Showing posts with label लैंग्स्टन ह्यूज. Show all posts
Showing posts with label लैंग्स्टन ह्यूज. Show all posts

Friday, April 19, 2013

लैंग्स्टन ह्यूज : आत्महत्या की वजह

लैंग्स्टन ह्यूज की एक और कविता... 

आत्महत्या की वजह : लैंग्स्टन ह्यूज 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

नदी के 
शांत, शीतल मुख ने 
एक चुंबन मांग लिया था मुझसे. 
             :: :: :: 

Saturday, February 11, 2012

लैंग्स्टन ह्यूज : मरीजों का कमरा

लैंग्स्टन ह्यूज की एक कविता... 

 

मरीजों का कमरा : लैंग्स्टन ह्यूज 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

कितनी शान्ति है 
मरीजों के इस कमरे में 
जहां बिस्तर पर 
सोई है एक औरत 
ज़िंदगी और मौत नाम के दो प्रेमियों के बीच, 
और तीनों ने ओढ़ रखी है दर्द की एक चादर. 
               :: :: :: 
Manoj Patel, padhte-padhte. blogspot. com 

Wednesday, February 8, 2012

लैंग्स्टन ह्यूज : ईश्वर

लैंग्स्टन ह्यूज की एक कविता... 

 
ईश्वर : लैंग्स्टन ह्यूज 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मैं ईश्वर हूँ -- 
किसी से भी नहीं है मेरी मित्रता,  
इतनी बड़ी दुनिया में 
तनहा हूँ, ढोता अपनी पवित्रता. 

मेरे नीचे नौजवान प्रेमी 
चहलकदमी करते हैं मोहक धरती पर -- 
मगर कैसे उतरूँ नीचे 
मैं तो हूँ ईश्वर.

उठो!
जीवन प्रेम है!
प्रेम ही है जीवन! 
ईश्वर -- और तनहा होने की बजाए 
बेहतर है होना इंसान.
               :: :: :: 
Manoj Patel Blog 

Wednesday, February 1, 2012

लैंग्स्टन ह्यूज : नीग्रो

लैंग्स्टन ह्यूज की एक कविता... 










नीग्रो : लैंग्स्टन ह्यूज 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मैं नीग्रो हूँ : 
     रात जितना काला, 
     काला, अपने अफ्रीका की गहराइयों जैसा. 

गुलाम रहा हूँ मैं : 
     सीजर ने मुझसे अपनी चौखट साफ़ करवाई, 
     वाशिंगटन के जूते चमकाए मैनें. 

मजदूर रहा हूँ मैं : 
     मेरे ही हाथों ने खड़े किए पिरामिड, 
     गारा-मिट्टी किया मैनें वूलवर्थ बिल्डिंग के लिए.   

गवैया रहा हूँ मैं : 
     अपने दुख भरे गीतों को मैं ले आया 
     अफ्रीका से जार्जिया तक. 
     रैगटाइम बनाया मैनें ही.  

पीड़ित रहा हूँ मैं : 
     बेल्जियनों ने मेरे हाथ काटे कांगो में, 
     मिसीसिपी में वे बेगुनाह मारते हैं मुझे अभी भी. 

नीग्रो हूँ मैं : 
     रात जितना काला, 
     काला, अपने अफ्रीका की गहराइयों जैसा. 
                    :: :: :: 
Manoj Patel Blog, padhte-padhte.blogspot.com 

Sunday, January 15, 2012

लैंग्स्टन ह्यूज : दो टुकड़ों में काट दें यह दुनिया

लैंग्स्टन ह्यूज की एक और कविता...

 

थक चुका हूँ : लैंग्स्टन ह्यूज 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मैं तो थक चुका हूँ इंतज़ार करते-करते, 
क्या तुम नहीं थके इस इंतज़ार में 
कि एक दिन हो जाएगी यह दुनिया 
खूबसूरत, बेहतर और मेहरबान?
आओ एक चाकू उठाकर 
दो टुकड़ों में काट दें यह दुनिया -- 
और देखें कि कौन से कीड़े 
खाए जा रहे हैं इसे. 
               :: :: ::   
Manoj Patel, 09838599333 

Saturday, January 14, 2012

लैंग्स्टन ह्यूज की चार कविताएँ


लैंग्स्टन ह्यूज की चार कविताएँ... 

 











लैंग्स्टन ह्यूज की चार कविताएँ 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

अश्वेत मजदूर 

बहुत मेहनत करती हैं मधुमक्खियाँ. 
उनसे छीन लिया जाता है उनकी मेहनत का फल. 
हम भी हैं मधुमक्खियों की ही तरह -- 
मगर ऐसे ही नहीं चलेगा 
हमेशा. 
               :: :: :: 

जोड़ 

7x7+ प्रेम = 
ऎसी संख्या 
जो बहुत अधिक होगी 
7x7- प्रेम 
से.
            :: :: ::                

पार्क की बेंच 

मेरी ज़िंदगी बीत रही है पार्क बेंच पर. 
और तुम्हारी पार्क एवन्यू में.  
बहुत फर्क है 
हम दोनों के बीच. 

मैं एक-एक पाई भीख माँगता हूँ भोजन के लिए -- 
और तुम्हारे यहाँ हैं खानसामा और नौकरानी. 
मगर अब जाग रहा हूँ मैं! 
कहो, क्या डर नहीं लग रहा तुम्हें 

कि क्या पता, हो सकता है ऐसा 
दो-एक सालों में 
पहुँच जाऊं मैं 
पार्क एवेन्यू में. 
               :: :: ::   

अंतिम मोड़ 

जब आप मुड़ते हैं किसी मोड़ से 
और टकरा जाते हैं खुद से ही 
तो जान जाते हैं कि आप 
मुड़ चुके हैं बाक़ी सारे मोड़ों से. 
               :: :: :: 
Manoj Patel, Tamsa Marg, Akbarpur, Ambedkarnagar, Phone : 09838599333

Tuesday, January 10, 2012

लैंग्स्टन ह्यूज : फ्लोरिडा सड़क मजदूर

लैंग्स्टन ह्यूज की एक और कविता...

 
फ्लोरिडा सड़क मजदूर : लैंग्स्टन ह्यूज 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

अरे सुनो यार!
मेरी तरफ देखो!

एक सड़क बना रहा हूँ मैं 
कारों के सरपट दौड़ने के लिए, 
बना रहा हूँ एक सड़क 
झाड़-झंखाड़ के बीच से 
ज्ञान और सभ्यता के 
सफ़र के लिए. 

एक सड़क बना रहा हूँ मैं 
अपनी बड़ी-बड़ी कारों में 
अमीरों के फर्राटा भरने के लिए 
और मुझे यहीं खड़ा छोड़ जाने के वास्ते. 

यकीनन, 
सड़क तो मदद करती है सबकी. 
अमीर सवारी करते हैं अपनी मोटरों में -- 
और मैं देखने को पाता हूँ उन्हें सवारी करते. 
मैनें पहले कभी नहीं देखा किसी को 
इतने शानदार ढंग से सवारी करते. 

अरे यार, देखो तो!
एक सड़क बना रहा हूँ मैं! 
                    :: :: :: 
Manoj Patel, Blogger & Translator, Tamsa Marg, Akbarpur, Ambedkarnagar, 09838599333 

Monday, January 9, 2012

लैंग्स्टन ह्यूज : स्वर्ग

लैंग्स्टन ह्यूज की एक और कविता...

 

स्वर्ग : लैंग्स्टन ह्यूज 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

स्वर्ग 
वह जगह है जहां 
सर्वत्र 
बिखरी होती है खुशी. 

पशु और पक्षी 
गाते हैं 
और झूमती हैं 
सारी चीजें. 

किसी भी पत्थर से पूछो,
"कहो भाई, क्या हाल-चाल है?"
तो पत्थर जवाब देता है, 
"बढ़िया! अपनी सुनाओ?" 
               :: :: :: 
Manoj Patel, Tamsa Marg, Akbarpur, Ambedkarnagar, Phone 09838599333  

Sunday, January 8, 2012

लैंग्स्टन ह्यूज : भूखे बच्चे से ईश्वर

लैंग्स्टन ह्यूज की एक और कविता...

 
भूखे बच्चे से ईश्वर : लैंग्स्टन ह्यूज 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

भूखे बच्चे, 
मैनें यह दुनिया तुम्हारे लिए नहीं बनाई. 
तुमने मेरी रेलवे में पूंजी तो लगाई नहीं.
मेरे निगमों में पैसा नहीं लगाया.
कहाँ हैं स्टैण्डर्ड आयल के शेयर तुम्हारे? 
मैनें अमीरों के लिए बनाई है यह दुनिया 
और उनके लिए जो अमीर होने वाले हैं 
और उनके लिए जो हमेशा से रहे हैं अमीर.
तुम्हारे लिए नहीं, 
भूखे बच्चे. 
                    :: :: :: 
Manoj Patel, Tamsa Marg, Akbarpur, Ambedkarnagar, (U.P.), 09838599333  

Saturday, January 7, 2012

लैंग्स्टन ह्यूज : जोहान्सबर्ग की खदानें

लैंग्स्टन ह्यूज की एक कविता...

 
जोहान्सबर्ग की खदानें : लैंग्स्टन ह्यूज 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

जोहान्सबर्ग की खदानों में 
काम कर रहे हैं 
२४०००० अफ्रीकी मूल निवासी. 
किस तरह की कविता 
तुम बना सकते हो 
इस बात से? 
२४०००० मूल निवासी 
काम कर रहे हैं 
जोहान्सबर्ग की खदानों में. 
               :: :: :: 
मनोज पटेल, ब्लॉगर एवं अनुवादक, तमसा मार्ग, अकबरपुर, जिला - अम्बेडकरनगर (उ. प्र.), पिनकोड - २२४१२२, मोबाइल फोन - ९८३८५९९३३३     

Wednesday, December 15, 2010

लैंग्स्टन ह्यूज की कविताएँ

( 1902 में जन्मे  लैंग्स्टन ह्यूज अमेरिका के प्रसिद्द कवि, उपन्यासकार, स्तंभकार, नाटककार रहे हैं. इन्होनें आठवीं कक्षा से ही कविताएँ लिखना शुरू कर दिया था. 1967 में कैंसर से अपनी मृत्यु के पहले इनके सोलह कविता संग्रह, दो उपन्यास, तीन कहानी संग्रहों के अतिरिक्त भी कई किताबें प्रकाशित हो चुकी थीं. प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कविताएँ  - Padhte Padhte )   


सपने 
सपने देखो जमकर 
क्योंकि गर नहीं रहे सपने 
बिना पंखों वाली किसी चिड़िया सी 
रह जाएगी जिन्दगी 
जो नहीं भर सकती उड़ान.
सपने देखो जमकर 
क्योंकि गर नहीं रहे सपने 
बंजर धरती सी रह जाएगी ज़िंदगी
जमी हुई बर्फ में.

इकरार 
बहुत बुद्धिमान नहीं बनाया मुझे 
ईश्वर ने अपने असीम विवेक से 
इसलिए जब काम रहे मेरे मूर्खतापूर्ण 
आश्चर्य हुआ हो उसे शायद ही.

ऊब 
कितना उबाऊ है 
कंगाल रहना 
हमेशा.

मातमपुर्सी 
कह दो मेरी मातमपुर्सी करने वालों से 
लाल कपड़े पहनकर रोएँ मेरे लिए 
गो कि कोई मतलब नहीं है 
मेरे मुर्दा होने का.

आर्टिना के लिए 
मैं ले लूंगा दिल तुम्हारा 
निकाल लूंगा आत्मा तुम्हारे शरीर से 
जैसे कि भगवान होऊँ मैं.
संतुष्ट नहीं होऊंगा 
केवल तुम्हारे हाथों के स्पर्श से 
या तुम्हारे होंठों के माधुर्य भर से.
ले लूंगा दिल तुम्हारा अपने दिल के लिए.
ले लूंगा तुम्हारी आत्मा.
भगवान हो जाऊंगा तुम्हारी बात आई तो.

स्वप्न रक्षक   
स्वप्नद्रष्टा 
अपने सारे सपने ले आओ मेरे पास,
सारी धुनें अपने दिल की 
ले आओ मेरे पास,
ताकि लपेट सकूं मैं उन्हें 
नीले बादल के एक टुकड़े में 
इस दुनिया की 
कठोर उँगलियों से बहुत दूर.

सांप  
इतनी तेजी से निकल जाता है वह 
घास में वापस 
मुझे रास्ता देने की खातिर 
सड़क छोड़ने का शिष्टाचार निभाते हुए 
कि थोड़ा शर्मिन्दा होता हूँ 
उसे मारने के वास्ते
एक पत्थर तलाशते हुए.

सवाल 
2 और 2 होते हैं 4.
4 और 4 मिलकर होते हैं 8.

लेकिन क्या होगा अगर 
बाद वाले 4 को हो जाए थोड़ी देर ?

और क्या नतीजा निकलेगा जो 
एक 2 मैं होऊँ ?

या होते पहला 4 तुम 
विभाजित 2 से ?

(अनुवाद : Manoj Patel) 
Langston Hughes 

Friday, October 22, 2010

एक कविता और एक तस्वीर

( रंगभेद पर आधारित जिम क्रो क़ानून अमेरिका में 1876 से 1965 तक लागू रहे. इस क़ानून में सभी सार्वजनिक स्थलों पर अश्वेतों के लिए पृथक स्थान निर्धारित किए गए थे. आज इसी पर एक कविता और एक तस्वीर.) 

मेले में अश्वेत बच्चा : लंगस्टन ह्युज्स 

जिम क्रो खंड कहाँ है 
इस गोल हिंडोले पर 
मैं भी झूलना चाहता था साहब ? 
हमारे दक्षिण तरफ जहाँ का मैं हूँ 
अगल-बगल नहीं बैठ सकते 
श्वेत और अश्वेत. 
हमारी तरफ रेलगाड़ी में
जिम क्रो डिब्बा होता है अलग से. 
और बसों में तो हम सबसे पीछे बिठाए जाते हैं. 
लेकिन इस गोल हिंडोले का 
पिछवाड़ा कहाँ है भला ! 
कोई बताएगा घोड़ा कहाँ है 
अश्वेत बच्चे के लिए ? 



और एक तस्वीर : ठंडा मतलब.......


केवल श्वेत ग्राहकों के लिए.......
( उसी दौर के अमेरिका में कोकाकोला की एक वेंडिंग मशीन )  

(अनुवाद : मनोज पटेल) 
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...