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Monday, March 3, 2014

अफ़ज़ाल अहमद सैयद : जहन्नम

अफ़ज़ाल अहमद सैयद की एक और कविता...   
जहन्नम : अफ़ज़ाल अहमद सैयद 
(लिप्यंतरण : मनोज पटेल) 
 
मरने के बाद मुझे जहन्नम में दफनाया गया 

मुझे जिस क़ब्र में दाखिल किया गया 
वहाँ एक आदमी पहले से मौजूद था 
यह वही आदमी था जिसे मैंने क़त्ल किया था 
जब क़ातिल और मक़तूल एक ही क़ब्र में जमा हो जाएं 
असल जहन्नम वहीं से शुरू होता है 

अजाब के फ़रिश्ते सवाल व जवाब के लिए क़ब्र में आ गए 
फ़रिश्ते नंगे थे 
उन्हें देखकर मुझे मतली आने लगी 
जो मैंने रोक ली 
मैं अपनी क़ब्र को गंदा नहीं करना चाहता था 

फ़रिश्ते डरे हुए थे 
शायद दोहरी क़ब्र में उतरने का उन्हें कोई तजुर्बा नहीं था 
सवाल शुरू करने के लिए 
एक फ़रिश्ते ने अपने कान से एक सिक्का निकाला 
जिस पर एक जानिब मेरी तस्वीर थी 
और दूसरी जानिब ख़ुदा की 
फ़रिश्ते ने सिक्का उछाला 
हारने वाले फ़रिश्ते ने सवालात शुरू करना चाहे 
मैंने तलवार खींच ली 
फ़रिश्ते मेरी क़ब्र छोड़कर भाग गए 
मैंने कब्र की मिट्टी पर पड़ा हुआ सिक्का उठा लिया 
यह जहन्नम में मेरी पहली कमाई थी 

"तुमने अजाब के फरिश्तों पर तलवार उठाकर अच्छा नहीं किया" 
"मैंने तुम पर तलवार उठाकर भी अच्छा नहीं किया था सूअर के बच्चे" 
"तुम मुझे क़त्ल कर सकते हो मगर गाली नहीं बक सकते" 
मगर यह गलत था 
मैं एक आदमी को दोबारा क़त्ल नहीं कर सकता था 
"अब जहन्नम का दारोग़ा तुम्हारी खबर लेगा" 

मैं जहन्नम के दारोग़ा के इंतज़ार में बैठ गया 
और सोचने लगा 
यह आदमी जो अपनी क़ब्र में भी मुझसे पनाह मांग रहा है 
उसे किस सिलसिले में मुझसे मुक़ाबले का हौसला पैदा हुआ होगा 
मगर उसकी गर्दन पर तलवार का निस्फ़ दायरा ज़िंदा था 
और ऐसा ज़ख्म सारी दुनिया में सिर्फ मैं लगा सकता था 

इतने में शोर हुआ 
जहन्नम का दारोग़ा हमारी क़ब्र में आ गया 
यह कुछ महजूब फरिश्ता था और कपड़े पहने हुए था 

"क्या तुमने मेरे फ़रिश्ते पर तलवार उठाई थी?" 
"जनाब इसने आपके फ़रिश्ते पर तलवार उठाई थी" 
क़ब्र के दूसरे गोशे से मेरे मक़तूल ने कहा 
हालांकि फ़रिश्ते के मुक़ाबले में उसे आदमी की हिमायत करनी चाहिए थी 

"क्या फरिश्ता मेरी तलवार से ज़ख्मी हो सकता है?" 
"नहीं" 
"क्या मैं फ़रिश्ते को क़त्ल कर सकता हूँ?" 
"नहीं" 
"क्या मुझे ऐसे जुर्म की सजा मिल सकती है 
जिसको अंजाम देना नामुमकिन हो?" 
"मैं नहीं कह सकता" 
"कौन कह सकता है?" 
"ख़ुदा" 

जहन्नम का दारोग़ा चला गया 
"तुमने जहन्नम के दारोग़ा को भगा दिया?" 
"मैं क़यामत को भी भगा दूंगा" 
"मगर क़यामत तो आ चुकी" 
मुझे बहुत अफ़सोस हुआ कि क़यामत हो भी चुकी और मुझे पता नहीं चला 
"तुम क़यामत में नहीं मरे?" 
"कुछ लोग क़यामत से नहीं मरे 
ख़ुदा ने उनको बराहे रास्त जहन्नम में बुला लिया" 

जहन्नम में मैंने अपनी जेब से ताश निकाला 
और सब्र का खेल खेलने लगा 
यहाँ तक कि पत्ते गल सड़ गए 
फिर मैंने अपनी याददाश्त को बावन खानों में बाँट दिया 
और सब्र का खेल खेलने लगा 

एक दिन एक कामचोर फरिश्ता 
हमारी क़ब्र में छुपकर आराम करने को आ गया 
मैंने उसकी गर्दन पर तलवार रख दी 
"मैं तुम्हें क़त्ल कर दूंगा" 
"तुम मुझे क़त्ल नहीं कर सकते मगर तलवार हटा लो, मुझे डर लगता है" 
"मुझे बाहर ले चलो" 
"यह कभी नहीं हुआ" 
जवाब में मैंने अजाब के फ़रिश्ते से हासिल किया हुआ सिक्का 
कामचोर फ़रिश्ते के हाथ पर रख दिया 
फ़रिश्ते ने सर झुका लिया 

मैं क़ब्र से बाहर निकलने लगा 
फिर मुझे अपने मक़तूल का ख्याल आया 
मैंने उसे आवाज़ से झिंझोड़ा 
"बाहर चलो" 
"मुझे बाहर नहीं जाना है 
मुझे तुम्हारे साथ कहीं नहीं जाना है" 
मैंने उसके मुंह पर थूक दिया 
और अपनी क़ब्र से बाहर निकल आया 
                          :: :: :: 

मक़तूल  :  जिसे क़त्ल किया गया हो  
अजाब  :  यमलोक में पाप का दंड  
जानिब  :  तरफ, पक्ष, पहलू  
निस्फ़  :  आधा  
महजूब  :  शर्मदार 
गोशे से  :  कोने से 
बराहे रास्त  :  सीधे 

Wednesday, July 17, 2013

अफ़ज़ाल अहमद सैयद : आख़िरी दलील

अफ़ज़ाल अहमद सैयद की एक और कविता...   
आख़िरी दलील : अफ़ज़ाल अहमद सैयद 
(लिप्यंतरण : मनोज पटेल) 
 
तुम्हारी मोहब्बत 
अब पहले से ज्यादा इंसाफ़ चाहती है 
सुबह बारिश हो रही थी 
जो तुम्हें उदास कर देती है 
उस मंजर को लाज़वाल बनने का हक़ था 

उस खिड़की को सब्ज़े की तरफ खोलते हुए 
तुम्हें एक मुहासरे में आए दिल की याद नहीं आई 

एक गुमनाम पुल पर 
तुमने अपने आप से मजबूत लहजे में कहा 
मुझे अकेले रहना है 

मोहब्बत को तुमने 
हैरतज़दा कर देने वाली ख़ुशक़िस्मती नहीं समझा 

मेरी क़िस्मत जहाज़रानी के कारखाने में नहीं बनी 
फिर भी मैंने समंदर के फ़ासले तय किए 
पुरइसरार तौर पर ख़ुद को ज़िंदा रखा 
और बेरहमी से शायरी की 

मेरे पास एक मोहब्बत करने वाले की 
तमाम ख़ामियाँ 
और आख़िरी दलील है 
                  :: :: :: 

मंजर  :  दृश्य 
लाज़वाल  :  अमर, अनश्वर 
मुहासरे में  :  घेरेबंदी में, कैद में 
सब्ज़े  :  हरियाली 
हैरतज़दा  :  अचंभित 

Thursday, June 20, 2013

अफ़ज़ाल अहमद सैयद की कविता

अफ़ज़ाल अहमद सैयद की एक और कविता...   










आग लगने के वक़्त : अफ़ज़ाल अहमद सैयद 
(लिप्यंतरण : मनोज पटेल) 
 
हर रात एक आदमी 
तुम्हारे बिस्तर और तुम्हारे हाफ़िजे से चला जाता है 
जब दरवाजे पर शोर होता है 
मेरी तलाश में 
मुझे क़त्ल करने के लिए 

गिरे हुए बोसों को उठाकर 
तुम अपने ख़्वाब से बाहर चली जाती हो 

मैं ज़मीन पर चाक से निशान लगाता हूँ 
तुम्हारे ख़्वाब में आए हुए आदमी को 
इस निशान में ले जाता हूँ 

जब आधा दरवाजा कट चुका होता है 
तुम लौटकर आ जाती हो 
अपनी एड़ी से 
चाक के निशान 
और ख़्वाब में आए हुए आदमी को 
मिटाने के लिए 

मैं आखिरी मंज़िल पर था 
जब तुम्हारे मकान को आग लग गई 
               :: :: :: 

हाफ़िजे  :  याददाश्त, स्मृति 
बोसों  :  चुम्बनों 

Sunday, June 16, 2013

अफ़ज़ाल अहमद सैयद : सुर्ख़ पत्तों का एक दरख़्त

अफ़ज़ाल अहमद सैयद की एक और कविता...   
सुर्ख़ पत्तों का एक दरख़्त : अफ़ज़ाल अहमद सैयद 
(लिप्यंतरण : मनोज पटेल) 
 
नहीं देखा होगा तुमने अपने आपको छत से लगे हुए आईने में 
सुर्ख़ पत्तों से भरे एक दरख़्त के नीचे 

नहीं बढ़ाई होंगी तुमने अपनी उंगलियाँ 
दरख़्त से पत्ते और अपने बदन से लिबास उतारने के लिए 

"आदमी दरख़्त से ज्यादा ख़ूबसूरत है" 
नहीं कहा होगा किसी ने तुम्हें चूमकर 
दरख़्त को टुकड़े टुकड़े करने के बाद 

नहीं उठाया होगा तुमने लकड़ी का गट्ठर 
नहीं जाना होगा तुमने कटी हुई शाख़ में पानी का वजन 

"आग दरख़्त से ज्यादा ख़ूबसूरत है" 
नहीं कहा होगा किसी ने अलाव के क़रीब तुम्हें अपने सीने से लगाकर 

नहीं दिया होगा तुम्हें किसी ने अपना दिल 
सुर्ख़ पत्तों का एक दरख़्त 
                     :: :: ::

Wednesday, June 12, 2013

अफ़ज़ाल अहमद सैयद : मेरे पार्लर में क़दम रखो

अफ़ज़ाल अहमद सैयद की एक और कविता...   
मेरे पार्लर में क़दम रखो : अफ़ज़ाल अहमद सैयद 
(लिप्यंतरण : मनोज पटेल) 
 
मेरे पार्लर में क़दम रखो 
मौत मुझे कहती है 

उसके बदन में 
मैं अपनी महबूबाओं को 
बरहना देखता हूँ 
उसकी रान पर बहते हुए 
अपने इंज़ाल को पहचान लेता हूँ 
उसको मेरी उस नज्म का हमल है 
जो मैं नहीं कह सका 
उसको एक जाल का हमल है 
जिससे मैं एक सितारा पकड़ना चाहता था 

मेरे पार्लर में क़दम रखो 
मौत मुझे कहती है 
और नहीं जानती 
अब मेरे पास उसे देने के लिए कुछ नहीं 
                :: :: :: 

बरहना  :  नग्न 
रान  :  जाँघ 
इंज़ाल  :  वीर्य 
हमल  :  गर्भ 

Wednesday, June 5, 2013

अफ़ज़ाल अहमद सैयद : बर्फ़ानी चिड़ियों का क़त्ल

अफ़ज़ाल अहमद सैयद की एक और कविता...   
बर्फ़ानी चिड़ियों का क़त्ल : अफ़ज़ाल अहमद सैयद 
(लिप्यंतरण : मनोज पटेल) 
 
यह बर्फ़ानी चिड़ियों के क़त्ल की कहानी है 
मगर मैं इसे तुम्हारे जिस्म से शुरू करूँगा 

तुम्हारा जिस्म जंगली जौ था 
जो फ़रोख्त हो गया, चुरा लिया गया या तबाह हो गया 

पहाड़ी बकरियों की ऊन और देवदार के रेशों से बुना लिबास 
मैंने 
कच्चे चमड़े की ढाल और तुम्हारी उँगलियों में मक्नातीस की अंगूठी पर 
ज़िंदा रहने का हलफ़ उठाने के दिन पहना था 

प्यालानुमा आईनों में 
मुख्तलिफ़ रंगों की रेत से बनी एक तस्वीर थी 

"यह मैं हूँ" 
तुमने कहा 
और आईनों से धुआँ निकलने लगा 

तुमने दुनिया की क़दीमतरीन ज़बान में दुआ मांगी 
जो एक गीत और झूठ 
दोनों तरह सुनी गई 
काश तुमने अपने जिस्म को इस कदर दहकाया न होता 

ख़ुदा का आग से पहले का दिन 
हमारे विसाल का दिन था 

जल्द उग आने वाली फसल का ज़माना था 
एक अजनबी ख़ुदा की शबीहें 
पानी को मैला किए जा रही थीं 

जब मैं एक ख़्वाब से दस्तबरदार हुआ 
और अपनी ज़िंदगी के एक हिस्से को 
पानी में घुलते हुए देखा 

क़ब्रिस्तान का दरवाजा 
सिंदूर से सुर्ख़ कर दिया गया था 
और उसके बाद का रास्ता 
हड्डियों से बने मछली पकड़ने के काँटों 
और अदने मोतियों से भरा था 
तुम्हारे जिस्म के सिवा मेरे पास कोई जाल न था 
जिससे डूबती हुई ज़िंदगी को पकड़ सकता 

मैंने तुमसे कहा 
मुझे अपने बालों की दो लटें दो 
और मेरी माँ को उनसे कमान की डोर बटने में मदद 

तुम्हारे इन्कार के बाद 
मेरे मारे जाने की कहानी है 

जो मैं टोकरियाँ बुनने वाली लड़कियों की पलकों और नाखूनों से शुरू करूँगा 
जिन्हें एक तवील क़हत ने 
अपनी टोकरियों में बर्फ़ानी चिड़ियों को क़त्ल कर देने पर मजबूर कर दिया था 
                             :: :: :: 

बर्फ़ानी  :  बर्फ़ की 
फ़रोख्त  :  बिकना 
मक्नातीस  :  चुम्बक 
हलफ़  :  शपथ 
मुख्तलिफ़  :  अलग-अलग 
क़दीमतरीन  :  सबसे पुरानी 
विसाल  :  मिलन 
शबीहें  :  तस्वीरें 
दस्तबरदार  :  विरक्त 
अदने  :  साधारण 
तवील  : दीर्घावधि, लम्बी 
क़हत  :  अकाल 

Saturday, June 1, 2013

अफ़ज़ाल अहमद सैयद : ज़िंदा रहना एक मिकानिकी अजीयत है

अफ़ज़ाल अहमद सैयद की एक और कविता...   














ज़िंदा रहना एक मिकानिकी अजीयत है : अफ़ज़ाल अहमद सैयद 
(लिप्यन्तरण : मनोज पटेल) 
 
ज़िंदा रहना एक मिकानिकी अजीयत है 
हम समझ सकते हैं 
अपनी शर्मगाहों को गहरा काटकर 
मर जाने वाली लड़कियाँ  
क्यों कोई अलविदाई ख़त नहीं छोड़तीं 
और बच्चों की हड्डियां 
कैसे 
दरख़्त की सब्ज़ टहनी की तरह मुड़ जाती हैं 

यह दरख़्त पाकिस्तान में हर जगह पाया जाता है 

हम जानते हैं 
ज़ियाफ़त की किस मेज पर 
सेबों को हमारे मुल्क के परचम से चमकाया जा रहा है 
मगर 
गवाह चार किस्म के होते हैं 
और फैसला हमेशा साफ़ हुरूफ़ों में लिखा जाता है 

हम उस लड़की की तरह नहीं 
जो रजामंदी देने का मतलब नहीं समझती 
और मलिका की काली ब्रेजियर्स 
और तीन हजार जूतियों को 
चूमने से मुतनफ़्फ़िर है 

हमें दिया गया ज़हर 
हमारे जिस्म से आंसुओं के जरिए ख़ारिज नहीं होगा 

वैनेशियन ब्लाइंड से झाँककर 
हम देख सकते हैं 
आबी भेड़िए किस तरह 
हमारी औरतों को हामिला कर रहे हैं 
और हमारी मुसावातें 
कहाँ हल हो रही हैं 

फिर भी हमारी जिम्मेदारी है 
उस शख्स को,  
जो अपनी उंगलियों के सिरों से 
नज़र न आने वाले धागे निकालने की कोशिश कर रहा है, 
बता दें 
ज़िंदा रहना एक तस्सुवराती अजीयत भी है 
                    :: :: :: 

मिकानिकी  :  यांत्रिक, संवेदनाहीन  
अजीयत  :  यातना 
शर्मगाह  :  जननांग, भग 
सब्ज़  :  हरी 
ज़ियाफ़त  :  अतिथि पूजा, मेहमाननवाज़ी 
हुरूफ़ों  :  अक्षरों 
मुतनफ़्फ़िर  :  नफरत करने वाली, गैररजामंद 
आबी भेड़िए  :  समुद्री भेड़िए 
हामिला  :  गर्भवती 
मुसावातें  :  समीकरण  
तस्स्वुराती  :  काल्पनिक 

Friday, May 24, 2013

अफ़ज़ाल अहमद सैयद : मेरा दिल चाहता है


अफ़ज़ाल अहमद सैयद की एक और कविता...   
मेरा दिल चाहता है : अफ़ज़ाल अहमद सैयद 
(लिप्यन्तरण : मनोज पटेल) 

मौत फ़रोख्त नहीं होती 
यह खुद को सिपुर्द कर देती है 
ज़हर की एक बूँद 
और स्याह सीढ़ियों के नीचे 

मौत की तलाश में 
हम उनके साथ भटक जाते हैं 
जिनके फांसीघरों में 
हमारे लिए कोई गिरह नहीं 

हम मौत को उन शहरों में ढूँढ़ते हैं 
जहाँ लोहे को ज़ंग नहीं लगता 

चीते के उन पंजों में तलाश करते हैं 
जो उतार दिए गए 

हम मरने के लिए जगह खरीदते हैं 
दरख़्त के साए में 
सुतून के पास 
या 
किसी बिकने वाले दिल में 
मगर हम किसी पुल पर दफ़्न नहीं हो सकते 

मौत किसी का रास्ता नहीं रोकती 
मुझे नहीं मालूम 
क़त्लगाह के दरवाजे पर मुझे 
क्यों रोक दिया गया  
मुझे नहीं मालूम 
खंजर नीलाम करने वाला 
मुझसे किस तरह पेश आएगा 

मैंने आखिरी बोली क्यों लगाई 
जबकि मेरे पास 
कोई रक़म नहीं 

शायद मैं मौत से उधार कर सकता हूँ 
सोने की एक सौ ईंटें 
या 
आधी दुनिया 
शायद मैं मौत से कह सकता हूँ 
मेरा बच्चा 
जो एक लड़की अपने बदन में ज़ाया कर रही है 
किसी और लड़की में 
मुंतक़िल कर दे 

मगर 
उतनी देर में 
गुज़रगाह की दूसरी तरफ़ 
कैद किए हुए जानवरों पर शाम आ जाती है 

मेरा दिल चाहता है 
मैं मौत से बेवफ़ाई करूँ 

मेरा दिल चाहता है 
तुम्हें बता दूँ 
मेरी मौत तुम्हारे उस ख़्वाब में है 
जो तुमने मुझसे बयान नहीं किया 

मेरा दिल चाहता है 
तुम्हारा देखा हुआ ख़्वाब 
तुम्हारे सामने दुहराऊँ 
और 
मर जाऊँ 
            :: :: :: 

फ़रोख्त  :  बिक्री 
सुतून  :  खम्भा 
फांसीघर  :  फांसी देने का स्थान 
गिरह  :  गाँठ, फंदा 
क़त्लगाह  :  वधस्थल 
मुंतक़िल  :  स्थानांतरित 
गुज़रगाह  :  रास्ता 
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