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Saturday, January 28, 2012

मरम अल-मसरी की दो कविताएँ

मरम अल-मसरी की दो कविताएँ... 

 

मरम अल-मसरी की दो कविताएँ 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

याद है 
तुम्हारे दस्तक दिए बिना ही 
मैनें खोल दिया था अपना दरवाज़ा... 

कितनी बुद्धू थी मैं 
मुझे लगा था कि तुमने कुछ नहीं चुराया 
सिगरेट और किताबों के सिवाय. 
:: :: :: 

अपने स्वादिष्ट फल से 
मैं रोशन करती हूँ 
खुद तक आने वाला रास्ता. 

तुम्हारे नासमझ परिंदों को 
पसंद है 
बासी रोटी. 
:: :: :: 
Manoj Patel, 9838599333 

Friday, December 16, 2011

मरम अल-मसरी : अपनी नग्नता की पोशाक में

मरम अल-मसरी की चार कविताएँ...



 









मरम अल-मसरी की चार कविताएँ 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

नहीं...
तुम्हारा दरवाजा नहीं है यह 
जिस पर मैं दस्तक दे रही हूँ.
यह वो दरवाजा नहीं है 
जिसके पीछे से 
मुझे सुनाई दे रही है 
किसी की आहट.
वह दरवाजा नहीं है यह 
जो उखड़ा हुआ है अपनी चौखट से 
अब भी इन्कार करता हुआ 
खुलने से.
:: :: :: 

तुम तज दोगे मुझे ?
तो फिर 
कौन देखेगा मुझे 
अपनी नग्नता की पोशाक में 
जिसमें 
मैं दिखती हूँ 
सचमुच खूबसूरत. 
:: :: :: 

तुम्हारी छाती से लगी हुई 
बटोरती जा रही हूँ 
तुम्हारी छोड़ी हुई साँसों को 
उस दिन के लिए 
जब रुकने वाली होगी मेरी सांस. 
:: :: :: 

एक पुरुष, मुंह है जिसके पास 
मगर बोलता नहीं वह,
होंठ हैं 
मगर चूमता नहीं. 

एक पुरुष, नाक है जिसके पास 
मगर सूंघता नहीं वह, 
कान हैं, मगर सुनता नहीं. 
उदास आँखें हैं 
उसके पास 
और लम्बी बाहें 
जो नहीं जानतीं 
लेना अपने आगोश में. 

एक काक भगौड़े ने 
छल लिया 
मेरी गौरैयों को.
:: :: ::  
Manoj Patel 

Monday, October 31, 2011

मरम अल-मसरी : इल्जाम बेवफाई का

मरम अल-मसरी की तीन कविताएँ...









मरम अल-मसरी की तीन कविताएँ 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

मेरी गंध 
घेर लेगी तुमको 
और जब तुम उतारोगे अपने कपड़े 
वह फैलती जाएगी 
तुम पर इल्जाम लगाते हुए 
बेवफाई का.
:: :: :: 

जरूर तुम 
भूल गए होगे कुछ कागजात 
और लौट गए होगे 
उन्हें ले आने के लिए. 

या 
तुम्हारे निकलने के वक़्त ही  
कर दिया होगा फोन किसी दोस्त ने 
और शुरू कर दी होगी बतकही. 

या 
तुम इंतज़ार कर रहे होगे मेरा 
किसी और काफीघर में. 
:: :: :: 

मुझे लगा 
वह तुम्हारे क़दमों की आवाज़ है 
मेरे दिल में हो रही 
जोरों की धुकधुकी. 
:: :: :: 
Manoj Patel Translation 

Monday, October 24, 2011

मरम अल-मसरी : इंतज़ार

मरम अल-मसरी की तीन कविताएँ...


मरम अल-मसरी की तीन कविताएँ 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

जब तुम 
उतार देते हो अपने जूते 
और दरवाजे पर 
या बेड के नीचे 
छोड़ देते हो उन्हें 
अकेला 
वे भर जाते हैं 
ऊब, और 
इंतज़ार के ठन्डे पैरों से.
:: :: ::

अपने झूठ मुझे सौंप दो 
मैं उन्हें धुलकर 
सहेज लूंगी 
अपने निश्छल दिल में 
सच बनाने के लिए. 
:: :: :: 

मुझे और मेरी खुशी को 
इंतज़ार है 
तुम्हारे क़दमों की आवाज़ का.
:: :: :: 
Manoj Patel Translation, Manoj Patel Blog 

Saturday, October 15, 2011

मरम अल-मसरी : तुम्हारे हाशिए पर रहते हुए

मरम अल-मसरी की तीन कविताएँ...











मरम अल-मसरी की तीन कविताएँ 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

ऊब गई हूँ मैं 
तुम्हारे हाशिए पर रहते हुए,
रहते हुए तुम्हारी कापियों 
और तुम्हारे छोटे से हिस्से में,
तुम्हारे दरवाजे के बाहर खड़ी-खड़ी 
आजिज आ चुकी हूँ मैं.
कहाँ है 
कहाँ है तुम्हारे स्वर्ग का खुला-खुला विस्तार?
:: :: :: 

तुम कितने अलग हो उन सबसे...
तुम्हारी खासियत है 
तुम्हारे होठों पर धरा 
मेरा चुम्बन.
:: :: ::

तुम्हारी कोई गलती नहीं थी.
कोई गलती नहीं थी मेरी भी.
यह तो हवा थी कमबख्त 
जिसने गिरा दिया 
मेरी कामनाओं का 
पका हुआ फल. 
:: :: ::
Manoj Patel Translations, Manoj patel"s Blog 

Saturday, October 8, 2011

मरम अल-मसरी : सीखो प्यार करना

मरम अल-मसरी की तीन कविताएँ...


















मरम अल-मसरी की तीन कविताएँ 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

मैं बंद कर लूंगी अपनी आँखें, 
रखवाली नहीं करूंगी 
तुम्हारे मंदिर की.

इस बार 
मैं भाग जाने दूंगी 
नटखट भगवान को 
नंगे पाँव.
:: :: ::

मुझे आजादी बख्शो 
और धीरज रखो 
मेरे इन्कार करने पर.
तब आओ मेरे नजदीक 
जब बुलाऊँ मैं तुम्हें,
और जब मैं उपेक्षा करूँ तुम्हारी 
सीखो इंतज़ार करना.
कामना करो मेरी 
अपने सिवा किसी और के लिए 
और सीखो प्यार करना. 
:: :: ::

मर जाएगा सांप 
जब 
वह काटेगा मुझे 
और चखेगा 
मेरा दुख.
:: :: ::
Manoj Patel Translations, Manoj Patel's  Blog 

Friday, September 30, 2011

मरम अल-मसरी : आज शाम मिलेंगे शिकार और शिकारी

मरम अल-मसरी की दो कविताएँ...


















मरम अल-मसरी की दो कविताएँ 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

सिर्फ इतना ही 
चाहता था वह :
एक घर,
बच्चे 
और प्यार करने वाली एक पत्नी.
मगर एक दिन जब वह जागा 
तो पाया कि 
बूढ़ी हो गई है है उसकी आत्मा.

सिर्फ इतना ही 
चाहती थी वह :
एक घर, बच्चे 
और प्यार करने वाला एक पति.
एक दिन 
वह जागी 
और पाया कि 
एक खिड़की खोलकर 
भाग निकली है उसकी आत्मा. 
:: :: ::

आज शाम 
एक पुरुष 
बाहर निकलेगा 
शिकार की तलाश में 
अपनी दमित कामनाओं को शांत करने के लिए.

आज शाम 
एक स्त्री बाहर निकलेगी 
किसी पुरुष की तलाश में 
जो उसे 
हमबिस्तर बना सके.

आज शाम 
मिलेंगे शिकार और शिकारी 
और एक हो जाएंगे 
और शायद 
शायद 
बदल लेंगे अपनी भूमिकाएं. 
:: :: ::        
Manoj Patel Translations, Manoj Patel Blog  

Wednesday, September 28, 2011

मरम अल-मसरी : तस्वीरें फूल चुम्बन और प्यार

मरम अल-मसरी की दो कविताएँ...
















मरम अल-मसरी की दो कविताएँ 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

छोटी पिनों की मदद से 
वह जड़ता है अपनी स्मृतियों को 
अपने कमरे की 
दीवारों पर 
उन्हें सुखाने के लिए.
तस्वीरें 
फूल
चुम्बन 
और प्यार की महक.
कोमल कृतज्ञता से भरी निगाहों के साथ 
वे सभी ताकते हैं उसे 
क्यूंकि उसने 
शाश्वत बना दिया है उन्हें,
लगभग शाश्वत.
:: :: ::

थोड़ी-थोड़ी देर पर 
वह खोलता है खिड़कियाँ,
और बार-बार 
बंद भी कर देता है उन्हें.
पर्दों के पीछे से उसकी आकृति 
खोल देती है उसका राज 
दिख जाता है वह आते-जाते हुए 
अपने सफ़र पर, दूर और पास.
अपने अकेलेपन को संगीत से भरने के लिए 
वह चलाता है रेडियो,
पड़ोसियों को झांसा देते हुए 
कि ठीक-ठाक है सब.
हम देखा करते थे उसे 
सर झुकाए 
जल्दी-जल्दी जाते हुए,
और ब्रेड लेकर 
उस जगह को लौटते 
जहां 
कोई उसका इंतज़ार नहीं करता होता था.   
:: :: :: 
Manoj Patel Translations 

Tuesday, September 20, 2011

मरम अल-मसरी : रोती है गुड़िया

मरम अल-मसरी की चार कविताएँ...












मरम अल-मसरी की चार कविताएँ 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

इंतज़ार करूंगी 
बच्चों के सोने का 
और फिर 
अपनी नाकामयाबी की लाश को 
बहने दूंगी 
छत तक.
:: :: :: 

एक दिन 
वह मोल ले लाया 
एक गुड़िया.
वह हंसती थी 
जब वह हंसने का हुक्म देता था उसे,
गाती और नाचती थी 
उसके बटन दबाने पर,
और सो जाती थी 
जब वह लिटा देता था उसे.
मगर ओह मालिक का गुस्सा !
उसके बिस्तर में लेटी
गुड़िया
रोती है कभी-कभी 
और ताकती रहती है आँखें फाड़ कर. 
:: :: :: 

माफी चाहती हूँ...
अनजाने,
और अनचाहे,
मेरी हवाओं ने 
झकझोर दिया तुम्हारी डालियों को   
और गिरा दिया 
तुम पर अभी तक खिला 
इकलौता फूल.
:: :: :: 

उसके पास दो स्त्रियाँ हैं :
एक सोती है उसके बिस्तर पर,
और दूसरी 
उसके ख़्वाबों के बिस्तर पर.

उसके पास उससे प्यार करने वाली दो स्त्रियाँ हैं :
एक बूढ़ी हो रही है उसके बगल में,
दूसरी उसे पेश करती है अपनी जवानी 
और फिर कुम्हला जाती है. 

उसके पास दो स्त्रियाँ हैं :
एक उसके घर के दिल में,
और दूसरी उसके दिल के घर में.
:: :: :: 

Thursday, September 15, 2011

मरम अल-मसरी : कहाँ से आती हैं यादें

एक बार फिर मरम अल-मसरी...











मरम अल-मसरी की कविताएँ
(अनुवाद : मनोज पटेल)

छोटी जलधाराओं की तरह 
वे दाखिल हुए हमारी ज़िंदगी में  
मगर अचानक 
हम डूब गए उनमें 
और जान नहीं पाए कि
किसने दे दिया हमें 
पानी और नमक 
और छोड़ गया हमारे भीतर 
इतनी कड़वाहट.
:: :: :: 

आखिर कहाँ से आती है यह धूल ?
कहाँ से ?
आप उसपर अपनी हथेली फिराते हैं उसे पोंछने के लिए,
मगर वह फिर लौट आती है हमेशा 
चेहरों, और 
आवाजों की तरह.
आपको लगता है कि वह केवल सतह पर जमती है,
मगर आप पाते हैं कि वह पाट देती है गहराईयों को.

ये यादें कहाँ से आती हैं ?
आखिर कहाँ से आती हैं वे ?
:: :: :: 

हर बार 
जब खोलती हूँ अपना बैग
धूल उड़ने लगती है उससे निकलकर.
:: :: :: 

Sunday, September 11, 2011

मरम अल-मसरी : सिर्फ एक चुम्बन के लिए

मरम अल-मसरी की कुछ और कविताएँ...















मरम अल-मसरी की कविताएँ 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

मैं ही हूँ चोर
तुम्हारी दूकान में सजी 
टाफियों की.
उंगलियाँ चिपचिपी हो गईं मेरी 
मगर 
डाल न सकी एक भी 
अपने मुंह में.
:: :: :: 

ख्वाहिश भड़काती है मुझे
और चमकने लगती है मेरी आँखें.
नैतिकताओं को ठूंस देती हूँ मैं 
नजदीकी दराज में,
बदल जाती हूँ शैतान में
फरिश्तों की आँखों पर बाँध देती हूँ पट्टी 
सिर्फ 
एक चुम्बन के लिए. 
:: :: :: 

कोई दस्तक दे रहा है दरवाज़े पर.
कौन ?
बुहार कर कालीन के नीचे कर देती हूँ
अपने अकेलेपन की गर्द.
एक मुस्कराहट का बंदोबस्त करके
खोल देती हूँ दरवाज़ा.
:: :: ::   

Friday, September 9, 2011

मरम अल-मसरी की कविताएँ

इस ब्लॉग की पहली सालगिरह के मौके पर आज मिलते हैं एक और अरबी कवियत्री मरम अल-मसरी से, 1962 में सीरिया में जन्मी मसरी ने दमिश्क यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी साहित्य की पढ़ाई की है. फ्रेंच और अंग्रेजी पर भी सामान अधिकार रखने वाली मरम अल-मसरी अरबी में कविताएँ लिखती हैं. अरबी पत्रिकाओं में बहुत कम उम्र से ही कविताओं का प्रकाशन, पेरिस में रिहाइश, अब तक तीन कविता-संग्रह प्रकाशित, कविताओं का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है. अकेलेपन और हताशा के साथ-साथ शारीरिक आकर्षण, बेवफाई, विवाहेतर संबंधों जैसी वर्जनाओं को अपनी कविता की विषय वस्तु बनाती हैं. 


















मरम अल-मसरी की कविताएँ
(अनुवाद : मनोज पटेल)

नमक के कणों की तरह 
वे चमके 
और गल गए. 
इस तरह गायब हुए 
वे मर्द 
जिन्होनें मुझे प्यार नहीं किया. 
:: :: :: 

मैं जा रही थी 
सीधे 
जब तुमने रोक लिया मेरा रास्ता.
ठोकर तो लगी 
मगर 
गिरी नहीं मैं. 
:: :: :: 

आईने में झांका मैनें 
और देखा 
एक स्त्री 
संतोष से भरी 
चमकीली आँखों 
और मीठी शरारत वाली,

और मुझे उससे जलन होने लगी. 
:: :: :: 

लड़की ने माँगा था लड़के से 
एक ख्वाब 
मगर उसने एक हकीकत पेश की उसे.
तब से ही 
उसने पाया खुद को 
एक दुखियारी माँ.
:: :: :: 

कैसी बेवकूफी :
जब भी मेरा दिल 
सुनता है कोई खटखटाहट 
ये खोल देता है अपने दरवाज़े.
:: :: :: 

एक पत्नी लौटती है 
अपने घर को 
एक पुरुष की गंध के साथ.
वह नहाती है,
इत्र छिड़कती है, 
मगर कसैली ही बनी रहती है,
पछतावे की गंध. 
:: :: :: 

बाहर अँधेरे में 
मैं ठिठुर रही हूँ ठण्ड से.
तुम 
खोलते क्यूं नहीं मेरी खातिर 
अपनी कमीज का दरवाज़ा ?
:: :: :: 
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