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Monday, March 12, 2012

चेस्लाव मिलोश : नदियाँ छोटी होती जाती हैं

चेस्लाव मिलोष की एक और कविता...   










नदियाँ छोटी होती जाती हैं : चेस्लाव मिलोश 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

नदियाँ छोटी होती जाती हैं. शहर छोटे होते जाते हैं. और शानदार बगीचे 
हमें वह दिखाते हैं जो हमने पहले नहीं देखा था: मुड़ी-तुड़ी पत्तियाँ और धूल. 
जब पहली बार मैं तैरा था झील के आर-पार 
तो बहुत बड़ी लगी थी वह मुझे, यदि इन दिनों गया होता मैं वहां 
तो हजामत वाले कटोरे जैसी लगती वह मुझे 
उत्तर-हिमकालीन चट्टानों और हपुषा के पेड़ों के बीच. 
हलीना गाँव के पास का जंगल कभी आदिम लगता था मुझे   
पिछले, मगर हाल ही में मारे गए भालू की गंध से युक्त, 
अलबत्ता एक जुता हुआ खेत नजर आता था चीड़ के पेड़ों के बीच से. 
जो अलग था वह आम ढंग की एक किस्म बन जाता है. 
मेरी नींद तक में चेतना बदल लेती है अपने प्राथमिक रंगों को. 
मेरे चेहरे के नाक-नक्श पिघल जाते हैं जैसे आग में कोई गुड़िया मोम की. 
और कौन राजी हो सकता है आईने में महज आदमी का चेहरा देखने के लिए? 
                                                                                             बर्कले, १९६३ 
                                        :: :: :: 

Monday, March 5, 2012

चेस्लाव मिलोश : चाहिए, नहीं चाहिए

चेस्लाव मिलोश की एक कविता...

 

चाहिए, नहीं चाहिए : चेस्लाव मिलोश 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

एक आदमी को प्रेम नहीं करना चाहिए चन्द्रमा से.
उसके हाथों में वजन कम नहीं होना चाहिए एक कुल्हाड़ी का. 
सड़ रहे सेबों की बदबू आनी चाहिए उसके बगीचे से 
और उसे अच्छी संख्या में उगानी चाहिए बिच्छू-बूटियाँ 
बातें करते समय एक आदमी को नहीं इस्तेमाल करने चाहिए ऐसे शब्द 
जो प्रिय हों उसे,
न ही फोड़ के देखना चाहिए एक बीज को कि क्या है इसके भीतर. 
उसे गिराना नहीं चाहिए रोटी का कोई टुकड़ा,
या थूकना नहीं चाहिए आग में 
(लिथुआनिया में तो मुझे यही सिखाया गया था).
जब वह कदम रखे संगमरमर की सीढ़ियों पर, 
किनारे से चिप्पी उतारने की कोशिश करनी चाहिए 
उस जाहिल को अपने जूते से 
यह याद दिलाने की खातिर कि हमेशा नहीं रहनी हैं सीढ़ियाँ. 
                                                                       बर्कले, १९६१ 
                    :: :: ::
Manoj Patel, चेस्वाव मिवोश 

Monday, December 26, 2011

चेस्लाव मिलोश : यह दुनिया

चेस्लाव मिलोश की एक और कविता...


यह दुनिया : चेस्लाव मिलोश 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

ऐसा लगता है कि वह सब एक गलतफहमी ही थी.

गंभीरता से ले लिया गया था एक परीक्षण जांच को. 

नदियाँ लौट जाएंगी अपने उद्गम की तरफ. 

हवा ठहर जाएगी एकदम शांत होकर. 

बढ़ने की बजाए पेड़ रुख करेंगे अपनी जड़ों की ओर. 

बूढ़े लोग पीछे भागेंगे एक गेंद के, आईने पर एक निगाह --

और फिर से बच्चे हो जाएंगे वे. 

मुर्दे ज़िंदा हो जाएंगे, समझ नहीं पाएंगे वे तमाम बातों को 

जब तक अघटित नहीं हो जातीं सारी घटित बातें. 

कितनी राहत की बात है! चैन की सांस लो तुम 

जिसने उठाई है इतनी तकलीफ. 
                    :: :: :: 
Manoj Patel

Saturday, December 24, 2011

चेस्लाव मिलोश : गोल बिंदियों की छींट वाली पोशाक

चेस्लाव मिलोश की एक और कविता...

 

गोल बिंदियों की छींट वाली एक पोशाक : चेस्लाव मिलोश 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

उसकी गोल बिंदियों की छींट वाली पोशाक -- बस 
इतना ही जानता हूँ उसके बारे में. 
एक बार, अपनी बन्दूक लिए एक जंगल में चुपचाप घूमते हुए 
मैं ठोकर खा गया था उससे, जो खाली जगह पर एक कम्बल बिछाए  
लेटी हुई थी माइकल के साथ. 
एक छोटी सी मांसल चीज,
लोग बताते थे कि वह किसी अधिकारी की बीवी है.
जरूर ज़ोसिया रहा होगा उसका नाम.  

शाम हो गई थी मुझे काले समुन्दर तक पहुँचते-पहुँचते. 
वे सभी मर चुके हैं, यह बहुत पहले की बात है. 

तुम्हें शान्ति मिले ज़ोसिया, और तुम्हारे कारनामों को भी. 

छुट्टी बिताने जाते हुए, ऐसा नहीं होता 
कि उम्मीद की जाए कुछ घटित हो जाने की : 
इश्तहारों में से काले बालों वाला कोई आदमी, 
या माइकल की तरह कोई सुनहरे बालों वाला,  
बस रोजमर्रा की ऊब से थोड़े बदलाव के तौर पर, 
फोन करे प्रेमिका को, चाय की दूकान में केक लेने जैसा. 
हम ऊब और जिज्ञासा से प्रेरित होते हैं पाप की तरफ, 
मगर उसके अलावा मासूम होते हैं हम. 

तुम्हें समझना चाहिए ज़ोसिया, कैसी मुश्किल में होता हूँ मैं 
जब ध्यान से सोचना चाहता हूँ तुम्हारी ज़िंदगी के बारे में 
और यहाँ, जहां तुम मेरी हो, पा जाता हूँ वह जो अनोखा है तुम्हारे भीतर,
हालांकि वह छिपा होता है आम बातों के नीचे. 

शायद तुमने मदद की हो कोई मोर्चा बाँधने में. 
या शायद खुद को कुर्बान किया हो किसी बीमार बच्चे की खातिर.
शायद तुम्हें तकलीफ रही हो किसी जख्म या बीमारी की वजह से, 
और पहुँच गई हो समर्पण की उच्चावस्था में. 
जैसा भी रहा हो, चाहे तुम नष्ट हो गई अपने जलते हुए शहर के साथ,  
या भटकती फिरी उसमें बूढ़ी होकर, सड़कों को न पहचानते हुए, 
मैं कोशिश करता हूँ हर जगह तुम्हारे साथ होने की, व्यर्थ में ही. 
और सिर्फ स्पर्श कर पाता हूँ तुम्हारे वक्षों की भरपूर गोलाइयों का,  
सफ़ेद बिंदियों की छींट वाली तुम्हारी लाल पोशाक को याद करते हुए.  
                    :: :: :: 
manojpatel 

Friday, December 23, 2011

चेस्लाव मिलोश : प्यार

चेस्लाव मिलोश की एक कविता...

 
 प्यार : चेस्लाव मिलोश 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

प्यार का मतलब होता है खुद को उस तरह से देखना सीखना 
जिस तरह कोई देखता है दूर की चीजों को 
क्योंकि तुम तमाम चीजों में से सिर्फ एक चीज भर हो. 
और जो कोई भी देखता है उस तरह से, वह अनजाने ही 
चंगा कर लेता है अपने दिल को अनेक बीमारियों से -
एक चिड़िया और एक पेड़ उससे कहते हैं : दोस्त.

फिर वह इस्तेमाल करना चाहता है खुद को और चीजों को 
ताकि वे रहें परिपक्वता की दीप्ति में. 
यह जरूरी नहीं कि वह जानता ही हो अपनी सेवा के बारे में : 
सबसे बेहतर सेवा करने वाला हमेशा समझता नहीं है.    
                    :: :: :: 
manojpatel 

Thursday, December 22, 2011

चेस्लाव मिलोश : सूरज

चेस्लाव मिलोश की एक कविता...


सूरज : चेस्लाव मिलोश 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

सारे रंग आते हैं सूरज से. मगर उसका नहीं है 
कोई एक रंग, क्योंकि सारे रंग समाए हैं उसके भीतर.
और पूरी पृथ्वी है एक कविता की तरह 
जबकि ऊपर सूरज प्रतीक है कलाकार का. 

जो कोई भी रंगना चाहता है बहुरंगी दुनिया को 
उसे कभी मत देखने दो सीधे सूरज की तरफ 
वरना वह गँवा बैठेगा अपनी देखी हुई चीजों की स्मृति. 
केवल जलते हुए आंसू रह जाएंगे उसकी आँखों में. 

उसे घुटनों के बल बैठकर झुकाने दो अपना चेहरा घास की ओर, 
और देखने दो जमीन से परावर्तित प्रकाश को. 
वहां उसे मिलेंगी वे सारी चीजें जो हम गँवा चुके हैं : 
तारे और गुलाब, शाम और सुबहें तमाम.   
                                                                       वारसा, १९४८ 
                    :: :: :: 
manojpatel 
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