर्स की उस विस्मृत सी सड़क पर कोई रहस्यमय शक्ति मौजूद है जिसकी वजह से यह दुनिया अभी तक कायम है. 
                                                          :: :: :: 
राबर्तो ह्वार्रोस, राबर्तो हुआर्रोस 

Wednesday, March 7, 2012

एंतोनियो पोर्चिया : क्योंकि तुम आ गए हो

एंतोनियो पोर्चिया की कविताओं के क्रम में...  

 
आवाजें : एंतोनियो पोर्चिया 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

महत्वपूर्ण और महत्वहीन एक जैसे होते हैं, 
केवल शुरूआत में. 
:: :: :: 

जब तुम और सत्य मुझसे बातें करते हैं तो मैं सत्य की नहीं सुनता.
मैं तुम्हारी सुनता हूँ. 
:: :: :: 

अब मैं तुम्हारा और इंतज़ार नहीं कर सकता. 
क्योंकि तुम आ गए हो. 
:: :: :: 

वह सपना गायब हो जाता है, 
जिसे सपने की खुराक नहीं मिलती. 
:: :: :: 
अंतोनियो पोर्चिया, एंटोनियो पोर्चिया 

Tuesday, February 28, 2012

एंतोनियो पोर्चिया : लोग स्मृति हो जाने की उम्मीद में जीते हैं

एंतोनियो पोर्चिया की कुछ और कविताएँ...  

 
आवाजें : एंतोनियो पोर्चिया 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मैं वह जानता हूँ जो मैनें तुम्हें दिया है. 
वह नहीं जानता जो तुमने पाया है. 
:: :: :: 

मेरे पिता जब गए, 
मेरे बचपन को आधी सदी का तोहफा दे गए. 
:: :: :: 

मनुष्य कहीं नहीं जाता. 
हर चीज मनुष्य तक आती है, जैसे कल. 
:: :: :: 

मैनें शायद ही मिट्टी को छुआ हो 
और मैं उसी से बना हुआ हूँ. 
:: :: :: 

लोग स्मृति हो जाने की उम्मीद में जीते हैं. 
:: :: :: 

Saturday, February 25, 2012

एंतोनियो पोर्चिया : सिर्फ फासले हैं मेरे करीब

एंतोनियो पोर्चिया की कविताओं के क्रम में...  

 
आवाजें : एंतोनियो पोर्चिया 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

सब कुछ, कुछ नहीं है, मगर बाद में. 
सब कुछ सह लेने के बाद. 
:: :: :: 

क्योंकि वे उसका नाम जानते हैं जो मैं ढूंढ़ रहा हूँ, 
उन्हें लगता है वे जानते हैं कि मैं क्या ढूंढ़ रहा हूँ. 
:: :: :: 

प्रशंसा करने की बजाय प्यार करना मेरे लिए हमेशा आसान रहा. 
:: :: :: 

तुम्हें आंसुओं की नदी इसलिए नहीं दिखती क्योंकि उसमें तुम्हारे एक आंसू की कमी है. 
:: :: :: 

सिर्फ फासले हैं मेरे करीब. 
:: :: :: 
अंतोनियो पोर्चिया एन्टोनियो पोर्चिया 

Thursday, February 23, 2012

एंतोनियो पोर्चिया : तुम कौन हो

एंतोनियो पोर्चिया की कविताएँ...  

 
आवाजें : एंतोनियो पोर्चिया 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

किसी को मैनें ऐसा नहीं पाया जिसके जैसा मैं होना चाहूँ. और मैं उसी तरह से रह गया : 
किसी की तरह नहीं. 
:: :: :: 

उन्होंने तुम्हें धोखा देना बंद कर दिया है, प्यार करना नहीं. 
और तुम्हें लगता है कि उन्होंने तुम्हें प्यार करना बंद कर दिया है. 
:: :: :: 

प्रकाश की एक किरण ने तुम्हारा नाम मिटा दिया. 
अब मुझे यह नहीं पता कि तुम कौन हो. 
:: :: :: 

जब तुम्हारा कष्ट मेरे कष्ट से थोड़ा ज्यादा होता है, 
तो मुझे लगता है कि मैं थोड़ा क्रूर हूँ. 
:: :: :: 
अंतोनियो पोर्चिया 

Tuesday, February 21, 2012

एंतोनियो पोर्चिया : हर खिलौने को टूटने का हक है

एंतोनियो पोर्चिया की 'आवाजें' श्रृंखला से...  

 
आवाजें : एंतोनियो पोर्चिया 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

जिसका मैं इंतज़ार कर रहा था, 
उससे मेरी इंतज़ार की आदत आई. 
:: :: :: 

स्वर्ग जरूर जाऊंगा, मगर अकेले नहीं 
अपने नरक के साथ. 
:: :: :: 

कुछ सपने होते हैं, 
जिन्हें आराम करने की जरूरत होती है. 
:: :: :: 

खालीपन की अनुभूति 
हम उसे भरकर करते हैं. 
:: :: :: 

हर खिलौने को टूटने का हक है. 
:: :: :: 

दिल को जख्म देना उसे रचना है. 
:: :: :: 

मेरा अभाव सम्पूर्ण नहीं है, 
उसमें मेरी कमी है. 
:: :: :: 
परिचय और पिछली पोस्ट यहाँ देखें : मेरी खामोशी में सिर्फ मेरी आवाज़ की कमी है  एंटोनियो पोर्चिया 

Thursday, February 16, 2012

एंतोनियो पोर्चिया : मेरी खामोशी में सिर्फ मेरी आवाज़ की कमी है


इस ब्लॉग पर आप इन दिनों अर्जेंटीना के कवि राबर्तो हुआरोज़ की कविताएँ पढ़ रहे हैं. आज प्रस्तुत हैं अर्जेंटीना के एक और कवि एंतोनियो पोर्चिया (१३ नवम्बर १८८५ -- ९ नवम्बर १९६८) की सूक्तियां. हालांकि उनका जन्म इटली में हुआ था किन्तु १९०० में अपने पिता की मृत्यु के बाद १९०६ में वे अर्जेंटीना चले गए थे. वहां उन्होंने बहुत सालों तक टोकरी बुनने वाले के रूप में काम किया और उसके बाद ब्यूनस आयर्स बंदरगाह पर एक क्लर्क के रूप में. कुछ पैसे जुट जाने के बाद उन्होंने अपने भाई निकोलस के साथ मिलकर एक छापाखाना खोल लिया जहां वे अगले १८ सालों तक काम करते रहे. भाईयों और बहनों के आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो जाने के बाद उन्होंने प्रेस का काम छोड़ दिया. इन्हीं दिनों वे कुछ कलाकारों के संपर्क में आए जिन्होनें पोर्चिया को इस बात के लिए राजी किया कि वे अपनी सूक्तियों और वाक्यांशों को खुद ही प्रकाशित करें. 'आवाजें' (Voices) नाम से यह किताब छप तो गई मगर बहुत दिनों तक उन किताबों के बण्डल यूं ही पड़े रहे और आखिरकार सारी किताबें सार्वजनिक पुस्तकालयों की एक सोसायटी को दान कर दी गईं. इसी किताब की कोई प्रति उन दिनों अर्जेंटीना आए हुए फ्रेंच कवि एवं आलोचक रोजर कैलोईस के हाथों में पड़ी और उन्होंने शर्मीले पोर्चिया को बुलाकर कहा कि "इन पंक्तियों से मैं अपने समूचे लेखन की अदला-बदली कर सकता हूँ." फ्रांस लौटने के बाद उन्होंने फ्रेंच भाषा में Voices का अनुवाद भी किया. उसके बाद तो वे इतने मशहूर हुए कि तमाम साहित्यकारों के लिए वे 'कल्ट आथर' बन गए. उनकी बाद की सारी किताबें भी Voces (Voices) नाम से ही प्रकाशित हुईं.   
प्रस्तुत हैं एंटोनियो पोर्चिया की कुछ सूक्तियां... 


आवाज़ें : एंतोनियो पोर्चिया 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 


समुन्दर था और मैं था. समुन्दर अकेला था और मैं भी अकेला था. 
हम दोनों में से एक गुम था. 
:: :: ::

टूटे बिना किसी चीज का अंत नहीं होता, 
क्योंकि सारी चीजें अनंत हैं. 
:: :: :: 

लगभग बिना किसी शब्द के तुम इस दुनिया में आए थे, 
जो शब्दों के बिना कुछ भी नहीं समझती. 
:: :: :: 

मजबूत वह नहीं है जिसने मुझे एक डोर से थाम रखा है, 
मजबूत वह डोर है. 
:: :: :: 

यदि तुम अपनी नजरें न उठाओ 
तो तुम्हें लगेगा कि तुम सबसे ऊंची जगह पर हो. 
:: :: :: 

तकलीफ ऊपर है, नीचे नहीं. और सबको लगता है कि तकलीफ नीचे है. 
और सब लोग ऊपर उठना चाहते हैं. 
:: :: :: 

मेरी खामोशी में सिर्फ मेरी आवाज़ की कमी है. 
:: :: :: 

पर्दा मत हटाओ. हो सकता है कि वहां कुछ नहीं हो. 
और कुछ नहीं पर फिर से पर्दा नहीं डाला जा सकता. 
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Manoj Patel 
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