Showing posts with label सादी यूसुफ़. Show all posts
Showing posts with label सादी यूसुफ़. Show all posts

Saturday, April 23, 2011

सादी यूसुफ़ की कविताएँ


आज सादी यूसुफ़ की दो कविताएँ, विरासत और ठंडक 











विरासत 

एक बूँद,
एक बूँद और फिर दूसरी.
बूंदे धार बांधकर बह रही हैं इस खिड़की से नीचे 
विस्मयादिबोधक चिन्हों की तरह...
बस थोड़ी देर, और विदा हो जाएगा अप्रैल 
जैसे 
कोई खोजी 
उत्साह और खुशबू से भरा हुआ,
विस्मयादिबोधक चिन्हों को मिट्टी में छोड़कर,
छोड़कर मुझे वजूद में. 
                                              दमिश्क, 18 /04 /1983  
                    * * *

ठंडक 

इस कमरे में 
जहां आसमान 
नीचे उतर आता है, बरसात की चेतावनी देते हुए...
इस कमरे में 
जहां सफेदी 
छिड़काव करती है मुझ पर 
ढालदार छत की छीलन का,
मैं कब्र की ठंडक महसूस करता हूँ. 
हड्डी का एक जोड़ कराहता है.
और गहरे धंसती है भाले की नोक. 
                                               पेरिस, 22/11/1990 
                    * * *
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

Friday, April 8, 2011

सादी यूसुफ़ की दो कविताएँ


आज सादी यूसुफ़ की दो कविताएँ - अकेलापन और एक स्त्री 












अकेलापन 


एक सुबह मैनें देखा उन्हें, तेज क़दमों से 
साथ-साथ चलते हुए,
बादामों की खुशबू से भर गयी थी सड़क.
क्या वे बहनें हैं ?
मैनें गौर किया कि बिल्लियों की चाल चल रही थीं वे.
मुझे क्यों महसूस होता है कि बादाम की खुशबू मेरा पीछा कर रही है 
और जैसे मैं कुछ जानता हूँ उन दो बहनों के बारे में 
तेज क़दमों से चलती हुईं सुबह-सुबह ? 
हर सुबह 
जब दस बजाती है घड़ी, मुझे फ़िक्र होने लगती है.
क्या वे गुजरेंगी इधर से ?
वे आती हैं 
और मुझे जकड़ लेती है बादामों की खुशबू  
महसूस करता हूँ बिल्ली के पंजे की नर्म छुअन को.
और फिर वे गुम हो जाती हैं पेड़ों के बीच 
या ओझल हो जाती हैं मोड़ से 
या मेरी खिड़की के आखिरी कोण में.
कभी-कभी पलट कर देखती हैं वे 
और मुझे दिखता है एक धागा 
मेरे कमरे को जोड़ता हुआ 
दुनिया-जहान से. 
                                          15/01/1975
                         * * *

एक स्त्री 

अब कैसे अपने पैर खींचकर ले जाऊंगा उस तक ?
कहाँ देख पाऊंगा उसे ?
और किस शहर की की किस गली में 
मैं पूछूं उसके बारे में ?
और अगर पा भी गया उसका घर 
(मान लीजिए कि मैं पा जाता हूँ)
क्या मैं घंटी बजाऊंगा उसके दरवाज़े की ?
कैसे जवाब देना चाहिए मुझे ?
और कैसे मैं निहारूंगा उसके चेहरे को 
जब छू रहा होऊंगा उसकी उँगलियों के बीच से 
रिसती हुई हल्की शराब. 
मुझे कैसे कहना चाहिए हैलो...
और कैसे थामूंगा दर्द 
इतने सारे सालों का ?

एक बार 
बीस साल पहले 
एक वातानुकूलित ट्रेन में 
मैंने चूमा था उसे 
रात भर...
                                                08/09/1984 
                         * * *

(अनुवाद : मनोज पटेल)

Wednesday, March 23, 2011

सादी यूसुफ़ : रोजमर्रा के काम


सादी यूसुफ़ का परिचय और उनकी एक कविता आप इस ब्लॉग पर पढ़ चुके हैं. आज उनकी एक और कविता. कुछ दिनों पहले मैनें सादी यूसुफ़ की हमवतन कवि, दून्या मिखाइल की कविताएँ पोस्ट की थीं, जिसमें एक कविता में एक बच्चे के लिए युद्ध का मतलब वह बटन है जिससे बत्ती बुझाई जाती है.  सादी यूसुफ़ की इस कविता में भी युद्ध को, ऐसे ही सिहरा देने वाले ब्योरों के माध्यम से देखा गया है...
















रोजमर्रा के काम 
(1982 में  इजराइल द्वारा बेरुत की घेरेबंदी के दौरान लिखे गए एक सिलसिले से) 

हमला 
कमरा कांपता है 
दूर हो रहे विस्फोटों से.
परदा कांपता है. 
और फिर दिल भी कांपता है.
क्यों हो तुम इतनी सारी कंपकंपियों के बीच ? 

पानी  
भरत पक्षी पीता है, 
सितारा पीता है,
समुन्दर पीता है,
और चिड़िया 
और घर के पौधे
और साबरा के बच्चे पीते हैं 
एक बम विस्फोट का धुंआ. 

एक कमरा 
कुछ नहीं है इसमें, सिवाय 
एक किताबों की आलमारी,
एक चारपाई,
और एक पोस्टर के.
एक लड़ाकू विमान उड़ता है ऊपर,
हवा में उठा लेता है चारपाई 
और आखिरी किताब को 
और राकेट से फाड़ देता है 
पोस्टर का एक हिस्सा.

बिजली 
अचानक हमें याद आती हैं गाँव की रातें 
और बगीचे 
और आठ बजे ही जाना बिस्तर पर.
अचानक हम सीख जाते हैं सुबह का इस्तेमाल. 
हम सुनते हैं मुअज्ज़िन की अज़ान 
और मुर्गे की बांग 
और शांत गाँव. 

किधर 
किधर जाता है यह लड़का 
इस अजीब सी शाम को ? 
एक पानी की बोतल और एक ग्रेनेड 
टंके हुए उसकी चौड़ी बेल्ट पर 
और हथियार जो कभी अलग नहीं होता उससे ?
क्या वह समुन्दर की तरफ जा रहा है ?

आह, यह अजीब लड़का ! 

रेडियो 
कचरे के मैदान हों या महल 
रेडियो रहता है हमारे साथ हर जगह 
अगल-बगल आगे बढ़ाए जाते चाय के प्यालों,
और यहाँ-वहां होते विस्फोटों के बीच. 
थोड़ा गा सकते हैं हम.
और रख सकते हैं थोड़ी उम्मीद.
बचा रहता है हमारा रेडियो 
क़यामत के दिन के बिगुल की तरह.  

राशन 
इनसे हम क्या खरीदने जा रहे हैं ?
क्या एक ही कमीज रहना काफी नहीं है,
या एक ही पुरानी जींस, 
आधी पावरोटी और चीज होना, 
और चहारदीवारी के पीछे से तोड़े गए फूल होना ही काफी नहीं है ?
इनसे हम क्या खरीदने जा रहे हैं ? 
शायद एकता का एक पल. 

तोपखाना 
बिजली कड़कती है सुबह-सुबह 
और समुन्दर घेर लेता है शहर को धुंए की तरह. 
बिजली कड़कती है सुबह-सुबह 
और डर जाती है एक चिड़िया.
हवाईजहाज आ गए क्या ?

सूनी इमारत में 
खामोशी से गिरता है एक पौधा 
और बर्तन सिहरते हैं. 

                                                बेरुत, जून-अगस्त / 1982 

(अनुवाद : मनोज पटेल)     
Poems in Hindi Translation  

Monday, March 21, 2011

सादी यूसुफ़ : कविता


इस ब्लॉग पर आप महमूद दरवेश की कविताएँ पढ़ते रहे हैं. ईराक में जन्में सादी यूसुफ़ का जीवन भी उन्हीं की तरह निर्वासन में बीता है और वे भी निर्वासन संबंधी कविताओं के लिए प्रसिद्ध हैं. 1934 में बसरा में जन्म, किन्तु 1979 में सद्दाम हुसैन के सत्ता में आने के बाद से वे सीरिया, लेबनान, ट्यूनीशिया, यमन, साइप्रस, यूगोस्लाविया, फ्रांस और जार्डन से होते हुए फिलहाल लन्दन में रह रहे हैं. कविताओं की तीस और गद्य की सात किताबें प्रकाशित. बहुत सा अनुवाद कार्य भी. 











कविता : सादी यूसुफ़ 

किसने तोड़ दिया इन आईनों को 
और फेंक दिया उन्हें 
किरच दर किरच  
टहनियों के बीच ?
और अब...
क्या हमें अल अख्दर से कहना चाहिए कि वह आकर देखे इसे ?
रंग सारे छितरा गए हैं इधर-उधर 
अक्स अटक कर रह गया है उनमें 
और आँखों में हो रही है जलन.
अल अख्दर को बटोरना ही होगा इन आईनों को 
अपनी हथेली पर 
मिलाना होगा इन टुकड़ों को एक-दूसरे से 
जिस भी तरह वह चाहे 
और बचानी ही होगी 
टहनियों की स्मृति. 
                                           बतना, 26/03/1980 

(अनुवाद : मनोज पटेल)
 سعدي يوسف‎

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...