'सुभाषित' श्रृंखला से ही एक और कविता...
एर्नेस्तो कार्देनाल की कविता
(अनुवाद : मनोज पटेल)
हर शाम अपनी माँ के साथ वह टहला करती लैंडस्ट्रासे भर में
और बाज़ार के मोड़ पर, हर शाम,
वहां हिटलर इंतज़ार करता होता, उसे गुजरते देखने के लिए.
टैक्सियाँ और बसें भरी होतीं चुम्बनों से
और भाड़े पर नाव ले रहे होते जोड़े डेन्यूब पर.
मगर उसे नहीं आता था नाचना. उससे बात करने की कभी हिम्मत नहीं हुई उसकी.
बाद में वह गुजरती अपनी माँ के बिना ही, किसी रंगरूट के साथ.
और उसके भी बाद वह कभी गुजरी ही नहीं उधर से.
यही वजह है कि गेस्टापो झेला हमने, आस्ट्रिया पर कब्जा,
और विश्व युद्ध.
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डेन्यूब : डेन्यूब नदी
