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Wednesday, February 1, 2012

ओरहान पामुक : खुश होना

नोबेल पुरस्कार विजेता ओरहान पामुक की कथेतर गद्य पुस्तक 'अदर कलर्स' से एक और अंश... 











खुश होना : ओरहान पामुक 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

क्या खुश होना खराब बात है? मैं अक्सर इस बारे में जानने को उत्सुक रहा हूँ. अब तो मैं हमेशा इसके बारे में विचार किया करता हूँ. हालांकि कई बार मैं कह चुका हूँ कि खुश होने में समर्थ लोग बुरे और मूर्ख होते हैं, समय-समय पर मुझे ऐसा भी लगता है कि नहीं, खुश होना बुरा नहीं है और इसके लिए मगजमारी करनी पड़ती है. 

जब मैं अपनी चार साल की बेटी रुया के साथ समुन्दर के किनारे जाता हूँ तो मैं दुनिया का सबसे खुश इंसान हो जाता हूँ. दुनिया का सबसे खुश इंसान सबसे अधिक क्या चाहता है? निस्संदेह वह दुनिया का सबसे खुश इंसान बना रहना चाहता है. इसीलिए उसे पता होता है कि हर बार वही-वही चीजें करना कितना जरूरी है. और हम ठीक यही करते हैं, हमेशा एक जैसी चीजें. 

१.      सबसे पहले तो मैं उसे बताता हूँ : आज हम इतने-इतने बजे समुन्दर किनारे चल रहे हैं. फिर रुया की कोशिश उस समय को और नजदीक खिसकाने की होती है. मगर उसकी समय की समझ थोड़ा गड़बड़ है. मसलन वह अचानक मेरे पास आएगी और कहेगी, "अभी समय नहीं हुआ?" 
"नहीं."
"पांच मिनट में समय हो जाएगा क्या?" 
"नहीं, ढाई घंटे बाद समय होगा." 
हो सकता है पांच मिनट बाद ही वह वापस आकर बड़ी मासूमियत से पूछे, "डैडी, अब चलें समुन्दर किनारे?" या कुछ देर बाद मुझे दांव देने वाली आवाज़ में रुया पूछेगी, "तो अब चल रहे हैं ना?" 

२.      ऐसा लगता है कि निकलने का समय कभी नहीं आएगा, मगर फिर समय हो जाता है. रुया अपनी तैराकी की पोशाक पहनकर चार पहियों वाली बच्चों की गाड़ी में बैठी जाती है. उसमें कुछ तौलिए हैं, कुछ स्विमसूट और एक अजीब सा तिनके का बैग जिसे मैं जाने-पहचाने रास्ते पर गाड़ी धकेलने के पहले उसकी गोद में सरका देता हूँ. 

३.      जब हम पथरीली गलियों के रास्ते से गुजरते हैं तो रुया आआह कहने के लिए अपना मुंह खोलती है. जब पत्थर गाड़ी को खड़खड़ाते हैं तो वह आआ-आआह में बदल जाती है. पत्थर रुया से गाना गवा रहे हैं! उसे सुनकर हम दोनों ही हँसते हैं.   

४.      समुन्दर किनारे तक का साधारण और छोटा रास्ता जल्दी ही समाप्त हो जाता है. किनारे की ओर नीचे उतर रही सीढ़ियों के पास गाड़ी को खड़ी करते समय रुया हमेशा कहती है, "चोर यहाँ कभी नहीं आते." 

५.      हम जल्दी-जल्दी अपना सामान पत्थरों पर फैला देते हैं और कपड़े उतारकर घुटनों भर समुन्दर में चले जाते हैं. फिर मैं कहता हूँ, "अब ठीक है, मगर ज्यादा दूर हरगिज मत जाना. मैं थोड़ा सा तैरकर आता हूँ, फिर हम खेलेंगे. ठीक है?" 
        "ठीक है."  

६.      अपने ख़याल पीछे झटकते हुए मैं तैरने निकल जाता हूँ. रुकने के बाद रुया को देखने के लिए मैं पीछे किनारे की तरफ देखता हूँ. अपनी तैराकी की पोशाक में रुया अब एक लाल धब्बे जैसी दिखती है और मैं सोचता हूँ कि मैं उसे कितना प्यार करता हूँ. यहाँ समुन्दर में मेरा हंसने का मन करता है. किनारे के पास उसने छपछपाहट मचा रखी है. 

७.      मैं वापस जाता हूँ. मेरे किनारे पहुँचने के बाद हम खेलने लग जाते हैं : (a) पानी में पैर चलाना; (b) छपछपाना; (c) डैडी का मुंह से पानी की फुहार मारना; (d) तैरने का नाटक करना; (e) समुन्दर में कंकड़ फेंकना; (f) बोलने वाली गुफा से बात करना; (g) चलो-चलो ज्यादा बचने की कोशिश न करो, अब तैरो, और अपने पसंदीदा सभी खेल और रस्में, और जब हम उन सबको खेल चुकते हैं तो हम उन्हें फिर से खेलते हैं. 

८.      "तुम्हारे होंठ बैगनी पड़ रहे हैं, तुम्हें सर्दी लग रही है." "नहीं, मुझे नहीं लग रही." "तुम्हें सर्दी लग रही है, हम बाहर निकल रहे हैं." कुछ देर ऐसा ही चलता है और बहस ख़त्म हो जाने के बाद हम पानी से बाहर निकल आते हैं. और जब हम रुया का शरीर पोंछकर उसका स्विमसूट बदल रहे होते हैं -- 

९.      अचानक ही वह मेरी बाहों से छिटककर खिलखिलाते हुए नंगी ही दौड़ लगाने लगती है. जब मैं उसके पीछे पत्थरों से होते हुए नंगे पैर भागने की कोशिश करता हूँ तो मैं लंगड़ाने लगता हूँ. नंगी-धड़ंगी रुया के लिए यह और भी ज्यादा हँसी का सबब है. मैं बोलता हूँ, "देखो, अगर मैं जूते पहन लूं तो तुम्हें पकड़ लूंगा."  मैं ठीक यही करता हूँ और वह चीखती रहती है. 

१०.     लौटते हुए मैं रुया की गाड़ी धकेल रहा होता हूँ और हम दोनों ही थक कर चूर व बहुत खुश होते हैं. हम ज़िंदगी के बारे में सोचते हैं और अपने पीछे छूट गए समुन्दर के बारे में, और एक भी शब्द नहीं बोलते.  
                                                                       :: :: :: 
Orhan Pamuk in Hindi, Manoj Patel Blog, padhte-padhte.blogspot.com     

Friday, February 4, 2011

ओरहान पामुक : मैं स्कूल नहीं जाऊंगी


ओरहान पामुक के कथेतर गद्य संग्रह अदर कलर्स से कई टुकड़े आप इस ब्लॉग पर पढ़ चुके हैं. यहाँ प्रस्तुत मेरा यह अनुवाद पिछली 30 जनवरी को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ था, सोचा आपके साथ साझा करूँ. एक बेटी रुया के पिता ओरहान पामुक ने यह और अन्य काव्यात्मक रेखाचित्र एक पत्रिका Okuz (Ox) के लिए साप्ताहिक स्तम्भ के रूप में 1996 से 1999 के बीच लिखे थे. उनके अनुसार ऐसे ज्यादातर लेख एक ही बैठक में लिखे गए और इनमें मुझे अपनी बेटी और अपने दोस्तों के बारे में लिखते हुए बहुत मजा आया. यह दुनिया को शब्दों के माध्यम से देखने का उनका ख़ास तरीका था.   
तस्वीर मेरी बेटी लिपि की है, जब वह पहले दिन स्कूल जा रही थी और अभी उसे यह नहीं पता था कि हम उसे स्कूल में छोड़ के वापस आ जाने वाले हैं. - मनोज 

मैं स्कूल नहीं जाऊंगी 
मैं स्कूल नहीं जाने वाली. क्यूंकि निन्नी आ रही है मुझे. सर्दी लग गई है. स्कूल में मुझे कोई पसंद नहीं करता. 
मैं स्कूल नहीं जाने वाली. क्यूंकि दो बच्चे हैं वहां. मुझसे इत्ते बड़े. मुझसे ताकतवर. जब उनके बगल से गुजरती हूँ तो बाहें फैलाकर रास्ता रोक लेते हैं वे मेरा. डर लगता है मुझे. 
डर लगता है मुझे. मैं स्कूल नहीं जाने वाली. स्कूल में, वक़्त तो बस ठहर जाता है. सब कुछ छूट जाता है बाहर. स्कूल के गेट के बाहर. 
मिसाल के तौर पर घर का मेरा कमरा. मेरी मम्मी भी, और पापा, खिलौने मेरे. और बालकनी पर वो परिंदे. जब स्कूल में होती हूँ और उनके बारे में सोचती हूँ तो रोना आ जाता है मुझे. बाहर देखने लगती हूँ खिडकी से, वहां बादल होते हैं न. 
मैं स्कूल नहीं जाने वाली. क्यूंकि वहां कुछ भी अच्छा नहीं लगता मुझे. 
उस दिन एक पेड़ की तस्वीर बनाई थी मैनें. टीचर ने कहा, "यह सचमुच एक पेड़ ही है, बहुत अच्छे." मैनें फिर एक दूसरी बनाई. इसमें भी कोई पत्तियाँ नहीं थीं. 
फिर उन्हीं में से एक बच्चा मेरे पास आया और मेरा मजाक उड़ाने लगा. 
मैं स्कूल नहीं जाने वाली. रात को सोते समय जब अगले दिन स्कूल जाने के बारे में सोचती हूँ तो दहशत होती है बहुत. मैं कहती हूँ, "मैं स्कूल नहीं जाने वाली." वे बोलते हैं, "ऐसा कैसे कह सकती हो तुम ? स्कूल तो सभी लोग जाते हैं."
सभी लोग ? तो फिर जाने दो न सभी को. आखिर क्या हो जाएगा जो मैं घर पर ही रुक जाऊं ? कल गई थी न मैं, नहीं क्या ? कैसा रहेगा अगर मैं कल न जाऊं, और फिर उसके अगले दिन चली जाऊं ?
काश मैं घर पर होती अपने बिस्तर पर. या अपने कमरे में. काश कि मैं और कहीं भी होती सिवाय उस स्कूल के. 
मैं स्कूल नहीं जाने वाली, बीमार हूँ मैं. दिख नहीं रहा आपको ? जैसे ही कोई कहता है स्कूल  मैं बीमार हो जाती हूँ, पेट दर्द करने लगता है मेरा. वो दूध भी नहीं पीया जाता मुझसे. 
वह दूध नहीं पीना मुझे, मुझे कुछ नहीं खाना, और न ही स्कूल जाने वाली हूँ मैं. कितनी परेशान हो गई हूँ. मुझे कोई पसंद नहीं करता. वे दोनों बच्चे हैं वहां. बाहें फैलाकर रास्ता रोकते हैं वे मेरा. 
टीचर के पास गई थी मैं. टीचर ने कहा, "मेरे पीछे -पीछे क्यूं लगी हो ?" अगर आप नाराज न हों तो मैं आपको कुछ बताऊँ. मैं तो हमेशा टीचर के पीछे ही लगी रहती हूँ, और टीचर हमेशा यही बोलती रहती हैं कि "मेरे पीछे-पीछे न आओ."      
मैं स्कूल नहीं जाने वाली, कब्भी नहीं. क्यूं ? क्यूंकि मैं बस वहां जाना नहीं चाहती, इसीलिए और क्यूं. 
रेसेस के वक़्त मैं बाहर भी नहीं जाना चाहती. जब सब लोग मुझे भूल चुके होते हैं तभी रेसेस होता है. फिर सबकुछ एकदम से घाल-मेल हो जाता है, सभी भागने लगते हैं. 
टीचर मुझे घूर कर देखने लगती हैं, और बस इतना कहूंगी कि वे इतनी अच्छी नहीं लगतीं. मैं स्कूल नहीं जाना चाहती. वहां एक बच्चा है जो मुझे पसंद करता है, बस वही है जो मुझे अच्छे से देखता है. किसी से बताना मत,  लेकिन मुझे वह बच्चा भी नहीं पसंद. 
मैं बस वहां बैठी पड़ी रहती हूँ. कितना अकेलापन महसूस होता है मुझे. आंसू लुढ़कते रहते हैं मेरे गालों पर. मुझे स्कूल बिलकुल भी पसंद नहीं. 
मैं स्कूल नहीं जाना चाहती, कहती हूँ मैं. फिर सुबह हो जाती है और वे मुझे स्कूल ले जाते हैं. मैं हंस भी नहीं पाती. मैं अपने सामने एकदम सीधा देखती रहती हूँ, रोना आ जाता है मुझे. मैं अपनी पीठ पर फौजियों जितना बड़ा बस्ता लादे पहाड़ी पर चढ़ती हूँ, और निगाहें पहाड़ी चढ़ते हुए अपने नन्हें पैरों पर टिकाए रहती हूँ. कितना भारी है सबकुछ : मेरी पीठ पर लदा बस्ता, मेरे पेट में पड़ा गर्म दूध. रोना चाहती हूँ मैं. 
मैं स्कूल में दाखिल होती हूँ. लोहे का काला फाटक मेरे पीछे बंद होता है. मैं रो पड़ती हूँ, "मम्मी, देखो, तुमने मुझे भीतर लाकर छोड़ दिया."
फिर मैं अपनी कक्षा में जाकर बैठ जाती हूँ. बाहर उन बादलों में से कोई एक बादल हो जाना चाहती हूँ मैं.    
इरेजर्स, कापियां, और पेन : मुर्गियों को खिला दो यह सब ! 

(अनुवाद : मनोज पटेल)
Orhan Pamuk, Other Colours 

Wednesday, January 12, 2011

ओरहान पामुक : टेलीविजन मुझे सिर्फ गुस्सा ही दिलाता है

( 1952 में इस्ताम्बुल में जन्में ओरहान पामुक तुर्की के प्रसिद्द उपन्यासकार हैं. उनके उपन्यासों का दुनिया की पचास से भी अधिक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है. माई नेम इ
 
रेड, स्नो, व्हाईट कैसेल, म्यूजियम आफ इनोसेंस जैसे उपन्यासों के लेखक पामुक को 2006 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. यहाँ प्रस्तुत है उनके गद्य की एक छोटी सी बानगी, उनके कथेतर गद्य संग्रह ' अदर कलर्स ' से - Padhte Padhte ) 

शाम को थक कर चूर 
मैं शामों को थक कर चूर घर लौटता हूँ. सीधे सामने की तरफ सड़कों और फुटपाथों को देखते हुए. किसी चीज से नाराज, आहत, कुपित. हालांकि मेरी कल्पना शक्ति सुन्दर दृश्यों से आकर्षित होती रहती है लेकिन ये मेरे दिमाग की फिल्म में तेजी से गुजर जाते हैं. समय बीत जाता है. कोई फर्क नहीं. रात घिर आई है. बदकिस्मती और हार. रात के खाने में क्या है ? 

मेज पर रखा लैम्प जल रहा है ; बगल में ही सलाद और ब्रेड का कटोरा रखा है, सबकुछ उसी टोकरी में ; मेजपोश चारखानेदार है. और कुछ ? ...... एक प्लेट और बीन्स. मैं बीन्स की कल्पना करता हूँ लेकिन यह काफी नहीं है. मेज पर वही लैम्प अब भी जल रहा है. थोड़ा सा दही शायद ? या शायद थोड़ी सी ज़िंदगी ? 

टेलीविजन पर क्या आ रहा है ? नहीं मैं टेलीविजन नहीं देख रहा ; यह मुझे सिर्फ गुस्सा ही दिलाता है. मैं बहुत गुस्सैल हूँ. मुझे कवाब भी पसंद है - तो कवाब कहाँ हैं ? पूरी ज़िंदगी यहीं सिमट आई है, इस मेज के इर्द-गिर्द. 

फ़रिश्ते मुझसे हिसाब मांगने लगे हैं. 

आज तुमने क्या किया प्यारे ?

अपनी पूरी ज़िंदगी.... मैंने काम किया. शामों को मैं घर लौटता रहा. टेलीविजन के बारे में - लेकिन मैं टेलीविजन नहीं देख रहा. कभी-कभी फोन उठाकर बात की है मैनें, नाराज हुआ कुछ लोगों पर ; फिर काम किया, लिखा..... एक आदमी बना...... और हाँ, बहुत एहसानमंद हूँ - जानवर भी बना. 

आज तुमने क्या किया प्यारे ?

दिख नहीं रहा क्या तुम्हें ? सलाद भरी है मेरे मुंह में. दांत हिल रहे हैं मेरे जबड़े में. मेरा दिमाग दुःख से पिघलकर गले से होता हुआ बह रहा है. नमक कहाँ है, कहाँ है नमक, नमक ? हम अपनी ज़िंदगी खाए जा रहे हैं. और थोड़ी सी दही भी. ज़िंदगी, ये जो है ज़िंदगी. 

फिर आहिस्ता से अपने हाथ फैलाकर मैं परदे अलग करता हूँ, और बाहर अँधेरे में चाँद की झलक मिलती है. दूसरी दुनियाएं सबसे बेहतर तसल्ली हैं. चाँद पर वे टेलीविजन देख रहे थे. मैनें एक संतरा ख़त्म किया - बहुत मीठा था यह - अब मेरा जोश कुछ बढ़ा है. 

तब मैं पूरी दुनिया का मालिक था. आप समझ रहे हैं न मेरा मतलब, है न ? शाम को मैं घर आया. घर आया मैं उन सभी लड़ाईयों से, अच्छी, बुरी, और कैसी भी ; मैं पूरा साबुत लौटा और एक गर्म घर में आया. खाना इन्तजार कर रहा था मेरे लिए, और मैनें अपना पेट भर लिया ; बत्तियां जल रही थीं ; फिर मैनें अपना फल खाया. मैनें यह भी सोचना शुरू कर दिया था कि सबकुछ बढ़िया होने वाला है.

फिर मैनें बटन दबाया और टेलीविजन देखने लगा. तब तक, आप समझ सकते हैं, मैं बहुत बेहतर महसूस कर रहा था.  

(अनुवाद : Manoj Patel)
Orhan Pamuk 

Thursday, September 9, 2010

किताबों के आवरण पर नौ टिप्पणियां : ओरहान पामुक



 अगर कोई लेखक  अपनी किताब बिना उसके आवरण का ख्वाब संजोए पूरी कर सकता है तो वह बुद्धिमान, पूर्ण विकसित और पूर्ण परिपक्व तो  है, लेकिन साथ ही वह अपनी मासूमियत भी खो चुका है जिसने प्रथमतया उसे लेखक बनाया था |

हम अपनी सबसे प्रिय किताबों का स्मरण, उनके आवरण के भी स्मरण के बिना नहीं कर सकते |

 हम सभी ज्यादा पाठकों को आवरण की वजह से किताबें खरीदते देखना पसंद करेंगे और ज्यादा आलोचकों को ऐसी किताबों की उपेक्षा करते देखना जो ऐसे ही पाठकों को ध्यान में रखकर लिखी गई हों |

 किताबों के आवरण पर नायकों का विस्तृत चित्रण न केवल उसके लेखक की कल्पना का अपमान है, बल्कि उसके पाठकों की कल्पना का भी |

अगर डिजाइनर यह फैसला करते हैं कि 'द रेड एंड ब्लैक' नाम की किताब लाल और काले रंग के आवरण के लायक है या 'ब्लू हाउस' शीर्षक किताब की सज्जा नीले रंग के मकान के चित्रों से होनी चाहिए तो हम ऐसा नहीं सोचने लग जाते कि वे विषय वस्तु के प्रति ईमानदार हैं, बल्कि शंका  होती है  कि उन्होंने किताब पढ़ी भी है या नहीं |

 किसी किताब को पढ़ने के सालों बाद उसके आवरण की एक झलक हमें बहुत  पहले के उस समय  में वापस पहुंचा देती है जब हम उस किताब के साथ, उसके भीतर छिपी दुनिया में प्रवेश पाने के लिए एक कोने में सिमटे बैठे हुए थे |

सफल आवरण, एक पाइप की तरह काम करते हुए हमें अपनी   मामूली दुनिया से खिसका कर किताब की दुनिया के भीतर प्रवेश करा देते हैं |

किताबों की कोई दुकान अपने आकर्षण के लिए, किताबों की बजाए उनके आवरण की विविधता के प्रति ऋणी होती है |  

किताबों के शीर्षक लोगों के नामों की तरह होते हैं : वे एक किताब को लाखों अन्य मिलती-जुलती किताबों से अलग करने में हमारी मदद करते हैं | लेकिन किताबों के आवरण लोगों के चेहरे की तरह होते हैं : वे या तो हमें उस सुख की याद दिलाते हैं जिसे हमने कभी महसूस किया था, या वे एक सुखद दुनिया का वादा करते हैं, हमारे लिए   जिसे अभी खोजना बाकी है | इसी लिए हम किताबों के आवरण को वैसी  ही उत्कंठा से देखते हैं जैसे कि चेहरों को |

 (Other Colours) 


(अनुवाद : Manoj Patel) 
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