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Saturday, January 21, 2012

निकानोर पार्रा : कलातथ्य - 2


१९६७ से पार्रा ने छोटी कविताएँ लिखना शुरू किया और बाद में इन्हें पोस्टकार्डों के संग्रह के रूप में 'आर्टीफैक्टोज' के नाम से प्रकाशित कराया. यह प्रकाशन एक तरह से उनके हालिया कामों की पूर्वसूचना था. इन्हें उनके एंटीपोयम की तार्किक परिणति कहा जाता है. ये "दृश्य कलातथ्य" एम टीवी पीढ़ी के लिए हाइकू जैसे हैं, विज्ञापनी कला से प्रभावित चित्रों और शब्दों को मिलाकर तैयार किए गए नारों जैसे. पार्रा का घर तमाम घरेलू साजोसामान के साथ लगे हुए हस्तलिखित साइनबोर्डों से तैयार ऎसी 'कलाकृतियों' से भरा हुआ है. ऎसी कलाकृतियों की एक झलक आप इस ब्लॉग पर पहले देख चुके हैं. आज कलातथ्य की एक और कड़ी प्रस्तुत है. आज प्रस्तुत ये सभी कलातथ्य उनके एक जैसे ही रेखाचित्र के साथ लिखे हुए थे जिसे नीचे दिया जा रहा है...  











कलातथ्य - 2 : निकानोर पार्रा 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 
                       
अभी-अभी देखा गया है 80 से ऊपर का एक आशिक 
पचास से ऊपर की सभी लड़कियों सावधान 
                       :: :: ::

               ईराक में युद्ध 
मुहं बाए खडा हूँ मैं 
लगता है कभी बंद नहीं कर पाऊंगा इसे अब 
                       :: :: ::

                       1973 
बहुत अच्छे !...... अब 
इन आजादी दिलाने वालों से कौन आज़ाद करेगा हमें ?
                       :: :: ::

                      चिली  2000 
यहाँ सरकार वो करती है जो वह कर सकती है 
सेना वो करती है जो वह चाहती है 
केवल चर्च ही वो करता है जो उसे करना चाहिए : कुछ नहीं 
                     :: :: ::

             बकवास है कविता-वविता 
कार्ला सैन्डोवल हमसे कहा करती थी :
निस्संदेह कुछ माननीय अपवाद भी हैं भई
                    :: :: :: 

              बस इतनी सी बात 
9 महीनों का समय ख़त्म हुआ 
और परिसर को खाली कर देने के अलावा कोई चारा न बचा 
                    :: :: ::

                  देववाणी 
आप जो भी करेंगे, पछताएंगे 
                    :: :: :: 

           बंद करो बकवास ! 
कोई हद होती है, 2000 सालों से चला आ रहा है झूठ !
                    :: :: :: 
Manoj Patel, Parte Parte, Parhte Parhte, Padte Padte, 9838599333 

Thursday, January 19, 2012

निकानोर पार्रा : सम्पूर्ण या उसका अंश

निकानोर पार्रा की एक कविता... 

 

निकानोर पार्रा की कविता 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

खेलों को मैनें त्यागा धर्म के लिए 
(हर इतवार को मैं प्रार्थना सभा में जाता था)
धर्म को छोड़ा कला के लिए 
और कला को गणितीय विज्ञान की खातिर 

जब तक कि आखिरकार ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो गई 

और अब मैं महज एक दर्शक हूँ, जिसकी  
सम्पूर्ण या उसके किसी अंश में श्रद्धा नहीं रही.  
                    :: :: :: 
Manoj Patel, Tamsa Marg, Akbarpur, Ambedkarnagar, Mobile : 09838599333 

Wednesday, December 14, 2011

निकानोर पार्रा : सत्य एक सामूहिक त्रुटि है

चिली के 'एंटी पोएट' निकानोर पार्रा हाल ही में स्पेन के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान 'सर्वेन्टीज पुरस्कार' से नवाजे गए हैं. आज प्रस्तुत है उनकी कविता 'कुर्सी पर सोने वाले कवि की चिट्ठियाँ' के कुछ अंश...



कुर्सी पर सोने वाले कवि की चिट्ठियाँ : निकानोर पार्रा 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

बड़ा मुश्किल है भरोसा करना उस ईश्वर में 
जो छोड़ देता है अपने बच्चों को 
उनके हाल पर 
बुढ़ापे 
और बीमारी के तूफानों की दया पर 
मौत की तो कोई बात ही नहीं.  
:: :: :: 

मैं उन लोगों में से एक हूँ जो स्वागत करते हैं शव वाहनों का. 
:: :: :: 

यह तो जाहिर है 
कि कोई नहीं रहता चाँद पर 

कि कुर्सियां मेज हैं 
कि तितलियाँ हमेशा फड़फड़ाते रहने वाले फूल हैं 
कि सत्य एक सामूहिक त्रुटि है. 

कि आत्मा मर जाती है शरीर के साथ.

जाहिर है यह तो 
कि झुर्रियां दाग नहीं हैं. 
:: :: :: 

आसान नहीं मेरे लिए उदास होना 
ईमानदारी से कहूं तो  
कपाल देखकर भी मुझे आती है हँसी. 
क्रास पर सोया हुआ कवि 
आपका स्वागत करता है खून के आंसुओं के साथ. 
:: :: :: 

कवि का काम है 
कोरे कागज़ को बेहतर करना 
मुझे नहीं लगता कि मुमकिन है यह. 
:: :: :: 
Manoj Patel 

Tuesday, June 7, 2011

निकानोर पार्रा : एक खतरनाक चक्कर में फंस गए हैं हम


निकानोर पार्रा की दो कविताएँ...


महंगाई 

रोटी की कीमत बढ़ती है, इसलिए रोटी की कीमत फिर बढ़ जाती है 
किराए बढ़ते हैं 
इस वजह से सारे किराए फ़ौरन दूने हो जाते हैं 
कपड़ों की कीमत बढ़ती है 
इसलिए कपड़ों की कीमत फिर बढ़ जाती है.
बचने का कोई रास्ता नहीं 
एक खतरनाक चक्कर में फंस गए हैं हम.
खाना है पिंजड़े में.
ज्यादा नहीं, मगर है. 
बाहर केवल आजादी का असीम विस्तार. 
                    * * *

रस्म 

जब कभी किसी लम्बे सफ़र के बाद 
मैं वापस जाता हूँ 
अपने देश 
सबसे पहला काम मैं यह करता हूँ 
पता करता हूँ उन लोगों के बारे में जिनकी मौत हो गई :
नायक हो जाते हैं सारे आदमी 
बस मर जाने का सीधा सा काम करके 
और नायक ही हमारे गुरू होते हैं. 

और दूसरा काम 
पता करता हूँ घायलों के बारे में.

इसके बाद ही 
जब यह छोटी सी रस्म 
पूरी हो जाती है 
मैं सांस लेता हूँ : 
अपनी आँखें बंद करता हूँ ज्यादा साफ़ देखने के लिए 
और कड़ुवाहट से एक गाना गाता हूँ 
सदी की शुरूआत के समय का. 
                    * * * 

(अनुवाद : मनोज पटेल) 

Saturday, May 28, 2011

जहां लिबर्टी एक स्टैचू है


निकानोर पार्रा की एंटीपोयम्स... 





 








अमेरिका 

जहां लिबर्टी 
एक स्टैचू है 
                    * * * 

मोना लिसा 

सभी मशहूर पेंटिंग्स की तरह 
यह पेंटिंग भी 100% बेहतर हो जाती है 
अगर हम इसे उल्टा लटका दें 

बस इसे 180 डिग्री घुमा दो 
मूंछ बनाने की कोई जरूरत नहीं 
                    * * *

जनसंख्या विस्फोट को रोकने का सूत्र 

ईसा मसीह के दिखाए रास्ते पर चलो 
जिनके कोई औलाद नहीं थी 

या सीधे-सीधे परमपिता परमेश्वर के आदर्श का पालन करो 
जिनके लिए एक ही औलाद काफी थी 
                    * * *

 (अनुवाद : मनोज पटेल) 

Wednesday, May 4, 2011

निकानोर पार्रा : भिखारी


निकानोर पार्रा की कविताओं के क्रम में आज उनकी कविता भिखारी 













भिखारी  :  निकानोर पार्रा 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

आप इस शहर में नहीं रह सकते 
गुजर-बसर के लिए किसी जाहिर आमदनी के बगैर :
ऐसा क़ानून है पुलिस का.

कुछ लोग सैनिक हैं 
जो अपने देश के लिए अपना खून बहाते हैं 
(ऐसा उद्धृत किया जाता है)
कुछ और लोग मक्कार कारोबारी हैं 
जो एक किलो आलूबुखारे में 
दो-तीन ग्राम काट लेते हैं.
और उसके बाद पुजारी हैं 
जो अपने हाथों में एक किताब लिए फिरते हैं.

इनमें से हर एक अपना धंधा जानता है.
और आपको क्या लगता है कि मैं क्या करता हूँ ?

गाते हुए 
           मैं ताकता रहता हूँ बंद खिड़कियों को 

यह देखने के लिए कि क्या कोई उन्हें खोलेगा 
और 
        मेरी तरफ 
                      फेंकेगा 
                                 कोई 
                                        सिक्का.  

Tuesday, May 3, 2011

निकानोर पार्रा की दो कविताएँ


निकानोर पार्रा की कविताओं के क्रम में आज उनकी दो कवितायेँ...












आत्मा को शान्ति मिले 

आत्मा को शान्ति मिले -- पक्का 
मगर इस सीलन का क्या करें ?
                           और यह जो काई लगी है ?
                                         और कब्र के पत्थर का बोझ ?
और नशे में धुत्त कब्र खोदने वाले ?
और लोग जो गुलदस्ते चुरा ले जाते हैं ?
और ताबूतों को कुतरते चूहे ?
और ये कमबख्त कीड़े 
चारो ओर रेंगते हुए 
मौत मुहाल किए हुए हैं वे हमारी 
या क्या तुम्हें सचमुच यही लगता है 
कि हमें नहीं पता क्या चल रहा है ...

बड़े आराम से कह दिया तुमने कि आत्मा को शान्ति मिले 
जबकि तुम्हें पता है कि यह कमबख्त नामुमकिन है 
बस बोल देते हो बिना सोचे-विचारे यूं ही 

और तुम्हारी सूचना के लिए 
हमें पता है कि क्या चल रहा है 
मकड़ियां दौड़ लगा रही हैं हमारे पैरों पर 
शक की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ते हम 

चलो फालतू की बकवास बंद करें 
जब तुम खड़े होओ एक खुली हुई कब्र के सामने 
तो यह वक़्त बिना लाग-लपेट के बात करने का होता है :
तुम अपने गम गलत कर सकते हो शराब में 
हम तो फंसे हुए हैं इस गड्ढे के तल पर.  
                    :: :: ::

कुछ प्रस्ताव 

मैं दुखी हूँ मेरे पास खाने के लिए कुछ नहीं है
कोई मेरी परवाह नहीं करता 
भिखमंगे नहीं होने चाहिए 
यही बात मैं सालों से कहता आ रहा हूँ 

मैं प्रस्ताव करता हूँ कि तितलियों की बजाए 
बागों में केकड़े घूमने चाहिए 
-- मुझे लगता है कि यह बहुत बेहतर रहेगा --
क्या तुम भिखमंगों के बिना एक दुनिया की कल्पना कर सकते हो ?

मैं प्रस्ताव करता हूँ कि हम सभी कैथोलिक हो जाएं 
या कम्युनिस्ट या जो भी आप चाहें 
यह केवल शब्दों का खेल है 
मैं प्रस्ताव करता हूँ कि हम पानी को शुद्ध करें 

अपनी भिखमंगों वाली छड़ी द्वारा दिए गए अधिकार से 
मैं प्रस्ताव करता हूँ कि पोप मूंछे रख लें 

भूख की वजह से मैं बेहोशी महसूस करने लगा हूँ 
मैं प्रस्ताव करता हूँ कि वे एक सैंडविच मुझे दे दें 
और एकरसता को ख़त्म करने के लिए मेरा प्रस्ताव है 
कि सूरज को पश्चिम में उगना चाहिए. 
                    :: :: ::

(अनुवाद : मनोज पटेल) 

Friday, April 29, 2011

निकानोर पार्रा : पोप की कविताएँ


अपने ख़ास अंदाज़ में एक बार फिर निकानोर पार्रा  : पोप की कविताएँ 












पोप की कविताएँ  :  निकानोर पार्रा 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

1
उन्होंने अभी-अभी मुझे पोप चुना है :
दुनिया का सबसे मशहूर आदमी हो गया हूँ मैं !

2 
अब मैं चर्च संबंधी पेशे की चोटी पर हूँ
और मर सकता हूँ सुकून से 

3 
कार्डिनल गुस्से में हैं 
उनके साथ मैं वैसा बरताव नहीं कर रहा जैसा कि किया करता था 
बहुत औपचारिक ?
मगर मैं पोप हूँ, भाड़ में जाओ...

4 
कल का पहला काम 
मैं रहने लगूंगा वेटिकन में 

5 
मेरे संबोधन का शीर्षक :
चर्च संबंधी पेशे में कैसे सफल हों 

6 
बधाईयों की बौछार हो रही है 
दुनिया के सारे अखबारों के 
पहले पेज पर मेरी तस्वीर है 

और एक बात तो पक्की है :
मैं अपनी असली उम्र से बहुत कम का लग रहा हूँ 

7 
मैं बच्चा था, तभी से  
पोप बनना चाहता था 
सबलोगों को इतना ताजुब्ब क्यों हो रहा है 
एक कुत्ते की तरह काम किया है मैनें 
वह हासिल करने के लिए जो मैं चाहता था 

8 
हे भगवान 
इस भीड़ को आशिर्वाद देना तो भूल ही गया मैं ! 

Monday, April 25, 2011

निकानोर पार्रा : पुलिस को गुमराह करने के लिए कुछ मजाक

आज बहुत दिनों बाद इस ब्लॉग पर निकानोर पार्रा की वापसी हो रही है. 










पुलिस को गुमराह करने के लिए कुछ मजाक : निकानोर पार्रा 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 


शानदार ! अब कौन 
आज़ाद कराएगा हमें आज़ाद कराने वालों से !
हमारे बचने का कोई रास्ता नहीं रहा अब 
* * *

चिली प्रथमतः व्याकरणशास्त्रियों और 
इतिहासकारों का देश था 
देश था यह कवियों का 
अब यह देश है... डाट डाट डाट का 
* * *

पढ़ने वाले लोगों का मैं 100% विशवास करता हूँ 
मुझे भरोसा है कि ...
नागरिक 
असली आशय समझ सकते हैं 
* * *

यातना का रक्तरंजित होना 
जरूरी नहीं 
मसलन 
एक बुद्धिजीवी 
बस उसका चश्मा छुपाना ही काफी है 
* * *

चिड़िया, 
मुर्गियां नहीं होतीं फादर 
घूमने-फिरने की पूरी आजादी 
दड़बे की सीमाओं के भीतर 
* * *

कल 
खाली बर्तनों की कदमताल 
और आज 
भरे हुए मलपात्रों की परेड 
* * *

मैं बहुत निराश हूँ 
मुझे लगता था कि पार्रा हमारी तरफ है.
-- आपको ऐसा क्यों लगता था महामहिम ?
तख्तापलट में ही पता चलता है 
कि कौन किस तरफ है.
* * *

Wednesday, February 2, 2011

निकानोर पार्रा की लम्बी कविता


( निकानोर पार्रा का परिचय और उनकी कई कविताएँ आप इस ब्लॉग पर पहले ही पढ़ चुके हैं, आज उनकी एक लम्बी कविता "एक ताबूत की स्मृतियाँ".  - Padhte Padhte)

एक ताबूत की स्मृतियाँ 
एक शानदार बढ़ई की दूकान में जन्म हुआ था मेरा 
लेकिन दिलचस्प हिस्सा तो आता है बाद में 
यूं ही भटकता रहता था इधर-उधर बच्चा था जब 
मजाक उड़ाया करता था अस्थि-कलशों का 
बड़े धीर-गंभीर लगा करते वे मुझे 
शोरूम में कुछ महीने बिताने के बाद 
एक ऎसी ज़िंदगी जिसे मैं मजेदार ही कहूंगा 
क्यूंकि कोई चीज नहीं भंग करती थी शान्ति वहां की 
बहुत मजे किए मैंने वहां 
दूसरे ताबूतों की कीमत पर आप समझ ही सकते हैं 
- बस वार्निश की खराब गंध ही थी इकलौती खोट वहां - 
तो कुछ महीनों के बाद फिर से बताऊँ आपको 
मुझे खरीदा गया मातमी लिबास पहने एक स्त्री द्वारा 
और किसी पहियों वाली चीज पर लाकर पटक दिया गया 
गैस इंजन से चालित 
जो गुजरी शहर से होकर तेज रफ़्तार में 
एक अनुभव जो कभी नहीं भूलूंगा मैं 
क्यूंकि अचानक 
180 डिग्री की करवट ली मेरी ज़िंदगी ने 
पूर्ण जड़ अवस्था से 
शाश्वत गति की स्थिति में आ पहुंचा मैं 
जब तक की हम एक निजी मकान तक न आ पहुंचे 
जहां मुझे खाने के कमरे में एक मेज पर रख दिया गया 


घंटों बिताए होंगे मैंने वहां 
खाने के कमरे की उस मेज पर 
कितने घंटे पता नहीं क्यूंकि फ़ौरन ही सो गया मैं गहरी नींद 
थक गया था घुमावदार रास्तों में 
और अँधेरे से - इन सारे अनुभवों से - 
एक ऎसी दुनिया जो अब तक अनजान ही थी मेरे लिए 
एक घड़ी देखी मैंने लटकती हुई दीवार के बीचोबीच 
और मेज और कुर्सियां तमाम बिखरे हुए इधर-उधर 
हालांकि अपने दिल में कहीं गहरे अच्छा लग रहा था मुझे 
इतना कि ख़्वाबों में भी नहीं सोचा था होगा कभी मुमकिन 
जब जगा मैं तो बदल चुका था पूरा दृश्य 
मसलन ढंका हुआ था फूलों से मैं 
और देख सकता था कुछ भीमकाय शमादान अपने पैरों की तरफ 
चकाचौंध कर देने वाली रोशनी फेंकते 
आह, और काले परदे भी 
ढेर सारे रुपहले सितारों से सुसज्जित 
अंदाजा भी नहीं लगा सकते आप मेरी खुशी का 
जब महसूस किया मैनें कि मैं ही था 
इस शानदार दुनिया की निगाहों का केंद्र 
लोग आते और देखते मुझे एक छोटी खिड़की से 
वे गले लगाते मुझे बड़े परेशान से 
गतिविधियाँ जितना समझ सकता था मैं भरसक 
ऊबने लगा था उस सारे दृश्य से मैं 
जो वहां संपन्न होता लग रहा था बहुत धीमी गति से 
एक खुश आत्मा द्वारा जबकि कष्ट सह रहे हों बदकिस्मत लोग 
तभी अचानक हालात पलट गए पूरी तौर पर 
बाहर निकाला उन्होंने मुझे उस नामुराद कमरे से 
और रखा मुझे घोड़े से जुती एक बग्घी में 
अदब की पराकाष्ठा ही कहेंगे इसे 
वही काले लिबास वाली स्त्री 
लिपट गई मुझसे जी-जान से 
काफी मुश्किल करती हुई रिश्तेदारों का काम 
वह सबसे शानदार दिन था मेरी ज़िंदगी का 
क्यूंकि जब शहर से गुजर रहे थे हम 
एक ऎसी मंजिल को जो अनजान थी मेरे लिए 
रास्ते में मिलने वाले सभी पदयात्री 
सम्मान प्रकट करते अपना हैट उतारकर 
ऎसी इज्जत नहीं समझता खुद को जिसके काबिल 
आखिर आ पहुंचे हम एक छोटे शहर में 
दीवारों से घिरे जैसा की होता था पुराने जमाने में 
एक तमाशा शुरू हुआ वहां 
जिसने आँसू ला दिए मेरी आँखों में 
और अमिट किरदारों से उकेर लिया खुद को मेरी याददाश्त में 
मेरा इशारा उन अद्भुत भाषणों की तरफ है 
जो असंख्य लोगों ने दिए मेरे सम्मान में 
और बार-बार दुहराए गए प्रेम के प्रदर्शन की तरफ 
जो सुना किया मैनें अपने चारो ओर
जब तक नीचे नहीं उतार दिया उन्होंने मुझे भरसक सतर्कता बरतते हुए 
इस कमरे में जहां इस समय मौजूद हूँ मैं 
टन भर फूलों के नीचे 
इंतज़ार करता हुआ नई चीजें घटित होने का. 

(अनुवाद : Manoj Patel) 
Nicanor Parra, Memories of a Coffin 

Saturday, January 8, 2011

निकानोर पार्रा की कविता

क्या हासिल होता है कसरत से एक बूढ़े को 
उसे क्या हासिल होगा फोन पर बात करके 
नाम के पीछे भागने से क्या मिलेगा उसे, बताओ मुझे 
क्या मिल जाता है एक बूढ़े को आईना देखकर 

कुछ नहीं 
बस हर बार वह कुछ और धंस जाता है कीचड़ में 

बज चुके हैं सुबह के चार या पांच 
वह कोशिश क्यों नहीं करता जाकर सो जाने की 
लेकिन नहीं - बंद नहीं करेगा वह कसरत करना 
नहीं बंद करेगा अपनी लम्बी दूरी की टेलीफोन की बतकही 
उसकी बातें नहीं ख़त्म होंगी बाख, बीथोवन और चायकोवस्की की 
नहीं बंद होगा एकटक देखना आईने में 
सांस लेते चले जाने की सनक नहीं ख़त्म होगी उसकी 

बेचारा - बेहतर होता कि वह बुझा देता बत्ती 

उसकी माँ कहती है उसे बुद्धू बुड्ढा 
एक ही जैसे हो तुम बाप-बेटे 
मरना नहीं चाहता वह भी 
ईश्वर तुम्हें कार चलाने की ताकत बख्शे 
ईश्वर तुम्हें फोन पर बात करने की ताकत बख्शे 
ईश्वर तुम्हें सांस लेने की ताकत बख्शे 
ईश्वर तुम्हें अपनी माँ को दफनाने की ताकत बख्शे 

सो गए तुम, बुद्धू बूढ़े !
लेकिन अभागे बुड्ढे का सोने का कोई इरादा नहीं 
रोने को सोना समझने की गलती न किया जाए.

(अनुवाद : Manoj Patel)
Nicanor Parra 

Monday, December 20, 2010

निकानोर पार्रा की कविताएँ

( निकानोर पार्रा की गिनती लैटिन अमेरिका के बड़े कवियों में होती है. 1914 में जन्मे पार्रा के पिता एक शिक्षक, संगीतकार और पार्रा के शब्दों में 'बोहेमियन' थे. घर-परिवार की सारी देखभाल उनकी माँ कार्ला सैन्डोवल के ही जिम्मे थी. पार्रा के पाठकों के लिए यह नाम इसलिए भी जरूरी है क्योंकि उनकी कविताओं में कई बार इस नाम का हवाला मिलता है. उनकी माँ एक बहुत कम पढी-लिखी महिला थीं लेकिन पार्रा की समस्त जानकारी का स्रोत वही थीं. पार्रा अपनी कविताओं को एंटी पोयम्स और अपने अनुवादों को एंटी ट्रांसलेशन नाम देते हैं. उनके अनुसार अनुवाद एक नामुमकिन बात है. उनकी एंटी पोयम्स को समझने का  'दूसरा' सबसे अच्छा तरीका यही है कि अनुवाद के इस नामुमकिनपन को स्वीकार कर लिया जाए. और सबसे अच्छा तरीका बकौल पार्रा स्पेनिश सीख लिया जाए. 
पार्रा कहते हैं कि, " Real seriousness rests in the comic." इस बात की रोशनी में पेश हैं उनकी गंभीर कवितायेँ   - Padhte Padhte )

किसी राष्ट्रपति की प्रतिमा बच नहीं पाती 
उन अचूक कबूतरों से 
कार्ला सैन्डोवल हमसे बताया करती थी :

ठीक-ठीक जानते हैं कबूतर क्या कर रहे हैं वे 
                    * *

नोबल पुरस्कार 
पढ़ने के लिए नोबल पुरस्कार 
दिया जाना चाहिए मुझे 
आदर्श पाठक हूँ मैं,
चाट जाता हूँ जो कुछ भी हाथ लगता है मेरे :

सड़कों के नाम पढ़ता हूँ मैं 
और रोशन साइनबोर्ड 
गुसलखाने की दीवारें 
और नई मूल्य-सूचियाँ पढ़ता हूँ 

पुलिस की ख़बरें,
और घुड़दौड़ के अनुमान 

और गाड़ियों के नंबर प्लेट 

मेरे जैसे इंसान के लिए 
शब्द ही हैं सबसे पवित्र 

जूरी के मेम्बरान 
झूठ बोलने से क्या मिलना है मुझे 
बतौर एक पाठक बहुत सख्त हूँ मैं 

चाट जाता हूँ सबकुछ - नहीं छोड़ता 
वर्गीकृत विज्ञापनों को भी 

ठीक है बहुत नहीं पढ़ता आजकल 
सीधी सी बात है कि वक़्त नहीं रहता मेरे पास 
लेकिन - ओह - यह क्या पढ़ डाला मैनें 

इसीलिए तो कह रहा हूँ आपसे 
दे ही दीजिए 
 मुझे
 पढ़ने का नोबल पुरस्कार 
जल्दी से जल्दी 
                    * *

कितना सही था उल्लू जब उसने कहा 
न तो मुहम्मद और न ही बुश :

हैमलेट ! 
सुव्यवस्थित संदेह का सूरमा : 

मैं संदेह करता हूँ इसलिए मैं हूँ 
                    * *

एक गुंजायमान शून्य 
कुछ नहीं तक सिमट आया यह पूरा का पूरा 
और इस कुछ नहीं में बहुत कम बाक़ी है 
                    * *

हँ ज्जी !
बीसवीं सदी के महानतम सच 
किताबों में नहीं मिलेंगे 

आप उन्हें पढ़ सकते हैं 
सार्वजनिक शौचालय की दीवारों पर 

बहुमत की इच्छा                                      प्रभु की इच्छा 

हाँ बिल्कुल, एक किताब में पढ़ा मैनें इसे 
                    * *

अपने हित का पक्षसमर्थक 
पहुंचता है महानगरीय कब्रिस्तान में  
"X" नाम की कब्र पर 
गुलनार के लाल फूलों का 
छोटा गुलदस्ता लिए हुए 
बड़ी गंभीरता से छूता है अपना हैट 
और किसी गुलदस्ते के अभाव में 
अपने फूल समर्पित करता है एक साधारण से कैन में 
जिसे निकाला है उसने बगल की कब्र से 
                    * *

(अनुवाद : Manoj Patel) 
Nicanor Parra 

निकानोर पार्रा की कविताएँ

ताकीद 
अगर यह चुप्पी को पुरस्कृत करने का मामला है 
जैसा कि यहाँ मुझे लग रहा है 
तो किसी और ने नहीं बनाया है खुद को इतना काबिल 
सबसे कम फलदायी रहा हूँ मैं 
सालों साल छपाया नहीं कुछ भी 

आदी मानता हूँ खुद को 
कोरे कागजों का 
उसी जान रुल्फो की तरह 
जिसने लिखा नहीं उससे ज्यादा एक भी लफ्ज़ 
जितना कि था बहुत जरूरी.
                   * *

शांतिपूर्ण रास्ते पर आस्था नहीं मेरी 
हिंसक रास्ते पर आस्था नहीं है मेरी 
होना चाहता हूँ किसी चीज पर आस्थावान 
लेकिन नहीं होता 
आस्थावान होने का मतलब है आस्था ईश्वर में 
ज्यादा से ज्यादा 
झटक सकता हूँ अपने कंधे 
माफ़ करें मुझे इतना रूखा होने की खातिर 
मुझे तो भरोसा नहीं आकाशगंगा में भी. 
                        * *

पखाने पर मक्खियाँ 
इन कृपालु सज्जन से - पर्यटक से - क्रांतिकारी से 
करना चाहता हूँ एक सवाल : 
क्या देखी है कभी आपने मक्खियों की एक सेना 
पखाने के ढेर पर चक्कर लगाती 
उतरती फिर काम को जाती पखाने पर ? 
क्या देखी हैं आपने पखाने पर मक्खियाँ आज तक कभी ? 

क्योंकि मैं पैदा और बड़ा हुआ 
पखाने से घिरे घर में मक्खियों के साथ. 
                       * *

ईश्वर से प्रार्थना 
परमपिता जो विराजते हैं स्वर्ग में 
हैं तरह-तरह की मुश्किलों में 
त्योरी से तो लगता है उनकी 
कि हैं वो भी एक आम इंसान.
ज्यादा फ़िक्र न करें आप हमारी प्रभु.

हमें पता है कि हैं आप कष्ट में 
क्योंकि घर अपना व्यवस्थित नहीं कर पा रहे आप.

पता है हमें कि शैतान नहीं रहने देता आपको चैन से 
बरबाद कर देता है आपकी हर रचना को.

वो हंसता है आप पर 
मगर रोते हैं हम आपके साथ.

परमपिता आप जहां हैं वहां हैं
गद्दार फरिश्तों से घिरे.
सचमुच 
हमारे लिए कष्ट मत उठाइए ज्यादा.
आखिर समझना चाहिए आपको 
कि अचूक नहीं होते ईश्वर 
और हम माफ़ कर देते हैं सबकुछ. 
                       * *
(भाषासेतु पर पूर्वप्रकाशित) 
(अनुवाद : Manoj Patel)
Nicanor Parra 
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