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Wednesday, July 4, 2012

मनीषा कुलश्रेष्ठ की तीन कविताएँ


सुपरिचित कवि, कथाकार मनीषा कुलश्रेष्ठ की कविताएँ आप इस ठिकाने पर पहले भी पढ़ चुके हैं. आज प्रस्तुत हैं उनकी तीन कविताएँ...    














ममीफिकेशन 

यह मेरा अंतस है 
पिरामिड नहीं नेफरटिटी का 
हर प्रेम को 
दोस्ती के अमरत्व का लेप दे 
'कभी कुछ काम आ सकूँ तो.. बताना' 
की लम्बवत पट्टियों में 
लपेट कर रख दूँ 
एक कतार से 
:: :: :: 

पतंग / सम्बन्ध 

यूँ भी जिन ऊँचाइयों पर 
पहुँचाया था इसे हमने 
उड़ाया था हवा के प्रवाह के विरुद्ध 
ढील और तनाव दे-दे कर 
उस ऊँचाई पर 
तो 
कट ही सकता था 
यह पतंग / सम्बन्ध 
दोस्ती की छत पर 
इसे उतारा जा सकता, नहीं था 
:: :: :: 

फ्रेम 

मर गई अगर तितली 
फूल पर बैठे-बैठे 
अपनी जीवंतता की अदा में 

मत पकड़ो उसे पंख से 
पंख रंग छोड़ देंगे 
तुम्हारी उँगलियों के पोर पर 
इसे गिर कर 
मिट्टी में मिल जाने दो 

मत करो फ्रेम 
उसका ये प्रेम 
दोस्ती के फ्रेम में 
:: :: :: 

Tuesday, August 2, 2011

मनीषा कुलश्रेष्ठ की कविताएँ


कवि, कथाकार एवं अनुवादक मनीषा कुलश्रेष्ठ के अनुवाद आप इस ब्लॉग पर पढ़ चुके हैं. हाल ही में वे यूरोप प्रवास से लौटी हैं. पेश हैं उनकी ताजा कविताएँ... 

















प्रवास - 1 ( यूरो – रेल )

ट्रेन में हूँ, 
एक तारा साथ चल रहा है, 
ये तुम हो क्या? 
रात की ट्रेन है 
म्युनिख से वेनिस. 
अजब उदासी है, 
लिपटी हुई त्वचा से
उतरती नहीं. 
मन है कि पका हुआ है, 
देह है कि उमड़ती चली जाती है
ये व्यातिक्रम नया है. 
वरना होता तो यह है कि 
मन दुखने से बहुत पहले
देह विरक्त होती है, 

एक स्टेशन पर गाड़ी रुकी है, 
कोई छोटा पुराना - सा स्टेशन..
दो बजे हैं, 
कोई कर्मचारी सीटी बजा रहा है, 
रूमान से भरी...उदास सीटी... 
ऊपर पाईन के पेड़ हिल रहे हैं. 
वो सीटी मुझे तुम्हारी पुकार क्यों लगी? 
घर पर / सबकी उपस्थिति में
हमारे साझे शब्द कोष में
तुम्हारा यूँ मुझे पुकारने का अर्थ है
मेरी पथराती देह में 
हिरणों का दौड़ना
                    
:: :: 

प्रवास - 2 वेनिस

आज सुबह से सब गलत हुआ
देर से नींद खुली
ब्रेकफास्ट छूट गया
उतरते हुए सीढ़ी से
पैर फिसल गया
गर्म कॉफी से मुँह जल गया
वापस रखने की जल्दी में 
प्याला हाथ से छूट गया 
कुछ वेनिस की गलियों – कैनालों का गुँजल
कुछ भाषा का अज्ञान, कुछ हड़बड़ी.
जाना था मोरानो द्वीप
गलत बोट में चढ़,
पहुँच गई
कारखानों और मजदूरों से भरे
किसी अनजान द्वीप,
भटकाव की थकान
अकेले होने की कसक 
लौटने से पहले कहीं थमना चाहती थी
कि
एक छोटी सी, उपेक्षित चर्च दिखी,
उसके रोशनदानों से
बुलाता - सा संगीत गूँजा,
भीतर झाँका, कोई नहीं था
ऊपर की बॉलकनी में जरूर कोई था
जो बजा रहा था
तल्लीनता से पियानो पर 
कोई आध्यात्मिक उदास / विरक्त संगीत
भीतर बस ठण्डी बैंच थी,
सामने थे यीशू 
सर झुकाए...विवश...सूली पर.
मैं ने सर टिका दिया
ठण्डी बेंच पर 
तब तक रोती रही,
जब तक बजती धुन रुक न गई
एक मिनट को मौन न हो गया.
बाहर निकली तो मन हल्का था
अब मुझे अपना रास्ता पता था.
                    
:: :: 

प्रवास - 3 (फ्लोरेंस) 

तुम हैरान होगे जान कर. 
मैं दिन भर घूमी हूँ और 
रात को जागी हूँ लगातार. 
तकियों से, आईनों से बातें की हैं. 
धूप में घूम कर ताम्बई हो गई हूँ, 
रात में जाग कर आँखे 
काले घेरों में धँस गई हैं, 
मिलोगे तो पहचानोगे तक नहीं. 

मैं बहुत भावुक हिन्दी गाने सुन रही हूँ 
नीचे गली में जो किशोर जोड़ा 
एक दूसरे को घण्टों से चूम रहा था
लौट गया है सायकिल पर
उनके लौट जाने से गली सुनसान हो गई है. 

पिछले पूरे पाँच दिन दरअसल बहुत सोचा 
पिछले पूरे पाँच दिन विश्लेषण किया 
प्रेम को लेकर......
क्या मैं जादूगरनी बन जाती हूँ? 
मोह में बाँधना चाहती हूँ 
और
तुम भागते हो....
जादू टूटने की हद के पार. 
अब मैं तुम्हें मुक्त कर दूँगी. 
बशर्ते कि 
तुम भी आकर थम जाओ मुझ पर. 
डर मुझे तुम्हें खोने का नहीं है. 
खुद के पलट आने का है. 
आतुर नदी जैसे कभी लौट आए स्रोत की तरफ. 

ओ मेरे संशय,
मेरे भय तुमसे नहीं हैं 
मेरे भय स्वयं मुझसे हैं
जैसे प्रकृति को ही भय हो
किसी दिन धुरी पर घूमती धरा
करती हुई परिक्रमा सूर्य की
उकता कर ठिठक जाए
निकल जाए दूर 
फिसल अपनी कक्षा से 
तुम फिर हँसोगे,
कहोगे - पगलैट ! 
करूँ क्या, पैदा ही 
भगोड़े, पलायनवादी सितारों में हुई हूँ.
                    :: ::

Friday, April 15, 2011

होर्हे लुईस बोर्हेस की कहानी


पढ़ते-पढ़ते पर आज अर्जेंटीनी कवि-कथाकार-निबंधकार होर्हे लुईस बोर्हेस (Jorge Luis Borjes, 1899-1986) की कहानी बुक आफ सैंड का मनीषा कुलश्रेष्ठ द्वारा किया गया अनुवाद - रेत की किताब 















रेत की किताब : होर्हे लुईस बोर्हेस 
(अनुवाद : मनीषा कुलश्रेष्ठ) 

रेखा का निर्माण अनन्त बिन्दुओं से होता है; अनंत रेखाओं से एक तल; अनंत तलों से मिलकर एक आयतन बनता है, अनंत आयतनों से एक परा - आयतन बनता है.  ना, बिला शक यह कोई रेखागणितीय मामला नहीं है - यह मेरी कहानी आरंभ करने का एक बेहतरीन तरीका है. यह दावा करना कि यह हकीकत है, किसी भी बनायी गयी कहानी को आरंभ करने की परंपरा सी बन गई है. लेकिन मेरी, फिर भी सच्ची है.

मैं ब्यूनस आयरस में बेलग्रानो स्ट्रीट में चौथी मंजिल पर स्थित अपार्टमेन्ट में अकेला रहता हूँ. कुछ महीने पहले, एक दिन देर शाम को मैंने अपने दरवाजे पर एक थपथपाहट सुनी. मैं ने दरवाजा खोला तो एक अजनबी वहां खडा था. वह एक लम्बा व्यक्ति था, जिसके नाक नक्शे का कोई खास वर्णन नहीं किया जा सकता - या हो सकता है कि वह मेरा निकट दृष्टि दोष रहा हो जिससे मुझे ऐसा लगा. उसने सलेटी कपडे पहने थे और सलेटी ही सूटकेस अपने हाथों में थाम रखा था, उसके चेहरे से उसकी थाह पाना कठिन था. उसे देखते ही मैंने जान लिया कि वह एक विदेशी था. पहले वह मुझे बूढ़े ज़ैसा लगा, केवल बाद में ही मुझे पता चला कि उसके पतले, हल्के भूरे बालों की वजह से यह गलतफहमी हुई थी, वे कुछ कुछ स्कैण्डनेविया के निवासियों के से थे, एकदम सफेद. हमारी बातचीत के दौरान, जो कि एक घण्टे भी नहीं चली थी, मुझे पता चल गया था कि वह ऑर्कनीज से आया था. मैं ने उसे अन्दर आमंत्रित किया, एक कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए. वह बोलने से पहला थोड़ा रुका. उसकी तरफ से एक उदासीनता विसर्जित हुई - जैसी कि अभी मुझसे हो रही है.
'' मैं बाइबिल बेचता हूँ.'' उसने कहा.
कुछ - कुछ पाण्डित्य का दिखावा सा करते हुए, मैंने उत्तर दिया, '' इस घर में कई अंग्रेजी बाइबिल हैं, सबसे पहली - जॉन विक्लिफ  वाली के समेत. मेरे पास किप्रियानो डी वेलेरा की भी है. लूथर की भी है - जो कि साहित्यिक नजरिये से सबसे बेकार है - और वल्गेट की लातिनी प्रति भी है. जैसा कि तुम देख रहे हो, मुझे बाइबिल की कोई जरूरत नहीं है.''

खामोशी के कुछ पलों के बाद, वह बोला, '' मैं केवल बाइबिल ही नहीं बेचता. मैं आपको एक पवित्र पुस्तक दिखा सकता हूँ जो मुझे बीकानेर के बाहरी इलाकों से मिली है. यह शायद आपको रुचिकर लगे.''
उसने सूटकेस खोला और एक किताब निकाल कर मेज पर रखी. यह एक अष्टांगीय ग्रंथ था, कपडे क़ी जिल्द बंधा. इसमें कोई शक नहीं था कि यह कई हाथों से गुजर कर आया था. उसे परखते हुए, मैं उसके असामान्य वजन से चकित था. उसकी पीछे की ओर पर ' होली रिट ' लिखा था, और उसके नीचे, '' बॉम्बे ''.
 '' संभवतया उन्नीसवीं शताब्दी की, '' मैं ने टिप्पणी जड़ी.
 '' मुझे नहीं पता,'' वह बोला, ''मैं ने कभी पता नहीं किया.''

मैं ने पुस्तक एकाएक खोली. उसकी लिपि मेरे लिये अनजानी थी. उसके पृष्ठ घिसे-पिटे, मुद्रण के हिसाब से बहुत ही खराब से थे , वे दो कॉलमों में बाइबिल की तरह बंटे थे. उसका मूलपाठ बहत पास पास छपा हुआ था और श्लोकों की तरह क्रमबध्द था. पृष्ठों के ऊपरी कोने में अरबी अंक पड़े हुए थे. मैं ने ध्यान दिया कि एक बांयी तरफ का पृष्ठ (मान लो कि) 40,514 और दांयी तरफ का पृष्ठ 999 संख्या वाला था. मैं ने पन्ना पलटा; उस पर आठ अंकों की संख्या अंकित थी. इस पर संक्षिप्त विवरण भी था, जैसे कि शब्दकोशों में हुआ करता है - कलम और स्याही से एक लंगर बना हुआ था, जो कि किसी स्कूली छोकरे के बेतरतीब हाथों का बना लगता था.

उस क्षण वह अजनबी बोला, '' चित्र की बारीकियों को ध्यान से देखो, इसे तुम दुबारा नहीं देख सकोगे.''
मैं ने वह जगह ध्यान से देखी और किताब बन्द कर दी. उसी वक्त, मैं ने किताब दुबारा खोली. पन्ना दर पन्ना, मैं ने वह लंगर का चित्र ढूंढना चाहा था, मगर सब व्यर्थ. ''यह किसी भारतीय भाषा का धर्मग्रन्थ संस्करण मालूम होता है. है ना!'' मैंने अपनी हताशा छिपाने के लिये कहा.
'' नहीं.'' उसने जवाब दिया. जैसे कि वह फिर कोई रहस्य छिपाना चाह रहा हो उसने अपनी आवाज धीमी कर ली, '' मैं ने यह पुस्तक मैदानी इलाके के एक शहर से महज मुट्ठी भर रूपयों और एक बाइबिल के बदले में प्राप्त की है. इसका मालिक पढ़ना ही नहीं जानता था. मुझे शक था कि वह इस विलक्षण किताब को एक रक्षा कवच की तरह देखता था. वह सबसे नीची जाति का था; उसके जैसे दूसरी नीची जाति के लोगों के अलावा अन्य कोई भी उसकी परछांई से भी संक्रमित हुए बिना नहीं रह सकता था. उसने मुझे बताया कि उसकी यह किताब ' रेत की किताब' के नाम से जानी जाती थी, क्योंकि न तो रेत का और न ही इस किताब का कोई आदि और कोई अन्त नहीं होता.
उस अजनबी ने मुझसे उस पुस्तक का पहला पृष्ठ निकालने को कहा.
मैं ने अपना बायां हाथ उस पुस्तक के आवरण पर रखा और अपना अंगूठा पुस्तक के पहले  पन्ने पर रखा, मैं ने किताब खोली. यह व्यर्थ रहा. मैं ने कोशिश की पर हर बार बहुत सारे पन्ने मेरे अंगूठे और आवरण के बीच आ गये. ऐसा लग रहा था मानो कि ये किताब में से उगते ही चले आ रहे हों.
''अच्छा अब अंतिम पन्ना निकालो.''मैं फिर असफल रहा. ऐसी आवाज में जो कि मेरी सी नहीं थी, मैं बमुश्किल हकलाया, '' यह नहीं हो सकता.''
अब भी धीमी आवाज रखते हुए वह अजनबी बोला, '' यह नहीं हो सकता, मगर है. इस पुस्तक के पन्ने अनंत से न तो ज्यादा है न ही कम . कोई भी पहला पन्ना नहीं और कोई भी आखिरी नहीं. मुझे नहीं पता कि क्यों उन्होंने इस ऊटपटांग तरीके से इन पर क्रम संख्या डाली है. शायद यह सुझाने के लिये कि अनंत संख्या - श्रेणियों में भी पदों की  कोई भी संख्या हो सकती है.

फिर, जैसे कि वह गंभीर सोच में हो, वह बोला, ''अगर अन्तरिक्ष अनन्त है, तो हम इसमें किसी भी बिन्दु पर हो सकते हैं, अगर समय अनन्त है, तो हम समय के किसी भी छोर पर हो सकते हैं.''

'' हां, मैं एक प्रधान पादरी द्वारा शासित संघ से हूँ. मेरी अन्तर्रात्मा साफ है. मैं तकरीबन निश्चिंत हूँ कि मैंने उस नागरिक को धोखा नहीं दिया है, जब मैंने उसे उसकी शैतानी किताब के बदले में 
'
ईश्वर के पवित्र शब्द' दिये.''

मैंने उसे आश्वस्त किया कि उसे स्वयं को धिक्कारने की आवश्यकता नहीं है, और फिर मैंने पूछा कि वह यहां से होकर गुजर रहा था क्या? उसने बताया कि वह कुछ ही दिनों में अपने देश लौटने की सोच रहा है. तब मुझे समझ आया कि वह ऑर्केनी आयलैण्ड एक स्कॉटलैण्डवासी था. मैंने उसे बताया कि मुझे स्कॉटलैण्ड के प्रति एक खास निजी आकर्षण रहा है, मेरे स्टीवेन्सन और ह्यूम के प्रति प्रेम के चलते.
'' तुम्हारा मतलब स्टीवेन्सन और रॉवी बर्न्स,'' उसने सुधारा.

जब हम बतिया रहे थे, मैं उस अनंत पुस्तक का अन्वेषण करता रहा, एक बनावटी उदासीनता के साथ. मैं ने उससे पूछा, '' क्या तुम इस जिज्ञासा भरी चीज क़ो ब्रिटिश म्यूजियम में देने का इरादा रखते हो?
'' नहीं, मैं इसे तुम्हें पेश कर रहा हूँ.'' उसने कहा और उसने अपेक्षाकृत एक बड़ी राशि का अनुबंध रखा.
मैं ने अपनी पूर्ण सत्यता के साथ उसे उत्तर दिया कि इतना पैसा देना मेरी औकात से बाहर की बात है, और मैंने सोचना शुरु कर दिया. एक या दो मिनट के बाद मुझे एक योजना सूझी.
 '' 
मैं एक अदला - बदली का सौदा सुझाता हूँ.'' मैं ने कहा, '' तुम्हें यह किताब मुट्ठीभर रूपयों और बाइबिल की एक प्रति के बदले मिली. मैं अपनी पेन्शन के चैक की राशि जो मैंने अभी निकलवाई है और मेरी काले अक्षरों वाली विक्लिफ बाइबल तुम्हें देता हूँ. यह मुझे अपने पूर्वजों से विरासत में मिली है.''
''काले अक्षरों वाली विक्लिफ बाइबल!'' वह बुदबुदाया.

मैं अपने शयनकक्ष में गया और उसके लिये पैसा और किताब लेकर आया. उसने पन्ने पलटे और एक सच्चे पुस्तक प्रेमी की उत्सुकता के साथ मुखपृष्ठ का अध्ययन किया.
'' तो यह सौदा पूरा हुआ.'' उसने कहा.

इस बात ने मुझे विस्मित किया कि उसने कोई मोल - भाव नहीं किया. केवल बाद में मुझे यह अहसास हुआ कि वह मेरे घर में यह तय करके घुसा था कि वह किताब बेच कर ही रहेगा. रूपयो को बिना गिने उसने अन्दर रख लिया.

हमने भारत के बारे में बातें की, ऑर्केनी के बारे में, और नार्वेजियन जार्ल्स के बारे में भी, जिन्होंने उस पर कभी शासन किया था. जब वह आदमी गया तब रात हो चुकी थी. मैं ने उसे फिर कभी नहीं देखा,न ही मैं उसका नाम जानता था.

मैंने अपनी किताबों की अलमारी में विक्लिफ के हटने से खाली हुई जगह पर ' रेत की किताब' को रखने की सोचा, फिर अन्त में निश्चय किया कि मैं इसे 'थाउजेण्ड एण्ड वन नाइट' के खण्डों के अधूरे सेट के पीछे छिपा कर रखूं. मैं बिस्तर पर जा लेटा मगर सोया नहीं. सुबह के तीन या चार बजे, मैंने बत्ती जला दी. उस असंभव सी किताब को उतारा और उसके पन्ने पलटने लगा. उनमें से एक पर मैंने एक मुखौटा उकेरा हुआ देखा. उस पृष्ठ के ऊपरी कोने पर एक संख्या डली हुई थी, मुझे वह संख्या तो अब याद नहीं, पर वह दस की नवीं घात के गुणज में थी.

मैंने अपना यह खजाना किसी को नहीं दिखाया. इसके मालिक होने के सौभाग्य में उसके चुराये जाने का डर भी शामिल हो गया था, और फिर यह आशंका कि हो सकता है कि यह वास्तव में अनन्त न निकले. इन जुड़वां पूर्वधारणाओं ने मेरे पुराने मानवद्वेषी स्वभाव को घनीभूत कर दिया. मेरे कुछ ही दोस्त बचे रह गये थे; अब मैंने उनसे भी मिलना बन्द कर दिया था. मैं किताब का कैदी बन कर रह गया था, तब मैं लगभग कभी बाहर निकला ही नहीं. किताब की घिसी पिटी रीढ़ और आवरण को मैग्नीफाइंग ग्लास से पढ़ने के बाद, मैंने किसी किस्म के कपट भरे सौदे की संभावनाओं को नकार दिया था. मैंने तस्दीक किया कि संक्षिप्त विवरण दो हजार पृष्ठों में फैले थे. मैं उन्हें वर्णक्रम के अनुसार पुस्तिका में सूचीबध्द करने के लिये बैठा, मैं जानता था पुस्तिका पूरी भरने में ज्यादा देर नही लगेगी. किसी  भी एक विवरण को एक बार भी दोहराया नहीं गया था. रात के लघु अंतरालों में मेरे अनिद्रा रोग ने मुझे बख्श दिया, और मैं किताब के सपनों में खो गया.

गर्मियां आईं और चली गईं, और मैंने महसूस किया कि किताब विराट थी. इससे मेरे साथ अच्छा तो यह हुआ कि मैं, जिसने कि इस खण्ड को अपनी आंखों से देखा, और सोचा,  कि वह जिसने इसे मेरे हाथ सौंपा, वो क्या कम विराट था? मैं ने महसूस किया कि यह पुस्तक भयावने सपनों की कोई वस्तु थी, एक अश्लील चीज ज़िसने कि वास्तविकता को ही खुलेआम कलंकित कर दिया था.

मैं ने इसे आग में झौंकने की सोचा, लेकिन मुझे डर था कि इस अनन्त पुस्तक का जलना भी इसकी तरह अनन्त सिध्द न हो जाये और पूरे ग्रह का धुंए से दम न घोट दे. तभी मुझे याद आया कि कहीं पर मैं ने पढा था कि एक पत्ती को छिपाने के लिये सबसे अच्छी जगह जंगल होती है.

अपनी सेवानिवृत्ति से पहले मैं मैक्सिको स्ट्रीट पर स्थित अर्जेन्टाइन राष्ट्रीय पुस्तकालय में काम करता था, जिसमें नौ सौ हजार पुस्तकें थीं. मैं जानता था कि प्रवेशद्वार के बिलकुल दायीं ओर कुछ घुमावदार सीढ़ियाँ थीं जो नीचे तलघर की ओर जाती थीं, जहां पर पुस्तकें, नक्शे और पत्रिकाएं आदि रखी रहती थीं. एक दिन मैं वहां गया, और वहां के एक कर्मचारी से बचता - बचाता हुआ, बिना यह ध्यान दिये कि दरवाजे से कितनी दूर और कितनी ऊंचाई पर और तलघर की किस सीलन भरी शेल्फ में, मैं उस किताब को छोड आया.

मनीषा कुलश्रेष्ठ

जन्म : 26 अगस्त 1967, जोधपुर
शिक्षा – बी.एससी., एम. ए. (हिन्दी साहित्य), एम. फिल., विशारद ( कथक)
प्रकाशित कृतियाँ –
कहानी संग्रह - कठपुतलियाँ, कुछ भी तो रूमानी नहीं, बौनी होती परछांई
केयर ऑफ स्वात घाटी (संग्रह शीघ्र प्रकाश्य)
उपन्यास-  शिगाफ़ ( कश्मीर पर), ‘शालभंजिका’
नया ज्ञानोदय में इंटरनेट और हिन्दी पर लिखी लेखमाला की पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य.
अनुवाद – माया एँजलू की आत्मकथा ‘ वाय केज्ड बर्ड सिंग’ के अंश, लातिन अमरीकी लेखक मामाडे के उपन्यास ‘हाउस मेड ऑफ डॉन’ के अंश, बोर्हेस की कहानियों का अनुवाद
अन्य : हिन्दीनेस्ट के अलावा, वर्धा विश्वविद्यालय की वेबसाईट ‘हिन्दी समय. कॉम’ का निर्माण, संगमन की वेबसाईट ‘संगमन डॉट कॉम’ का निर्माण व देखरेख.
पुरस्कार व सम्मान :  चन्द्रदेव शर्मा नवोदित प्रतिभा           पुरस्कार – वर्ष 1989 ( रा. साहित्य अकादमी)
कृष्ण बलदेव वैद फैलोशिप – 2007
डॉ. घासीराम वर्मा सम्मान – वर्ष 2009
रांगेय राघव पुरस्कार वर्ष 2010 ( राजस्थान साहित्य अकादमी)
संप्रति – स्वतंत्र लेखन और इंटरनेट की पहली हिन्दी वेबपत्रिका ‘हिन्दीनेस्ट’ का दस वर्षों से संपादन.
ई – पता – 
manisha@hindinest.com
 

Tuesday, April 12, 2011

माइआ अंजालो : कफस के पंछी का गीत


पढ़ते-पढ़ते पर आप माइआ अंजालो की कविताएँ पढ़ते रहे हैं. आज मनीषा कुलश्रेष्ठ के सौजन्य से उनके गद्य की एक बानगी  -  कफस के पंछी का गीत  












कफस के पंछी का गीत : माइआ अंजालो 
(अनुवाद : मनीषा कुलश्रेष्ठ) 

मेरी मां के प्रेमी मि. फ्रीमैन हमारे साथ रहा करते थे या हम उनके साथ रहा करते थे, तब मैं इस बारे में ठीक से नहीं जानती थी. वे भी दक्षिणी थे, विशालकाय और कुछ थुलथुल. जब भी वे बनियान में घूमा करते, मुझे उनका सीना देख कर शर्मिन्दगी होती, वह औरतों की सपाट छातियों जैसा था.
यदि मेरी मां इतनी सुंदर स्त्री न भी होती - गोरी, सीधे बालों वाली. तब भी वह उन्हें पाकर भाग्यशाली होते यह वह खूब जानते थे. वे शिक्षित थीं और एक प्रतिष्ठित परिवार से सम्बध्द थीं, आखिरकार वह सेन्ट लुईस की पैदाईश नहीं थीं क्या! फिर वे खुशमिजाज थीं. वे हरदम हंसती रहतीं और चुटकुले सुनातीं. वे आभारी थे. मेरे ख्याल से वे मां से उम्र में काफी बडे रहे होंगे. अन्यथा उन्हें सुस्त किस्म की हीन भावना क्यों होती जो कि एक अधेड़  आदमी को अपने से जवान औरत से विवाह करके होती है. वे उनकी हर हरकत, हर गति पर निगाह गाड़े रखते, जब वे कमरे से चली जातीं तो उनकी आंखें उन्हें बेमन से जाते देखतीं.

मैं ने तय कर लिया था कि सेंट लुईस मेरा अपना देश नहीं है. मैं टॉयलेट में तेज ग़ति में फ्लश चलने की आवाज या डब्बाबन्द खानों की और दरवाजों की घंटियों, कारों, रेलों - बसों के शोर की आदी नहीं हो सकी थी,जो कि दीवारों को फोड़ता हुआ या दरवाजों से रेंगता हुआ अन्दर आता था. मेरे दिमाग के हिसाब से, मैं केवल कुछ ही सप्ताह सेंट लुईस में रही होऊंगी. जैसे ही मुझे अहसास हो गया कि मैं अपने घर पर नहीं या ये सब मेरे नहीं है मैं कायरों की तरह रॉबिन हुड के जंगलों और ऐली ओप की वादियों में जा उतरती थी, जहां वास्तविकता अवास्तविकता में बदल जाती थी और यहां तक कि वह हर दिन बदलती रहती थी. मैं यह सुरक्षा कवच हमेशा साथ रखती थी, बल्कि इसे स्टांप की तरह इस्तेमाल करती थी कि - मैं यहां रहने नहीं आई हूँ.

मेरी मां हमें सर्व सुख - सुविधाएं देने में सक्षम थी. इसका मतलब यह भी लगा सकते हैं कि अगर किसी को पटा कर हमें सब कुछ मुहैय्या करवाना ही क्यों न हो. हालांकि वह नर्स थी, लेकिन जब तक हम उसके साथ रहे उसने अपने पेशे से सम्बध्द तो कोई काम नहीं किया. मि. फ्रीमैन जरूरतों की पूर्ति के लिए लाए गए थे और हमारी मां ने जुआघरों में पोकर खेलकर अतिरिक्त पैसा बना लिया था. सीधी - सादी आठ से पांच की दुनिया उनको आकर्षित करने के लिए नाकाफी थी. यह उसके बीस साल बाद की बात है जब मैं ने उन्हें पहली बार नर्स की पोशाक में देखा था.

मि. फ्रीमैन दक्षिण पैसिफिक यार्ड में फोरमैन थे और कभी कभी देर से घर लौटा करते थे. मां के चले जाने के बाद. वे स्टोव से अपना रात का खाना उठाते, जिसे मां ने ध्यान से ढककर रखा होता था, हमारे लिए इस अपरोक्ष चेतावनी के साथ कि तुम्हें इस सब की परवाह करने की जरूरत नहीं है. वे चुपचाप रसोई में खाना खाते जबकि मैं और बैली अलग - अलग और एकदम लालचियों की तरह अपनी - अपनी 'स्ट्रीट एंड स्मिथ' नामक घटिया किस्म की किताबें पढा करते. अब जबकि हम अपना पैसा खर्चते ही थे,तो हम ऐसी सचित्र पेपरबैक किताबें खरीदते जिनमें भडक़ीली तस्वीरें होतीं. जब मां घर पर नहीं होतीं तो हमें एक सुविधाजनक व्यवस्था बनानी होती थी. हमें होमवर्क खत्म करके, खाना खाकर, प्लेटें धोनी होती थीं ताकि हम ' द लोन रेंजर', 'क्राईम बस्टर्स' या 'द शेडो' पढ़ या सुन सकें.

मि. फ्रीमैन सौजन्यता के साथ ऐसे अन्दर आते जैसे एक बडा भूरा भालू और कभी - कभार ही हमसे बात करते. वे बस मम्मी का इंतजार करते और खुद को समूचा उनके इंतजार में झौंक देते. वे कभी अखबार नहीं पढते थे और न ही रेडियो के संगीत पर अपने पैर थिरकाते थे. वे प्रतीक्षा करते थे. बस सिर्फ यही.

अगर वे हमारे बिस्तरों में घुसने से पहले घर लौट आतीं तो हम उस व्यक्ति को जीवंत पाते. वे बडी क़ुर्सी से ऐसे उठते जैसे कोई आदमी नींद से उठता है, मुस्कुराते. तब मुझे याद आता कि कुछ ही सैकेण्ड पहले मुझे कार के दरवाजे बन्द होने की आवाज सुनाई दी थी, फिर मम्मी के कदमों की आहट का संकेत. जब मम्मी की चाबी दरवाजे में घूमती मि. फ्रीमैन आदतन वही अपना प्रश्न पहले ही पूछ चुके होते थे - 'हे, बिब्बी, समय अच्छा बीता?'
उनका यह सवाल हवा में अटका रह जाता, तब तक मां लपक कर उनके होंठों का चुंबन ले रही होती थीं. फिर वे बैली और मेरी तरफ अपने लिप्स्टिक लगे चुम्बनों के साथ मुड्तीं , '' तुमने अभी तक होमवर्क नहीं किया?'' अगर हम पढ़ रहे होते तो कहतीं - '' अच्छा अपनी प्रार्थनाएं बोलो और सोने चलो.'' अगर हम पढ़ नहीं रहे होते तो कहतीं - '' चलो अपने कमरे में जाओ, अपना काम पूरा अपनी प्रार्थनाएं बोलो और सो जाओ.''

मि. फ्रीमैन की मुस्कान में कभी घटा - बढ़ी नहीं हुई, वह लगभग उतनी ही सघन बनी रही. कभी - कभी मम्मी उनकी गोद में चढ़ क़र बैठ जाती तो उनके चेहरे की मुस्कान ऐसे लगती कि जैसे वह उनके चेहरे पर सदा के लिए चिपक गयी है.

हम अपने कमरों से ग्लासों के टकराने की और रेडियो चलाए जाने की आवाज सुन पाते थे. मैं सोचती थी कि वे जरूर सोने से पहले उनके लिए नाचती थीं, क्योंकि उन्हें नाचना नहीं आता था. लेकिन अकसर नींद में डूबने से पहले मुझे नृत्य की ताल पर पैरों की थिरकन सुनाई देती.

मुझे मि. फ्रीमैन पर तरस आता. मुझे मि फ्रीमैन पर वैसा ही तरस आता जैसा कि आर्केनसास में अपने घर के पिछवाड़े बने सुअरबाड़े में जन्मे सुअर के नन्हें बच्चों पर आता था. हम उन सुअरों को पूरे साल खिला - पिला कर सर्दियों की पहली बर्फबारी में काटे जाने के लिए मोटा करते, हालांकि उन प्यारे नन्हें कुलबुलाते जीवों के लिए मैं ही थी जो दुखी होती थी, और मैं यह भी जानती थी कि ताजा सॉसेजेज और सुअरों के भेजे का मजा भी मैं ही लेने वाली हूँ, जो कि उनके मरे बिना मुझे नहीं मिलने वाला है.

हमारी पढ़ी हुई उन सनसनीखेज क़हानियों और हमारी प्रबल कल्पनाओं या शायद हमारी संक्षिप्त मगर बहुत तेज रफ्तार जिन्दगी की यादों की वजह से बैली और मुझ पर बुरा असर पडा था - उस पर शारीरिक तौर पर, मुझ पर मानसिक तौर पर. वह हकलाने लगा था और मैं भयानक सपनों से पसीने - पसीने हो जाया करती थी. उसे लगातार समझाया जाता कि - धीरे - धीरे बोलो और फिर से बोलना शुरु करो. मेरी उन विशेष बुरी रातों में मम्मी मुझे अपने अपने साथ, उस विशाल बिस्तर पर मि. फ्रीमैन के साथ सोने के लिए ले जाती. स्थायित्व की आवश्यकता के लिए बच्चे जल्दी ही आदतों के आदी जीव बन जाते हैं. तीन बार मां के बिस्तर पर सोने के बाद मुझे लगने लगा था कि वहां सोने में कुछ भी अजीब नहीं है.

एक सुबह, एक शीघ्र बुलावे पर वे बिस्तर से जल्दी उठ गयीं और मैं दुबारा सो गयी थी. लेकिन एक दबाव और अपने दांए पैर पर एक अजीब से स्पर्श से मैं जाग गयी. वह हाथ से कहीं मुलायम था, और वह कपडे क़ा स्पर्श बिलकुल नहीं था. वह जो भी था वैसे उद्दीपन का अनुभव मुझे मां के साथ इतने वर्षों सोते हुए कभी महसूस नहीं हुआ था. वह हिल नहीं रहा था और मैं दम साधे हुए थी. मैंने मि. फ्रीमैन को देखने के लिए अपना सिर जरा सा बायीं तरफ घुमाया कि वे उठ कर चले गए कि नहीं,लेकिन उनकी आंखें खुली थीं और दोनें हाथ चादर के ऊपर थे. मुझे पता था, जैसे कि मैं हमेशा से जानती होऊं, कि यह उनकी वह 'चीज' थी जो मेरे पैर पर सटी थी.
उन्होंने कहा, '' ऐसे ही लेटी रहो, रिटी, मैं तुम्हें चोट नहीं पहुंचाऊंगा.''
मैं डर नहीं रही थी, शायद कुछ आशंकित सी थी मगर डरी तो नहीं थी. हाँ, बेशक जानती थी, बहुत से लोग 'ये' किया करते थे और वे अपना काम पूरा करने के लिए, अपनी इस ' चीज' क़ो इस्तेमाल करते थे, लेकिन, मैं कभी ऐसे किसी को नहीं जानती थी जिसने इसे किसी और के साथ किया हो. मि. फ्रीमैन ने मुझे अपने पास खींच लिया और अपना हाथ मेरे पैरों के बीच डाल दिया. उन्होंने चोट नहीं पहुंचाई, मगर मम्मी ने मेरे दिमाग में यह बात अच्छी तरह से डाल रखी थी कि, '' अपनी टांगे हमेशा भींच कर रखनी हैं और किसी को भी अपनी 'पॉकेट बुक' देखने नहीं देनी है.''
'' देखो, मैंने तुम्हें अभी चोट नहीं पहुंचाई ना, डरो मत.'' उन्होंने कम्बल पीछे को पटक दिया और उनकी वह 'चीज' भूरे भुट्टे की तरह सीधी खड़ी थी. उन्होंने मेरा हाथ पकडा और कहा, '' इसे महसूस करो.'' वह ताजे कटे हुए मुर्गे की अन्दरूनी हिस्से की तरह लिजलिजी और गिलगिली थी.
फिर उन्होने मुझे अपने सीने के ऊपर अपनी बांई बांह से खींच लिया, उनका सीधा हाथ इतना तेज चल रहा था और उनका दिल इतना तेज धड़क रहा था कि मुझे डर लगा कि वे मरने वाले हैं. भूतों की कहानियों में होता है कि किस तरह मरने वाले लोग, अपने मरते वक्त जिस किसी चीज क़ो पकड़े होते हैं उसे जकड़ लेते हैं. मैं आतंकित थी कि अगर मि. फ्रीमैन मुझे जकड़े - जकड़े ही मर गया तो मैं कैसे मुक्त हो पाऊंगी? क्या मुझे छुड़ाने के लिए लोग उनकी बांह तोड़ डालेंगे ?

अंतत: वे शांत हो गए, फिर एक अच्छी बात हुई, उन्होंने मुझे बहुत नर्म तरीके से आलिंगित किया कि मेरा मन करने लगा कि वे मुझे कभी न छोड़ें. मुझे अपना - सा महसूस हुआ. जिस तरह उन्होंने मुझे सहेजा हुआ था, मैं जानती थी कि वे मुझे कभी नहीं जाने देंगे या कभी मेरे साथ कुछ बुरा नहीं होने देंगे. हो सकता है कि यही मेरे पिता हों और आखिरकार हमने एक दूसरे को पा लिया हो. लेकिन फिर वे पलटे और मुझे गीले स्थान पर छोड क़र उठ गए.

'' मुझे तुमसे बात करनी है रिटी.'' उन्होंने अपने शॉर्ट्स को ऊपर खींचा जो कि उनकी एड़ियों में जा गिरा था और बाथरूम में जा घुसे. ये सच था कि बिस्तर गीला था, लेकिन मुझे पता था कि मैं 'बिस्तर गीला करने' जैसा कुछ भी नहीं किया है. हो सकता है मि फ्रीमैन के साथ ऐसा हो गया हो जब वे मुझे जकड़े हुए थे. वे एक ग्लास पानी के साथ वापस लौटे और मुझसे खीजी हुई आवाज में कहा , '' उठो तुमने बिस्तर में सूसू कर दिया है.''
उन्होंने गीले हिस्से पर पानी डाला, और मेरे वाले गद्दे पर वह निशान कई सुबहों तक वैसा ही दिखता रहा.

दक्षिणी अनुशासन में रहने के कारण मैं जानती थी कि कब बड़ों के सामने चुप रहना है, लेकिन मैं उनसे पूछना चाहती थी कि उन्होंने ये क्यों कहा कि मैं ने बिस्तर गीला किया है, जबकि मुझे पक्का पता था कि उन्हें खुद भी इस बात का यकीन नहीं था. मगर उन्होंने यह सोच लिया कि मैं बदतमीज हूँ तो, इसका मतलब, क्या वे मुझे फिर कभी उस प्यार से गले नहीं लगाएंगे?  या कभी यह नहीं जताएंगे कि वे ही मेरे पिता है. मैं ने उन्हें अपने बारे में शर्मिन्दा कर दिया है.

''रिटी, क्या तुम बैली से प्यार करती हो?'' वे बिस्तर पर बैठ गए और मैं उछलती - कूदती हुई उनके पास आई  - '' हाँ.''
वे झुक कर अपने मोजे पहन रहे थे, उनकी पीठ इतनी विशाल और दोस्ताना - सी थी कि मेरा मन चाहा कि मैं उस पर अपना सिर टिका दूं.
''अगर तुमने किसी से भी कहा कि हमने क्या किया है, तो मुझे बिली को मार डालना पडेग़ा.''
हमने क्या किया? हमने! जाहिर है उनका मतलब मेरे बिस्तर पर सूसु कर देने से तो नहीं है. मैं समझी नहीं, न ही मेरी हिम्मत हुई उनसे पूछने की. जरूर इसका मतलब मुझे गले लगाने से होगा. लेकिन मैं बैली से भी पूछ नहीं सकती थी, क्योंकि उसे वह सब बताना पड़ता जो हमने किया था. वह बैली को मार सकता है, यह विचार ही मुझे सहमा गया था. उनके कमरे से जाने के बाद मैं ने मम्मी को यह बताने की सोची कि मैं ने बिस्तर गीला नहीं किया था, लेकिन अगर उन्होंने पूछा कि हुआ क्या था तो मुझे उन्हें मि. फ्रीमैन के सीने से लगाने की बात बतानी पडेग़ी, और उससे बात नहीं बनेगी.

अब यह वही पुराना असमंजस था, जिसे मैं ने हमेशा जिया था. यहां बड़ों की फौज थी, जिनके इरादे और हरकतें मैं समझ ही नहीं पाती थी और जिन्होंने मेरी बातें समझने की कोई जहमत तक नहीं उठाई. मेरे मि. फ्रीमैन को नापसंद करने का कोई प्रश्न नहीं था, शायद मैं बस उन्हें समझने में नाकाम रही.

कई हफ्तों बाद तक उन्होंने कुछ नहीं कहा, केवल उन उजड्ड से नमस्ते के जवाबों के सिवा जो उन्होंने मेरी तरफ देखे बिना दिए थे.

यह पहला ही राज था जिसे मैंने बैली से छिपाया था और कभी कभी मैंनें सोचा कि वह इसे मेरे चेहरे पर पढ़ लेगा लेकिन उसे कुछ पता नहीं चला.

मैं मि. फ्रीमैन और उनकी बड़ी - बड़ी बांहों के घेरे के बिना अकेला महसूस करने लगी थी. इसके पहले बैली, खाना, मम्मी, दुकान, किताबें पढ़ना और अकंल विली ही मेरा संसार हुआ करते थे. अब पहली बार मैंने इसमें शारीरिक स्पर्श को शामिल किया था.

मैंने मि. फ्रीमैन के यार्ड से लौट कर आने का इंतजार करना शुरु कर दिया था, लेकिन जब वे आते तो मेरी तरफ ध्यान ही नहीं देते थे, हालांकि मैं ढेर सा अपनत्व भर कर उन्हें '' गुडईवनिंग, मि फ्रीमैन.'' जरूर कहती.

एक शाम, जब मैं अपना मन कहीं नहीं लगा पा रही थी तो मैं उनके पास जाकर उनकी गोद में चढ़ क़र बैठ गई.वे पहले की तरह मम्मी का इंतजार कर रहे थे. बैली 'द शैडो' सुन रहा था और उसे मेरी जरूरत नहीं थी. पहले तो मि. फ्रीमैन स्थिर बैठे रहे, मुझे बिना जकड़े या बिना कुछ किए, तभी मुझे अपनी जांघों के नीचे एक मुलायम मांसल पिण्ड के हिलने का अहसास हुआ. वह मुझसे हल्के - हल्के टकरा रहा था और कड़ा होता जा रहा था. तब उन्होंने मुझे अपने सीने पर खींच लिया. उनमें से कोयले के बुरादे और ग्रीस की महक आ रही थी, और इतना करीब थे कि मैंने अपना सिर उनकी कमीज में धंसा लिया था और उनके दिल की धड़कन सुन रही थी, वह सिर्फ मेरे लिए धड़क रहा था. केवल मैं उस धमक को सुन पा रही थी, मैं उसकी उछाल को अपने चेहरे पर महसूस कर पा रही थी.उन्होंने कहा, '' टिक कर बैठो, कुलबुलाओ मत.'' लेकिब पूरे वक्त, वे ही तो मुझे अपनी गोदी में धक्का देते रहे थे, फिर अचानक वे खड़े हो गए और मैं फर्श पर फिसल गई. वे बाथरूम की तरफ भागे.

महीनों के लिए उन्होंने फिर से मुझसे बात करना बन्द कर दिया था. मैं आहत थी और एक समय के लिए तो मैं पहले से कहीं ज्यादा अकेला महसूस करने लगी थी. लेकिन फिर में उनके बारे में भूल चुकी थी, यहां तक कि उनके मुझे गले लगाने का वह प्रिय अहसास भी बचपन की आंखों पर बंधे पट्टे के पीछे के उन सहज अंधेरों में पिघल कर खो गया था.

मैं पहले से ज्यादा पढ़ने लगी, और अपनी आत्मा में यह प्रार्थना करती कि काश मैं लड़का बनकर पैदा हुई होती. होरेशियो एल्गर विश्व के महान लेखक थे. उनके नायक हमेशा अच्छे होते थे, हमेशा जीता करते थे और हमेशा लड़के ही होते. मैं स्वयं में पहले दो गुण तो विकसित कर सकती थी, लेकिन लड़का बनना असंभव नहीं तो निश्चित तौर पर आसान तो नहीं था.

' द सण्डे फनीज' मुझे प्रभावित करते थे, हालांकि मुझे शक्तिशाली नायक पसंद थे जो हमेशा अंत में विजय पाया करते थे. मैं स्वयं को 'टाइनी टिम' से जोड़ा करती. बाथरूम में जहां मैं अखबार ले जाया करती थी, वहां उसके गैरजरूरी पन्ने हटाना और देखना यंत्रणादायी होता था कि मैं जान सकूं कि अंतत: कैसे वह अपने नए विरोधी से जीत सका. मैं हर इतवार इस राहत से रोया करती कि वह दुष्ट आदमियों के चंगुल से बच निकला और अपनी संभावित हार की सीमाओं से फिर बाहर आ खड़ा हुआ, हमेशा की तरह प्यारा और सौम्य. ' द कैटजेनजेमर किड्स' मजेदार थे क्योंकि वे वयस्क लोगों को मूर्ख साबित कर दिया करते थे. लेकिन मेरी रुचि के विपरीत वे कुछ ज्यादा ही चतुर - चालाक थे.

जब सेंट लुईस में बसंत आया, तो मैं ने अपना पहला लाईब्रेरी कार्ड बनवाया, और जब से मैं और बैली अलग - अलग बड़े होने लगे थे, मैं ने अपने ज्यादातर शनिवार लाईब्रेरी में ( बिना व्यवधान के ) निर्धन, बूट पॉलिश करने वाले लड़कों की दुनिया में सांस लेते हुए बिताए थे, जो कि अपनी नेकी और लगातार मेहनत के साथ अमीर, बेहद अमीर बनते हैं और छुट्टी के दिन डलिया भर - भर कर सामान गरीबों में बांटते हैं. एक छोटी राजकुमारी जिसे गलतफहमी में नौकरानी समझ लिया गया था, खोए हुए बच्चे जिन्हें लावारिस समझ लिया गया था मेरे लिए अपने घर, अपनी मम्मी, स्कूल और मि. फ्रीमैन से ज्यादा वास्तविक हो चले थे.

उन महीनों के दौरान, हम अपने नाना - नानी और मामाओं से मिले. ( हमारी एकमात्र मौसी कैलीफोर्निया में अपना भविष्य बनाने चली गई थीं.) लेकिन वे ज्यादातर एक ही प्रश्न पूछते - '' तुम अच्छे बच्चे बने रहे न?'' जिसके लिए हमारे पास एक ही उत्तर था. यहां तक कि बैली भी कभी 'ना' कहने का दु:साहस न कर सका.


मनीषा कुलश्रेष्ठ

जन्म : 26 अगस्त 1967, जोधपुर
शिक्षा – बी.एससी., एम. ए. (हिन्दी साहित्य), एम. फिल., विशारद ( कथक)
प्रकाशित कृतियाँ –
कहानी संग्रह - कठपुतलियाँ, कुछ भी तो रूमानी नहीं, बौनी होती परछांई
केयर ऑफ स्वात घाटी (संग्रह शीघ्र प्रकाश्य)
उपन्यास-  शिगाफ़ ( कश्मीर पर), ‘शालभंजिका’
नया ज्ञानोदय में इंटरनेट और हिन्दी पर लिखी लेखमाला की पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य.
अनुवाद – माया एँजलू की आत्मकथा ‘ वाय केज्ड बर्ड सिंग’ के अंश, लातिन अमरीकी लेखक मामाडे के उपन्यास ‘हाउस मेड ऑफ डॉन’ के अंश, बोर्हेस की कहानियों का अनुवाद
अन्य : हिन्दीनेस्ट के अलावा, वर्धा विश्वविद्यालय की वेबसाईट ‘हिन्दी समय. कॉम’ का निर्माण, संगमन की वेबसाईट ‘संगमन डॉट कॉम’ का निर्माण व देखरेख.
पुरस्कार व सम्मान :  चन्द्रदेव शर्मा नवोदित प्रतिभा           पुरस्कार – वर्ष 1989 ( रा. साहित्य अकादमी)
कृष्ण बलदेव वैद फैलोशिप – 2007
डॉ. घासीराम वर्मा सम्मान – वर्ष 2009
रांगेय राघव पुरस्कार वर्ष 2010 ( राजस्थान साहित्य अकादमी)
संप्रति – स्वतंत्र लेखन और इंटरनेट की पहली हिन्दी वेबपत्रिका ‘हिन्दीनेस्ट’ का दस वर्षों से संपादन.
ई – पता – 
manisha@hindinest.com
 

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