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Sunday, May 13, 2012

रोक डाल्टन : अब नहीं खुला करता बगीचे का फाटक

रोक डाल्टन की एक और कविता...  

 
संगीतकार मारियानो की मौत : रोक डाल्टन 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

अब परिंदे नहीं हैं वहां, जहां पियानो पड़ा रहता था इंतज़ार में 
बस एक बेनाम सी सिहरन की आकृतिहीन स्मृतियाँ. 

अब धूल झड़ रही है 
अपने रास्ते में आबनूस के उस बुत को पाए बगैर. 

अब नहीं खुला करता बगीचे का फाटक. 

कभी-कभी सोचता हूँ मैं 
कि हमारे मर जाने पर क्या मकान भी नहीं सहते 
विधवाओं जितनी ही तकलीफ.   

कम अज कम तब, जब किसी ने गाया हो 
या रची हों मीठी धुनें उनके भीतर 
मारियानो की तरह... 
                    :: :: :: 
रोके दालतोन 

Monday, February 20, 2012

रोक डाल्टन : यकीन


रोक डाल्टन (अल सल्वाडोर, 1935 - 1975) एक कवि, लेखक, बुद्धिजीवी और क्रांतिकारी की हैसियत से लैटिन अमेरिका के इतिहास की महत्वपूर्ण शख्सियत रहे हैं. अपने छोटे से जीवन में उन्होंने कुल मिलाकर 18 किताबें लिखीं. मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारों से प्रभावित डाल्टन ने क्रांतिकारी एक्टिविस्ट बनने का भी काफी प्रयास किया जिसे यह कहते हुए नकार दिया गया कि क्रान्ति में उनकी भूमिका एक कवि के रूप में ही है. मेक्सिको में निर्वासन में रहने के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया और मौत की सजा सुनाई गई लेकिन भूकंप में जेल के ध्वस्त हो जाने के कारण वे चमत्कारी ढंग से बच निकले. इसके पूर्व भी 1960 में सैनिक शासकों ने उन्हें गिरफ्तार कर किसानों को जमींदारों के खिलाफ हिंसा के लिए उकसाने के आरोप में मौत की सजा सुनाई थी. जिस रात उन्हें फायरिंग स्क्वाड का सामना करना था उसी रात तत्कालीन तानाशाह कर्नल जोसे मारिया लिमोस का तख्ता पलट गया और वे बच गए. 1975 में एक अति-वामपंथी समूह ने उनकी हत्या कर दी.   


यकीन : रोक डाल्टन 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

चार घंटों की यातना के बाद, अपाचे एवं अन्य दो सिपाहियों ने कैदी को होश में लाने के लिए उस पर एक बाल्टी पानी फेंक कर कहा : "कर्नल ने हमें यह बताने का हुक्म दिया है कि तुम्हें खुद को बचाने का एक मौक़ा दिया जाने वाला है. यदि तुम सही-सही यह बता दो कि हममें से किसकी एक आँख शीशे की है, तो तुम्हें यातना से छुटकारा दे दिया जाएगा." जल्लादों के चेहरे पर निगाहें फिराने के बाद, कैदी ने उनमें से एक की तरफ इशारा किया : "वह, उसकी दाहिनी आँख शीशे की है." 

अचंभित सिपाहियों ने कहा, "तुम तो बच गए ! लेकिन तुमने कैसे अंदाजा लगाया ? तुम्हारे सभी साथी गच्चा खा गए क्योंकि यह अमेरिकी आँख है, यानी एकदम बेऐब." "सीधी सी बात है," फिर से बेहोशी तारी होने का एहसास करते हुए कैदी ने कहा, "यही इकलौती आँख थी जिसमें मेरे लिए नफरत नहीं थी." 

जाहिर है, उन्होंने उसे यातना देना जारी रखा. 
                                                  :: :: :: 
(यह अनुवाद नई बात ब्लॉग एवं जनसंदेश टाइम्स में पूर्व-प्रकाशित है) 

Sunday, January 15, 2012

रोक डाल्टन : मर्ज का इलाज

रोक डाल्टन की एक कविता... 











मर्ज का इलाज : रोक डाल्टन 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

लेखकों ने एक जानमारू किताब तैयार की 
महामहिम राष्ट्रपति महोदय के लिए. 

महामहिम राष्ट्रपति महोदय निरीक्षण करते हैं 
अपने खंजरों के संग्रह का और उद्धृत करते हैं पाइथागोरस को. 

महामहिम राष्ट्रपति महोदय को लोहे के डंडे की जरूरत पड़ती है 
फौरी काम को निपटाने के लिए. 

जूएँ पड़ी हुई हैं लेखकों के सर में. 

महामहिम राष्ट्रपति महोदय छूरे से मारना चाहते हैं 
लेखकों के सर में रेंग रही जूओं को. 

लेखक भागते हैं दूसरे देश को : 
सीमा पार करने के लिए मुंडाए गए उनके सर 
चमकते हैं चांदनी में. 
                    :: :: :: 
Manoj Patel, Blogger & Translator, Mobile : 9838599333 

Saturday, November 5, 2011

रोक डाल्टन : बुरी खबर

आज फिर से रोक डाल्टन की एक कविता...









अखबार की एक कतरन पर बुरी खबर : रोक डाल्टन 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

इन दिनों मेरे दोस्तों की मौत होती है  
तो सिर्फ उनके नाम मर जाते हैं. 

इस सड़े से बिल में 
उम्मीद करूँ भी तो कैसे 
अखबारी कागज़ से कुछ ज्यादा जज्ब करने की, 
उन नाजुक काले अक्षरों की जगरमगर को 
कैसे समझूं स्मृतियों में चुभते किसी तीर से ज्यादा ?

सिर्फ वे ही इज्जत बख्श सकते हैं लाशों को 
जो रहते हैं जेल से बाहर, 
प्रियजनों की लाशों से लिपटकर 
सिर्फ वे ही कम कर सकते हैं अपना गम, 
कब्र को खुरच सकते हैं अपने नाखूनों से 
और आंसुओं से नम कर सकते हैं उसकी मिट्टी को.

यह सब नहीं कर पाते हम जैसे जेल के कैदी :
हम बस सीटी बजाते हैं अपने होंठों से 
खबर के असर को कम करने के लिए. 
                    :: :: :: 
Manoj Patel's Blog, Manoj Patel Translations रॉक डाल्टन 

Friday, October 28, 2011

रोक डाल्टन : बहुत शानदार मौत होगी मेरी

रोक डाल्टन की कविता...











अकड़ : रोक डाल्टन 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

बहुत शानदार मौत होगी मेरी 

मेरे पाप चमकेंगे पुराने नगों की तरह 
विष की सुखद आभा के साथ 

हर तरह की सुगंध खिलेगी मेरी कब्र से 
मेरी सबसे बड़ी खुशियों के किशोरवय संस्करण 
और दुख की मेरी गुप्त बातें 

शायद कोई कहे कि मैं सच्चा था या फिर भला 
मगर सिर्फ तुम याद करोगी 
कैसे मैं झांकता था तुम्हारी आँखों में 
                    :: :: :: 
Manoj Patel Padhte Padhte 

Thursday, October 27, 2011

रोक डाल्टन : बारूद का स्वाद

क्रांतिकारी कवि रोक डाल्टन की कविता...















भयानक बात : रोक डाल्टन 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

मेरे आंसू तक 
सूख चुके हैं अब तो 

मैं, जिसे भरोसा था हर एक चीज में 
हर किसी पर 

मैं, जिसने बस थोड़ी सी नर्म-दिली चाही थी 
जिसमें और कुछ नहीं लगता 
सिवाय दिल के 

मगर अब देर हो चुकी है 
और अब नर्म-दिली ही काफी नहीं रही 

स्वाद लग गया है मुझे बारूद का 
                    :: :: :: 
Manoj Patel Padhte Padhte 

Wednesday, October 26, 2011

तुम्हारी रोशनी मेरे आस-पास रहती है

पढ़ते-पढ़ते के सभी मित्रों, शुभचिंतकों और पाठकों को दीपावली की शुभकामनाएं. इस अवसर पर आज रोक डाल्टन की यह कविता... 


कविता से : रोक डाल्टन 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

मैं तुम्हारा स्वागत करता हूँ कविता 
बहुत शुक्रगुजार हूँ आज तुमसे मुलाक़ात के लिए 
(ज़िंदगी और किताबों में)
तुम्हारा वजूद सिर्फ उदासी के चकाचौंध कर देने वाले 
भव्य अलंकरण के लिए ही नहीं है

इसके अलावा हमारी जनता के इस लम्बे और कठिन संघर्ष के  
काम में मेरी मदद करके 
तुम आज मुझे बेहतर कर सकती हो  

तुम अब अपने मूल में हो :
अब वह भड़कीला विकल्प नहीं रही तुम 
जिसने मुझे अपनी ही जगह से काट दिया था 

और तुम खूबसूरत होती जाती हो 
कामरेड कविता 
कड़ी धूप में जलती हुई सच्ची खूबसूरत बाहों के बीच 
मेरे हाथों के बीच और मेरे कन्धों पर 

तुम्हारी रोशनी मेरे आस-पास रहती है 
                    :: :: :: 

Sunday, July 24, 2011

रोक डाल्टन की कविता


रोक डाल्टन की एक कविता...

 
अब तुम समझ सकती हो : रोक डाल्टन 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

अब समझ सकती हो, जो कुछ भी बनने की कामना करती थी तुम 
कालेज की बातचीत में 
क्यों एक बेवतन शख्स की महबूब बन बैठी 

तुम जो हवाई जहाज से सैर करने जा रही थी यूरोप की 
तीन या चार इज्जतदार बुजुर्गों से मिली विरासत की बिना पर 
तुम जो बैठी होती हो एक लम्बी लिमोजिन गाड़ी में 
फर के गमकते कोट और चांदी के बड़े-बड़े कंगन पहने हुए 
मगर सबसे बढ़कर 
पूरे शहर में सबसे शानदार आँखों वाली तुम 
जो सोई पड़ी हो इस वक़्त 
इस गरीब तन्हा इंसान की बाहों में. 

मुझे दिख रहा है चमकता हुआ नन्हा क्रास तुम्हारी छाती पर 
और दीवार पर मार्क्स की अपनी तस्वीर 
और लग रहा है कि सारी चीजों के बावजूद 
खूबसूरत है ज़िंदगी.   
                    :: :: :: 

Friday, July 8, 2011

रोक डाल्टन की दो कविताएँ

रोक डाल्टन की दो कविताएँ...


प्रेम 

प्रेम मेरा दूसरा वतन है 
मेरा असली वतन 
वह नहीं जिसपर मुझे गर्व है 
बल्कि वह जो मुझे तकलीफ़ देता है 
                    :: :: 

तनावपूर्ण बातचीत   

तुम क्या करोगे अगर तुम्हारे सबसे खराब दुश्मन भी 
तुमसे कई गुना ज्यादा 
बेहतर हों ?

यह तो कुछ भी नहीं. दिक्कत तो तब आती है 
जब तुम्हारे सबसे अच्छे दोस्त 
तुमसे बदतर हों.

सबसे खराब बात है कि तुम्हारे सिर्फ दुश्मन ही दुश्मन हों. 

नहीं. सबसे खराब बात है कि तुम्हारे सिर्फ दोस्त ही दोस्त हों.

मगर, दुश्मन कौन है ?
तुम खुद या तुम्हारे दुश्मन ? 

फिर मिलेंगे,
दोस्त. 
                    :: :: 

(अनुवाद : मनोज पटेल) 

Monday, June 6, 2011

रोक डाल्टन : चोर बाज़ार में जनता की संपत्ति का बंटवारा


आज रोक डाल्टन की यह कविता... 


















चोर बाज़ार में जनता की संपत्ति का बंटवारा  :  रोक डाल्टन 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

उन्होंने हमें बताया कि पहली शक्ति है 
कार्यपालिका शक्ति, 
और विधायी शक्ति दूसरी शक्ति है 
जिसे ठगों के एक गिरोह ने 
"सत्ता पक्ष" और "विपक्ष" में बाँट रखा है, 
और चरित्र भ्रष्ट हो चुका (फिर भी माननीय) सुप्रीम कोर्ट 
तीसरी शक्ति है.

अखबारों, रेडियो और टी. वी. ने खुद को 
चौथी शक्ति का दर्ज़ा दे रखा है और वाकई 
वे बाक़ी तीनों शक्तियों के हाथ में हाथ डाले चलते हैं.

अब वे हमें यह भी बता रहे हैं कि 
नई लहर वाले युवा पांचवी शक्ति हैं.

और वे हमें यह भी भरोसा दिलाते हैं कि सभी चीजों और शक्तियों के ऊपर 
ईश्वर की महान शक्ति है. 

"और अब चूंकि सभी शक्तियों का बंटवारा हो चुका है 
-- वे निष्कर्ष रूप में हमें बताते हैं --
किसी और के लिए कोई शक्ति नहीं बची है 
और अगर कोई कुछ और सोचता है 
तो उसके लिए फौज और नेशनल गार्ड हैं."  

शिक्षाएं : 
1) पूंजीवाद शक्तियों की एक बड़ी मंडी है 
जहां केवल चोर अपना धंधा करते हैं 
और सच्ची शक्ति की वास्तविक मालिक 
यानी आम जनता की बात करना जानलेवा हो सकता है. 

2) शक्ति के वास्तविक मालिक को उसका 
हक़ दिलाने के लिए यह जरूरी होगा 
कि चोरों को व्यापार के मंदिरों से लतिया कर केवल बाहर ही न कर दिया जाए 
क्योंकि वे बाहर जाकर फिर संगठित हो जाएंगे ;
बल्कि बाज़ार को व्यापारियों के 
सर तक ले आना होगा.
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