एथलबर्ट मिलर की एक और कविता...

रेबेका : एथलबर्ट मिलर
(अनुवाद : मनोज पटेल)
क्या मैं नफरत करने लगूंगी आईनों से?
नफरत करने लगूंगी अक्सों से?
क्या मैं नफरत करने लगूंगी कपड़े पहनने से?
कपड़े उतारने से नफरत करने लगूंगी क्या?
मेरा पति जिम कहता है मुझसे
कि कोई फर्क नहीं पड़ता इससे
चाहे एक रहे मेरे पास या दो
दो या एक कोई फर्क नहीं
वह कहता है
मगर पड़ता है फर्क
मुझे पता है कि पड़ता है
मेरी देह है यह
दक्षिण अफ्रीका या निकारागुआ नहीं
मेरी देह
एक जंग हारती हुई कैंसर के खिलाफ
और अस्पताल के बाहर कोई प्रदर्शनकारी भी नहीं
बंद करो का नारा लगाने के लिए
केवल जिम है वहां
बैठा हुआ बरामदे में
सोचता हुआ कि क्या कहेगा वह
अगली बार प्यार करते समय
जब बढ़ेंगे उसके हाथ
बचे हुए मेरे एक स्तन की ओर
कैसे समझाएंगे हम खुद को
कि कोई फर्क नहीं पड़ता इससे?
कैसे स्वीकार करूंगी अपनी नग्नता को
जो अब नहीं रही सम्पूर्ण?
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