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Sunday, May 5, 2013

ऊलाव हाउगे : रोड रोलर

उलाव हाउगे की एक और कविता... 

रोड रोलर  : ऊलाव हाउगे 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मोड़ पर वह मुनासिब चेतावनी देता है तुम्हें, 
नीम रौशनी में आता है तुम्हारी ओर, 
सुलगते सींग 
उसके माथे से झिलमिलाते हुए -- 
आता है बोझिल, साधिकार आता है लुढ़कते हुए 
उस डामर पट्टी को बराबर करते जिस पर चलना ही है तुम्हें. 

हर किसी को बने ही रहना है डामर पट्टियों पर, 
प्रसूति गृह से शवदाहगृह तक दौड़ती 
कन्वेयर बेल्टों पर. 
                     :: :: :: 

Thursday, July 19, 2012

ऊलाव हाउगे की कविता

उलाव हाउगे की एक और कविता...   

 
मैं बहा जा रहा हूँ : ऊलाव हाउगे 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मैं बहा जा रहा हूँ, हवा से 
हांका जाता, लहरों से हांका जाता. 
एक लठ्ठे पर सवार हो गया हूँ किसी तरह, 
और गर्वित हूँ कि नक्काशीदार है वह. 
               :: :: :: 

Wednesday, July 18, 2012

ऊलाव हाउगे : इन्द्रधनुष

ऊलाव हाउगे की एक और कविता...   

 
इन्द्रधनुष : ऊलाव हाउगे 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

पुल के ऊपर पुल --
तीन इन्द्रधनुष!
हम कहाँ जाने वाले हैं, 
क्या सोच सकती हो तुम? 

पहला तो बिलाशक 
ले जाता है जन्नत को, 
और दूसरा जाकर ख़त्म होता है 
पाले और बर्फ में. 

और तीसरा? यह 
इधर चला आया 
इस बगीचे में 
मेरे और तुम्हारे साथ! 
:: :: :: 

Sunday, July 15, 2012

ऊलाव हाउगे : तुम सीख गए हो

ऊलाव हाउगे की एक और कविता...   

 
देखता हूँ कि तुम सीख गए हो : ऊलाव हाउगे 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मुझे पसंद है 
कि तुम 
इस्तेमाल करो 
कम शब्द, 
कम शब्द और 
छोटे वाक्य 
जो 
पन्ने से होकर 
बारिश की फुहार की तरह गिरें  
अपने बीच 
रोशनी और हवा लिए हुए. 
देखता हूँ कि तुम सीख गए हो  
जंगल में 
ढेर लगाना लकड़ी का, 
बेहतर है 
ऊंचा ढेर लगाना उसका 
तब सूख जाएगी वह; 
अगर लम्बाई में और नीचा लगा दोगे उसे 
तो सड़ जाएगी लकड़ी. 
          :: :: :: 

Wednesday, July 11, 2012

ऊलाव हाउगे की कविता

ऊलाव हाउगे की एक और कविता...   

 
नदी का उफनना : ऊलाव हाउगे 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मछली उफ़ नहीं करती 
नदी के उफनने पर. 
पर बेचारा बूढ़ा ऊदबिलाव 
घबरा जाता है अपने घरों को लेकर.  
            :: :: :: 

Monday, July 9, 2012

ऊलाव हाउगे : एकाकी चीड़

ऊलाव हाउगे की एक और कविता...   

 
एकाकी चीड़ : ऊलाव हाउगे 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

काफी जगह है यहाँ, तुम 
फ़ैल सके और चौड़ा कर सके 
अपना ताज. 

पर तुम खड़े हो अकेले. 
जब तूफ़ान आते हैं, 
कोई नहीं होता तुम्हारे पास 
सहारा लेने के लिए. 
          :: :: :: 

Monday, June 25, 2012

ऊलाव हाउगे की कविता

नार्वेजियन कवि ऊलाव हाउगे की एक और कविता...   

 
कटाई वाला कुंदा : ऊलाव हाउगे 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मुश्किल होता है 
कुल्हाड़ी के नीचे का कुंदा होना, 
महसूस किया है मैंने. 
मगर मैंने सीखा 
जब वे चुन लें  
सिर्फ मुझे: 
निश्चल और खामोश रहो! 

ऊपर ढलान पर मेरे सहोदर ठूंठ 
निकाल रहे हैं नई पत्तियाँ. 
उन्हें चीरने दो 
यहाँ आँगन में! 
मैं ऐंठता हूँ, इठलाता हूँ 
अपने खपचीदार ताज में. 
            :: :: :: 

Thursday, June 21, 2012

ऊलाव हाउगे की कविता

ऊलाव हाउगे की एक और कविता...  

आज मैंने : ऊलाव हाउगे 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

आज मैंने 
दो चाँद देखे, 
एक नया 
और एक पुराना. 
नए चाँद पर बहुत भरोसा है मुझे 
मगर शायद है यह वही पुराना. 
          :: :: ::  
ओलाव होगे 

Monday, June 18, 2012

ऊलाव हाउगे : शंख

नार्वे के कवि ऊलाव हाउगे की एक और कविता...  

 
शंख : ऊलाव हाउगे 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

तुम एक घर बनाते हो अपनी आत्मा के लिए 
और सितारों की रोशनी में 
इधर-उधर बहा करते हो शान से 
घर को अपनी पीठ पर लादे 
किसी घोंघे की तरह. 
कोई ख़तरा सामने पड़ने पर 
तुम सरक जाते हो भीतर 
और सुरक्षित हो जाते हो 
अपनी 
सख्त खोल के पीछे. 

और जब तुम नहीं रहोगे, 
तब भी 
घर जिंदा रहेगा तुम्हारा, 
एक वसीयतनामा 
तुम्हारी आत्मा की सुन्दरता का. 
और भीतर 
बहुत गहरे से कहीं 
गाएगा तुम्हारे अकेलेपन का समुन्दर. 
                    :: :: :: 

Wednesday, June 13, 2012

ऊलाव हाउगे : नया मेजपोश

ऊलाव हाउगे की एक और कविता...   

 
नया मेजपोश : ऊलाव हाउगे 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

नया पीला मेजपोश मेज पर. 
और कोरे सफ़ेद पन्ने! 
यहाँ आना ही चाहिए शब्दों को, 
इतना उम्दा नया मेजपोश है यहाँ 
और इतना उम्दा कागज़! 
बर्फ जम गई फ्योर्ड पर,  
पंछी आए और उतर गए.  
            :: :: :: 

फ्योर्ड : चट्टानों से घिरी लंबी सँकरी समुद्री खाड़ी 

Sunday, June 10, 2012

ऊलाव हाउगे की दो कविताएँ

ऊलाव हाउगे की दो कविताएँ...  

 
ऊलाव हाउगे की दो कविताएँ 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

युद्ध-काल से 

एक गोली उछली मेरे फर्श पर. 
मैंने तौला उसे अपने हाथ में. 
वह आई थी खिड़की और 
लकड़ी की दो दीवारों से होते हुए. 
मैंने शक नहीं किया कि जान ले सकती थी वह. 
               :: :: :: 

तीर और गोली 

तीर आया गोली से पहले. 
इसलिए मुझे पसंद है तीर. 
मीलों तक जाती है गोली. 
किन्तु भयानक होता है उसका धमाका. 
उस समय मुस्कराता है तीर. 
               :: :: :: 

Saturday, June 9, 2012

ऊलाव हाउगे : बीज

उलाव हाउगे की एक और कविता...   

 
बीज : ऊलाव हाउगे 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

कोई जगह नहीं उगाने के लिए इसे. 
जड़ें मत निकालना, 
मत खिलाना फूल! 
यदि बचाना चाहते हो अपनी ज़िंदगी 
सख्त बने रहना और साबुत! 
            :: :: :: 

Friday, June 8, 2012

ऊलाव हाउगे : समुद्र तट पर

ऊलाव हाउगे की एक और कविता...  

 
समुद्र तट पर : ऊलाव हाउगे 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

उसने कोई जवाब नहीं दिया, बल्कि अपनी पीठ फेर ली तुम्हारी ओर -- और 
चली गई. 
और हवा ने और बादलों ने, हाँ समुद्र तक ने फेर ली 
अपनी काली पड़ती पीठ; डुबकी लगा लिया तट पर पड़े पत्थरों ने, 
हरेक लहर, हरेक तिनका निकल भागा  
किसी और तट के लिए. 
                    :: :: :: 

Sunday, May 20, 2012

ऊलाव हाउगे : मेरे पास तीन कविताएँ हैं

ऊलाव ह हाउगे की एक और कविता...  

 
मेरे पास तीन कविताएँ हैं : ऊलाव हाउगे 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मेरे पास तीन कविताएँ हैं, 
उसने कहा. 
सोचो तो कविताएँ गिनने के बारे में. 
एमिली फेंक देती थी उन्हें 
एक संदूक में, मैं  
कल्पना नहीं कर सकता कि वह गिनती रही होगी उन्हें, 
वह तो बस फैला देती थी चाय का एक पैकेट 
और लिख देती थी एक नई कविता. 
ठीक भी था यह. एक अच्छी कविता से 
आनी चाहिए चाय की महक. 
या कच्ची मिट्टी की और ताजी चीरी गई जलाऊ लकड़ी की. 
                    :: :: :: 
एमिली : प्रसिद्द अमेरिकी कवियत्री एमिली डिकिन्सन (१० दिसंबर १८३० - १५ मई १८८६). उनके जीवनकाल में उनकी बहुत कम कविताएँ प्रकाशित हुई थीं. एमिली की मृत्यु के पश्चात उनकी छोटी बहन के माध्यम से उनकी कविताएँ प्रकाश में आईं, हालांकि एमिली ने अपनी बहन से अपने कागजातों को जला डालने का वादा करवा रखा था मगर एक ताला जड़े संदूक में बंद चालीस नोटबुक और कागजों पर लिखी कविताएँ बची रह गईं.  

Saturday, May 19, 2012

ऊलाव हाउगे : तीर और कमान के साथ कई वर्षों का अनुभव

ऊलाव हाउगे की एक और कविता...  

 
तीर और कमान के साथ कई वर्षों का अनुभव : ऊलाव एच. हाउगे 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

ठीक बीचोबीच वह जो काला बिंदु है 
वहीं निशाना लगाना है तुमको, 
ठीक वहीं, जहां जाकर 
गड़ेगा तीर कांपता हुआ! 
मगर ठीक वहीं तुम नहीं लगा पाते निशाना. 
तुम करीब हो, और करीब, नहीं, 
काफी करीब नहीं. 
इसलिए जाओ तीरों को फिर से ले आने के लिए, 
वापस आओ, फिर से कोशिश करो. 
काला बिंदु चिढ़ाता है तुम्हें. 
जब तक तुम समझ नहीं जाते तीर को 
जो गड़ा है वहां कांपता हुआ: 
यहाँ भी है एक मध्य-बिंदु. 
               :: :: :: 

Wednesday, May 9, 2012

ऊलाव हाउगे : तलवार

ऊलाव ह. हाउगे की एक और कविता...  

 

तलवार : ऊलाव एच. हाउगे 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

काटती है 
तलवार 
निकाले जाने पर, 
कुछ और नहीं 
-- तो हवा को ही. 
     :: :: :: 

Tuesday, May 8, 2012

ऊलाव हाउगे : बटखरे

ऊलाव हाउगे की एक और कविता... 

 
बटखरे : ऊलाव एच हाउगे 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

क्या तुम निकल गए हो अन्तरिक्ष-यात्रा पर 
या तुम 
उन बटखरों में से एक हो 
जो ठहरे रहते हैं जमीन पर और कहते हैं 
वो कभी नहीं उठेंगे. 

बटखरों के साथ कुछ नहीं करना होता. 
वे पड़े रहते हैं वहीं. 
तुम तौल सकते हो उन्हें, कोई 
फर्क नहीं पड़ता उनको. 
मगर वे पड़े रहेंगे वहीं 
वैसे ही कड़ियल, वैसे ही सर्द. 

वही हैं, जिन्हें पता होता है 
कितनी वजनी हैं चीजें. 
               :: :: :: 

Sunday, April 22, 2012

ऊलाव हाउगे की कविता

ऊलाव हाउगे की एक और कविता... 

 
थोड़ा ऊपर निशाना लगाता हूँ मैं : ऊलाव एच. हाउगे 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

रास्ते से बहुत इधर-उधर नहीं हो सकता एक तीर,  
अपना लक्ष्य भेदने के लिए. मगर कोई अच्छा तीरंदाज 
गुंजाइश रखता है दूरी और हवा की खातिर. 
इसलिए जब तुम पर साधता हूँ निशाना, 
थोड़ा ऊपर निशाना लगाता हूँ मैं.  
                    :: :: :: 

Friday, April 20, 2012

ऊलाव एच. हाउगे : सर्द दिन

ऊलाव एच. हाउगे की एक और कविता... 

 
सर्द दिन : ऊलाव एच. हाउगे 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

एक बर्फीली चोटी के पीछे 
सूरज ढांप लेता है अपनी आँखें. 
थर्मामीटर का पारा 
सरकता जाता है नीचे, और 
नीचे -- 
इंसान की गर्माहट 
सिकुड़ जाती है 
एक 
छोटे से खोखल में. 
मैं बचा के खर्च करता हूँ जलाऊ लकड़ी 
संक्षिप्त रखता हूँ कविता. 
                    :: :: ::  

Wednesday, April 4, 2012

ऊलाव एच. हाउगे : मत आओ मेरे पास पूरा सच लेकर

आज प्रस्तुत है नार्वे के कवि एवं अनुवादक  ऊलाव एच. हाउगे  (१८ अगस्त १९०८ - २३ मई १९९४) की एक कविता.   

 











मत आओ मेरे पास पूरा सच लेकर : ऊलाव एच. हाउगे 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मत आओ मेरे पास पूरा सच लेकर.  
पूरा समुन्दर लेकर मत आओ जब प्यास लगे मुझे, 
जब रोशनी माँगू तो मत आ जाओ स्वर्ग लेकर;  
बल्कि एक झलक  लाओ, थोड़ी सी ओस, एक कतरा, 
जैसे पंछी सिर्फ कुछ बूँदें ले जाते हैं पानी से 
और नमक का एक कण ले जाती है हवा. 
                    :: :: :: 
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