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Saturday, April 27, 2013

विमल चन्द्र पाण्डेय की कहानी : लोकल


विमल चन्द्र पाण्डेय की एक कहानी 'खून भरी मांग' आप इस ब्लॉग पर पहले भी पढ़ चुके हैं. आज प्रस्तुत है उनकी एक और कहानी जो हाल ही में 'कथन' में प्रकाशित हुई है... 

लोकल : विमल चन्द्र पाण्डेय 

वे दोनों जब गोदौलिया चैराहे पहुंचे तो सूरज निकलने में कुछ मिनटों का समय शेष था। सड़क के किनारे बैरीकेडिंग लगी थी और उसके भीतर लोटा लिये श्रद्धालुओं की जो लाइन थी वह कई बार कई जगहों पर मुड़ कर बाबा विश्वनाथ के दर्शन और उन पर जल चढ़ाने के लिये व्याकुल थी।
‘‘कितना किलोमीटर होगा ?’’ मोटे लड़के ने पिछली सीट से उचक कर कतार का सिरा देखने की कोशिश करते हुये पूछा।
‘‘नापे हैं क्या हम ?’’ चश्मे वाले ने झल्लाहट में जवाब दिया।
भीड़ इतनी थी कि पैदल लोग भी चलने की बजाय सरक रहे थे। उन दोनों ने अपनी मोटरसायकिल घाट वाली सड़क की ओर बढ़ायी जहां पुलिस का अस्थायी चेक पोस्ट बना था और कई वर्दी वाले खड़े देश की बढ़ती जा रही जनसंख्या पर चिंता व्यक्त कर रहे थे। मोटरसायकिल की हेडलाइट कवर पर प्रेस लिखा था। पीछे बैठे मोटे लड़के ने गले में एक हैण्डीकैम लटका रखा था और उसके हाथ में एक पन्नी थी जिसमें कुछ अपाहिज़ हो चुके ईश्वर थे जिन्हें गंगा में प्रवाहित करना था। मोटरसायकिल आगे बढ़ी तो खाकी वर्दी वालों ने डंडा खड़काया।
‘‘आगे नहीं जायेगा गाड़ी।’’
‘‘प्रेस हैं।’’ मोटरसायकिल चला रहे चश्मे वाले लड़के ने कहा। कहने में टोन थी कि वह प्रेस से है या फिर खुद प्रेस है।
‘‘प्रेस होमिक्सर हो चाहे गीजरआज गाड़ी आगे नहीं जायेगी।’’ खाकी वर्दी ने बेतुकी तुक जोड़ते हुये आदेश फरमाया।
चश्मे वाले लड़के ने थोड़ी देर पुलिस वाले को घूरने के बाद मोटरसायकिल मारवाड़ी अस्पताल की तरफ मोड़ दी। खाकी वर्दी वाला निर्लिप्त भाव से देख रहा था। लड़के ने मोटरसायकिल सड़के के किनारे खड़ी कर दी फिर नाराज़गी भरे भाव से पुलिस वाले से बोला, ‘‘अगर गाड़ी चोरी हुआ तो आपका जि़म्मेदारी होगा।’’
पुलिस वाला उदासीन भाव से बोला, ‘‘आज क्याकभी भी चोरी हुयी तो मेरी ही जि़म्मेदारी होगी।’’
दोनों लड़के पैदल ही राजेंद्र प्रसाद घाट की ओर चलने लगे।
‘‘उसको फोन करोकितनी देर में आ रहा है। पार्टी आज देगा या कल ?’’ मोटे ने उम्र में बड़े होने का फायदा उठाना चाहा।
‘‘बनारस छोड़ के कोई बम्बई जायेगा नौकरी करने तो पार्टी तो उसका बाप भी देगा।’’ चश्मे वाले ने महानगर की श्रेष्ठता सिद्ध करने वाला वक्तव्य दिया और फोन मिलाने लगा।
मोटा लड़का उसी चैनल में कैमरामैन था जिसमें अब वह चश्मे वाला लड़का समाचार वाचकपत्रकार और वीडियो एडीटर की बहुआयामी भूमिकाएं निभा रहा था। वह अभी हाल ही में शहर के एक विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई करके आया था और तकनीकी रूप से अपेक्षाकृत जानकार था। इस चैनल में आते ही उसने अपने लिये अच्छा नाम और सम्मान दोनों अर्जित कर लिया था। मोटे लड़के को सिर्फ कैमरा चलाना आता था और उसका अनुभव इस लड़के से कम से कम पांच साल अधिक था लेकिन अब विडम्बना यह थी कि उसे इस लड़के की जानकारियों के आगे एक तरह से इसके अघोषित सहायक की भूमिका निभानी पड़ रही थी। चैनल के मालिक ने उसे कई बार चश्मे वाले लड़के के सामने डांटा था और कहा था कि उसे अपने इस जूनियर सहकर्मी से कुछ सीखना चाहिये। दोनों साथ काम करते थे और शहर में यहां वहां घूम कर खबरें इकट्ठी करते थे। उनके अन्य साथी जो सेटेलाइट चैनलों के संवाददाता थेउन्हें कभी गंभीरता से नहीं लेते थे।
वे दोनों शहर के ही नाम पर चल रहे एक स्थानीय चैनल के पत्रकार थे।
आज माघी पूर्णिमा यानि गंगा स्नान कर सभी पापों से एक झटके में छुटकारा पाने का धार्मिक ऑफर था और लोगों में काफी उत्साह था। चश्मे वाले ने मोटे लड़के को इशारा किया कि वह बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिये लगी अत्यधिक लम्बी लाइन की एक फुटेज रिकॉर्ड कर ले और अपने मोबाइल पर कोई नंबर डायल करने लगा।
‘‘इसमें का है हर सोमवार लाइन लगती है एतने लम्बी।’’ मोटे ने उसकी बात को भाव नहीं दिया।
‘‘हर सोमवार की बात अलग है। यहीं से स्टोरी उठाएंगे तो सही रहेगा। माघी पूर्णिमा पर श्रद्धालुओं का तांता....।’’ चश्मे वाले लड़के ने चैनलों के अख़बारों से आतंकित होने की पुष्टि करते हुये कहा मगर मोटे ने इसे भाव नहीं दिया।
‘‘शिवरात्रि पर देखना भीड़ देखनी हो तो....।’’ कह कर मोटा आगे बढ़ गया।
दोनों राजेंद्र प्रसाद घाट की सीढ़ीयां उतरने लगे। घाट पर भीड़ थी और श्रद्धालु गंगा में नहा कर अपने पाप कम करने की कोशिश में थे। दोनों सीढ़ीयां उतर कर सिंधिया घाट की तरफ जाने लगे।
‘‘बोट पर चलेंगे बोट पर चलेंगे सर ?’’ मल्लाहों के झुण्ड से एक लड़का उन दोनों के पीछे लग गया। मोटे ने पीछे पलट कर देखा। लड़के से उसकी नज़रें मिलीं।
‘‘बोट माने ?’’ उसने लड़के से पूछा।
‘‘नाव।’’ लड़के ने इत्मीनान से उत्तर दिया।
‘‘तऽ पूरा हिंदी बोलनाव पर चलेंगे या तऽ फिर पूरा अंग्रेजी बोल....।’’ इतना कह कर मोटे ने चश्मे वाले लड़के की ओर देखा। बाकी बात उसने पूरी की, ‘‘विल यू कम ऑन माई बोट सर ?’’
मल्लाह लड़का समझ गया कि दोनों लोकल हैं। वह उछलता हुआ दूसरी तरफ निकल गया।
वे दोनों भीड़ में जगह बनाते आगे बढ़े तो एक सपेरा अपनी पिटारी खोल कर सांप दिखा रहा था। मोटा वहां से गुज़रा तो सपेरे ने पिटारी उसके आगे बढ़ाते हुये उसका अभिवादन किया जिसका अर्थ था कि उसकी पिटारी में कुछ पैसे डाल दिये जाएं।
‘‘महादेव।‘‘
‘‘असली हौ ?’’ मोटे ने पूछा। सवाल ने सपेरे को दुखी कर दिया और वह सांप को पिटारी से निकाल कर मोटे की ओर बढ़ाने लगा।
‘‘कटवा के बतइबा का ?’’ मोटे ने मुस्कराते हुये कहा और आगे बढ़ गया। चश्मे वाले ने उसे आवाज़ दी।
‘‘सांप को नचवा के रिकॉर्डिंग कर लिया जाये क्या ?’’ उसने सलाह मांगी। मोटे को अच्छा लगा कि उसने सलाह मांगी हैआदेश नहीं दिया। उसने एक पल को सोचा फिर प्रस्ताव को नकार दिया।
‘‘सांप वाले तो बहुत मिल जाएंगेएम्मे कोई बड़ी बात थोड़े है।’’
दोनों फिर चलने लगे। चश्मे वाला काफ़ी देर से बार-बार फोन लगा रहा था और दूसरी तरफ से उसका फोन नहीं उठाया जा रहा था।
‘‘हद्द है साला।’’ वह फिर झल्लाया।
‘‘अरे जाने दोसो रही होगी।’’ मोटे ने कहा।
‘‘नहीं यारउसके मामा के यहां सब सुबेरहीं उठ जाते हैं। उठ गयी होगी।’’
उसने फिर से नंबर लगाया। इस बार फोन उठा लिया गया। मोटा थोड़ा आगे हो गया लेकिन उसके कान फोन की बातों पर ही लगे थे।
‘‘आधा घंटा से परसान हैं।’’
‘‘तो रोमिंग में होगी तो फोने नहीं उठाओगी कोई मर जाये और तुम बिल बचाती रहो।’’
‘‘अरे यार गजब बात करती हो। अच्छा गुस्साओ मतहम आये हैं स्नान पर स्टोरी बनाने।’’
‘‘ठीक हैहम करा देंगे रिचार्ज। हमको एक घण्टे बाद करो मिसकालठीक है भूलना मत।’’
फ़ोन काटने के बाद वह मोटे के पास पहुंचा। मोटे ने चाल धीमी कर दी थी।
‘‘ई साला रोमिंग का बहुत लफड़ा है।’’ चश्मे वाले ने निराश आवाज़ में कहा।
‘‘वो कहां पहुंचापूछो।’’ मोटे ने अचानक पलट कर कहा तो चश्मे वाला लड़का फोन मिलाने लगा।
‘‘पहुंच जायेगा पांच मिनट मेंसुलभ शौचालय के पास है अभी।’’ चश्मे वाले ने फोन काट कर कहा।
‘‘निपट कर नहीं आया था का घरे से ?’’ मोटे ने कहा और सामने से आ रही दो विदेशी युवतियों को देखने लगा। उसकी नज़र युवती के स्तनों पर थी।
‘‘लटक गया है कम उमर में ही।’’ उसने चिंताग्रस्त होकर चश्मे वाले से कहा। चश्मे वाले ने भी मुआयना किया।
‘‘इतनी कम उमर भी नहीं है। हमारे यहां तो तीसे साल में......।’’
वे दोनों शीतला मंदिर से थोड़ा आगे निकले और सीढ़ीयों पर बैठ गये। मोटे ने अपना हैण्डीकैम निकाला और दूर नहा रही युवतियों पर फोकस करने लगा।
तीसरा विश्वनाथ गली में रहता था और एक सांध्यकालीन अख़बार में पत्रकार था। उसका घर घाट के किनारे था। घाट के निवासी यानि घटियारेलोग घाट के सब राज़ जानते थे और इस सहारे वह धर्म के भी सभी राज़ जानने का दावा करते थे। वह काफ़ी लम्बा था और दूर से ही नज़र आ जाता था। थोड़ी देर में वह दोनों के बताये स्थान पर पहुंचा और पहुंच कर उनके पास बैठ गया।
‘‘माल है ?’’ उसे देखते ही मोटे ने जिज्ञासा व्यक्त की।
‘‘हां।’’ उसने संक्षिप्त जवाब दिया और हाफ जैकेट की भीतरी जेब से एक पीली पन्नी निकाली जो बारात में नमकीन खिलाने के काम में आती थी और जिसे दबा कर बंद किया जाता था। उसने पन्नी में से कुछ सूखे निचुड़े पौधों के टुकड़े निकाले और उनकी सफ़ाई करने लगा।
‘‘देखें महकें जरा।’’ चश्मे वाले ने चेहरा आगे किया और तीसरे ने हथेली में रखी चीज़ एक बार चश्मे वाले की नाक के सामने से घुमा दी।
‘‘तगड़ा है।’’ चश्मे वाले ने महक न पाने के बावजूद खुद के अनुभवी गंजेड़ी होने का दावा पेश करने हेतु कहा।
मोटे ने उसे एक बार देखा और फिर रिकॉर्डिंग में लग गया।
‘‘सूरज उग रहा हैउससे जूम करके फिर नीचे आते हैं जहां सब लोग नहा रहे हैं।’’ मोटे ने कैमरे के व्यूफाइंडर में देखते हुये कहा। ‘‘पता चलेगा कि सुबह से ही लोगों की भीड़ इकट्ठा हो रही थी।’’ मोटे ने अपना पत्रकारिता ज्ञान दिखाना चाहा।
‘‘अरे सूरज फूरज से क्या मतलब है भीड़ तो रहबे करेगी नहान का दिन है तो। कोई दमदार स्टोरी चाहिये। दिमाग काम नहीं कर रहा है। कुछ बताओ बे अलग सी स्टोरी आज के लिये नहान में से....।’’ चश्मे वाले ने लम्बू की ओर देखा।
‘‘खाली करो इसको।’’ लम्बू ने चश्मे वाले को एक सिगरेट निकाल कर देते हुये कहा। चश्मे वाला सिगरेट को हल्के हल्के मसल कर उसके अंदर का तम्बाकू निकालने लगा।
लम्बू ने जेब से एक पतला पारदर्शी कागज़ निकाला और मसले हुये पौधों में से छोटे गोल आकार के बीज निकाल कर फेंकने लगा। फिर इसमें थोड़ा सा सिगरेट का निकला हुआ तम्बाकू मिलाया और इस मसाले को और साफ और महीन करने में जुट गया।
‘‘हम लोग त बढि़या स्टोरी बना ही लेंगे लेकिन ई साले सेटेलाइट वाले तो किसी काम के नहीं हैं। अभिजीतवा वहीं दसास्वमेधे घाट से दस मिनट का फुटेज लेकर निकल गया। कहा इतने में काम हो जायेगा।’’ मोटे ने संतुष्टि की भावना ज़ाहिर करते हुये कहा।
‘‘उन सालों को पूछता कौन है हम लोग लोकल चैनल के हैं तो यहां का स्नान कैसा रहाये देखने के लिये लोग हमारी खबर देखेंगे न कि कोई सेटेलाइट चैनल जिसपर सरवा दिल्ली में लूट दिल्ली में बलात्कार चल रहा होगा।’’ चश्मे वाले ने अधिक जानकारी और समझ होने का सबूत दिया। थोड़ी देर के लिये फिर खामोशी छा गयी। घाट पर श्रद्धालुओं की भीड़ थी और बीच-बीच में कुछ विदेशी भी घाटों की शोभा अपने कैमरे में कैद करते आगे बढ़ रहे थे। चश्मे वाले के फोन पर एक मिस्ड कॉल आयी और उसने फोन मिलाया। यह अपडेट देने के बाद कि मौसम में कोई खास ठंड नहीं है और नाश्ता वह सही समय पर कर लेगाउसने फोन काट दिया। उसके फोन काटने पर मोटे को कुछ याद आया और उसने कैमरा बंद कर दिया।
‘‘एयरसेल रोमिंग फ्री करने वाली है पूरे इंडिया में।’’ उसने कह कर बाकी दोनों के चेहरे देखे। चश्मे वाले के चेहरे पर उत्साह दिखा।
‘‘सही में कौन बताया ?’’
‘‘अखबार में निकला था एक दिन। एकाध महीने में हो जाये शायद।’’ उसने विश्वास के साथ कहा। लम्बू ने बात बीच में लपक ली।
‘‘अपने ही देश में साला रोमिंग का क्या मतलब पूरे देश में लोकल लगना चाहिये। ये क्या कि यूपी में हैं तो लोकल और जबलपुर गये तो रोमिंग ?’’
‘‘हांऔर क्या। एक कंपनी कर देगी तो सब कर देंगी धीरे-धीरे।’’ मोटे ने सहमति दी।
‘‘सही बात है।’’ चश्मे वाले ने चश्मा उतार कर टीशर्ट की किनारी से साफ़ किया और बोला।
‘‘तब.... बंबई कब जा रहे हो माल चीरने ?’’ मोटे ने लम्बे से मुंह उठा कर पूछा। मुंबई के नाम पर तीसरे के मुंह से एक हल्की कराह निकली जिसे किसी ने सुना नहीं।
‘‘कितना देंगे सब सेलरी वेलरी ?’’ अबकी चश्मे वाले ने पूछा। लम्बू ने सिगरेट की डिबिया का ढक्कन फाड़कर थोड़े हिस्से से उस सिगरेट का फिल्टर बनाया जो उसने उस पारदर्शी कागज़ को मोड़ कर बनाया था। इसके बाद उसने स्वनिर्मित सिगरेट को अपने होंठों से लगाया और जला कर एक लम्बा कश खींचा।
‘‘मुंबई में हमको काम करना ही नहीं है।’’ उसने इत्मीनान से धुंआ उगलते हुये कहा। दोनों उसके चेहरे को ध्यान से देखने लगे।
‘‘काहे बे का हो गया ?’’ मोटे ने सुहानूभूति भरे शब्दों में पूछा।
‘‘गुरू मुंबई में लोग सही नहीं हैं।’’ लम्बू ने फैसला सुनाया और सिगरेट चश्मे वाले की तरफ बढ़ा दी।
मोटा लड़का और चश्मे वाला लड़का थोड़ा और पास खिसक आये ताकि लम्बू के दुख में शामिल हो सकें। लम्बू का दुख उसके आसपास बिखरा था और उसने सुल्फे के साथ अपना दुख तंबाकू में मिला कर यह सिगरेट बनायी थी। सिगरेट के साथ दुख धीरे-धीरे धुंएं में समा कर नष्ट हो रहा था। दोनों मित्रों की मदद से इस दुख को समाप्त करने का काम तेज़ी से हो रहा था और थोड़ी ही देर में काफी हद तक कम नज़र आने लगा।
दुख के कम होने के बाद लम्बू नेजो मुंबई में किसी अख़बार में नौकरी खोजने गया था और बेरंग लौटा थाअपने मुंबई प्रवास की कहानी सुनायी। उसने बताया कि वह नौकरी के सिलसिले में जिस बनारसी दोस्त के कमरे पर ठहरा थावह एक पुराने यूपी वाले भइया का मकान था। दोस्त एक हिंदी अख़बार में मुलाजि़म था और उसके लिये भी कोशिशें कर रहा था। एक अख़बार में उसके लिये बात कर उसने साक्षात्कार की व्यवस्था की थी लेकिन वह वर्तमान राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े सवालों के जवाब नहीं दे पाया था।
‘‘साला हम लोग लोकल के राजा हैंयहां आओ तो बताएं लोकल पॉलिटिक्स में क्या दम है। हमसे पूछो कि अजय राय इस बार किस पार्टी से लड़ेंगे तो बताएं। पूछो तो चिरईगांव में कितने प्रतिशत ओट पड़ेगा वहू बता दें। चले हैं साले यूपीए फूपिये कॉमनवेल्थ के बारे में पूछने।’’
एक दिन लम्बू नौकरी खोज कर बहुत दुखी हो गया तो उसने किसी सस्ते बार में बैठ कर कुछ पेग मार लिये। दोस्त ने कहा था कि आज वह थोड़ा देर में कमरे पर पहुंचेगा इसलिये वह थोड़ी देर चाहे तो इधर उधर घूम सकता है। उसने समय काटने की गरज़ से दो तीन अतिरिक्त पेग मारे और जब देर रात दोस्त के बताये समय पर पहुंचा तो गड़बड़ हो गयी। उसे हालांकि याद था कि दोस्त का कमरा गली नं छह में है लेकिन वह गलती से गली नं सात में घुस गया। काफी मशक्कत के बाद भी जब उसे दोस्त वाला मकान समझ में नहीं आया तो उसने दोस्त को फोन लगाने की कोशिश की। दोस्त का फोन स्विच ऑफ था। उसे उस इलाके की सारी गलियां एक जैसी लग रही थीं और नशे की हालत में फोन स्विच ऑफ पाने पर वह इस कदर दबाव में आया कि भूल गया कि गली का नंबर क्या था। उसने फिर से गली के बाहर निकल कर उस चाय की दुकान से अंदाज़ा लगाना चाहा जहां वह पिछले चार पांच दिनों से रोज़ सुबह चाय पी रहा था। लेकिन उसकी बदकिस्मती देर रात दबे पांव आयी थी क्योंकि चाय की दुकान क्या एक लाइन से सारी दुकानें बंद हो चुकी थीं। उसने सिर को झटका और आंखें फाड़ कर एक बार फिर से गली को पहचानने की कोशिश की। उसने अपने मन पर भरोसा किया और उस झूठे आत्मविश्वास पर भी जो एक बार हां कहने के बाद एक गली की ओर इशारा करने लगा।
इस गली के म़कानों को देखकर उसे लग रहा था कि यह वही गली हो सकती है। वह मकानों को देखकर अंदाज़ा लगाने लगा कि दोस्त किसमें रहता है। उसे दोस्त पर गुस्सा आया कि उसने फोन स्विच ऑफ कर लिया और उसकी कोई खोज खबर नहीं ले रहा। आखि़रकार दसेक कदम चलने के बाद एक काले गेट ने उसे अपनी ओर बुलाया और उसके कानों में कहा कि वह वही गेट है जिसकी वह तलाश कर रहा है। उसने अपने भीतर के झूठे आत्मविश्वास की पीठ थपथपायी और गेट खोलकर भीतर प्रवेश कर गया।
‘‘हम्में इधर-उधर कहीं नहीं जाना। बनारस में जीना है और इहें मरना हैपूछो काहे ?’’ लम्बू ने आपबीती का अध्याय रोक कर पूछा जो दरअसल मुख्य बात पर आने से पहले की भूमिका बनाने की कोशिश थी।
‘‘क्यों ?’’ सवाल आया।
‘‘काहे कि यहां आजादी हैकहीं बैठोकहीं उठोजो मन में आये करो। मुंबई साला दूसरे देस जइसा है हम लोगों के लिये।’’ उसकी बात से सहमत होने लायक अनुभव दोनों में से किसी के पास नहीं था क्योंकि एक ने मुंबई की शक्ल ही नहीं देखी थी और एक ने मुंबई में सिर्फ़ गेटवे ऑफ इंडिया और एलिफेण्टा की गुफाएं देखी थीं।
आज़ादी वाली बात करने के बाद उसे प्रायोगिक तौर पर समझाने के लिये लम्बू ने एक लम्बा कश खींचा और अपने दोनों लम्बे पांव घाट की सीढ़ी से नीचे लटका कर सीधा फैला दिये। उसके पांव फैलाने से वहां से गुज़र रहे श्रद्धालुओं को परेशानी हुयी लेकिन उसने अपना पांव नहीं हटाया। एकाध गुज़रने वालों ने भृकुटि टेढ़ी कर उसकी ओर देखा तो उसने बत्तीसी खोल दी। वे समझ गये कि यह लड़का लोकल है और चुपचाप गुज़र गये। इसके बाद उसने दोनों लड़कों की ओर इस उम्मीद भरी नज़र से देखा कि वे अब समझ गये होंगे कि आज़ादी से उसका क्या मतलब था। अचानक एक अंग्रेज उधर से गुज़रा और कैमरे के ज़रिये किसी दृश्य पर ध्यान केंद्रित होने के कारण लड़के के फैले पैर को देख नहीं पाया और टकरा गया।
‘‘हे यू....।’’ वह कैमरे से आंखें हटाकर चिल्लाया। उसकी आवाज़ में गुस्सा था लेकिन कैमरे के बाहर जो दुनिया दिखी उसने उसे बताया कि वह अपने देश से कई समुंदर पार एक अजनबी शहर में है। उसकी आवाज़ की तपिश गायब हो गयी और उसने संयत होकर मुस्कराते हुये कहा, ‘‘प्लीजलेट पीपल गो।’’
‘‘जा जा आगे बढ़ाअंग्रेजी मत छांटा इहां।’’ लम्बू ने अपने फैले पैर बटोरने की कोई कोशिश नहीं की। अंग्रेज़ थोड़ी देर उन तीनों को देखता रहा फिर तिरछा होकर निकल गया।
‘‘फिर का हुआ जब तुम अंदर घुसे ?’’ मोटा उत्सुक था।
जब वह भीतर घुसा तो उसके मन ने एक बार कहा कि दोस्त वाले मकान में सीढ़ीयां दांयी तरफ से थीं लेकिन इस मकान में तो बांयी तरफ से हैं लेकिन उसे मन को एक चपत लगायी और उसे समझाया कि इतनी मेहनत के बाद उस मकान से मिलता जुलता मकान उसने खोजा है,अब इसे भीतर से चेक किये बिना जाना बेवकूफी है।
उसने उस कमरे का दरवाज़ा खटखटाया जो उसके हिसाब से उसके दोस्त का था। कमरे में से एक महिला निकली और उसने उससे मराठी में कुछ पूछा जिसका जवाब उसने लड़खड़ाती हिंदी में दिया। फिर उसका पति निकलाउसने उससे एकाध सवाल पूछे और उसके किसी भी उत्तर से संतुष्ट न होने पर उसे धकेलता हुआ नीचे ले आया। शोर से अगल बगल के भी लोग जाग गये थे और उस मकान का मालिक उसे गली में थप्पड़ों और लातों से मार रहा था। एकाध पड़ोसियों ने उससे मराठी में कुछ पूछा और जब उसने जवाब हिंदी में दिया तो क्रोधित होकर बिना पूरा मामला जाने एकाध झापड़ रख दिये। लेकिन कुछ मराठी पड़ोसियों ने ही बीच-बचाव किया और मारने वाले को समझाया कि वह आदमी चोर नहीं हो सकता क्योंकि चोर आजकल दिन में आते हैं। वह सिर्फ़ शराबी है और काफी चांस है कि जो वह बोल रहा हो उसमें सच्चाई हो। उसने लोगों को बनारस के एक लोकल चैनल का अपना प्रेस कार्ड दिखाया था तब लोगों ने उसकी सच्चाई पर विश्वास किया था और जाने दिया था।
उसकी अब दोस्त का कमरा खोजने की इच्छा मर गयी थी और वह बाहर निकल कर वहां की सड़कों पर घूमने लगा। घूमता-घूमता वह थोड़ा आगे निकल गया। जब थक गया तो सड़क के किनारे बैठ गया। अभी वह अपनी थकान मिटा कर आगे के कदम के बारे में सोच पाता तब तक एक गश्त लगाते पुलिस वाले ने उसे पकड़ लिया और थोड़ी दूर पर खड़ी पुलिस जीप के पास ले गया।
वहां उसने कुछ कहने की कोशिश की थी लेकिन उसके हुलिये और चेहरे पर मार के निशानों ने पुलिस का मन भी चंचल कर दिया था। उसे दो चार झापड़ और मारे गये और पूछा गया कि वह वहां क्यों बैठा है।
‘‘बताओ सरवाकोई कहीं बैठे तो भला इस बात का क्या जवाब दे सकता है कि वहां क्यों बैठा है।’’ उसने दुखी मन से दोनों की ओर देखते हुये कहा फिर थोड़ी दूरी पर बैठे एक अधेड़ की ओर मुंह कर पूछा जहां एक देहाती औरतों का एक झुण्ड नहा कर गुज़र रहा था, ‘‘का हो चच्चाइहां काहें बदे बइठल हउवा ?’’
अधेड़ ने उसकी ओर हिकारत से देखा और बोला, ‘‘गांड़ मरावे बदे बइठल हई।’’
वे तीनों समझ गये कि वह लोकल है और हंसने लगे। लम्बू ने आगे कहानी को समाप्त करते हुये बताया कि उस पूरी रात वह उस क्षेत्र में घूमता रहा और सुबह होते ही दोस्त के कमरे पर जाकर अपना बैग लेकर निकल आया।
‘‘वहां के लोग अपने आप को साला दुनिया का राजा समझते हैं। बाहरी आदमी की कोई इज्जत ही नहीं। हमारे सामने ही एक और आदमी को पकड़ा जो दारू पीये था और बाइक से जा रहा था। वो मराठी में कुछ बोला तो उसको साले सब आराम से जाने दिये। बाहरी लोगों के लिये वहां के लोगों के मन में कोई भावना नहीं। बेकार है। च्चचमसीन हैं सब उहांसाला कोई आदमी नहीं।’’ लम्बू कहानी के उपसंहार के बाद चुप हो गया और इंतज़ार करने लगा कि सिगरेट का आखि़री कश उसके दिया जाये। मोटे ने उसकी दृष्टि भांप पर हाथ उसकी तरफ बढ़ा दिया।
लम्बू ने धीरे से सिगरेट का आखि़री कश खींचा और बचा हुआ फिल्टर दूर फेंक दिया जो नहा कर निकले एक आदमी के कंधे के बगल से होता हुआ गिरा। कंधे पर गमछा रखे उस आदमी ने क्रोध से तीनों की ओर देखा और आगे बढ़ गया।
‘‘मज़ा आ रहा है गुरू।’’ चश्मे वाले ने किलकारी मारी और खड़ा होकर अंगड़ाई लेने लगा। उसके भीतर पिनक जाग गयी थी।
‘‘हांमाल वाकई तगड़ा था।’’ मोटा भी उठ खड़ा हुआ।
‘‘क्या हुआ बइठो थोड़ी देर।’’ लम्बू ने कहा।
‘‘चलोगे तो नसा भिनेगाभिनेगा तो मजा आयेगा।’’ मोटे ने सलाह दी तो लम्बू भी उठ खड़ा हुआ। ‘‘कर्नाटक से लौट आएंगे।’’ उसने कहा।
‘‘ठीक है गुरूचलो तो।’’ दोनों ने रज़ामंदी दे दी।
वे दोनों घाट के ही रास्ते कर्नाटक स्टेट भवन की तरफ चलने लगे। मोटे ने काफ़ी देर से हाथ में ली पन्नी ज़ोर से घुमा कर गंगा जी में फेंक दी।
‘‘क्या था बे ?’’
‘‘मूर्ति था कई ठो भगवान काटूट गया था।’’
जल पुलिस वालों की उद्घोषणा सुनायी दे रही थी, ‘‘जो घाट के स्थायी भिखारी हैंवे ही कृपया घाट पर रहें। बाहरी भिखारी घाट पर प्रवेश न करें। ध्यान से सुनेंबाहरी भिखारी घाट पर प्रवेश न करें।’’ दोनों ने ध्यान से सुना और लम्बू की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा गोया घाट की सारी बातें उसे पता हैं।
‘‘अरे नहान वाले दिन बहुत बाहरी भिखारी आ जाते हैं।’’ लम्बू ने उनकी उम्मीदों पर खरे उतरने की कोशिश की।
‘‘तो ?’’
‘‘अरे तो क्याऊ सब पइसा थोड़े देंगे। पुरनकन सब पइसा देते हैं जब बइठने देती है जल पुलिस इनको सीढ़ी पे भीख मांगने।’’
इस जवाब से दोनों संतुष्ट हो गये और आगे की ओर बढ़ चले। सामने से दक्षिण भारतीय श्रद्धालुओं का एक दल आ रहा था जिसमें कुछ महिलाओं ने सिर मुंड़ा रखा था।
‘‘औरतन काहे सब कपार छिलवा लेती हैं वहां की ?’’ मोटे ने झल्लाहट में पूछा। चश्मे वाला कुछ कहना चाहता था लेकिन तब तक उसके मोबाइल पर फिर से मिस्ड कॉल आ गयी। लम्बे वाले लड़के ने मोटे की ओर देखा, ‘‘ई सब बहुत बिजंड भक्त होते हैं। साले पूरा इंडिया घूमते हैं नंगे पैर भक्ति के चक्कर में। यहां घाट पर सबसे ज्यादा गंदगी साउथ इंडियनवे फइलाते हैं।’’ तीसरे ने समूह को घूरते हुये कहा।
चश्मे वाला थोड़ा पीछे रह गया था और अपनी बात खत्म कर रहा था, ‘‘एयरसेल आल इंडिया रोमिंग फ्री करने वाला हैतुम एयरसेल ले लेना और हम तुम कहीं रहेंचउचक बात कर सकेंगे।’’ उसने फोन की दूसरी तरफ़ वाले को ख़ुशखबरी दी और तेज़ कदमों से दोनों के पास आ गया। तभी दक्षिण भारतीयों के समूह में से एक आदमी ने अपने हाथ में पकड़ा फ्रूटी का पैकट खाली होने पर बगल में फेंक दिया जहां पहले से काफ़ी कूड़ा-करकट बिखरा हुआ था। चश्मे वाला कुछ कहने ही वाला था कि लम्बू फुर्ती से श्रद्धालुओं के उस समूह के पास पहुंच गया।
‘‘इधर क्यों फेंका कचरा ?’’
‘‘व्हाट ?’’ उस आदमी ने समझ न पाने की स्थिति में पूछा।
‘‘व्हाई इम्पटी पैकेट थ्रो हियर दिस नॉट डस्टबीन। दिस गंगा मइया।’’
‘‘ओके।’’ उस आदमी ने कहा और आगे बढ़ने लगा। लम्बू को बुरा लगा। तब तक बाकी दोनों भी पास आ गये थे।
‘‘देख रहे हो साले का एक तो साले गंदगी फइलाते हैं और ऊपर से बोल रहे हैं तो सुन भी नहीं रहा।’’ लम्बू ने आगे बढ़ते उस आदमी का हाथ पकड़ लिया था। वह आदमी शरीर से तगड़ा थाउसने अपना हाथ झटका तो लम्बू नीचे गिर पड़ा। इसके बाद का सब काफ़ी तेज़ी से हुआ। लम्बू उठा और उसने उस आदमी को पीछे से एक लात मारी। आदमी अचानक हुये हमले से संभल नहीं पाया और गिर गया। उसके गिरते ही लम्बू उसके ऊपर चढ़ गया और उसे पीटने लगा। मोटा भी आकर उसका साथ देने लगा। चश्मे वाले ने चश्मा जेब में रख लिया और उन दोनों के साथ उस आदमी पर पिल पड़ा।
उस आदमी के परिवार के लोग डर गये थे और शोर मचा रहे थे। जब तक घाट पर इधर-उधर से लोग दौड़ कर आतेतब तक आदमी को वे तीनों मिल कर काफ़ी मार चुके थे। घाट के लोगों ने आदमी को तीनों की पकड़ से छुड़ाया और झगड़े की वजह पूछी। लम्बू ने अपने कोण से घटना बयान की और बाकी दोनों ने उसके पक्ष में गवाही दी। कुछ बुजु़र्ग लोगों ने श्रद्धालुओं को आगे जाने को कहा और लड़कों को डांटा। लगभग सभी लोगों का कहा कि लोकल लड़के आजकल बहुत बदमाश हो गये हैं लेकिन कुछेक लोगों का कहना था कि लड़कों ने ठीक किया है,बाहरी लोग आकर गंगा जी को बहुत दूषित कर रहे हैं।
वे तीनों सामान्य होकर फिर से कर्नाटक स्टेट भवन की ओर बढ़ चले थे। अचानक लम्बू ने पीछे पलट कर पूछा, ‘‘कौन बता रहा था कि एयरसेल आल इंडिया रोमिंग फ्री कर रहा है ?’’
‘‘अख़बार में निकला था,’’ मोटे ने जवाब दिया। 
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Tuesday, April 24, 2012

विमल चन्द्र पाण्डेय की कहानी


आज प्रस्तुत है कवि-कथाकार विमल चन्द्र पाण्डेय की कहानी 'खून भरी मांग'. इन दिनों लमही के कहानी विशेषांक में प्रकाशित विमल की कहानी "उत्तर प्रदेश की खिड़की" अपने अनूठे शिल्प, कथ्य और काव्यात्मक भाषा के चलते चर्चा में है. भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित उनके कहानी-संग्रह 'डर' को ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार प्राप्त हो चुका है.  




















खून भरी मांग : विमल चन्द्र पाण्डेय 

उनकी आंखों में जो मुझे दिखायी देता था वह फिर मुझे कभी और कहीं नहीं दिखा। उसकी परिभाषा देना मुश्किल है लेकिन उन्हें समझना कतई मुश्किल नहीं था। चीज़ें दिमाग में इतनी स्पष्ट नहीं हैं और मुझे शुरुआत का इतना याद आता है कि इस दुनिया को मैंने उनकी ही नीली आंखों से देखना शुरू किया था। वह हमेशा मुझे अपने पुराने दिनों में बैठी दिखायी देती थींजहां मैं हाफ पैण्ट पहने उनके पीछे-पीछे घूम रहा होंउ और वह मुझे ढेर सारी कहानियों में गुमा दे रही हों। हम उन्हें किरन बुआ कहते थे और जीतेंद्र उनका पसंदीदा हीरो थायह बात पूरे मुहल्ले पर उसी तरह ज़ाहिर थी जिस तरह यह ज़ाहिर था कि मुझे स्कूल जाना एकदम नहीं पसंद। मुझे उस मासूम उम्र में एक अंधेरे हॉल में सैकड़ों जगमगाती रोशनियों के बीच सबसे पहली बार वही लेकर गयी थीं। सभी लोग दम साधे किसी एक चीज़ का इंतज़ार कर रहे थे तो मैं भी करने लगा। वह मेरी उंगली थामे अंदर जाकर दाहिने मुड़ी थीं और एक सीट पर बैठ गयी थीं। मैं उनकी बगल वाली सीट पर बैठा था कि अचानक सामने के परदे पर रंगों के इंद्रधनुष उतर आये। जो संगीत बज रहा था उसकी झनकार मुझे उन रंगों के रथ पर बिठा कर दूसरी दुनिया में ले जा रही थी। मैं सिनेमा हॉल में बैठकर अपनी ज़िंदगी की पहली फिल्म देख रहा था। फिल्म का नाम `आखिरी रास्ता´

किरन बुआ का घर हम लोगों के घर के ठीक बगल में था। उनके पिता जी नहीं थे और मां व भाई मिलकर घर चलाते थे। भाई अंडे का ठेला लगाता था और दोपहर से ही उनकी मां एक बड़े परात में प्याज़ काटना शुरू देती थीं। शाम होने पर उनका भाई अंडे के ठेले पर अंडों की ट्रे सजाता और नदेसर चौराहे की तरफ निकल जाता। उनकी मां का पसंदीदा काम औरतों से बातें करना और अपने रिश्तेदारों को कोसना था। किरण बुआ की उम्र उस समय 17 या 18 रही होगी। मैं दूसरी क्लास में पढ़ता था और किरण बुआ के सबसे करीब था।

फिल्में उनकी जान थीं। वह हमारे घर से अक्सर अचार मांग कर ले जाती थीं और कहती थीं कि उनकी मां को नहीं पता चलना चाहिये नहीं तो वह बहुत मार खायेंगीं।

हमारे घर वाली सड़क के दूसरी तरफ यानि सड़क पार करने पर फिलमिस्तान टॉकीज़ था जिसमें किरण बुआ नियमित रूप से फिल्में देखने जाती थीं। कोई भी नयी फिल्म लगने पर उस दिन बहुत भीड़ होती थी इसलिये बुआ अक्सर शुक्रवार को लगी फिल्म को देखने के लिये सोमवार या मंगलवार का दिन चुनती थीं। मैं हमेशा उनके साथ होता था। मैं एक छोटा बच्चा था और छोटे बच्चे इस बात की अघोषित गारंटी लेते थे कि उनके होते कोई अनैतिक कार्य नहीं किया जा सकेगा। पहली बार के बाद मैंने किरण बुआ के साथ हर हफ्ते एक के हिसाब से एक साल में इतनी फि़ल्में देख लीं कि मेरे दोस्त मुझसे ईर्ष्या करने लगे। कटिंग मेमोरियल के उस बड़े से मैदान में जब आधी छुट्टी में सभी दोस्त पकड़ा-पकड़ी और विषअमृत खेलतेमैं चार-पांच लड़के लड़कियों से घिरा किसी नयी फिल्म की कहानी सुना रहा होगा। फि़ल्मों की कहानियां सुनाने की कला मैंने उनसे ही सीखी थी। फिल्में देखना उनका नशा हैये बात मुहल्ले में सबको पता थी और इससे किसी को ऐतराज़ नहीं था। यह ऐसा समय था जब लोगों को कम ऐतराज़ हुआ करते थे और दिलों में प्यार ज़्यादा हुआ करता था।

मैं धीरे-धीरे उनका राज़दार और साथी बन गया था। `खुदगर्ज´ देखते वक्त जब वह मुझे बिठा कर कुछ देर के लिये गायब हुयीं तो मुझे लगा कि वह बाथरुम गयी होंगीं लेकिन जब वह पंद्रह बीस मिनट बाद आयीं तो थोड़ी घबरायी और अस्त व्यस्त सी लगीं। फिर इसके बाद यह नियम ही हो गया। वह हर फिल्म में मुझे बैठा रहने को कह गायब हो जातीं। उनके जाने और आने के बीच का अंतराल बढ़ता गया। पहले वह पंद्रह बीस मिनटों में वापस आ जाती थीं,फिर एक-एक घंटे तक गायब रहने लगीं। मैं कुछ पूछता तो उदास हो जातीं। जब ऐसा उन्होंने जीतेंद्र और रेखा की एक फिल्म में किया तो मुझे कुछ शक सा हुआ। जीतेंद्र उनका आराध्य था और रेखा उनके लिये धरती पर किसी चमत्कार जैसी थी। उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी इच्छा थी कि जीतेंद्र और रेखा शादी कर लें। मैं उनके उठने के दस मिनट बाद उठा और बाथरुम के पास चला गया। मुझे बाथरुम के पीछे वाली दीवार से कुछ आवाज़ आयी तो मैं उधर ही चला गया। मैंने देखा हमारे मुहल्ले का हसनजो हॉल में टिकट चेक करता थाकिरण बुआ को दीवार पर लगाये उनके होंठों को चूम रहा है। किरण बुआ उसका सिर सहला रही थीं। थोड़ी देर बाद किरन बुआ ने उसे पीछे धकेला तो वह हंसने लगा।

``कहां जाएंगे....?´´ किरन बुआ ने पूछा था।

``कहीं भी....जहां भी सिनेमाहॉल होगा हमारी नौकरी लग जायेगी। जितना पैसा मिलेगा उतने में हम खाना खा लेंगे और तुम पिक्चर देख लोगी।´´ हसन ने बुआ का हाथ पकड़ते हुये कहा। बुआ ने उसकी हथेलियों को अपने चेहरे से सटाते हुये कहा।

``कितना अच्छा लगता है न...? हमको खाना तीन-चार दिन पे भी मिले तो हम काम चला लेंगे बस तुम नौकरी यही करना कि हम लोग खूब पिक्चर देख सकें।´´

हसन ने उन्हें बांहों में भर लिया था और यही पल था जब उसकी नज़र मुझ पर पड़ी। वह झटके से बुआ को अलग हो गया। ``राजू....चलो पिक्चर देखो यार´´ उसने मुझसे कहा। बुआ की नज़र मुझसे मिली और वह चुपचाप हॉल में घुस गयीं। मुझे अचानक लगा कि मैं बहुत बड़ा हो गया हूं और एकदम अवांछित भी। उसी पल मेरे मन ने तमन्ना की कि मुझे कभी बड़ा नहीं होना है। क्या फायदा ऐसा बड़ा होने का कि लोग आपसे डर जायं  मैं बुआ को खुश देख कर खुश था लेकिन मुझे देखकर उनके चेहरे पर जो डर उभरा था उसने फिल्म देखने का मेरा पूरा मज़ा किरकिरा कर दिया।

रास्ते भर बुआ ने मुझसे कोई बात नहीं की। लौटते वक्त हम फिल्मों के नशे में लौटते थे और गाने और कलाकारों की तारीफें करते हुये घर पहुंचते थे लेकिन उस दिन हम दोनों खामोश रहे। मुझे रात भर नींद नहीं आयी और डर सताता रहा कि अब बुआ मेरे बिना फिल्में देखने चली जाया करेंगी तो मेरा क्या होगा।

अगले दिन बुआ ने मुझे नीचे मैदान से खेलते हुये बुलाया और कहा कि वह उस लड़के से प्यार करती हैं जैसे जीतेंद्र रेखा से करता है और उससे शादी करने के लिये वह किसी भी हद तक जा सकती हैं। वह फिल्मों के संवादों में बात कर रही थीं और ये सुनना मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। मैं खुद को अपनी उम्र से बड़ा महसूस कर रहा था। मैंने उनका हाथ पकड़ कर वादा किया कि मैं किसी को कुछ नहीं बताउंगा और मेरी मदद की जो भी जरूरत पड़ें वो मुझे बेझिझक बताएं। मुझे पता नहीं चला कि मैं भी फिल्मी संवादों में बात करने लगा था।

 अगली दो-तीन फिल्में शायद किरन बुआ की ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत फिल्में थीं। मुझे हॉल में बिठा कर वह हसन से मिलने चली जातीं और दोनों एक दूसरे को बांहों में भरे किसी कोने में अपने भविष्य के सपने देखते। बुआ हर फिल्म को दो बार देखतीं क्योंकि एक ही बार वह हॉल में पूरे वक्त मौजूद रहतीं।

जिस दिन हम `तमाचा´ देख कर घर लौटे थे उस दिन मुझे दो और किरन बुआ को अनगिनत तमाचे पड़े थे। यह घटना ऐसी थी कि मुझे ज़िंदगी भर के लिये उस फिल्म का नाम और उसकी कहानी याद हो गयी। किसी ने उनके बारे में उनके भाई को पता नहीं क्या बताया था कि अगली सुबह मेरी भी वहां पेशी हुयी।

``हसनवा को जानते हो देखे हो इसके साथ कभी पिक्चर में से निकलती है कि नहीं बीच में ये एक ही पिक्चर दो-दो बार क्यों जाते हो तुम लोग देखने कितना देर तुम्हारे साथ रहती है ये....?´´ किरन बुआ के भाई के पास अनगिनत सवाल थे। मैंने सबके जवाब में सिर्फ यही कहा कि जो फिल्म मुझे अच्छी लग जाती है उसे दुबारा देखने के लिये मैं ही किरन बुआ से जिद करता हूं और किरन बुआ पूरी फिल्म भर मेरे ही साथ रहती हैं। मेरी बात का विश्वास नहीं किया गया और किरन बुआ ने कुछ कहने के लिये मुंह खोला ही था कि उनके भैया उन्हें लातों से पीटने लगे।

``साली कटुये के चक्कर में इज्जत डुबायेगी हमारी...हरामजादी।´´ किरन बुआ की मां भी अपने बेटे को किरन बुआ को मारने के लिये उकसा रही थीं। मैं रोने लगा और उन्हें रोकने की कोशिश की तो उन्होंने मुझे धक्का दिया जिससे मेरा सिर वहीं रखी लोहे की कुर्सी से टकराया और मैं रोता हुआ घर आ गया। घर आकर मैंने पापा को सब कुछ बताया और किरन बुआ को बचाने को कहा तो उन्होंने मुझे दो तमाचे मारे और कहा कि मैं अपनी खैर चाहता हूं तो उनके घर की ओर देखूं भी नहीं।

इसके बाद सब कुछ बहुत जल्दी-जल्दी हुआ। एक दिन भोर में हसन की लाश फिलमिस्तान के पीछे पायी गयी। पुलिस ने बताया कि हसन को जुआ खेलने की आदत थी और किसी से उधार लेकर उसने जुआ खेला थाउधार वक्त पर चुकता न कर पाने के कारण उसकी हत्या कर दी गयी। उसी महीने के अंत तक किरन बुआ की शादी तय कर दी गयी।

बुआ सिर्फ बालकनी पर कभी-कभी दिखायी देती थीं। उनकी आंखें हमेशा सूजी रहतीं और वह न जाने कहां देखा करती थीं कि बहुत कोशिश के बावजूद मेरी आंखों से उनकी आंखें मिलती ही नहीं।

उनकी शादी में मैं नयी कमीज़ पहन कर गया था और मैंने छह गुलाबजामुन खाये थे। वह विदाई के समय इतना रोयीं कि पूरा मुहल्ला वीरान लगने लगा। डोली में बैठने से पहले वह मेरे गले लग के भी खूब रोयीं।

उनके जाने के बाद मुहल्ला सूना हो गया। मैं स्कूल से आते वक्त नयी नयी फिल्मों के पोस्टर देखता और उन्हें देखने के लिये तड़पता रहता लेकिन मुझे कौन दिखाता फिल्में। पापा से कहता तो वह कहते कि मैं फिल्में समझने लायक हो जाउं तब वह दिखाने ले चलेंगे।

एक दिन मैं स्कूल से लौट कर आ रहा था। रास्ते में लगे `खून भरी मांग´ के पोस्टर जो मुझे एक हफ्ते से परेशान कर रहे थे। मैं किरन बुआ को याद करता आ रहा था कि रेखा की फिल्म उन्होनें मुझे पहले ही दिन दिखा दी होती। फिल्म मारधाड़ वाली लग रही थी और मुझे किरन बुआ की रोमांटिक फिल्मों की तुलना में ऐसी ही ज्यादा पसंद आती थीं। पोस्टर घर लौटते तक मेरे दिमाग में छा चुका था, -राकेश रोशन की प्रस्तुति खून भरी मांगसंगीत राजेश रोशनगीत इंदीवर। मैं पागलों की तरह सोच रहा था कि कैसे देखूंगा ये फिल्म। मेरे दिमाग में पोस्टर के आधार पर पचासों कहानियां दौड़ रही थीं।

जब मैं घर पहुंचा तो खुशी से मेरी किलकारी फूट पड़ी। किरन बुआ मेरे घर में बैठी मां से बातें कर रही थीं। मैंने अपना बस्ता फेंका और दौड़ कर उनसे लिपट गया। वह मेरे सिर पर हाथ फिराने लगीं।

``कैसे हो राजू ?´´ उनकी आवाज़ सिर्फ दो-ढाई महीनों में ही इतनी बदल गयी थी कि पहचान में नहीं आ रही थी। एकदम टूटी हुयी आवाज़बिखरी सी जैसे रात भर टपकती ओस में भीग कर नम हो गयी और कहीं कोई धूप न हो। मैं उनसे ज़ोर से लिपट गया। वह जाने लगीं तो मेरी आंखें भर आयीं। उन्होंने मेरा माथा सहलाया, ``आदमी होके रो रहे हो?  आदमी बहुत ताकतवर होता है। रोओ मतशाम को बरामदे में मिलेंगे।´´

बरामदा एक तरह से हमारे मोहल्ले की चौपाल था जहां औरतें और बच्चे शाम को बैठ अपनी-अपनी दुखों की गठरी खोल कर आपस में साझा किया करती थीं।

शाम को जब पापा आ गये और मैंने होमवर्क उन्हें दिखा लिया तो बरामदे में जाने के लिये निकलने लगा। मां ने पापा से कुछ कहा जिसमें मुझे इतना ही समझ में आया कि किरन बुआ के ससुराल वाले बजाज चेतक मांग रहे हैं और उन्हें यहां मारपीट कर वापस यह कह कर भेजा गया है कि वापस तभी आयें जब उनका भाई बजाज चेतक खरीद कर वहां पहुंचा आये। मैं इस बात का मतलब ठीक से नहीं समझा और जितना समझा उसमें मुझे यही लगा कि मार खाना कोई बड़़ी बात नहीं और चेतक खरीद कर जितने दिन नहीं दिया जायेगा उतने दिन मैं किरन बुआ के साथ रह सकूंगा।

जब मैं बरामदे में पहुंचा तो बुआ बैठी एक पत्रिका पढ़ रही थीं। मैंने उन दिनों की अपनी सबसे बड़ी समस्या उनसे साझा की। `खून भरी मांग´ जरूर बहुत शानदार पिक्चर होगी और हमें उसे देखना चाहियेमैं उनके आने का कैसे भी फायदा उठा लेना चाहता था। वह एक बिना चीनी की मुस्कराहट मुस्करायीं और मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अपने पास बिठा लिया।

``मैंने तो देख लिया।´´ मेरा चेहरा बुझ सा गया। उन्होंने मेरी ठुड्डी ऊपर उठाते हुये पूछा, ``कहानी सुनोगे ?´´

``हां हां ....सुनाइये।´´ मैं उत्साहित हो गया। उनसे कहानी सुनना किसी फिल्म देखने से कम नहीं था। वह एक-एक डायलॉग बोलकर फिल्मों की कहानियां दो-दो घण्टेफिल्म बहुत अच्छी हुयी तो दो तीन दिन में सुनाती थीं। उनके फिल्म सुनाने की बात सुनकर पास खेल रहे मेरे एकाध दोस्त और खिसक आये। आखिर किरन बुआ बहुत दिन बाद किसी फिल्म की कहानी सुनाने जा रही थीं। इसके पहले जब मैंने उनसे जीतेंद्र की फिल्म `मजाल´ सुनी थी तो उसका असर इतना तगड़ा था कि इत्तेफाकन उसे कुछ महीनों बाद हॉल में देखा तो किरन बुआ की सुनायी हुयी फिल्म ज्यादा अच्छी लगी थी। बुआ की कहानी में जिस तरह से जीतेंद्र ने काम किया था वैसा काम न फिल्म में उसने किया और न ही श्रीदेवी या जया प्रदा उतनी सुंदर लगीं जितनी बुआ की कहानी में लगी थीं।

बुआ की आवाज़ की उदासी बरकरार थी। कहानी में शुरू में वह ऊर्जा महसूस नहीं हुयी लेकिन जैसे ही कहानी ने दस मिनट का सफ़र तय कियाकिरन बुआ की न जाने कहां खो गयी ऊर्जा वापस आने लगी।

``फिर एक दिन सुंदर वाली रेखा अपने पति से कहती है कि मुझे अपनी जायदाद में दूसरा हिस्सेदार नहीं चाहिये।´´यह कहती हुयी बुआ खड़ी हो गयीं। ``टेन टेणान टेन टेन....इसके बाद बेचारी जो गरीब वाली रेखा हैउसको मारने के लिये सुंदर वाली घमंडी रेखा गुंडा भेजती है....डिन डिन डिन डिन..टेन टेणेन..।´´ किरन बुआ पूरी तरह फॉर्म में आ चुकी थीं और जब रेखा को मारने के लिये पहुंचे गुंडे उस पर हमला करने लगे उन्होंने बाकायदा हाथ पांव चलाकर पहले की तरह पूरी फिल्म उपस्थित कर दी। हंसी वाले मौकों पर उनकी आवाज़उनकी आंखें उनका पूरा शरीर हंसने लगता और भावुक पलों पर पूरा मोहल्ला भावुक हो जाता।

कहानी कुछ यूं थी कि एक ही अमीर बाप की दो बेटियां थीं जिनमें एक सुंदर और दूसरी कुरूप थी। सुंदर वाली बहुत घमंडी थी और कुरूप वाली बहुत आज्ञाकारी थी। रेखा का इसमें डबल रोल था। बाप के मरने के बाद सुंदर वाली अपने मन से शादी कर लेती है और कुरूप वाली को अपनी मर्जी से शादी नहीं करने देती। कुरूप रेखा राकेश रोशन से प्यार करती हैसुंदर वाली रेखा उसे मरवा देती है। सुंदर वाली रेखा कुरूप वाली रेखा से घर के सारे काम करवाती है और उसे बहुत मारती है। एक दिन उसे लगता है कि कहीं कुरूप वाली रेखा उसकी जायदाद में से हिस्सा न मांग लेइसलिये वह अपने पति कबीर बेदी से एक ऐसी मांग करती है जिसे सुन कर वह घबरा जाता है। वह उससे मांग करती है कि वह उसकी बहन को मार डाले। उसकी `खून´ से `भरी´ यह `मांग´ सुनकर उसका पति डर जाता है लेकिन उसे अपनी पत्नी की यह `खून भरी मांग´ पूरी करनी पड़ती है। वह उसकी हत्या कर देता है। कहानी के अंत के बारे में किरन बुआ हम बच्चों को संतुष्ट नहीं कर पायीं। उन्होंने बताया कि कुरूप वाली रेखा के मरने के बाद उसका घोड़ा उसी तरह उसकी मौत का बदला लेता है जैसे तेरी मेहरबानियां में कुत्ते ने लिया था। हम बच्चे अंत से बहुत खुश नहीं थे लेकिन फिल्म हमें बहुत पसंद आयी थी। पूरी फिल्म सुनाने में किरन बुआ ने दो घंटे लिये थे और फिल्म खत्म होने के कुछ ही देर बाद जब वह गली में गोलगप्पे वाले को रोककर गोलगप्पे खाने वाली थीं कि उनकी मां ने उन्हें आवाज़ दी और वह चली गयीं।

यह हमारी आखिरी मुलाकात थी। इसके कुछ ही महीनों बाद पापा ने उसी शहर के एक दूसरे मुहल्ले में ज़मीन खरीद कर दो कमरे बनवा लिये और हम लोग किराये का वह कमरा छोड़ कर वहां शिफ्ट हो गये। मैं छठवीं क्लास में आ गया था और अपने दोस्तों के बीच रमने लगा था। मां बीच-बीच में अपने पुराने पड़ोसियों से मिलने पुराने मुहल्ले कभी-कभी जाती रहती थीं। एक दिन उन्होंने वहां से लौट कर बताया कि किरन आयी है और तुझे पूछ रही थी। मैं आठवीं में चला गया था। मां ने पापा से रोते हुये बताया कि बेचारी इतनी हंसमुख लड़की सिर्फ़ हडि्डयों का ढांचा भर रह गयी है। मैंने सोचा कि मैं किसी दिन मिलने ज़रूर जाउंगा।

मैं नवीं क्लास में चला गया था जब मां ने एक दिन लौट कर बताया कि किरन की अपने ससुराल में खाना बनाते समय जलने से मौत हो गयी। मैं सन्न रह गया। मां पापा से बता रही थीं कि स्कूटर देने के बाद से ही उसके ससुराल वाले सोने की चेन की मांग कर रहे थे। पिछली बार किरन ने रोते हुये उन्हें बताया था कि अगर उनकी मांग पूरी नहीं की गयी तो वे लोग उसे मार डालेंगे। मुझसे और सुना नहीं गया। मैं वहां से हट गया। मुझे रुलाई भी आयी लेकिन मैं उसे दबा ले गया।

जब मैं बारहवीं पास कर चुका था और बी. एससी. के कठिन मैथ और फिजिक्स से जूझने लगा था उन्हीं दिनों एक बदहवास से दिन दूरदर्शन पर शाम को `खून भरी मांग´ आने लगी। मेरा कहीं निकलने का प्लान नहीं था इसलिये मैं फिल्म देखने लगा वरना अब इस तरह की फिल्में मुझे पसंद नहीं आती थीं।

मैं जैसे-जैसे फिल्म देखता गयामेरे भीतर कुछ भरता सा गया और कहीं कुछ खाली सा होता गया। फिल्म खत्म होते तक मैं पूरी तरह से भर कर एकदम खाली हो चुका था। न फिल्म में रेखा का डबल रोल था और न उसमें खून से भरी कोई मांग थी जिसे किसी को पूरा करने के लिये किसी का खून करना पड़े। मैं खुद को जज़्ब करने की कोशिश में अचानक हिचकियां लेने लगा था। मां दूसरे कमरे से आ गयी।

``क्या हुआरो रहे हो क्या ?´´ मां ने पूछा।

``नहींनहीं....।´´ मैंने आंखें पोंछते हुये कहा। ``उसे मार डाला....।´´ मैंने बात संभालने की कोशिश की।

``किसे...?´´ मां घबरा गयीं। उन्होंने टीवी देखा। टीवी पर रेखा अपनी हत्या की कोशिश करने वाले कबीर बेदी को बुरी तरह मार रही थी।

``रेखा को....।´´ मैंने कुछ शर्मिंदा होकर सामान्य होना चाहा।

``बेवकूफ हो क्या...रेखा ज़िंदा है। वही तो बदला ले रही है। पिक्चर का तुम्हारा कीड़ा न...।´´ मां बड़बड़ाती हुयी बाहर चली गयीं।

मैंने छत की ओर देखा और एक लम्बी सांस लेने की कोशिश की। एक छिपकली छत पर थी और एक सीने में आकर फंस गयी थी।
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