Showing posts with label हाल सिरोविट्ज़. Show all posts
Showing posts with label हाल सिरोविट्ज़. Show all posts

Tuesday, June 25, 2013

हाल सिरोविट्ज़ की कविता

हाल सिरोविट्ज़ की एक और कविता...   
एक असंतुलन को सही करना : हाल सिरोविट्ज़ 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 
 
मैं विज्ञापनों की कभी नहीं सुनता, पिता जी ने कहा. 
उनका इरादा मुझे ऐसा कुछ बेचने की कोशिश करना होता है 
जिसकी मुझे जरूरत नहीं होती. अगर मुझे उसकी जरूरत हो 
तो मैं जानना चाहूँगा कि वह जरूरत मुझसे पैदा हुई है, न कि 
दूसरों से. मैं नहीं चाहता कि मेरे पास ऐसा ढेर सारा कबाड़ जमा हो जाए 
जिसे फेंकने के सिवा और कोई चारा न हो. इस घर की आधी चीजें 
इस्तेमाल में नहीं आतीं. असल में हमें सिर्फ रोटी, कपड़ा, छत 
और हाँ, एक-दूसरे की जरूरत होती है. तुम्हें मेरी जरूरत है. 
है ना? तुम्हारी माँ मुझे बात करने का ज्यादा मौका नहीं देतीं. 
मुझसे सिर्फ सुनने की अपेक्षा की जाती है. मैं तुमसे 
बात करने में समर्थ हूँ, मगर मुझे ख़ुशी होगी 
अगर कभी-कभार तुम भी बोल दिया करो कुछ. 
                            :: :: ::

Sunday, July 22, 2012

हाल सिरोविट्ज़ : पुत्र

हाल सिरोविट्ज़ की एक और कविता...   

  
पुत्र : हाल सिरोविट्ज़ 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

हम लोग यहूदी हैं, पिता जी ने कहा. 
इसलिए ईसा मसीह को नहीं मानते हम. 
यदि ईश्वर ने चाहा होता कि हम पूजा करें ईसा मसीह की 
तो उसने बंदोबस्त किया होता हमें 
किसी इतालवी परिवार में पैदा करवाने का. उनके खिलाफ 
नहीं हूँ मैं. शायद बहुत बढ़िया इंसान थे वे. 
उनकी कोशिशों का श्रेय तो तुम्हें देना ही पड़ेगा उन्हें.  
अब भी बहुत से लोग मानते हैं कि वे पुत्र हैं ईश्वर के. 
मुझे नहीं पता कि उनके मन में क्या था अपने असली पिता के खिलाफ. 
पर यदि तुमने कभी मेरे साथ किया ऐसा,  
और कहा कि तुम पुत्र हो किसी और के, अपमानित महसूस करूंगा मैं.  
                         :: :: :: 

Thursday, June 28, 2012

हाल सिरोविट्ज़ : कार का सम्बन्ध

हाल सिरोविट्ज़ की एक और कविता...   

 
कार का सम्बन्ध : हाल सिरोविट्ज़ 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

लोग कहते हैं कि कार की बजाय सायकिल से देखने पर 
अलग से लगते हैं प्राकृतिक दृश्य. मोटर इतनी तेज भागती 

है कि आप देख नहीं सकते कुछ ख़ास. जब तक आप 
दर्ज कर पाए अपने दिमाग में कि वह एक पेड़ था बड़ा सा, 

आप पीछे छोड़ चुके थे उसे. मगर सायकिल पर आप रुक 
सकते थे. बहाना कर सकते थे कि हांफ रहे हैं आप,  

और निहार सकते थे डालियों को, शायद वहां दौड़ लगाती 
किसी गिलहरी को देखते हुए. एक दुनिया के भीतर 

एक दुनिया शामिल थी हर पेड़ में. यही किया मैंने अपने 
संबंधों के दौरान -- उस तरह से देखने की कोशिश की इसे 

जैसे कि सायकिल पर होऊँ मैं. पर जब कभी 
तुम्हें बेहतर देख पाने के लिए धीमे होने की कोशिश की मैंने, 

तुम कभी नहीं चली उस रफ़्तार से, बल्कि भागती ही गई आगे 
जैसे कि तुम नाराज थी कार में न होने से.  
                    :: :: ::

Wednesday, June 27, 2012

हाल सिरोविट्ज़ : किताबें देना

हाल सिरोविट्ज़ की एक और कविता...   

 
किताबें देना : हाल सिरोविट्ज़ 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

तुम हमेशा देते ही रहते हो, मेरे डाक्टर ने कहा. 
तुम्हें सीखना होगा कि लिया जाता है कैसे. जब भी 
तुम मिलते हो किसी स्त्री से तो पहला काम करते हो 
उसे पढ़ने के लिए अपनी किताबें देने का. तुम सोचते हो 
कि उन्हें लौटाने के लिए उसे दुबारा मिलना होगा तुमसे. 
मगर होता यह है कि उसके पास समय नहीं होता 
उन्हें पढ़ने का, और वह डरती है कि यदि वह तुमसे दुबारा मिली 
तो तुम उससे अपेक्षा करोगे किताबों के बारे में बात करने की, 
और कुछ और किताबें देना चाहोगे उसे. इसलिए वह 
रद्द कर देती है मुलाक़ात. तो हुआ यह है कि काफी किताबें गँवा 
चुके हो तुम. तुम्हें मांगनी चाहिए उसकी किताबें. 
                    :: :: :: 

Tuesday, June 26, 2012

हाल सिरोविट्ज़ की कविता

अमेरिकी कवि हाल सिरोविट्ज़ (जन्म १९४९) की एक कविता...   

 
फच्चर : हाल सिरोविट्ज़ 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

तुम्हीं थे जो मेरे पीछे-पीछे
चले आए थे लिफ्ट में 
और मेरा फोन नंबर माँगा था, उसने कहा. 
तुम्हें बहकाया नहीं था मैंने. असल में तो 
मैंने रोकने की ही कोशिश की थी तुम्हें. 
बता भी दिया था कि बड़ी दिक्कतें हैं मेरे साथ. 
अकेले रहने की आदी थी मैं. पर जब 
तुमने अपना फच्चर फंसा ही दिया है मेरी ज़िंदगी में, 
मत समझना कि आसान होगा मुझे छोड़ना 
लिफ्ट की हमारी पहली सवारी की तरह. 
सीढ़ियों पर चढ़ने जैसा होगा वह. 
            :: :: :: 
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...