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Tuesday, September 11, 2012

नाओमी शिहाब न्ये : ट्रे

नाओमी शिहाब न्ये की एक और कविता...   

 
ट्रे : नाओमी शिहाब न्ये 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

किसी ग़मी वाले दिन भी 
भाप छोड़ती गर्मागर्म चाय से भरी 
बिना हत्थे वाली छोटी सफ़ेद प्यालियाँ 
पेश हो जाती थीं 
ट्रे पर एक वृत्त में, 
और हम कुछ बोल पाएं   
या न बोल पाएं,    
ट्रे आगे बढ़ाई जाती रहती थी, 
चुस्कियां लिया करते थे हम 
खामोशी से, 
यह एक और तरीका था  
होंठों के साथ-साथ बोलने का,   
प्याली की गरम कोर पर खुलते 
और सुड़कते हुए एक सुर में. 
               :: :: :: 

Friday, May 25, 2012

नाओमी शिहाब न्ये की कविता

नाओमी शिहाब न्ये की एक कविता...  

 
सवार : नाओमी शिहाब न्ये 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

एक लड़के ने बताया मुझे 
कि अगर वह बहुत तेज करे स्केटिंग 
उसका अकेलापन पकड़ नहीं पाता उसे 

विजेता बनने की कोशिश करने के लिए 
मेरी अभी तक की सुनी सर्वोत्तम वजह. 

आज रात सोच रही हूँ 
तेजी से पैडल मारते, किंग विलियम स्ट्रीट से गुजरते हुए 
कि क्या सायकिल में भी अनूदित होता है यह. 

एक जीत! तुम्हारे अकेलेपन को 
पीछे किसी सड़क के कोने में हांफता छोड़ आने के लिए 
जबकि मुक्त तैरते तुम पहुँच जाओ 
अचानक खिल आए  अज़ेलिया के फूलों के एक बादल में,  
गुलाबी पंखुड़ियां जिन्होंने कभी नहीं महसूस किया अकेलापन, 
भले ही कितना भी धीमे गिरी हों वे.  
                    :: :: :: 

Thursday, January 12, 2012

नाओमी शिहाब न्ये : बारिश

नाओमी शिहाब न्ये की एक कविता... 











बारिश : नाओमी शिहाब न्ये 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

पॉल से एक शिक्षिका ने पूछा 
कि तीसरी कक्षा की कौन सी बात 
याद रखेगा वह, और जवाब लिखने के पहले 
वह बहुत देर तक बैठा सोचता रहा 
"किसी ने मेरे कन्दों पे 
माला था इस साल" 
और जमा कर दिया अपना पर्चा. 
बाद में उस शिक्षिका ने मुझे वह पर्चा दिखाया 
अपनी बेकार सी ज़िंदगी की मिसाल के तौर पर. 
बड़े-बड़े शब्द लिखे थे उसने 
जैसे किसी भूदृश्य में मकान. 
वह भीतर जाकर रहना चाहता था 
उन मकानों के, भर सकता था 
"क" और "म" की खिड़कियाँ 
ताकि वह सुरक्षित रहे जबकि बाहर 
निकास पाइपों में घोंसले बना रही चिड़ियों को 
पता भी नहीं था आने वाली बारिश के बारे में.  
                    :: :: :: 
Manoj Patel, Tamsa Marg, Akbarpur, Ambedkarnagar, Mobile : 09838599333 

Saturday, December 3, 2011

नाओमी शिहाब न्ये : सरहद पार


नाओमी शिहाब न्ये की एक कविता इस सन्दर्भ के साथ कि 1952 में महान गायक पॉल रॉब्सन को वैंकूवर, कनाडा में गाने के लिए आमंत्रित किया गया तो स्टेट डिपार्टमेंट ने उन्हें देश छोड़ने की इजाजत नहीं दी थी, बावजूद इसके कि अमेरिका से कनाडा जाने के लिए पासपोर्ट तक कि दरकार नहीं थी. उसके बाद जो हुआ उसे आप इस कविता में पढ़ सकते हैं... 



सरहद पार : नाओमी शिहाब न्ये
(अनुवाद : मनोज पटेल)

अमेरिका की उत्तरी सरहद पर 
खड़े हो 
पाल राब्सन ने गाया कनाडा के लिए
जहां फोल्डिंग कुर्सियों पर बैठी 
भारी भीड़ 
उन्हें सुनने की खातिर 
कर रही थी इंतज़ार.

गाया उन्होंने कनाडा में
उनकी आवाज़ ने पार की
अमेरिका की सरहद 
जबकि उनकी देह को 
नहीं थी इजाज़त
सरहद पार करने की.

फिर से याद दिलाओ हमें
बहादुर दोस्त.
किन मुल्कों में गाना है हमें ?
पार करना है हमें किन सरहदों को ?
किन गीतों को बहुत दूर से आना है
हमारी तरफ घूमते हुए
गाढ़ा करने के वास्ते हमारे दिनों को ? 
                    :: :: :: 
Manoj Patel 

Saturday, November 26, 2011

नाओमी शिहाब न्ये : निगाहों की जांच


नाओमी शिहाब न्ये की कविता...

















निगाहों की जांच : नाओमी शिहाब न्ये 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

D है हताश. 
और B चाहता है छुट्टी 
रहना चाहता है किसी विज्ञापन-पट पर,
होकर बड़ा और बहादुर. 
E नाराज है R से कि उसने धकेल दिया है उसे मंच से पीछे. 
छोटा c बनना चाहता है बड़ा C मुमकिन हो अगर, 
और P खोया हुआ है ख़यालों में. 

कहानी, कितना बेहतर है कहानी होना. 
क्या तुम पढ़ सकती हो मुझे ? 

हमें रहना पड़ता है इस सफ़ेद पट पर 
साथ-साथ एक -दूसरे के पड़ोस में. 
जबकि होना चाहते थे हम किसी बादल की दुम
जहाँ एक हर्फ़ तब्दील होता दूसरे में, 
या चाहते थे गुम हो जाना किसी लड़के की जेब में 
फाहे की तरह बेडौल, 
वही लड़का जो भैंगी आँखों से पढ़ा करता है हमें 
लगता है उसे कि हम में छिपा है कोई गूढ़ सन्देश. 
काश कि उसके दोस्त बन पाते हम. 
आजिज आ चुके हैं इस बेमतलबपन से. 
                    :: :: :: 
(नई बात से साभार) Manoj Patel 

Sunday, November 13, 2011

नाओमी शिहाब न्ये की कविता


नाओमी शिहाब न्ये की एक कविता...



मशहूर : नाओमी शिहाब न्ये 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मछली के लिए मशहूर होती है नदी 
तेज आवाज़ मशहूर होती है खामोशी के लिए 
जिसे पता है कि वह ही वारिस होगी धरती की 
इससे पहले कि कोई ऐसा सोचे भी. 

चहारदीवारी पर बैठी बिल्ली मशहूर होती है चिड़ियों के लिए 
जो देखा करती हैं उसे घोंसले से. 

आंसू मशहूर होते हैं गालों के लिए. 

तसव्वुर जिसे आप लगाए फिरते हैं अपने सीने से 
मशहूर होते हैं आपके सीने के लिए. 

जूते मशहूर होते हैं धरती के लिए, 
ज्यादा मशहूर बनिस्बत भड़कीले जूतों के, 
जो मशहूर होते हैं फकत फर्श के लिए. 

उसी के लिए मशहूर होती है वह मुड़ी-तुड़ी तस्वीर 
जो उसे लिए फिरता है अपने साथ 
उसके लिए तो तनिक भी नहीं जो है उस तस्वीर में. 

मैं मशहूर होना चाहती हूँ घिसटते चलते लोगों के लिए 
मुस्कराते हैं जो सड़क पार करते, 
सौदा-सुलफ के लिए पसीने से लथपथ कतार में लगे बच्चों के लिए,
जवाब में मुस्कराने वाली शख्स के रूप में.

मैं मशहूर होना चाहती हूँ वैसे ही 
जैसे मशहूर होती है गरारी,
या एक काज बटन का,
इसलिए नहीं कि इन्होनें कर दिया कोई बड़ा काम,
बल्कि इसलिए कि वे कभी नहीं चूके उससे 
जो वे कर सकते थे...
                    :: :: :: 
Manoj Patel 

Wednesday, September 21, 2011

नाओमी शिहाब न्ये : प्याज का सफ़र

नाओमी शिहाब न्ये की कविता...












प्याज का सफ़र : नाओमी शिहाब न्ये 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

"ऐसा माना जाता है कि प्याज मूल रूप से हिन्दुस्तान से आई. मिस्र में इसकी पूजा की जाती थी - ऐसा क्यों था यह मुझे पता नहीं चल पाया. मिस्र से प्याज यूनान और  इटली पहुंची. फिर वहां से पूरे यूरोप में."
                                                                                 - बेटर लिविंग कुकबुक


जब मैं सोचती हूँ कि कितना लंबा सफ़र तय किया है प्याज ने 
सिर्फ आज मेरे स्ट्यू में शामिल होने के लिए, 
झुक कर तारीफ़ करने का मन होता है 
भुला दिए जाने वाले ऐसे छोटे-छोटे करिश्मों की, 
चटचटा कर उतरना पतले से कागजी छिलके का,
भीतर एक चिकनी तालमेल में मोतियों सी परतें,
कैसे उतरता है चाकू प्याज में 
और खुल जाती है प्याज 
एक इतिहास जाहिर करती हुई.  

और मैं प्याज को कभी दोष नहीं दूंगी 
आंसू निकालने के लिए.
यह तो ठीक ही है कि आंसू निकल आएं 
किसी छोटी और भूली-बिसरी चीज के लिए.
खाना खाते समय हम कैसे बैठकर 
बातें करते हैं मांस की बनावट और मसालों की खुशबू की 
मगर कभी बात नहीं करते अब बँट और बिखर चुकी  
प्याज की पारभासकता पर,
या जमाने पुराने इसके इज्जतदार पेशे पर :
खुद को गायब कर लेना 
दूसरों के भले के लिए. 
                    :: :: ::  
Manoj Patel Translations 

Monday, January 31, 2011

नाओमी शिहाब न्ये की कविता

अरबी काफी 
ज्यादा कड़क कभी नहीं लगी यह हमें :
थोड़ा और काली बनाइए न पापा 
तले पर  खूब गाढ़ी,
फिर से बताइए हमें कि कैसे छोटे सफ़ेद कपों में 
जुटते जाएंगे हमारे साल,
कैसे बसती है हमारी तकदीर 
काफी पाउडर के धब्बों में.

स्टोव पर झुके हुए उबलने दिया उन्होंने  इसे एकदम ऊपर तक 
और फिर जाने दिया नीचे. दो बार.
चीनी एकदम नहीं थी उनके बर्तन में.
और वह जगह जहां मर्द और औरतें 
अलग होते हैं एक-दूसरे से 
उस कमरे में नहीं थी मौजूद. 
सैकड़ों नाउम्मीदियाँ,
गोदाम पर आग में स्वाहा होते 
जैतून की लकड़ी से बने मनके, और ख्वाब 
हर दिन में लिपटे हुए रुमालों की तरह,
अपनी-अपनी जगह ली मेज पर इन सबने,
भुट्टे के अधभरे बर्तन के पास.
और कोई भी ज्यादा अहम नहीं था दूजे से,
और सभी मेहमान ही थे वहां.
जब वे लेकर आए ट्रे कमरे में 
संतुलन बनाए उठाए हुए ऊपर अपने हाथों में,
यह एक भेंट थी उन सभी के लिए,
ठहरिए, बैठिए, और सुनिए शुरू हो जाए 
जो भी बतकही. काफी ही केंद्र थी 
फूल का. 
मानो एक कतार के कपड़े कह रहे हों 
काफी लम्बे जिएंगे आप हमें पहनने की खातिर,    
भरोसे का एक कौल. 
और यह, और 
काफी कुछ और. 

(अनुवाद : Manoj Patel)
Naomi Shihab Nye

Monday, January 10, 2011

नाओमी शिहाब न्ये की दो कविताएँ

जो नहीं बदलता उसे नाम देने की कोशिश 
रोजेल्वा के मुताबिक़ सिर्फ रेल की पटरी ही है 
ऎसी इकलौती चीज जो नहीं बदलती. 
पक्का यकीन है उसे.
बदल जाती है रेलगाड़ी 
या अगल-बगल उग आई बेतरतीब खर-पतवार 
नहीं बदलती तो पटरी.
मैनें तीन साल तक गौर किया एक पटरी पर,
बताती है वह,
और यह मुड़ी नहीं, टूटी नहीं, बढ़ी नहीं.

पीटर को शक है कुछ. देखी थी उसने मेक्सिको में सबीना के पास 
एक निष्प्रयोज्य पटरी, उसका कहना है कि 
बदली हुई होती है  
बिना रेलगाड़ी के कोई पटरी.
चमक नहीं बची थी धातु में.
लकड़ी में दरारें पड़ गई थीं और 
खुल गए थे कुछ जोड़. 

मोराल्स स्ट्रीट पर हर मंगलवार 
सैकड़ों मुर्गों की गर्दनें तोड़ते हैं कसाई.
तम्बू में रह रही विधवा 
दालचीनी से चटपटा करती है अपना सूप.
उससे पूछो क्या नहीं बदलता.

विस्फोट होता है सितारों में.
यूं मुड़े होते हैं गुलाब मानो आग हो पंखुड़ियों में. 
झाड़ी के नीचे दफ़न है वह बिल्ली जो पहचानती थी मुझे. 

रेल की सीटी अभी भी बजाती है अपना चिरंतन बाजा 
लेकिन जब चली जाती है दूर 
सिकुड़ते हुए दिमाग की चहारदीवारी से ओझल 
कुछ अलग लिए जाती है अपने साथ हमेशा. 
                         * *

आपको सतर्क रहना होता है 
सतर्क रहना होता है आपको बातें करते समय.
सुरंग होते हैं कुछ कान.
भीतर जाएंगे आपके शब्द और खो जाएंगे अँधेरे में.
सोने की खोज में लगे खनिकों के पास पाए जाने वाले  
चपटे पैन की तरह होते हैं कुछ कान.
पत्थरों से धोया जाएगा जो कुछ भी कहेंगे आप. 

लम्बे समय तक तलाश रहती है आपको 
जब तक कि मिल नहीं जाते सही कान.  
तब तक परिंदे और लैम्प होते हैं बातें करने के लिए, 
गोल-गोल घिसता चमकाता एक धैर्यवान कपड़ा,
और धीरे-धीरे बढ़ती जाती है संभावना 
कि आखिरकार जब मिल जाएंगे आपको ऐसे कान,
उन्हें पता होगा पहले से ही. 
                          * *
(अनुवाद : Manoj Patel) 
Naomi Shihaab Nye 

Tuesday, January 4, 2011

नाओमी शिहाब न्ये की कविता


(1952 में जन्मीं नाओमी शिहाब न्ये फिलीस्तीनी पिता और अमेरिकी माँ की संतान हैं. खुद को घुमंतू कवि मानने वाली नाओमी जार्डन, येरुशलम से होते हुए अब टेक्सास में रह रही हैं. उनकी कविताओं में अपनी जड़ों की बेचैन तलाश की झलक मिलती है. उनके लेखक और सम्पादक पिता,  अज़ीज़ शिहाब येरुशलम टाइम्स के सम्पादक रह चुके हैं. यह तस्वीर अपने पिता के कन्धों पर बैठी एक वर्षीय नाओमी शिहाब न्ये की है. - पढ़ते पढ़ते )

खून 
" एक सच्चा अरब जानता है हाथों से कैसे पकड़ते हैं मक्खी," 
कहते मेरे पिता. और साबित भी कर देते इसे, 
भिनभिनाती मक्खी को फ़ौरन बंद कर अपनी मुट्ठी में, 
जबकि मेजबान ताकता रह जाता 
हाथों में मक्खी पकड़ने का स्वाटर लिए. 

बसंत में छिलके सी छूटती थीं हमारी हथेलियाँ सांप की तरह. 
सच्चे अरब मानते थे कि फायदेमंद है तरबूज पचासों तरह से. 
मैंने बदला इसे माहौल के अनुरूप ढालने की खातिर. 

सालों पहले, दरवाज़ा खटखटाया था एक लड़की ने 
वह देखना चाहती थी एक अरब. 
मैंने जवाब दिया था कि हमारे यहाँ नहीं है कोई.
इसी के बाद बताया था मेरे पिता ने अपने बारे में, 
कि "उल्का" मतलब होता है "शिहाब" का,
आसमान से जमीन पर गिरा हुआ सितारा --
एक शानदार नाम, उधार लिया हुआ आसमान से. 
एक बार तो मैनें यह भी पूछ लिया था, "जब मर जाएंगे हम 
तो क्या वापस कर देंगे इसे आसमान को ?"
बोला था उन्होंने कि यही कहना चाहिए एक सच्चे अरब को. 

आज थक्के की तरह जम गई हैं ख़बरों की सुर्खियाँ मेरे खून में.
ट्रक के पीछे लगा फिर रहा है एक फिलिस्तीनी बच्चा फाटक पर.
बेघर लोग, असहनीय है हमारे लिए 
भयानक जड़ों वाली यह त्रासदी. 
आखिर कौन सा झंडा फहरा सकते हैं हम ?  
पत्थर और बीज का झंडा फहराती हूँ मैं,
नीले रंग के धागे से सिला गया एक मेजपोश.

अपने पिता को फोन मिलाती हूँ मैं 
और ख़बरों के बारे में बात करते हैं हम.
उनके लिए बहुत पीड़ादायी है यह सब, 
बहुत मुश्किल है इसे समझना उनके लिए 
अपनी दोनों ज़ुबानों में. 
देहात की तरफ निकल जाती हूँ मैं 
भेड़ों और गायों से मिलने के लिए
बहस करने के लिए हवा से ही : 
कि कौन सभ्य कहता है खुद को ?
कहाँ सुकून मिल सकता है एक रोते हुए दिल को ? 
आखिर क्या करे कोई सच्चा अरब अब ? 

(अनुवाद : Manoj Patel) 
Naomi Shihab Nye 

Thursday, December 23, 2010

नाओमी शिहाब न्ये की कविताएँ

गलियाँ 
एक इंसान छोड़ जाता है दुनिया 
और कुछ छोटी हो जाती हैं वो गलियाँ 
जहां रहा करता था वह.

एक और अंधेरी खिड़की इस शहर में,
मुलायम पड़ जाएंगे उसकी डालियों पर फले अंजीर 
परिंदों के लिए.

अगर हम काफी शामें बिताएं खड़े-खड़े चुपचाप 
एक टोली बन जाती है हमारी 
साथ-साथ खड़े चुपचाप लोगों की.
चहचहाहट चिड़ियों की सर के ऊपर 
दावा जतातीं अपने दरख्तों पर 
और आसमान जो सी रहा है 
सिए जा रहा है बिना थके 
गिराने लगता है अपना जामुनी दामन. 
हर चीज यथासमय, यथास्थान 
बेहतर होगा ऐसा सोचना लोगों के बारे में भी. 

होते हैं कुछ लोग. सोते भरपूर नींद,
जागते तरोताजा. बाक़ी रहते दो संसारों में, 
गुम और याद किए जाते.
दो बार सोते हैं वे, एक बार उसके लिए जो जा चुका है,
और एक बार अपने लिए. वे सपने देखते हैं लगातार, 
देखते हैं दुगने सपने, एक सपने से जागते दूसरे सपने में, 
लोगों का नाम पुकारते गुजरते हैं वे गलियों से, 
और फिर जवाब देते खुद ही.     
                           * *

मुठ्ठी बाँधना 
पहली बार टाम्पिको के उत्तर तरफ सड़क पर,
अपनी जान निकलते हुए महसूस की मैनें, 
मानो रेगिस्तान में बज रहा हो कोई नगाड़ा 
और कठिन से कठिनतर होता जा रहा हो सुनना उसे. 
सात साल की थी मैं, लेटी हुई कार में   
देखती हुई शीशे के परे चीड़ के पेड़ों को 
भागते हुए पीछे अरुचिकर नमूना बनाते.
पेट मेरा किसी खरबूजे की तरह फटा पडा था मेरे भीतर.

"कैसे पता चलता है कि आप मरने वाले हैं ?"
मैनें जानना चाहा था अपनी माँ से. 
कई दिनों से हम सफ़र में थे साथ-साथ. 
एक अजीब आत्मविश्वास से जवाब दिया था उसने,
"जब तुम मुठ्ठी बाँधने लायक नहीं रह जाते."

सालों बाद मुस्कराती हूँ उस सफ़र के बारे में सोचकर, 
सरहदें जिन्हें हर हालत में पार करना है हमें अलग-अलग 
छाप लिए अपने लाजवाब दुखों की. 
मैं जो मरी नहीं, जो ज़िंदा हूँ अभी तक  
अभी भी लेटी हुई पिछली सीट पर 
अपने सभी सवालों के पीछे 
बांधती-खोलती एक छोटा सा हाथ. 

(अनुवाद : Manoj Patel)  
Naomi Shihab Nye 

Friday, December 10, 2010

नाओमी शिहाब न्ये की कविता

( नाओमी शिहाब न्ये की कविताएँ आप पहले भी पढ़ चुके हैं. 1952 में जन्मीं नाओमी शिहाब न्ये फिलीस्तीनी पिता और अमेरिकी माँ की संतान हैं. खुद को घुमंतू कवि मानने वाली नाओमी जार्डन, येरुशलम से होते हुए अब टेक्सास में रह रही हैं. वे Organica पत्रिका की नियमित स्तंभकार और Texas Observer की कविता संपादक भी हैं. इनके कई कविता-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें प्रमुख हैं : 19 Varieties of Gazelle: Poems of the Middle East, A Maze Me: Poems for Girls, Red Suitcase, Words Under the Words, Fuel, and You & Yours...- Padhte Padhte ) 

एक लड़के ने बताया मुझे 
मेरे पैरों में बसता है संगीत 
झरता है यह जब बात करता हूँ मैं.

भेजने जा रहा हूँ अपने वैलेंटाईन प्रस्ताव 
उन लोगों को जिन्हें जानते भी नहीं तुम. 

जई के बिस्किट सरपट निगलता है मेरा गला.

जमीन पर रहते हैं बड़ों के पाँव 
मुझे नफरत है गर इन्हें हिलाते हैं वे.

बीचो-बीच टकराते हुए इन दोनों O को देखो 
हिज्जे बनाते हैं जो good bye के.

फिर नाम न लेना कभी "उद्देश्य" का 
चलो इस शब्द को फेंक दें बाहर.

बड़ी-बड़ी बातें मत करो मुझसे.
अपने चेहरों का बक्सा लिए चल रहा हूँ साथ.
बदल लूंगा चेहरा गर चाहूंगा ऐसा.

फीका पड़ गया है बीता हुआ कल 
गाढ़े अक्षरों में है आने वाला कल मगर.

जब बड़ा हो जाऊंगा मैं तो 
उस घर में रहेंगे मेरे पुराने नाम 
जहां रह रहे हैं हम अभी.
आया करूंगा उनसे मिलने तब.

केवल एक आँख ही थकी हुई है मेरी 
दूसरी आँख और बाक़ी बदन नहीं.

क्या सच में तरल थीं सभी धातुएं पहले ?
तो क्या गर खरीदी होती कार हमने कुछ पहले 
दिया होता उन्होंने इसे एक कप में हमें ?

एक अवरोधक लगा है मेरे हाथों में 
बड़ा नहीं होने देगा यह कभी मुझे 
रहूँगा छोटा यूं ही हमेशा. 

और गहरा पानी भी होऊंगा मैं 
इंतज़ार करो, बस इंतज़ार करो.
कितनी गहरी है नदी ?
क्या यह डुबा लेगी अपने हाथ उठाए हुए एक लम्बे आदमी को ?

एक स्मारक है तुम्हारा सिर.

जब न्यूयार्क में थे तुम मैं देख सकता था तुम्हें 
जीता-जागता, चलता-फिरता अपने दिमाग में.

एक मधुमक्खी को न्यौतूंगा तुम्हारे जूतों में बसने के लिए 
कैसा रहेगा गर अपने जूतों को पाओ तुम शहद से भरा ?

कैसा रहेगा गर घड़ी बजाए 6:92 
6:30 की बजाय ? क्या डर जाओगे तुम ?

कार की धुलाई है मेरी जीभ 
चम्मच की खातिर.

क्या तैर सकते हैं नूडल ?

शब्दकोष हैं मेरे पाँव के अंगूठे 
क्या कोई शब्द चाहिए तुम्हें ?

आगे से सिर्फ 26 जनवरी को 
पिया करूंगा दूध सफ़ेद.

ये घटाव का क्या मतलब होता है ?
मैं कभी नहीं घटाऊंगा तुम्हें.

ज़रा सोचो, इससे पहले किसी ने नहीं देखा 
इस मूंगफली के भीतर !

बहुत मुश्किल है होना एक इंसान.

करता हूँ और नहीं करता हूँ तुम्हें प्यार -
क्या यही नहीं है खुशी ?  

(अनुवाद : Manoj Patel) 
Naomi Shihab Nye 

Thursday, November 25, 2010

नाओमी शिहाब न्ये की कविता

(नाओमी शिहाब न्ये का परिचय और उनकी कविताएँ नई बात पर आप पहले ही पढ़ चुके हैं. आज उनकी एक और कविता. - Padhte Padhte)


फिलीस्तीनी कैसे रखते हैं खुद को गर्म 


एक शब्द चुनो और उचारो इसे बार-बार,
जब तक कि यह शोला न भड़का दे तुम्हारे मुंह में.
अधफेरा , जो रहता है थामे और अल्फर्द  जो रहता है अकेले,
हमारे जैसे लोगों ने ही रखे थे इन सितारों के नाम.
हर रात जमा हो जाते हैं वे 
तमाम ग्रहों के बीच के लम्बे रास्ते पर.
ऊंघते और टिमटिमाते हैं वे अपनी जर्द आँखों में 
न सही न गलत.
दिराह, छोटे से घर,
खोलकर अपनी दीवारें अन्दर ले लो हमें.

सूख चुका है मेरा कुआं,
बंद कर दिया है गाना अंगूरों ने मेरे बाबा के.
मैं भड़का रही हूँ कोयला, रो रहे हैं मेरे बच्चे.
कैसे बताऊंगी उन्हें कि सितारों से है उनका नाता ?
किले बनाए उन्होंने सफ़ेद पत्थरों के और कहा कि, "यह है मेरा."
कैसे सिखाऊंगी उन्हें मैं प्यार करना मिजार, वील  और क्लोक  से,
कि इनके पीछे है शोलों को हवा करता हमारा एक पुरखा ?
वही ताजा करता है हमारी साँसों की सियाह हवा को.
वही बताता है कि उगेगा वील  जरूर
जब तक कि देख न लें वे हमें 
खुशकिस्मत पहाड़ों पर 
चमकते और फैलते अंगारों की तरह.

अच्छा तो बहुत बनाई मैनें बातें.
ठीक ठीक कुछ पता नहीं मुझे मिजार  के बारे में.
बस इतना जानती हूँ कि 
गर्म रखने की जरूरत होती है हमें खुद को यहाँ धरती पर   
और अगर दुशाला तुम्हारा हो मेरे जितना ही पतला,
सुनाने ही लगोगे कहानियां. 

(अनुवाद : Manoj Patel) 
 Naomi Shihab Nye

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