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Friday, May 3, 2013

येहूदा आमिखाई : किसी जगह

यहूदा आमिखाई की एक और कविता... 

किसी जगह  : येहूदा आमिखाई  
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

किसी जगह 
ख़त्म हो चुकी है बारिश, मगर 
मैं कभी नहीं खड़ा हुआ सीमा पर, 
जहाँ कि अभी सूखा ही हो एक पैर 
और दूसरा भीग जाए बारिश में. 

या किसी ऐसे देश में 
जहाँ लोगों ने बंद कर दिया हो झुकना 
अगर गिर जाए कोई चीज जमीन पर. 
                    :: :: ::

Monday, April 22, 2013

येहूदा आमिखाई : यही फ़ितरत होती है दिल की

यहूदा आमीखाई की एक और कविता... 

उन दिनों, इस समय  : येहूदा आमिखाई  
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

धीरे-धीरे अलग होते हैं वे दिन 
इस समय  से, जैसे कोई संतरी लौट रहा हो अपने घर, जैसे मातमपुर्सी करने वाले 
लौट रहे हों किसी क्रियाकर्म से दूरदराज के अपने घरों को. 

याद है? "मैं तुम्हें जाने नहीं दे सकता था." हमारे पीछे 
नष्ट हो चुके हैं वे घर जहाँ हम रहा करते थे. अब तो 
गूँज भी बाकी नहीं रही उनके गिरने की. सोचता हूँ 
कैसे हमेशा एकवचन में होता है यह समय 
और वे दिन  होते हैं बहुवचन में. और मैं अगुवा हूँ 
बहुत सारे दिनों की एक फ़ौज का. याद है? "यह 
आखिरी लड़ाई है." खूबसूरत था संगीत 
उन दिनों. इस समय. 

अब एक दीवार है मेरा दिल, 
जिस पर झूमती डालियों की परछाईयाँ 
ज्यादा हरकत करती लगती हैं असलियत के मुकाबले. 
यही फ़ितरत होती है परछाइयों की, 
यही फ़ितरत होती है दिल की. 
                 :: :: ::

Monday, September 3, 2012

येहूदा आमिखाई : इस छोटे से देश में

येहूदा आमिखाई की एक और कविता...   

 
इस छोटे से देश में कितनी उलझन : येहूदा आमिखाई 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

इस छोटे से देश में कितनी उलझन, 
कितना भ्रम! "पहले पति का दूसरा बेटा 
जाता है अपने तीसरे युद्ध पर, पहले ईश्वर का 
दूसरा मंदिर नष्ट हो जाता है हर साल." 
मेरा डाक्टर इलाज करता है मोची की आँतों का 
जो मरम्मत करता है उस आदमी के जूतों की 
जिसने मेरा बचाव किया था मेरे चौथे मुक़दमे में. 
पराए बाल मेरी कंघी में, मेरी रुमाल में पराया पसीना, 
चिपक जाती हैं मुझसे दूसरों की स्मृतियाँ 
जैसे गंध से चिपक जाते हैं कुत्ते, 
और उन्हें भगाना ही होगा मुझे 
डांटते हुए, एक छड़ी उठाकर. 

सभी प्रदूषित हैं एक-दूसरे से, 
एक-दूसरे को स्पर्श करते हैं सभी, 
छोड़ जाते हैं उँगलियों के निशान, 
और बहुत काबिल गुप्तचर होता होगा यमदूत 
उनमें फर्क करने के लिए. 

एक फ़ौजी को जानता था मैं, जो मर गया था एक युद्ध में, 
तीन या चार स्त्रियों ने मातम मनाया था उसका: 
वह मुझसे प्रेम करता था. मैं प्रेम करती थी उससे. 
वह मेरा था. मैं थी उसकी. 

बर्तन और मोर्टार दोनों ही बनाती है सोल्टाम कम्पनी 
और मैं नहीं बनाता कुछ भी. 
                    :: :: :: 

Wednesday, August 29, 2012

येहूदा आमिखाई : परिचारिका

येहूदा आमिखाई की एक कविता...   

 
परिचारिका : येहूदा आमिखाई 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

एक परिचारिका ने हमसे धूम्रपान की सभी चीजें बुझा देने के लिए कहा 
और तफसील से नहीं बताया सिगरेट, सिगार, या पाइप. 
मैंने मन ही मन उसे जवाब दिया: खूबसूरत प्यारी चीजें हैं तुम्हारे पास, 
और मैंने भी नहीं बताया तफसील से. 

और उसने मुझसे पेटी बाँध लेने के लिए कहा, कस लेने के लिए खुद को 
कुर्सी से, और मैंने उसे जवाब दिया: 
मैं चाहता हूँ कि मेरी ज़िंदगी की सारी पेटियां तुम्हारे मुंह के आकार की हो जाएं. 

और उसने कहा: आप काफी अभी लेंगे या कुछ देर बाद, 
या लेंगे ही नहीं. और आसमान जितनी ऊंची वह 
गुजर गई मेरे पास से.  

उसकी बांह के ऊपरी हिस्से के एक दाग ने गवाही दी 
कि चेचक कभी छुएगी भी नहीं उसे 
और उसकी आँखों ने गवाही दी कि दुबारा कभी प्रेम में नहीं पड़ेगी वह: 
कि अपनी ज़िंदगी में सिर्फ एक अच्छे प्रेम को पसंद करने वालों के 
रूढ़िवादी दल से ताल्लुक रखती है वह.  
                    :: :: :: 

Wednesday, May 16, 2012

येहूदा आमिखाई की कविता

येहूदा आमिखाई की 'जियान के गीत' श्रृंखला से एक कविता...   

 
येहूदा आमिखाई की कविता 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

एक ऎसी जगह है येरुशलम जहां हर किसी को याद है 
कि वह भूल गया है कुछ 
मगर यह नहीं याद कि क्या. 

और याद करने की खातिर 
मैं अपने चेहरे के ऊपर पहन लेता हूँ अपने पिता का चेहरा. 

यह वो शहर है जहां भर जाते हैं मेरे सपनों के पीपे  
किसी गोताखार के आक्सीजन टैंक की तरह. 

इसकी पवित्रता 
कभी-कभी बदल जाती है प्यार में. 

और सवाल जो पूछे जाते हैं इन पहाड़ों में 
वही हैं, जो पूछे जाते रहे हैं हमेशा से: "क्या तुमने 
मेरी भेड़ देखी?" "क्या तुमने 
मेरा गड़रिया देखा?" 

और मेरे घर का दरवाजा खुला रहता है 
किसी कब्र की तरह 
जहां पुनर्जीवित किया गया था कोई. 
                    :: :: :: 

Monday, March 26, 2012

येहूदा आमिखाई : बीहड़ यादें

येहूदा आमिखाई की एक और कविता...  

 
बीहड़ यादें : येहूदा आमिखाई 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

इन दिनों मुझे याद आती है तुम्हारे बालों को लहराती हवा, 
और याद आता है तुम्हारे आने के पहले 
इस दुनिया में बीता अपना समय,   
और वह अनंतता जिधर मैं चल पड़ा तुमसे पहले; 

और उन गोलियों को याद करता हूँ जिन्होनें मारा नहीं मुझे, 
मगर मार डाला मेरे दोस्तों को -- 
उन्हें, जो मुझसे बेहतर थे  
क्योंकि जिए जाना छोड़ दिया उन्होंने; 

और तुम्हें याद करता हूँ, गर्मियों में 
नग्न खड़ी चूल्हे के सामने 
या बेहतर पढ़ने के लिए झुकी हुई एक किताब पर 
ढलते हुए दिन की रोशनी में.  

हाँ, ज़िंदगी से कुछ ज्यादा ही था हमारे पास. 
बहुत जरूरी है हमारे लिए 
संतुलित करना हर चीज को भारी स्वप्नों से, 
और जड़ना बीहड़ यादों को 
उस चीज पर जो कभी आज था. 
                    :: :: ::

Tuesday, January 10, 2012

येहूदा आमिखाई : चाँद ही तो था मैं

येहूदा आमिखाई की एक और कविता...

 
चाँद ही तो था मैं : येहूदा आमिखाई 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

बहुत उदास है मेरा बच्चा. 
मैं उसे पढ़ाता हूँ : 
मुहब्बतों का भूगोल, 
और विदेशी भाषाएँ जो वह सुन नहीं पाता 
दूरी की वजह से. 

रात में, मेरा बच्चा 
मुझ तक हिलाता है अपना छोटा पलंग. मैं उसे पढ़ाता हूँ 
भूलने से भी ज्यादा, भूलने की भाषा. 
जब तक वह समझने लायक होगा मेरे कामों को, 
मैं मर चुका होऊंगा. 

क्या कर रहे हो तुम हमारे चैन से सोते बच्चे के साथ? 
तुम उसे ओढ़ा देती हो एक कम्बल, 
आसमान की तरह. बादलों की एक परत. 
काश कि चाँद हो पाया होता मैं. 

क्या कर रहे हो तुम अपनी उदास उँगलियों के साथ? 
तुम ढक देती हो उन्हें दस्ताने में 
और चली जाती हो.  
चाँद ही तो था मैं. 
                    :: :: :: 
Manoj Patel, Tamsa Marg, Akbarpur, Ambedkarnagar, Mobile : 09838599333 

Saturday, January 7, 2012

येहूदा आमिखाई : यह पवनचक्की कभी आटा नहीं पीसती

येहूदा आमिखाई की एक और कविता... 

 

येमिन मोश की पवनचक्की : येहूदा आमिखाई 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

यह पवनचक्की कभी आटा नहीं पीसती. 
यह पीसती है पवित्र हवा और लालसा से भरे 
बियालिक के पक्षियों को, यह शब्दों को पीसती है 
और समय को, यह बारिश को पीसती है 
और यहाँ तक कि सीपियों को भी 
मगर यह कभी आटा नहीं पीसती. 

अब इसने खोज निकाला है हमें, 
और पीसे जा रही है हमारी ज़िंदगी दिन ब दिन 
अमन का आटा बना रही है हमें पीसकर 
हमें पीसकर बना रही है अमन की रोटी 
आने वाली पीढ़ियों के लिए. 
                    :: :: :: 
येमिन मोश : येरुशलम का एक मोहल्ला 
बियालिक के पक्षी : यहूदी कवि बियालिक की पहली कविता 'टू द बर्ड' का सन्दर्भ 
Manoj Patel, Tamsa Marg, Akbarpur, Ambedkarnagar, (U.P.) Pincode : 224122, Mobile : 9838599333   

Friday, January 6, 2012

येहूदा आमिखाई : चप्पलें

येहूदा आमिखाई की एक और कविता...



 









चप्पलें : येहूदा आमिखाई 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

चप्पलें कंकाल होती हैं एक समूचे जूते की, 
कंकाल, और उसकी इकलौती वास्तविक आत्मा.  
चप्पलें लगाम हैं मेरे सरपट भागते क़दमों की 
और एक थके हुए पैर के 
 प्रार्थनारत टेफील्लिन  के फीते. 

चप्पलें निजी भूमि के टुकड़े हैं, जिन पर मैं चलता हूँ 
जहां भी मैं जाऊं, मेरी मातृभूमि की राजदूत, 
मेरा असली वतन, आसमान हैं वे झुण्ड बनाकर घूमते 
पृथ्वी के छोटे जीवों के लिए 
और उनके संहार का दिन, निश्चित है जिसका आना. 

चप्पलें जवानी होती हैं जूते की 
और बीहड़ में घूमने की एक स्मृति. 

मुझे नहीं पता कि कब वे खो देंगी मुझे 
या कब मैं खो बैठूंगा उन्हें, मगर  
गुम हो जाएंगी वे दोनों अलग-अलग जगहों पर : 
एक मेरे घर के करीब 
पत्थरों और झाड़ियों के बीच, और दूसरी 
डूब जाएगी समुन्दर के पास रेत के टीलों में 
डूबते हुए सूरज की तरह, 
डूबते हुए सूरज के सामने.   
                    :: :: :: 
Manoj Patel, Tamsa Marg, Akbarpur - Ambedkarnagar (U.P.), Pincode - 224122  

Wednesday, January 4, 2012

येहूदा आमिखाई : येरुशलम की आबो-हवा

आज पढ़ते हैं येहूदा आमिखाई की एक कविता... 

Yerushalayim 

येरुशलम की आबो-हवा : येहूदा आमिखाई 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

येरुशलम के ऊपर की हवा भरी रहती है प्रार्थनाओं और स्वप्नों से 
औद्योगिक शहरों की हवा की तरह 
मुश्किल होता है सांस लेना.

समय-समय पर पहुंचती रहती है इतिहास की नई खेप   
और मकान और मीनारें होते हैं उसकी गठरी बाँधने के सामान. 
बाद में उन्हें फेंक दिया जाता है कचरे के ढेर में.  

और कभी-कभी मोमबत्तियां आ जाती हैं लोगों की बजाय 
खामोशी छा जाती है उस समय. 
और कभी-कभी लोग आ जाते हैं मोमबत्तियों की बजाय, 
शोर मचने लगता है तब. 

और चमेली के पौधों से भरे बंद बगीचों में 
विदेशी दूतावास, 
अनचाही दुष्ट बहुओं की तरह, 
पड़े रहते हैं अपने समय के इंतज़ार में.  
                           :: :: :: 
Manoj Patel, Akbarpur - Ambedkarnagar, (U.P.) 

Saturday, October 1, 2011

येहूदा आमिखाई : मैं हमेशा हार जाता हूँ

येहूदा आमिखाई के 'जियान के गीतों' से कुछ कविताएँ...


















येहूदा आमिखाई की कविताएँ 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

युद्ध के बारे में कहने के लिए मेरे पास कुछ नहीं है, कुछ भी 
नया नहीं. मैं शर्मिन्दा हूँ.

मैं अब त्याग दे रहा हूँ अपनी ज़िंदगी में हासिल 
सारी जानकारी, जैसे कोई रेगिस्तान 
जिसने त्याग दिया हो पानी को.
मैं अब भूल रहा हूँ उन नामों को भी 
जिन्हें कभी नहीं सोचा था कि भूलूंगा.

और युद्ध की वजह से 
मैं दुहराता हूँ, आखिरी सौजन्यपूर्ण मिठास के लिए :
सूरज चक्कर लगाता है पृथ्वी का, हाँ.
पृथ्वी चपटी है किसी गुमशुदा बहते हुए तख्ते की तरह, हाँ.
वहां स्वर्ग में कोई भगवान है. हाँ. 
                    :: :: ::

मैनें खुद को बंद कर लिया है, अब मैं 
किसी नीरस भारी दलदल की तरह हो गया हूँ.
घर में चुपचाप सोते हुए बिता रहा हूँ युद्ध.

उन्होंने मुझे मृतकों का सेनापति बना दिया है 
जैतून के पहाड़ों पर.

मैं हमेशा हार जाता हूँ, यहाँ तक कि 
जीत में भी.
                    :: :: ::

ज़िंदा जल मरे इंसान ने हमसे 
क्या चाहा था ?
जो पानी ने हमसे करवाना चाहा होता :
शोर न मचाना, गंदगी न फैलाना,
खामोश खड़े रहना उसके बगल,
उसे बहते देने के लिए. 
                    :: :: :: 
Manoj Patel Translations, Manoj Patel Blog 

Tuesday, September 13, 2011

येहूदा आमिखाई : मैं कहाँ भागा जा रहा हूँ

येहूदा आमिखाई...

















मेरी नींद : येहूदा आमिखाई
(अनुवाद : मनोज पटेल)

मेरे दिल की धड़कन हमेशा फिर से ठोंकती है मुझे 
और जड़ देती है पलंग से,
और मैं लौट जाता हूँ नींद की चिर परिचित मुद्राओं में : 
मेरे घुटने ऊपर की ओर मुड़े हुए जैसा कि 
उन्होंने मुझे दफनाया था, या बाहें फैली हुईं जैसे किसी क्रास पर,
या यातायात संचालित कर रहे किसी पुलिस वाले की तरह
एक हाथ ऊपर उठाए और दूसरे हाथ से इशारा करते हुए.
या किसी पुराने यूनानी बर्तन पर बने 
एक धावक के रेखाचित्र की तरह. 
एक हाथ ऊपर की तरफ मुड़ा और शरीर झुका हुआ.
मैं कहाँ भागा जा रहा हूँ ? 
                    :: :: ::

येहूदा आमिखाई : मेरी स्मृतियों का ढेर लग गया है मेरे भीतर

येहूदा आमिखाई की कविता...















आखिरी शब्द कप्तान है : येहूदा आमिखाई
(अनुवाद : मनोज पटेल)

मेरा सर भी नहीं बढ़ा है 
जबसे मैनें बंद किया है बढ़ना  
और मेरी स्मृतियों का ढेर लग गया है मेरे भीतर,
मैं मानता हूँ कि वे अब मेरे पेट 
मेरी जाँघों और पैरों में जमा हो गई हैं. 
एक तरह का चलता-फिरता अभिलेखागार, एक सुव्यवस्थित दुर्व्यवस्था,
जैसे क्षमता से अधिक भरे जहाज पर लादने के लिए 
माल रखने की जगह. 

कभी-कभी मैं सो जाना चाहता हूँ किसी पार्क की बेंच पर :
जो कि बदल देगा मेरी स्थिति 
अपने भीतर की गुमशुदगी से
बाहर की गुमशुदगी में.
शब्द मुझे छोड़कर जाने लगे हैं
जैसे चूहे छोड़ देते हैं डूबते हुए जहाज को
और आखिरी शब्द कप्तान है. 
                    :: :: :: 

Thursday, September 8, 2011

येहूदा आमिखाई : एक बच्चे की स्मृति

येहूदा आमिखाई...












एक छोटा सा पार्क : येहूदा आमिखाई
(अनुवाद : मनोज पटेल)

युद्ध में मारे गए एक बच्चे की स्मृति में 
कायम किया गया एक छोटा सा पार्क 
बिल्कुल उस बच्चे की तरह लगने लगा है
जैसा कि वह दिखता था उन्तीस साल पहले. 
साल दर साल वे और ज्यादा एक जैसे दिखते गए हैं.
उसके बूढ़े माँ बाप तकरीबन रोज आते हैं 
एक बेंच पर बैठकर 
उसे देखने के लिए.

और हर रात बाग़ में स्मृति 
गनगनाती है किसी छोटी मोटर की तरह :
दिन के वक़्त आप इसे नहीं सुन सकते. 
                    :: :: :: 

Saturday, September 3, 2011

येहूदा आमिखाई : मेरी वसीयत ढंकी है ढेर सारे पैबन्दों से

येहूदा आमिखाई की एक और कविता पढ़ते हैं...



मुझसे पहले की सारी पीढ़ियाँ : येहूदा आमिखाई 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

मुझसे पहले की सारी पीढ़ियों ने
थोड़ा-थोड़ा दान दिया है मुझे 
ताकि यहाँ येरुशलम में 
मैं एकबारगी बना कर खड़ा कर दिया जाऊं,
किसी इबादतगाह 
या खैराती संस्था की तरह. 
यह बाँध लेता है. मेरा नाम 
मेरे दानदाताओं का नाम है.
यह बाँध लेता है.

मैं अपने पिता की मौत की उम्र 
में पहुँचने वाला हूँ. 
मेरी आखिरी वसीयत ढंकी है
ढेर सारे पैबन्दों से. 
मुझे हर दिन बदलनी है 
अपनी ज़िंदगी और मौत 
अपने बारे में की गई 
सारी भविष्यवाणियों को पूरा करने के लिए.
ताकि झूठी न साबित हों वे.
वे बाँध लेती हैं. 

चालीस की उम्र पार कर गया हूँ मैं.
बहुत से काम नहीं कर पाता अब 
इसी वजह से. 
यदि मैं आश्चविट्ज में होता  
तो वे काम पर बाहर भेजने की बजाय 
सीधे-सीधे गैस चैंबर में भेज देते मुझे.
यह बाँध लेता है. 
                    :: :: :: 
Yehuda Amichai in Hindi Translation, Manoj Patel

Friday, September 2, 2011

येहूदा आमिखाई : एक असीम शान्ति

येहूदा आमिखाई की कविता...  














एक असीम शान्ति : सवाल और जवाब : येहूदा आमिखाई 
(अनुवाद : मनोज पटेल)


बहुत तकलीफदेह रूप से रोशन एक प्रेक्षागृह में
लोग बातें कर रहे थे 
आजकल के इंसानों की ज़िंदगी में धर्म 
और उसमें ईश्वर के स्थान के बारे में.

लोग उत्तेजित स्वर में बोल रहे थे 
जैसा कि वे बोला करते हैं हवाईअड्डों पर.
मैं उन सबसे दूर चला आया :
"आपातकालीन द्वार" लिखा हुआ लोहे का दरवाजा खोला
और दाखिल हो गया 
एक असीम शान्ति : सवाल और जवाब के भीतर.
                    :: :: :: 
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