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Tuesday, February 14, 2012

निज़ार कब्बानी : मुहब्बत के हाशिए पर

आज निज़ार कब्बानी... 

 

निज़ार कब्बानी की कविताएँ 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

काफी पियो अपनी 
और ज़रा शांति से सुनो मेरी बात. 
शायद 
फिर कभी साथ-साथ काफी न पिएँ हम, 
शायद फिर कभी मौक़ा न मिले तुमसे बात करने का. 
:: :: :: 

मुझे तुम्हारे बारे में बात नहीं करनी, 
न ही बात करनी है अपने बारे में, 
हम दो शून्य भर हैं मुहब्बत के हाशिए पर, 
पेन्सिल से लिखी दो सतरें सिर्फ. 
मैं बात करूंगा उस चीज के बारे में 
जो ज्यादा खरी है 
तुमसे और मुझसे, 
मैं बात करूंगा 
प्यार के बारे में, 
उस अद्भुत तितली के बारे में 
जो मंडरा रही है हमारे कन्धों पर 
सिर्फ झटक दिए जाने के लिए,  
उस सुनहरी मछली के बारे में 
समुन्दर की गहराईयों से उठती आ रही है जो 
सिर्फ मसले जाने के लिए, 
उस नीले सितारे के बारे में 
जो बढ़ाए हुए है हमारी तरफ दोस्ती का हाथ 
सिर्फ ठुकरा दिए जाने के लिए. 
:: :: :: 

यह अहम नहीं कि 
तुम चली जाओ अपना बैग उठाकर, 
यही करती है हर औरत 
नाराज होने पर. 
अहम सवाल यह नहीं कि 
हताशा में मैं अपनी सिगरेट बुझाऊँ 
सोफे के कुशन पर, 
सभी मर्द यही करते हैं 
नाराज होने पर. 
इतना आसान नहीं है यह सब. 
हमारे बस के बाहर है यह. 
हम दो शून्य भर हैं मुहब्बत के हाशिए पर, 
पेन्सिल से लिखी दो सतरें सिर्फ. 
सबसे अहम थी वह मछली 
जिसे समुन्दर ने उछाला था हमारी तरफ  
और जो पिस गई हमारी उँगलियों के बीच. 
:: :: :: 

Saturday, November 12, 2011

निज़ार कब्बानी : पानी पर चलता है प्यार हमारा


निज़ार कब्बानी की दो कविताएँ... 


निज़ार कब्बानी की कविताएँ 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

ओह मुसाफिर 
बीत गए दस साल 
मगर अब भी तुम 
जैसे मेरे पहलू में धंसी हुई बरछी 
:: :: :: 

कोई दिमाग 
कोई तर्क नहीं है 
हमारे प्यार के पास 
पानी पर चलता है प्यार हमारा 
:: :: :: 
Manoj Patel 

Monday, November 7, 2011

निज़ार कब्बानी : कौन है सबसे खूबसूरत ?

निज़ार कब्बानी की एक कविता...













कौन है सबसे खूबसूरत ? : निज़ार कब्बानी 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

मेरी कविता और तुम्हारा चेहरा 
दो अशर्फियाँ हैं सोने की. 
दो कपोत हैं और दो फूल कनेर के. 
हैरान हूँ अभी तक 
कि कौन है सबसे खूबसूरत ?
               :: :: :: 
Manoj Patel 

Sunday, October 30, 2011

निज़ार कब्बानी : कोई हल

सौ प्रेम पत्र' से निज़ार कब्बानी की कुछ और कविताएँ...



निज़ार कब्बानी की कविताएँ 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

क्या हमारी इस समस्या का 
कोई हल है तुम्हारे पास, 
है इस जर्जर जहाज का कोई समाधान 
जो न तो तैरने लायक है न डूबने लायक ?
               :: :: ::

मुझे मानना पड़ेगा 
तुम्हारे सारे फैसलों को 
क्योंकि बहुत पी चुका हूँ मैं 
समुन्दर का खारा पानी 
बहुत झुलसा चुका है 
सूरज मेरी चमड़ी को 
और नाराज मछलियाँ 
बहुत नोच चुकीं हैं मेरा मांस. 
               :: :: :: 

ऊब चुका हूँ मैं सफ़र करते-करते 
ऊब चुका हूँ मैं ऊब से 
क्या कोई हल है तुम्हारे पास 
इस खंजर का 
जो धंसता तो है मगर मारता नहीं ?
है कोई हल तुम्हारे पास इस अफीम का 
जो हम लेते तो हैं 
मगर जो चढ़ती नहीं कमबख्त ?
               :: :: :: 

मैं सुस्ताना चाहता हूँ 
किसी भी पत्थर, या 
किसी भी कंधे पर,
थक चुका हूँ 
बिना पाल वाली नावों से 
बिना फुटपाथ वाली सड़कों से उकता चुका हूँ. 
तुम्हीं कोई हल सुझाओ मेरी प्रिय 
वादा करता हूँ उसे मानने का 
ताकि सो सकूं मैं पूरी नींद. 
               :: :: :: 
Manoj Patel Padhte Padhte 

Saturday, August 27, 2011

निज़ार कब्बानी की कविताएँ

निज़ार कब्बानी की कविताएँ...



निज़ार कब्बानी की कविताएँ 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

क्या कभी सोचा तुमने
कि आखिर जा कहाँ रहे हैं हम 
जहाज़ों को पता होती है अपनी दिशा,
मछलियाँ जानती हैं कि उन्हें तैरना है किस तरफ,
पंछी जानते हैं अपनी मंजिल 
मगर हम छटपटाते हैं समुन्दर में
और डूबते नहीं 
पहने होते हैं सैलानियों की पोशाक 
और निकलते नहीं बाहर 
लिखते हैं चिट्ठियाँ 
मगर भेजते नहीं उन्हें 
जाते हुए हर हवाई जहाज का 
खरीदते हैं टिकट 
मगर बैठे रहते हैं हवाई अड्डे पर 
तुम और मैं प्रिय  
सबसे बुजदिल मुसाफिर हैं इतिहास के.
                    :: :: :: 

बंद कर दो सारी किताबें 
और पढ़ो मेरे चेहरे की लकीरों को 
निहार रहा हूँ मैं तुम्हें
क्रिसमस के पेड़ के सामने खड़े 
एक बच्चे की उत्सुक निगाहों से. 
                    :: :: :: 

कल मैनें सोचा 
तुम्हारी खातिर अपने प्यार के बारे में.
मुझे याद आईं 
तुम्हारे होंठो पर शहद की वे बूँदें, 
और अपने होंठों पर जुबां फिराकर 
पोंछ दी मैनें वह मिठास 
स्मृति के गलियारे से.
                    :: :: :: 

Thursday, August 4, 2011

निज़ार कब्बानी : कैसे चूं-चूं करते हैं चूजे

'सौ प्रेम पत्र' से निज़ार कब्बानी की दो और कविताएँ...


















निज़ार कब्बानी की कविताएँ 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

मैनें सिखाया तुम्हें पेड़ों के नाम 
और रात में झींगुरों की बातें सुनना 
और पता बताया तुम्हें दूर-दराज के तारों का. 
दाखिल कराया तुम्हें बहारों की पाठशाला में 
सिखाया चिड़ियों की भाषा 
और नदियों की वर्णमाला.   
तुम्हारा नाम लिखा 
बारिश की कापियों,   
बर्फ की चादरों, 
और चीड के पेड़ों पर.
तुम्हें बातें करना सिखाया खरगोशों और लोमड़ियों से 
और मेमने के बालों में कंघी करना.
मैनें दिखाया तुम्हें चिड़ियों की अप्रकाशित चिट्ठियों को, 
और सौंपा तुम्हें 
गरमी और सर्दी के नक़्शे 
ताकि तुम जान सको 
कि गेहूं कैसे उगता है, 
कैसे चूं-चूं करते हैं चूजे, 
कैसे शादी करती हैं मछलियाँ, 
और चाँद की छाती से कैसे निकलता है दूध. 
                    :: :: :: 

वे दो साल 
जब तुम रही मेरी महबूब 
दो सबसे अहम पन्ने हैं 
मुहब्बत की किताब के. 
कोरे हैं 
उसके पहले और बाद के सारे पन्ने. 
ये पन्ने 
भूमध्य रेखा हैं 
मेरे और तुम्हारे होंठों के बीच से गुजरती, 
ये पैमाने हैं वक़्त के 
जिनसे मिलाया जाता है 
दुनिया भर की तमाम घड़ियों को. 
                    :: :: ::  

Thursday, July 28, 2011

निज़ार कब्बानी : मुझे शिकायत नहीं है

'सौ प्रेम पत्र' से निज़ार कब्बानी की कुछ और कविताएँ... 


निज़ार कब्बानी की कविताएँ 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

मैनें फैसला किया 
आजादी की सायकिल पर 
दुनिया भर की सैर करने का 
उसी गैरकानूनी तरीके से 
जैसे सैर करती है हवा. 
अगर मुझसे पूछी जाती है मेरी रिहाइश 
मैं बता देता हूँ 
उन सारे फुटपाथों का पता 
जिन्हें चुना है मैनें अपना स्थायी ठिकाना.
अगर मुझसे मांगे जाते हैं मेरे कागज़ात,
मैं दिखा देता हूँ उन्हें तुम्हारी आँखें. 
प्रिय,
मुझे जाने दिया जाता है 
क्यूंकि उन्हें मालूम है कि 
तुम्हारी आँखों की बस्ती में सैर का  
हक़ है सारे मर्दों को. 
                    :: :: :: 

तुम्हारे साथ ही ख़त्म हो गई 
छोटी-छोटी चीजों की मेरी बादशाहत 
अब अकेले मेरे पास नहीं होती कोई चीज,
अकेले मैं नहीं सजा पाता फूल,
न ही पढ़ पाता हूँ किताबें 
तुम आ जाती हो 
मेरी आँखों और किताब के बीच,
मेरे मुंह और मेरी आवाज़ के बीच,
मेरे सर और तकिए के बीच,
मेरी अँगुलियों और सिगरेट के बीच.
                    :: :: :: 

सच है 
मुझे शिकायत नहीं है 
अपने दिल में तुम्हारे रहने से, 
अपने हाथों की हरकत में तुम्हारी दखलंदाजी से, 
अपनी आँखों के झपकने, 
और अपने ख्यालों की रफ़्तार से, 
पेड़ शिकायत नहीं करते 
इतनी सारी चिड़ियों का बसेरा होने पर,
प्याले शिकायत नहीं करते 
कि उन्होंने थाम रखी है इतनी शराब. 
                    :: :: :: 

Tuesday, July 26, 2011

निज़ार कब्बानी की कविता

निजार कब्बानी के 'सौ प्रेम पत्र' से एक और कविता... 



निज़ार कब्बानी की कविता 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

मैं तुमसे प्यार करता हूँ 
मगर खेल नहीं खेलता 
प्यार का.
तुमसे लड़ता नहीं 
जैसे बच्चे लड़ते हैं 
समुन्दर की मछलियों के लिए, 
लाल मछली तुम्हारी,
नीली वाली मेरी.
ले लो सारी लाल और नीली मछलियाँ 
मगर बनी रहो मेरी महबूबा. 
पूरा समुन्दर ले लो,
जहाज़, 
और मुसाफिर, 
मगर बनी रहो मेरी महबूबा. 
मेरी सारी चीजें ले लो 
सिर्फ एक कवि हूँ मैं 
मेरी सारी दौलत है 
अपनी कापी 
और तुम्हारी खूबसूरत आँखों में. 
                    :: :: :: 

Thursday, July 21, 2011

निज़ार कब्बानी : जब तुम आई किसी कविता की तरह


निज़ार कब्बानी की कविता 'सौ प्रेम पत्र' से कुछ और कविताएँ... 











सौ प्रेम पत्र  : निज़ार कब्बानी  
(अनुवाद : मनोज पटेल)

मार्च की उस सुबह जब चलकर तुम मेरे पास आई 
किसी कविता की तरह 
धूप आई तुम्हारे साथ और बहार आई. 
हरे हो गए 
मेरी मेज पर रखे सारे कागज़ 
और पीने के पहले ही खाली हो गया 
सामने रखा काफी का कप, 
तुम्हें देखते ही 
दीवार पर लगी पेंटिंग के 
दौड़ते हुए घोड़े 
छोड़ कर मुझे 
भाग गए तुम्हारी तरफ. 
:: :: :: 

मैं कोई बादशाह नहीं हूँ, 
न ही किसी शाही खानदान का, 
मगर यह ख्याल कि तुम मेरी हो 
मुझे एहसास कराता है,
कि जैसे पांचो महाद्वीपों पर हो मेरी सत्ता,
जैसे बारिश हो मेरे काबू में, 
और हवा के रथ मेरे वश में हों,
जैसे सूरज के ऊपर 
हजारों एकड़ जमीन पर हो मेरा कब्जा, 
जैसे उन लोगों पर हो मेरी हुकूमत 
जो कभी किसी के अधीन नहीं रहे, 
और लगता है मैं खेल रहा होऊँ सौर मंडल के सितारों से 
जैसे सीपियों से खेलता है कोई बच्चा. 
मैं कोई बादशाह नहीं हूँ 
न ही होना चाहता हूँ;
मगर जब महसूस करता हूँ 
अपनी हथेलियों पर तुम्हें सोते हुए 
लगता है 
रूस का जार हूँ मैं, 
और फारस का शाह. 
:: :: :: 

Wednesday, June 15, 2011

निज़ार कब्बानी : कविता का एक लिबास


आज निजार कब्बानी की कविता 'सौ प्रेम पत्र' से एक कविता पढ़ते हैं... 













सौ प्रेम पत्र : 
निज़ार कब्बानी 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

                    ~ 1 ~ 
मैं तुम्हारे लिए अलग शब्द लिखना चाहता हूँ 
सिर्फ तुम्हारे लिए ईजाद करना चाहता हूँ नई भाषा 
सही नाप की हो जो तुम्हारी देंह 
और मेरे प्रेम के लिए. 
* * * 

मैं शब्दकोष से बाहर निकल जाना चाहता हूँ 
और छोड़ देना चाहता हूँ अपने होंठ. 
आजिज़ आ चुका हूँ अपने मुंह से 
और चाहता हूँ एक नया मुंह 
जो बदल सके 
चेरी के किसी पेड़ या माचिस की डिबिया में,
ऐसा मुंह जिससे शब्द निकलें वैसे ही  
जैसे अप्सराएं निकलती हैं समुन्दर से,
जैसे जादूगर की टोपी से निकलते हैं चूजे. 
* * *

मेरी सारी किताबें ले लो 
जो पढ़ीं थीं बचपन में, 
स्कूल की मेरी सारी कापियां ले लो,
चाक,
पेन,
और ब्लैकबोर्ड ले लो,
मगर सिखला दो मुझे एक नया शब्द 
मेरी महबूबा के कानों से 
एक झुमके की तरह लटकने के लिए. 
* * *

मैं नई उंगलियाँ चाहता हूँ 
अलग तरह से लिखने के लिए, 
जहाज के मस्तूल जैसी ऊंची,
और जिराफ की गरदन जैसी लम्बी 
ताकि सिल सकूं अपनी जान के लिए 
कविता का एक लिबास.
* * * 

तुम्हारे लिए एक अनूठी वर्णमाला बनाना चाहता हूँ. 
जिसमें मैं चाहता हूँ 
बरसात की लय, 
चंद्रमा की मिट्टी,
धूसर बादलों की उदासी,
और पतझड़ के पहियों के नीचे दबी 
विलो के पेड़ की गिरी हुई पत्तियों का दर्द. 
                    :: :: ::  

Monday, May 30, 2011

निज़ार कब्बानी : ताकि याद रख सकूं अपनी कविता का शिल्प


आज फिर निज़ार कब्बानी की कविता...












तुम्हारे साथ-साथ वक़्त भी चला जाता है : निज़ार कब्बानी 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

आह स्त्री कभी जो हुआ करती थी मेरा प्यार 
मैं टहलता रहा 
तुम्हारे चेहरे की गलियों में. 
मैनें पता किया अपने पुराने होटल के बारे में,
उस दूकान के बारे में 
जहां खरीदा करता था अखबार, 
और लाटरी टिकट 
जिन्हें कभी नहीं जीत पाया. 
न तो मुझे होटल मिला.
न ही दूकान.
पता चला कि 
अखबार छपना ही बंद हो गए 
तुम्हारे जाने के बाद से,
कि कहीं और चले गए 
शहर और फुटपाथ, 
कि सूरज ने अपना ठिकाना बदल लिया,
और बिक गए वे सितारे 
जिन्हें हम भाड़े पर लिया करते थे 
गर्मियों के दौरान. 
पेड़ों भी दर-बदर कर गए,
दूर देश उड़ गए परिंदे 
अपने बच्चों और संगीत के साथ. 
और समुन्दर मर गया 
अपनी लहरों पर पटक कर खुद को.   
                    ॹ 

आह स्त्री किसी पेड़ की तरह जड़ें जमाए हुए मेरी चमड़ी में 
बंद करो उगना मेरे भीतर 
मदद करो मेरी 
उन आदतों से निजात पाने में 
जो पड़ गईं एक-दूसरे के साथ की वजह से,
मदद करो 
पर्दों, किताबों की आलमारी,
और कांच के गुलदानों को
अपनी गन्ध से आज़ाद करने में. 
मदद करो मेरी 
उस नाम को याद करने में 
जिससे पुकारा जाता था मुझे स्कूल में. 
मदद करो 
कि याद रख सकूं तुम्हारी देंह के आकार में ढलने से पहले का 
अपनी कविता का शिल्प. 
मदद करो 
कि फिर से पा सकूं अपनी भाषा 
जो नहीं बोली जाती किसी और स्त्री से 
तुम्हारे सिवाय. 
                    ॹ 

तुम्हारी आवाज़ की बरसाती गलियों में 
मैं भटकता रहा 
एक छाते की तलाश में.
अपने साथ लिए फिर रहा था उस शहर का नक्शा 
जहां प्यार किया था तुमसे,
उन नाईटक्लबों के नाम 
जहां नाचा था तुम्हारे साथ, 
मगर पुलिस वालों ने मेरी हँसी उड़ाई 
और बताया 
कि जिस शहर की तलाश में था मैं 
उसे निगल गया था समुन्दर 
दसवीं सदी में. 
                    :: :: ::    

निज़ार कब्बानी की कविता


निज़ार कब्बानी की इस कविता का मेरा अनुवाद पहले-पहल अनुनाद ब्लॉग पर प्रकाशित हुआ था. 











ख़ुदा से सवाल : निज़ार कब्बानी 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मेरे ख़ुदा ! 
यह क्या वशीभूत कर लेता है हमें प्यार में ?
क्या घटता है हमारे भीतर बहुत गहरे ?
और टूट जाती है भीतर कौन सी चीज भला ?
कैसे वापस पहुँच जाते हैं हम बचपन में जब करते होते हैं प्यार ?
एक बूँद केवल कैसे बन जाती है समंदर 
और लम्बे हो जाते हैं पेड़ ताड़ के 
और मीठा हो जाता है समंदर का पानी 
आखिर कैसे सूरज हो जाता है कीमती कंगन एक हीरे का 
जब प्यार करते हैं हम ? 

मेरे ख़ुदा :
जब प्यार होता है अचानक 
कौन सी चीज छोड़ देते हैं हम ?
पैदा होता है क्या हमारे भीतर ?
कमसिन बच्चों से क्यों हो जाते हैं हम 
भोले और मासूम ?
और ऐसा क्यों होता है कि जब हंसता है हमारा महबूब 
दुनिया बरसाती है यास्मीन हम पर 
क्यों होता है ऐसा कि जब रोती है वह 
सर रखके हमारे घुटनों पर 
उदास चिड़िया सी हो उठती है दुनिया सारी ?

मेरे ख़ुदा :
क्या कहा जाता है इस प्यार को जिसने सदियों से 
मारा है लोगों को, जीता है किलों को 
ताकतवर को किया है विवश 
और पिघलाया किया है निरीह और भोले को ?
कैसे जुल्फें अपनी महबूबा की 
बिस्तर बन जाती हैं सोने का   
और होंठ उसके मदिरा और अंगूर ?
कैसे हम चलते हैं आग में 
और मजे लेते हैं शोलों का ?
कैदी कैसे बन जाते हैं जब प्यार करते हैं हम 
गोकि विजयी बादशाह ही रहे हों क्यों न ?
क्या कहेंगे उस प्यार को जो धंसता है हमारे भीतर 
खंजर की तरह ?
क्या सरदर्द है यह ?
या फिर पागलपन ?
कैसे होता है यह कि एक पल के अंतराल में 
यह दुनिया बन जाती है एक मरु उद्यान.... प्यारा एक नाजुक सा कोना 
जब प्यार करते हैं हम ?

मेरे ख़ुदा :
कहाँ बिला जाती है हमारी सूझ-बूझ ?
हो क्या जाता है हमें ?
ख्वाहिशों के पल कैसे बदल जाते हैं सालों में 
और अवश्यम्भावी कैसे हो उठता है एक छलावा प्यार में ?
कैसे जुदा हो जाते हैं साल से हफ्ते ?
मिटा कैसे देता है प्यार मौसमों के भेद ?
कि गर्मी पड़ती है सर्दियों में 
और आसमान के बागों में खिलते हैं फूल गुलाब के 
जब प्यार करते हैं हम ?

मेरे ख़ुदा :
प्यार के सामने कैसे कर देते हैं हम समर्पण,
सौंप देते हैं इसे चाभी अपने शरण स्थल की 
शमां ले जाते हैं इस तक और खुशबू जाफ़रान की 
कैसे होता है यह कि गिर पड़ते हैं इसके पैरों पर मांगते हुए माफी  
क्यों होना चाहते हैं हम दाखिल इसके इलाके में 
हवाले करते हुए खुद को उन सब चीजों के 
जो यह करता है साथ हमारे 
सबकुछ जो यह करता है.

मेरे ख़ुदा :
अगर हो तुम सचमुच में ख़ुदा 
तो रहने दो हमें प्रेमी 
हमेशा के लिए. 
                    :: :: :: 

Thursday, April 21, 2011

ताकि घूमती रहे पृथ्वी


आज एक बार फिर निज़ार कब्बानी. 












गेहूं की बालियाँ : निज़ार कब्बानी 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

आह ........ गेहूं की बालियाँ आंसुओं से सींची हुई,
दिल में उतर चुकी है तलवार, अब वापस नहीं हो सकते हम.
ठहरे हुए प्रेम के खतरनाक फाटक पर 
तलवार की रुपहली धार पर करता हूँ तुम्हें प्यार 
मौत के मुंह में और कांपते हुए भी.
इतने जाने-पहचाने हैं हम - 
इतिहास रोशन करता है मुझे 
और बढ़ती जाती हैं अफवाहें ....
यही होता है हमेशा सभी अच्छे संबंधों में. 

आह ...... फातिमा,
तुम्हारे साथ हिस्सा लिया है मैनें 
हजारों छोटी - छोटी बेवकूफियों में, 
जानता हूँ मैं प्यार में होने का मतलब 
इस अरबी जमाने की दीवार के पीछे 
जानता हूँ क्या मतलब होता है वादा करने,
फुसफुसाने और एलान करने का,
आज के इस अरबी समय में, 
और तुम्हारे, अपना होने का मतलब भी जानता हूँ 
ऐसे दहशत भरे दौर में. 

पुलिस बुला भेजती है मुझे पूछताछ के लिए 
जानना चाहती है मुझसे तुम्हारी आँखों के रंग के बारे में,
कि क्या है मेरी कमीज के नीचे 
और मेरे दिल में 
जानना चाहती है 
मेरे सफ़र, मेरे खयालात और मेरी नई कविताओं के बारे में. 
अगर पकड़ लेते वे मुझे 
लिखते हुए तुम्हारी आँखों से बहते काजल के बारे में   
उनकी राइफलें पीछा करतीं मेरा. 
खोल दो जुल्फें अपनी 
इस तनहा इंसान के लिए 
सताया गया है जिसे किसी पैगम्बर की तरह 
खोल दो जुल्फें अपनी, निकाल दो चिमटियां सब,
क्या पता आखिरी मौक़ा हो यह हमारा.

आह, मेरी ज़िंदगी की सुन्दरतम प्रतिमा,
वापस खींच लिए आती हो तुम मुझे हर सुबह 
बचपन के खेल के मैदानों पर 
नामुमकिन धूप खिलती है जहाँ तुम्हारी पलकों के तले 
और हकीकत हो उठते हैं नामुमकिन मुल्क 
तुम पौराणिक गाथाओं के खजाने सी साथ हुआ करती हो मेरे 
उत्तर की तरफ जाने वाली रेलगाड़ियों पर,
तुम्हारी आँखों में यह चीनी रोशनाई 
मेरे वंश से भी घटित होती है पहले, 
दौड़ा करती हो तुम मेरी रगों में 
संतरे की खुशबू की तरह.

रात में चीरकर कर देती हो मेरे दो हिस्से 
और भोर में ढाल लेती हो मुझे अपने घुटनों पर,
  जैसे दुइज का चाँद कोई.
घेरे रहती हो तुम मुझे हर ओर पूरब और पश्चिम,
दाएं और बाएँ - कितना सुहाना है यह कब्जा !
याद करता हूँ विन्डरमीयर झील पर साथ बिताए दिनों को  
जब ललकता था मैं तुम्हारे साथ पानी पर चलने को 
और चलने को बादलों पर, समय के आरपार,
और चाहता था रोना तुम्हारी छाती में मुंह छिपाए हमेशा.
ललकता हूँ देशी शराबघरों के लिए,  
अलाव के पास की अपनी उस जगह के लिए 
सभी सफ़ेद पर्वत चोटियों के लिए 
जब हिजाज़ का काजल घुलता है बर्फ में 
बहुत तरसता हूँ उम्दा शराब के लिए 
ठिठुरती सर्द रातों में.

आह, उत्तरी रेलगाड़ियों में 
मेरे बगल बैठी हुई जलपाखी,
मजबूती से थाम लो मुझे बाहों से.
कोई मतलब नहीं है मेरे लिए 
सुल्तानों के फरमान और पुलिस की फाइलों का.
डूबा रहता हूँ केवल तुम्हारे प्यार में.
उड़ा चुके हैं बहुत कुछ हम जुए में और 
लालबत्ती की हद से भी बाहर कर चुके हैं अनाधिकार प्रवेश.
थाम लो मेरी बांह ताकि घूमती रहे यह पृथ्वी...
क्योंकि घूमना बंद कर देती है यह 
किसी महान प्यार के बिना. 
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Sunday, April 17, 2011

केवल स्त्रियाँ और लिखना ही बचाए रखता है हमें मौत से

आज निज़ार कब्बानी की कविता, "मैं लिखता हूँ" 










मैं लिखता हूँ : निज़ार कब्बानी 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

मैं लिखता हूँ 
चीजों को उड़ा देने के लिए भक से ; लेखन पूरा है विस्फोट ही 
मैं लिखता हूँ 
ताकि रोशनी की जीत हो अंधेरों पर 
और विजयी हो कविता 
लिखता हूँ मैं 
ताकि पढ़ सकें मुझे गेहूं की बालियाँ 
और पढ़ सकें पेड़ मुझे 
मैं लिखता हूँ 
ताकि गुलाब समझ सके मुझे,
और सितारे और परिंदे,
और बिल्ली, मछली, 
घोंघे और सीपियाँ समझ सकें मुझे. 

मैं लिखता हूँ  
बचाने की खातिर इस दुनिया को हलाकू के जबड़ों से 
और मिलीशिया की हुकूमत 
और गिरोह के सरदार की सनक से. 
लिखता हूँ मैं 
तानाशाहों की कैद से स्त्रियों को बचाने की खातिर 
उन्हें मुर्दों की बस्तियों, बहुविवाह की प्रथा 
और ज़िंदगी की नीरसता, 
औपचारिकता और दुहराव से बचाने की खातिर.
मैं लिखता हूँ 
शब्दों को पूछताछ से बचाने के लिए 
उन्हें जासूसी कुत्तों की सूंघ और 
सेंसर के फांसी के तख्ते से बचाने के लिए. 

मैं लिखता हूँ 
स्त्रियों को बचाने के लिए जिनसे प्यार है मुझे    
उन्हें कविता और प्यार से रहित कुंठा और उदासी की बस्तियों से 
बचाने के लिए लिखता हूँ मैं 
मैं लिखता हूँ उन्हें एक धुंध भरा बादल बना देने के लिए.

केवल स्त्रियाँ और लिखना ही 
बचाए रखता है हमें मौत से.   

Friday, April 1, 2011

निज़ार कब्बानी : प्रेम पत्र


निज़ार कब्बानी के अनुवादकों लेना जयुसी और डब्लू. एस. मर्विन के सौजन्य से यह कविता-कोलाज : 'प्रेम पत्र'













प्रेम पत्र  :  निज़ार कब्बानी 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

1.
हमारे बीच 
बीस साल का अंतर 
मेरे और तुम्हारे होंठों के बीच 
जब मिलते हैं वे 
ढह जाते हैं साल 
और चकनाचूर हो जाती है ज़िंदगी की रेतघड़ी.

2.
मिला जिस दिन तुमसे, फाड़ डाले
अपने नक़्शे सब
सारी भविष्यवाणियाँ अपनी 
एक अरबी घोड़े की तरह 
सूंघ ली तुम्हारी बारिश की गंध 
अपने भीगने के पहले 
तुम्हारी आवाज़ का स्पंदन सुन लिया 
तुम्हारे बोलने के पहले 
और खोल दिया तुम्हारा जूड़ा 
तुम्हारे उसे बाँधने के पहले.

3. 
कुछ नहीं कर सकता मैं 
कर नहीं सकती कुछ तुम भी 
ज़ख्म क्या कर सकता है भला 
उस तक पहुँच रहे चाकू के खिलाफ ?

4
तुम्हारी आँखें जैसे बारिश की रात एक 
जिसमें डूब रहे हों जहाज़ तमाम 
और बिसराया जा चुका है मेरा लिखा सब 
आईनों को नहीं होती याददाश्त कोई.

5. 
हे भगवान प्यार के सामने कैसे कर देते हैं हम समर्पण,
सौंप देते हैं इसे चाभी अपने शरण स्थल की 
शमां ले जाते हैं इस तक और खुशबू जाफ़रान की 
कैसे होता है यह, कि गिर पड़ते हैं इसके पैरों पर मांगते हुए माफी  
क्यों होना चाहते हैं हम दाखिल इसके इलाके में 
हवाले करते हुए खुद को उन सब चीजों के 
जो यह करता है साथ हमारे 
सबकुछ जो यह करता है ?

6
प्रिय तुम्हारी आवाज़ में 
घुल जाती है चांदी और शराब 
बारिश में 
दिन शुरू करता है अपना सफ़र 
तुम्हारे घुटनों के आईने से 
और बुझ जाती है ज़िंदगी समुन्दर तक.

7.
जानता था कि जब कहा मैनें 
मैं प्यार करता हूँ तुमसे 
ईजाद कर रहा था मैं एक नई वर्णमाला का 
एक ऐसे शहर के लिए जहां किसी को नहीं आता था पढ़ना 
कि एक खाली थियेटर में कर रहा था अपना कविता पाठ 
कि ढाल रहा था शराब अपनी उनके लिए 
इसे चखना भी था हराम जिन्हें.

8. 
जब भगवान ने सौंपा 
तुम्हें मुझको 
लगा जैसे सबकुछ दे दिया उन्होंने मुझे 
और अनकहा कर दिया अपनी सभी पवित्र किताबों को.

9. 
कौन हो तुम, स्त्री ?
तुम जो घुसती चली आती हो एक खंजर की तरह मेरे इतिहास में 
तुम, नर्मदिल किसी खरगोश की आँख की तरह 
रोएँ की तरह मुलायम,
तुम, चमेली की माला सी खरी 
बच्चों के कुर्ते सी मासूम 
और शब्दों की तरह कठोर 
निकल जाओ बाहर मेरी नोटबुक के पन्नों से 
मेरे बिस्तर की चादर से निकल जाओ
काफी कपों और चीनी के चम्मचों से 
निकल जाओ बाहर 
निकलो मेरी कमीज के बटन से 
और मेरी रुमाल के धागों से निकल जाओ बाहर 
मेरे टूथब्रश और 
मेरे चेहरे के झाग से 
 
 
बाहर 
 
 
निकलो 
निकल जाओ मेरी सभी छोटी-छोटी चीजों से 
ताकि कर सकूं कुछ काम...........

10. 
तुम्हारा चेहरा खुदा है मेरी घड़ी के डायल पर 
और मिनट की सुई पर 
और हफ़्तों पर खुदा है......
महीनों पर....... सालों पर.......
अब कोई अपना समय नहीं बचा मेरे पास  
क्योंकि तुम ही बन बैठी हो समय अनंत.

11. 
जब चला रहा होता हूँ अपनी कार 
और तुम रख देती हो अपना सर मेरे कन्धों पर 
सितारे छोड़ देते हैं अपनी कक्षा 
और हजारों की तादाद में गिर पड़ते हैं नीचे 
शीशे की 
खिड़कियों
 पर फिसलने की खातिर......
और नीचे आ जाता है चाँद भी 
मेरे कन्धों पर बस जाने को.
तब 
    तुम्हारे साथ धुंए उड़ाना हो जाता है मजेदार  
    बातचीत करना या 
    खामोशी भी हो जाती है मजेदार.  
और रास्ता भटक जाना सर्द सड़कों पर 
     जिनका कोई नाम नहीं 
     हो जाता है मजेदार.
और आरजू 
होती 
है मेरी कि ऐसे ही बने रहें हम हमेशा 
गाती रहे बारिश यूं ही 
गाते रहें विंडशील्ड  के वाइपर 
और यह छोटा सा सर तुम्हारा 
पकड़े रहे मेरी छाती के बाल यूं ही 
जैसे इक रंगबिरंगी तितली 
उड़ने से इनकार करती हुई.

12. 
कोई शिक्षक नहीं हूँ मैं 
कि सिखलाऊँ तुम्हें कैसे किया जाता है प्यार
मछलियों को तो नहीं पड़ती जरूरत 
तैरना सीखने के लिए किसी शिक्षक की 
और उड़ना सीखने के लिए 
चिड़ियों को भी नहीं पड़ती जरूरत 
किसी शिक्षक की.
तैरो तुम खुद से. 
उड़ो खुद से ही. 
पाठ्य पुस्तकें नहीं होतीं प्यार की 
और निरक्षर थे इतिहास के महान प्रेमी
 सभी. 

13. 
गुनगुनाता रहता हूँ तुम्हारी चटक रंगीन यादों को 
जैसे गुनगुनाती रहती है चिड़िया कोई 
या गाता है जैसे अंडालूसी घरों में कोई झरना 
अपने नीले पानी को.

14. 
तुमको लिक्खे मेरे ख़त 
बढ़ कर हैं मुझसे...... और बढ़कर हैं तुमसे 
क्योंकि रोशनी ज्यादा अहम है लालटेन से,
नोटबुक से ज्यादा अहम है कविता,
और चुम्बन ज्यादा अहम है होंठों से.
तुमको लिक्खे गए मेरे ख़त 
बड़े और ज्यादा अहम हैं हमदोनों से.
वही तो हैं इकलौते दस्तावेज 
जिनसे जान पाएंगे लोगबाग 
तुम्हारी खूबसूरती 
और दीवानापन मेरा.

15. 
जब सुनता हूँ मर्दों को 
व्यग्रता से बात करते तुम्हारे बारे में 
और स्त्रियों को सुनता हूँ 
तुम्हारे बारे में चिड़चिड़ी होकर बात करते 
समझ जाता हूँ कि 
कितनी खूबसूरत हो तुम. 
Nizar Qabbani in Hindi 
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