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Monday, May 23, 2011

इतालो काल्विनो : चमकीली मछली


इतालो काल्विनो द्वारा संकलित इटली की लोककथाओं से एक और कहानी...














इटली की लोककथा - 3 : चमकीली मछली 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

एक बहुत शरीफ बूढा आदमी था जिसके सारे बेटे मर चुके थे, और उसे यह नहीं सूझ रहा था कि उसका और उसकी बीबी का गुजारा कैसे होगा क्योंकि वह भी बूढ़ी और बीमार थी. हर रोज वह जंगल में जाता और वहां से जलावन बटोर कर उसे बेंचता ताकि वह राशन खरीद सके और किसी तरह गुजर-बसर कर सके. 

एक दिन जब वह दुखी मन से जंगल से गुजर रहा था, उसे लम्बी दाढ़ी वाला एक भला आदमी मिला, उसने कहा, "मैं तुम्हारी मुसीबतों के बारे में जानता हूँ और तुम्हारी मदद करूंगा. यह लो इस बटुए में सौ रूपए हैं."

बूढ़े ने बटुआ ले लिया और बेहोश होकर गिर पड़ा. जब उसे होश आया, भला आदमी गायब हो चुका था. बूढ़ा घर पहुंचा और अपनी बीबी को एक भी शब्द बताए बिना बटुए को गोबर के ढेर में छुपा दिया. "अगर मैनें उसे पैसा दे दिया तो वह फ़ौरन ही खर्च कर डालेगी..." दूसरे दिन वह हमेशा की तरह फिर जंगल में गया. 

शाम को उसने खाने की मेज पर तरह-तरह के व्यंजन सजे देखे. "तुम यह सब कैसे खरीद लाई ?" उसने शंका करते हुए पूछा.

"मैनें गोबर की खाद बेंच डाली," उसकी बीबी ने बताया.

"अभागी ! मैनें उसमें सौ रूपए छिपाए थे !"

अगले दिन बूढ़ा और ज्यादा आहें भरते हुए जंगल से गुजर रहा था. उसे फिर से वही लम्बी दाढ़ी वाला भला आदमी मिला. "मुझे तुम्हारी बदकिस्मती के बारे में पता है," उसने कहा. "शांत हो जाओ. यह लो सौ रूपए और."

इस बार बूढ़े ने पैसों को राख के ढेर में छुपा दिया. अगले दिन उसकी बीबी ने राख भी बेंच कर एक और शानदार दावत का इंतजाम किया. जब बूढ़े ने लौटकर यह सब देखा तो उससे एक कौर भी न खाया गया और वह अपने बाल नोचते हुए बिस्तर पर लेट गया. 

अगली सुबह वह जंगल में बैठा रो रहा था जब फिर से वह भला आदमी प्रकट हुआ. "इस बार मैं तुम्हें पैसे नहीं दूंगा. यह चौबीस मेढक लो और इन्हें बेंचकर जो सबसे बड़ी मछली तुम्हें मिले, खरीद लेना." 

बूढ़े ने मेढकों को बेंचकर एक मछली खरीद ली. रात में उसने पाया कि वह जगमगा रही थी ; उससे बहुत तेज रोशनी निकलती थी जो चारो ओर उजाला कर रही थी. उसे पकड़ना एक लालटेन लेकर चलने जैसा था. शाम को उसने मछली को तरोताजा बनाए रखने के लिए उसे खिड़की के बाहर लटका दिया. वह अंधेरी और तूफानी रात थी. ऊंची-ऊंची लहरों के बीच समुद्र में फंसे मछुवारे अपना रास्ता नहीं पा रहे थे. खिड़की पर रोशनी देखकर उन्होंने उसी तरफ अपनी नाव खेई और बच गए. उन्होंने बूढ़े को मछलियों से हुई कमाई का आधा हिस्सा दे दिया और उससे समझौता किया कि यदि वह हर रात खिड़की पर अपनी मछली लटका दिया करे, तो हर रात की कमाई में से उसे भी हिस्सा मिलेगा. उन्होंने ऐसा ही किया और उस शरीफ बूढ़े आदमी के सारे दुःख दूर हो गए.   
                                                                   :: :: ::

Saturday, May 7, 2011

इतालो काल्विनो की कहानी 'वजह'


इतालो काल्विनो की कहानियों के क्रम में आज उनकी एक और छोटी कहानी, 'वजह'. रचनाकाल 1943 















वजह  :  इतालो काल्विनो 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

एक कस्बा था जहां सारी चीजों की मनाही थी.

अब चूंकि सिर्फ गुल्ली-डंडा का खेल ही इकलौती ऎसी चीज थी जिसकी मनाही नहीं थी, तो सारे लोग क़स्बे के पीछे के घास के मैदान पर जुटते और गुल्ली-डंडा खेलते हुए अपने दिन बिताते. 

और चूंकि चीजों को प्रतिषिद्ध करने वाले क़ानून हमेशा बेहतर तर्कों के साथ और एक-एक कर बनाए गए थे, किसी के पास न तो शिकायत करने की कोई वजह थी और न ही उन कानूनों का आदी होने में उन्हें कोई मुश्किल आई.   

सालों बीत गए. एक दिन हुक्मरानों को समझ में आया कि हर चीज की मनाही की कोई तुक नहीं है तो उन्होंने सारे लोगों तक यह बात पहुंचाने के लिए हरकारे दौड़ाए कि वे जो चाहे कर सकते हैं. 

हरकारे उन जगहों पर गए जहां जुटने के लोग आदी थे.

'सुनो, सुनो' उन्होंने एलान किया, 'अब किसी चीज की मनाही नहीं है.'

जनता गुल्ली-डंडा खेलती रही. 

'समझ में आया ?' हरकारों ने जोर देकर कहा. 'तुम जो चाहो वो करने के लिए आज़ाद हो.'

'अच्छी बात है,' लोगों ने जवाब दिया. 'हम गुल्ली-डंडा खेल तो रहे हैं.'

हरकारों ने जल्दी-जल्दी उन तमाम अनोखे और फायदेमंद धंधों की बाबत उन्हें याद दिलाया जिनमें कभी वे सब मसरूफ़ हुआ करते थे और अब, वे एक बार फिर से उन्हें कर सकते थे. मगर लोगों ने उनकी बात नहीं सुनी और वे बिना दम लिए, प्रहार दर प्रहार गुल्ली-डंडा खेलने में लगे रहे. 

अपनी कोशिशों को जाया होते देख हरकारे यह बात हुक्मरानों को बताने के लिए गए. 

'सीधा सा उपाय है,' हुक्मरानों ने कहा. 'गुल्ली-डंडा के खेल की ही मनाही कर देते हैं.'

यही वह बात थी जिसपर लोगों ने बगावत कर दी और हुक्मरानों को मार डाला.

और बिना वक़्त बर्बाद किए वे फिर से गुल्ली-डंडा खेलने लगे.  
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Tuesday, April 26, 2011

इतालो काल्विनो की कहानी


इतालो काल्विनो की कहानियों के क्रम में आज उनकी कहानी 'द मैन हू शाऊटेड टेरेसा' का हिन्दी अनुवाद...












टेरेसा को आवाज़ देने वाला आदमी : इतालो काल्विनो 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

मैं फुटपाथ से नीचे उतर आया, ऊपर देखते हुए कुछ कदम पीछे की ओर चला, और अपने हाथों को मुंह के पास ला, भोंपू सा बनाकर, सड़क के बीचोबीच से इमारत की सबसे ऊपरी मंजिलों की तरफ चिल्लाया : 'टेरेसा !'  

मेरी परछाईं चंद्रमा से डरकर मेरे पैरों के बीच सिमट गई. 

कोई पास से गुजरा. मैं फिर चिल्लाया : 'टेरेसा !' वह आदमी मेरे पास आया और बोला : 'अगर तुम और तेज नहीं चिल्लाए तो वह तुम्हारी आवाज़ नहीं सुन पाएगी. चलो हम दोनों मिलकर कोशिश करते हैं. तीन तक गिनो, तीन आने पर हम एक साथ चिलाएंगे.' और फिर उसने गिना : 'एक, दो, तीन.' और हम दोनों ने गुहार लगाई. 'टेरेसाssss !' 

उधर से गुजरती कुछ दोस्तों की एक छोटी सी टोली ने, जो शायद थियेटर से या फिर काफीघर से लौट रही थी, हमें आवाज़ लगाते देखा. वे बोल पड़े : 'चलो, हम भी आवाज़ लगाने में तुम्हारी मदद करते हैं.' और वे सड़क के बीचोबीच हमारे साथ आ खड़े हुए और पहले आदमी ने एक दो तीन गिना जिसपर सारे लोग मिलकर चिल्लाए, 'टे-रेsss-साsss !'   

कोई और भी आया और हमारे साथ हो लिया ; लगभग पंद्रह मिनटों में हमारी अच्छी खासी संख्या हो गई, बीस के आस पास. थोड़े-थोड़े अंतराल पर कोई न कोई नया आदमी आता ही जा रहा था. 

एक ही समय पर बढ़िया ढंग से आवाज़ देने के लिए खुद को संगठित करना आसान न था. तीन के पहले ही कोई न कोई  हमेशा शुरू हो जाता था या कोई देर तक आवाज़ देता रह जाता था, लेकिन आखिरकार हम कुछ ठीक-ठाक ही निपटा ले जा रहे थे. हम इस बात पर राजी हुए थे कि 'टे' को धीमे और देर तक बोलना है, 'रे' को जोर से और देर तक, जबकि 'सा' को धीमे और थोड़े समय के लिए. यह बढ़िया लग रहा था. बस यदा कदा कुछ शोरगुल  मच जाता, जब कोई बाहर निकल आता था.   

हम इस काम को ठीक-ठीक करना शुरू ही कर रहे थे जब किसी ने, जिसकी आवाज़ से अंदाजा मिल रहा था कि जरूर वह चित्ते पड़े हुए चेहरे वाला होगा, पूछा : 'मगर क्या तुम पक्का जानते हो कि वह घर पर होगी ?' 
'नहीं,' मैनें कहा.
'यह तो बहुत बुरा हुआ,' कोई और बोला. 'तुम जरूर अपनी चाभी भूल गए होगे, है ना ?'
'दरअसल,' मैं बोला, 'मेरे पास अपनी चाभी है.'
'तो फिर' उन्होंने कहा, 'तुम सीधे ऊपर ही क्यों नहीं चले जाते ?'
'अरे लेकिन मैं यहाँ नहीं रहता,' मैनें जवाब दिया. 'मैं शहर के उस तरफ रहता हूँ.'
'ठीक है, मेरी जिज्ञासा के लिए मुझे माफ़ करिएगा, फिर यहाँ कौन रहता है ?' उसी चित्तीदार आवाज़ वाले ने सावधान स्वर में पूछा.
'मुझे कैसे पता हो सकता है,' मैनें कहा.

लोग इस बात को लेकर थोड़ा परेशान हो गए.

'तो क्या आप मेहेरबानी करके बताएंगे,' किसी ने पूछा, ' कि आप यहाँ टेरेसा-टेरेसा पुकारते हुए क्यों खड़े हैं ?'
'जहां तक मेरी बात है,' मैनें कहा, 'हम कोई और नाम पुकार सकते हैं, या किसी और जगह ऎसी कोशिश कर सकते हैं. यह कोई ख़ास बात नहीं है.'

दूसरे लोग भी कुछ नाराज होने लगे. 
'मैं उम्मीद करता हूँ कि तुम हमारे साथ कोई चाल नहीं चल रहे होगे ? उसी चित्तेदार चेहरे वाले ने सन्देहपूर्वक पूछा. 
'क्या ?' मैनें नाराजगी जताते हुए कहा, और अपनी सच्चाई की पुष्टि के लिए बाक़ी लोगों की तरफ मुड़ा. यह दिखाते हुए कि वे इशारे को नहीं समझ पाए थे, उन लोगों ने कुछ भी नहीं कहा.     

एक पल के लिए उलझन छाई रही.

'देखो' किसी ने भलमनसाहत से कहा, 'क्यों न हम एक आखिरी बार टेरेसा आवाज़ लगाएं, फिर अपने घर चले जाएं.'

तो हम लोगों ने एक बार फिर वैसा ही किया. 'एक दो तीन टेरेसा !' मगर इसबार आवाज़ कुछ ख़ास ठीक से नहीं निकली. फिर लोग अपने घरों की तरफ चल पड़े, कुछ एक रास्ते, और कुछ दूसरे. 

मैं चौराहे की तरफ मुड़ चुका था, जब मुझे लगा कि मैनें एक आवाज़ सुनी जो अब भी पुकार रही थी : 'टेssरेssसाss!'    

जरूर कोई चिल्लाते रहने के लिए रुक गया था. कोई जिद्दी शख्स. 
Italo Calvino Stories Translated in Hindi, Manoj Patel Anuvaadak, Padhte Padhte 

Monday, April 4, 2011

इतालो काल्विनो : एक बेमेल इंसान


चोरों के देश में एक ईमानदार आदमी रहने क्या आ गया पूरी व्यवस्था ही गड़बड़ा गयी. पढ़िए इतालो काल्विनो की यह बेहतरीन कहानी. उनकी और कहानियां आप यहाँ और यहाँ पढ़ सकते हैं.
















एक बेमेल इंसान 

एक ऐसा देश था, जिसके सारे निवासी चोर थे.

रात में नकली चाभियों के गुच्छे और लालटेन के साथ सभी लोग अपने-अपने घर से निकलते और किसी पड़ोसी के घर में चोरी कर लेते. सुबह जब माल-मत्ते के साथ वे वापस आते तो पाते कि उनका भी घर लुट चुका है. 

तो इस तरह हर शख्स खुशी-खुशी एक-दूसरे के साथ रह रहा था, किसी का कोई नुकसान नहीं होता था क्योंकि हर इंसान दूसरे के घर चोरी करता था, और वह दूसरा किसी तीसरे के घर और यह सिलसिला चलता रहता था उस आखिरी शख्स तक जो कि पहले इंसान के घर सेंध मारता था. उस देश के व्यापार में अनिवार्य रूप से, खरीदने और बेचने वाले दोनों ही पक्षों की धोखाधड़ी शामिल होती थी. सरकार अपराधियों का एक संगठन थी जो अपने नागरिकों से हड़पने में लगी रहती थी, और नागरिकों की रूचि केवल इसी बात में रहती थी कि कैसे सरकार को चूना लगाया जाए. इस तरह ज़िंदगी सहज गति से चल रही थी, न तो कोई अमीर था न तो कोई गरीब.

एक दिन, यह तो हमें नहीं पता कि कैसे, कुछ ऐसा हुआ कि उस जगह पर एक ईमानदार आदमी रहने के लिए आ गया. रात में बोरा और लालटेन लेकर बाहर निकलने की बजाए वह घर में ही रुका रहा और सिगरेट पीते हुए उपन्यास पढ़ता रहा.  

चोर आए और बत्ती जलती देखकर अन्दर नहीं घुसे. 

ऐसा कुछ दिन चलता रहा : फिर उन्होंने उसे खुशी-खुशी यह समझाया कि भले ही वह बिना कुछ किए ही गुजर करना चाहता हो, लेकिन दूसरों को कुछ करने से रोकने का कोई तुक नहीं है. उसके हर रात घर पर बिताने का मतलब यह है कि अगले दिन किसी एक परिवार के पास खाने के लिए कुछ नहीं होगा. 

ईमानदारी आदमी बमुश्किल ही इस तर्क पर कोई ऐतराज कर सकता था. वह उन्हीं की तरह शाम को बाहर निकलने और अगली सुबह घर वापस आने के लिए राजी हो गया. लेकिन वह चोरी नहीं करता था. वह ईमानदार था, और इसके लिए आप उसका कुछ कर भी नहीं सकते थे. वह पुल तक जाता और नीचे पानी को बहता हुआ देखा करता. जब वह घर लौटता तो पाता कि वह लुट चुका है. 

हफ्ते भर के भीतर ईमानदारी आदमी ने पाया कि उसके पास एक भी पैसा नहीं बचा है, उसके पास खाने के लिए कुछ नहीं है और उसका घर भी खाली हो चुका है. लेकिन यह कोई ख़ास समस्या न थी, क्योंकि यह तो उसी की गलती थी ; असल समस्या तो यह थी कि उसके इस बर्ताव से बाक़ी सारी चीजें गड़बड़ा गयी थीं. क्योंकि उसने दूसरों को तो अपना सारा माल-मत्ता चुरा लेने दिया था जबकि उसने किसी का कुछ नहीं चुराया था. इसलिए हमेशा कोई न कोई ऐसा शख्स होता था जो, जब सुबह घर लौटता तो पाता कि उसका घर सुरक्षित है : वह घर जिसमें उस ईमानदार आदमी को चोरी करना चाहिए था. कुछ समय के बाद उन लोगों ने जिनका घर सुरक्षित रह गया था अपने आप को दूसरों के मुकाबले कुछ अमीर पाया और उन्हें यह लगा कि अब उन्हें चोरी करने की जरूरत नहीं रह गयी है. मामले की गंभीरता और अधिक कुछ यूं बढ़ी कि जो लोग ईमानदार आदमी के घर में चोरी करने आते, उसे हमेशा खाली ही पाते ; इस तरह वे गरीब हो गए. 

इस बीच, उन लोगों में जो अमीर हो गए थे, ईमानदार आदमी की ही तरह रात में पुल पर जाने और नीचे बहते हुए पानी को देखने की आदत पड़ गयी. इससे गड़बड़ी और बढ़ गयी क्योंकि इसका मतलब यही था कि बहुत से और लोग अमीर हो गए हैं तथा बहुत से और लोग गरीब भी हो गए हैं.  

अब अमीरों को लगा कि अगर वे हर रात पुल पर जाना जारी रखेंगे तो वे जल्दी ही गरीब हो जाएंगे. तो उन लोगों को सूझा : 'चलो कुछ ग़रीबों को पैसे पर रख लिया जाए जो हमारे लिए चोरियां किया करें'. उन लोगों ने समझौते किए, तनख्वाहें और कमीशन तय किया : अब भी थे तो वे चोर ही, इसलिए अब भी उन्होंने एक-दूसरे को ठगने की कोशिश की. लेकिन, जैसा कि होता है, अमीर और भी अमीर होते गए जबकि गरीब और भी गरीब. 

कुछ अमीर लोग इतने अमीर हो गए कि उन्हें अमीर बने रहने के लिए चोरी करने या दूसरों से कराने की जरूरत नहीं रह गयी. लेकिन अगर वे चुराना बंद कर देते तो वे गरीब हो जाते क्योंकि गरीब तो उनसे चुराते ही रहते थे. इसलिए उनलोगों ने ग़रीबों में भी सबसे गरीब को अपनी जायदाद को दूसरे ग़रीबों से बचाने के लिए पैसे देकर रखना शुरू कर दिया, और इसका मतलब था पुलिस बल और कैदखानों की स्थापना. 

तो हुआ यह कि ईमानदार आदमी के प्रगट होने के कुछ ही साल बाद, लोगों ने चोरी करने या लुट जाने के बारे में बातें करना बंद कर दिया. अब वे सिर्फ अमीर और गरीब की बात किया करते थे ; लेकिन अब भी थे वे चोर ही. 

इकलौता ईमानदार आदमी वही शुरूआत वाला ही था, और वह थोड़े समय बाद ही भूख से मर गया था.    

(अनुवाद : मनोज पटेल) 
Italo Calvino stories in Hindi Translation 

Monday, December 6, 2010

इतालो काल्विनो की कहानी

( इतालो काल्विनो द्वारा संकलित इटली की लोककथाओं से एक कहानी आप पहले पढ़ चुके हैं. आज उसी संकलन से दूसरी कहानी - Padhte Padhte )
 इटली की लोककथा - 2  :  क्रैक और कुक 


बहुत दूर एक शहर में क्रैक नाम का एक नामी चोर हुआ करता था जो कभी पकड़ा नहीं गया था. क्रैक एक दूसरे बदनाम चोर क्रुक से मिलना चाहता था ताकि दोनों मिलकर चोरियां कर सकें. एक दिन क्रैक एक सराय में एक अजनबी के सामने मेज पर बैठा खाना खा रहा था. अचानक उसकी निगाह अपनी घड़ी की तरफ गई तो उसने उसे गायब पाया. उसने सोचा कि इस दुनिया में क्रुक के सिवा और कौन ऐसा है जो मेरी जानकारी के बिना मेरी घड़ी इतनी सफाई से चुरा सकता है. अब क्रैक के पास जवाब में क्रुक का बटुआ चुराने के सिवा और कोई चारा ही नहीं था. जब उस अजनबी ने अपने खाने का पैसा चुकाना चाहा तो पाया कि उसका बटुआ गायब है. तब वह मेज के अपने साथी से मुखातिब हुआ, "अच्छा तुम जरूर क्रैक होगे."  

"और तुम क्रुक होगे."
"बिलकुल ठीक."
"बढ़िया, अब हम दोनों मिलकर काम किया जाए."
वे दोनों शहर पहुंचे और राजा के खजाने को चुराने की योजना बनाने लगे जो कि चारो तरफ से पहरेदारों से घिरा रहता था. दोनों ने नीचे ही नीचे सुरंग खोद डाली और पूरा खजाना साफ़ कर दिया. चोरों को पकड़ने के वास्ते राजा को कोई उपाय ही नहीं सूझ रहा था. इसलिए राजा चोरी के मामले में सजा काट रहे स्नेअर नाम के एक आदमी के पास पहुंचे और कहा, "अगर तुम यह पता लगा दो कि यह चोरी किसकी करतूत है तो मैं तुम्हें आज़ाद कर दूंगा और कोई ओहदा भी दे दूंगा." 

स्नेअर ने जवाब दिया, " यह करतूत क्रैक या क्रुक के सिवा और किसी की नहीं हो सकती या हो सकता है दोनों ने मिलकर इसे अंजाम दिया हो क्योंकि वही दोनों सबसे काबिल चोर हैं जो ज़िंदा बचे हैं. लेकिन मैं उन्हें पकड़वा सकता हूँ. आप ऐसा करिए कि मांस का दाम बढ़ाकर सौ डालर प्रति पौण्ड कर दीजिए. जो आदमी इतना महँगा मांस खरीदेगा वही चोर होगा." 

राजा ने मांस का दाम बढ़ाकर सौ डालर प्रति पौण्ड कर दिया जिससे सबने मांस खरीदना बंद कर दिया. आख़िरकार यह सूचना आई कि किसी पादरी ने एक कसाई से मांस खरीदा है. स्नेअर ने कहा, "वह क्रैक या कुक में से ही कोई वेश बदलकर रहा होगा. अब मैं भी वेश बदलकर घर-घर भिक्षा मांगने जाता हूँ. अगर कोई मुझे भिक्षा में मांस देता है तो मैं उसके दरवाजे पर लाल रंग से निशान लगा दूंगा जिससे कि आपके सिपाही बाद में जाकर चोरों को पकड़ लें." 

लेकिन जब उसने क्रैक के दरवाजे पर लाल निशान लगाया तो क्रैक ने उसे देख लिया और जाकर शहर के सभी दरवाजों पर लाल निशान लगा दिया जिससे कि पता ही न लग पाए कि क्रैक और कुक किस घर में रहते हैं. 

स्नेअर ने राजा से कहा, "मैनें आपसे कहा था न कि वे दोनों बहुत चालक हैं. लेकिन शायद उन्हें पता नहीं कि उनसे भी चालक कोई मौजूद है. अगला काम यह करना है : उबलते हुए अलकतरे का एक टब खजाने की सीढियों के नीचे रखवा दीजिए. जो कोई भी चोरी करने के लिए नीचे उतरेगा, टब में गिर जाएगा और फिर उसकी लाश ही बाहर आएगी." 

इस बीच क्रैक और क्रुक के पैसे ख़त्म हो गए तो उन्होंने और पैसों के लिए खजाने का फेरा लगाने का फैसला किया. क्रुक पहले घुसा और अँधेरा होने के कारण टब में गिर पडा. क्रैक ने अपने साथी की देह अलकतरे से बाहर खींचने की कोशिश की लेकिन उसकी देह अलकतरे में एकदम चिपक चुकी थी. तब उसने क्रुक का सर काट लिया और उसे अपने साथ लेता गया. 

अगले दिन राजा यह देखने के लिए गया कि कोई चोर उसके जाल में फंसा या नहीं. " पकड़ लिया, इस बार हमने उसे पकड़ ही लिया ! "  लेकिन लाश का तो सर ही गायब था इसलिए यह कहना मुश्किल था कि वह चोर की ही लाश थी या उसके किसी सहयोगी की.  

स्नेअर ने कहा, " हम एक काम और कर सकते हैं. लाश को दो घोड़ों से बांधकर पूरे शहर में घसीटा जाए, जिस घर से रोने की आवाज़ आए वह चोर का ही घर होना चाहिए." 

हुआ भी यही, जब क्रुक की बीवी ने खिड़की से देखा कि उसके पति की लाश को सड़कों पर घसीटा जा रहा है तो वह रोने-चीखने लगी. लेकिन क्रैक वहीं था और वह तुरंत ही समझ गया कि इस तरह तो वह पकड़ा जाएगा. इसलिए उसने इधर-उधर बर्तन फेंकने शुरू कर दिए और साथ ही उस बेचारी औरत की पिटाई भी करने लगा. चीखने-चिल्लाने की आवाज़ सुनकर सिपाही वहां पहुंचे तो उन्होंने पाया कि घर के सारे बर्तन तोड़ देने की वजह से एक पति अपनी पत्नी की पिटाई कर रहा है. 

तब राजा ने हर नुक्कड़ पर अपना फरमान चिपकवा दिया कि वह उस चोर को माफ़ कर देगा जिसने उसका सारा माल साफ कर दिया है यदि वह रात में सोते समय उसके नीचे से चादर चुराने में कामयाब हो जाए. क्रैक ने भी सामने आ इस चुनौती को स्वीकार कर कहा कि वह ऐसा कर सकता है. 

उस रात राजा कपड़े बदलकर अपनी बन्दूक के साथ बिस्तर पर गया और चोर का इंतज़ार करने लगा. क्रैक ने कब्र खोदने वाले से एक लाश का जुगाड़ किया और उसे अपने कपड़े पहनाकर महल की छत पर ले गया. आधी रात के वक्त रस्सी से बंधी हुई लाश राजा की खिड़की के सामने झूलती हुई दिखाई पड़ी. यह समझकर कि यह क्रैक है राजा ने उसपर गोली चला दिया और रस्सी समेत उसे नीचे गिरते देखा. फिर वह दौड़ा-दौड़ा यह देखने नीचे भागा कि क्रैक मर गया है या नहीं. जब राजा नहीं था उसी बीच क्रैक उसके कमरे में घुसा और चादर को चुरा लिया. इस तरह क्रैक को माफ़ कर दिया गया और उसे फिर से चोरी न करनी पड़े इसलिए राजा ने अपनी बेटी की शादी उसके साथ कर दिया.  

(अनुवाद : Manoj Patel) 
Italo Calvino 

Wednesday, November 3, 2010

इटली की लोककथा : इतालो काल्विनो

( इटली के मशहूर लेखक इतालो काल्विनो (1923-1985) अपनी विलक्षण किस्सागोई के लिए जाने जाते हैं. इन्होनें इनविजिबल सिटीज और इफ आन अ विंटर्स नाईट अ ट्रेवलर जैसे उपन्यास लिखे हैं. इटली की 200 लोककथाओं का इनके द्वारा किया गया संकलन 1956 में प्रकाशित हुआ था. - Padhte Padhte )

पैसा सबकुछ कर सकता है 


एक बार एक बहुत रईस शहजादे ने राजा के महल के ठीक सामने उससे भी शानदार एक महल बनवाने का निश्चय किया. महल जब बनकर पूरा  हो गया तो उसने सामने की तरफ बड़े-बड़े अक्षरों में लिखवा दिया कि " पैसा सबकुछ कर सकता है." 


राजा ने बाहर आकर जब इसे देखा तो फ़ौरन शहजादे को बुला भेजा जो शहर में अभी नया ही था और अभी तक उसने दरबार में हाजिरी नहीं बजाई थी. 

"मुबारक हो," राजा ने कहा. "तुम्हारा महल तो सचमुच अजूबा है. उसके सामने मेरा गरीबखाना तो झोपड़ी जैसा लगता है. मुबारक ! लेकिन यह लिखाना क्या तुम्हें ही सूझा था कि : पैसा सबकुछ कर सकता है ?" 

शहजादे ने महसूस किया कि शायद वह हद पार कर गया था. 

"जी हाँ यह मेरा ही ख़याल था," उसने जवाब दिया, "लेकिन जहाँपनाह को यदि यह नागवार लग रहा हो तो मैं उसे मिटवा देता हूँ." 

"अरे नहीं, मुझे लगा कि यह तुम्हारा ख्याल नहीं रहा होगा. मैं बस तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता था कि इस बात से तुम्हारा क्या मतलब था. मिसाल के तौर पर क्या तुम्हें ऐसा लगता है कि अपने पैसों से तुम मुझे क़त्ल भी करा सकते हो ?"    

शहजादे को लग गया कि वह कायदे से फंस चुका था. 

"मुझे माफ़ कीजिए हुजूर. मैं फ़ौरन उन लफ़्ज़ों को मिटवा देता हूँ. और अगर आपको मेरा महल नापसंद हो तो बस हुक्म कीजिए, मैं उसे भी जमींदोज करवा दूंगा." 

"नहीं, नहीं उसे वैसा ही बना रहने दो. लेकिन चूंकि तुम दावा करते हो कि एक पैसे वाला शख्स कुछ भी कर सकता है, मुझे यह साबित करके दिखाओ. अपनी बेटी से बात करने की कोशिश करने के लिए मैं तुम्हें तीन दिन का मौक़ा देता हूँ. अगर तुम उससे बात करने में कामयाब रहे तो ठीक है, तुम्हारी उससे शादी करवा दी जाएगी. अगर नहीं. तो मैं तुम्हारा सर कलम करवा दूंगा. समझ गए ?" 

शहजादा इतना परेशान हो उठा कि उसका खाना, पीना और सोना तक हराम हो गया. रात-दिन वह सोंचा करता कि वह कैसे अपनी गर्दन बचाए. दूसरे दिन तक तो उसे अपनी नाकामयाबी के प्रति इतना इत्मिनान हो चुका था कि वह अपनी वसीयत करने के बारे में सोचने लगा. उसके हालात भी नाउम्मीद करने वाले थे क्योंकि राजा की बेटी सौ पहरेदारों से घिरे किले में बंद रहती थी. किसी चिथड़े की तरह पीला और ढीला सा वह बिस्तर पर पड़े-पड़े अपनी मौत का इंतज़ार कर रहा था जब उसकी बूढ़ी दाई उससे मिलने आई. इस जर्जर बूढ़ी दाई ने उसे बचपन में खिलाया था और अब भी उसके यहाँ काम कर रही थी. उसका मरियल सा चेहरा देखकर इस बूढ़ी औरत ने पूछा कि क्या गड़बड़ थी. हकलाते हुए शहजादे ने उसको पूरी कहानी कह सुनाई. 

"तो क्या हुआ ?" दाई ने कहा, "तुम इस तरह उम्मीद छोड़े बैठे हो ? तुम पर तो मुझे हँसी आ रही है. देखो मैं क्या कर सकती हूँ !"   

वह डगमगाते क़दमों से शहर के सबसे काबिल सुनार के पास पहुंची और उससे ठोस चांदी का एक हंस बनाने के लिए कहा जो अपनी चोंच खोले-बंद करे. हंस को आदमकद और अन्दर से खोखला होना था. "और हाँ यह कल तक तैयार हो जाना चाहिए," उसने जोड़ा. 

"कल ? तुम होश में तो हो !" सुनार चिल्लाया. 

"मैनें कहा न कल !" उस बूढ़ी औरत ने सोने की अशर्फियों से भरा एक बटुआ निकाला और बोलती गई "ज़रा सोचो. यह पेशगी रकम है. बाक़ी तुम्हें कल मिल जाएगी जब तुम हंस तैयार करके मेरे सुपुर्द कर दोगे."   

सुनार हक्का-बक्का रह गया. "यही चीज तो है दुनिया में जिसकी बात ही और है," उसने कहा. "मैं कल तक हंस तैयार करने की भरसक कोशिश करूंगा."    

अगले दिन तक हंस तैयार हो गया और बहुत खूब तैयार हुआ. 

बूढ़ी औरत ने शहजादे से कहा, "अपनी वायलिन लेकर हंस के भीतर बैठ जाओ. जैसे ही हम सड़क पर पहुंचें तुम वायलिन बजाने लगना." 

हंस के भीतर बैठा शहजादा वायलिन बजाता रहा और बूढ़ी दाई चांदी के उस हंस को एक फीते के सहारे खींचती हुई शहर का चक्कर लगाने लगी. उसे देखने के लिए सड़कों पर लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी : शहर में ऐसा कोई भी न बचा जो उस खूबसूरत हंस को देखने के लिए दौड़ा न आया हो. यह बात उस किले तक भी पहुंची जहाँ राजा की बेटी बंद थी, उसने अपने अब्बा हुजूर से बाहर निकलकर यह अनोखा दृश्य देखने की अनुमति मांगी. 

राजा ने कहा, "उस शेखीबाज शहजादे को मिला मौक़ा कल ख़त्म हो जाने दो. तब तुम बाहर निकलना और हंस देख लेना." 

लेकिन राजा की बेटी ने सुन रखा था कि कल तक हंस वाली बूढ़ी औरत चली जाएगी. इसलिए राजा ने हंस को किले के अन्दर ले जाने दिया ताकि उसकी बेटी हंस को देख सके. बूढ़ी दाई को इसी बात की उम्मीद थी. जैसे ही शहजादी ने चांदी के उस हंस के साथ अकेले में उसकी चोंच से निकल रहे संगीत का आनंद लेना शुरू किया, अचानक हंस खुल पड़ा और उसमें से एक नौजवान ने बाहर कदम रखा. 

"डरो मत," उस आदमी ने कहा, "मैं वही शहजादा हूँ जो अगर तुमसे बात न कर सका तो कल सुबह तुम्हारे अब्बा हुजूर मेरा सर कलम करवा देंगे. तुम उनसे यह बताकर मेरी जान बचा सकती हो कि तुम मुझसे बात कर चुकी हो."  

अगले दिन राजा ने शहजादे को बुला भेजा. "हाँ, तो क्या मेरी बेटी से बात करने में तुम्हारा पैसा तुम्हारे कोई काम आया ?"

"जी हाँ जहाँपनाह," शहजादे ने जवाब दिया. 

"क्या ! तुम्हारा मतलब तुमने उससे बात किया ?" 

"उसी से पूछ लीजिए." 

शहजादी आई और उसने बताया कि कैसे वह चांदी के हंस में छुपा हुआ था जिसे खुद राजा के हुक्म पर किले में घुसने दिया गया था. 

इसपर राजा ने अपना मुकुट उतारकर शहजादे के माथे पर रख दिया. "इसका मतलब तुम्हारे पास सिर्फ पैसा ही नहीं बल्कि एक अच्छा दिमाग भी है. जाओ खुश रहो ! मैं अपनी बेटी का हाथ तुम्हारे हाथों में सौंपता हूँ."  


(अनुवाद : Manoj Patel ) 

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