मरम अल-मसरी की चार कविताएँ...
मरम अल-मसरी की चार कविताएँ
(अनुवाद : मनोज पटेल)
इंतज़ार करूंगी
बच्चों के सोने का
और फिर
अपनी नाकामयाबी की लाश को
बहने दूंगी
छत तक.
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एक दिन
वह मोल ले लाया
एक गुड़िया.
वह हंसती थी
जब वह हंसने का हुक्म देता था उसे,
गाती और नाचती थी
उसके बटन दबाने पर,
और सो जाती थी
जब वह लिटा देता था उसे.
मगर ओह मालिक का गुस्सा !
उसके बिस्तर में लेटी
गुड़िया
रोती है कभी-कभी
और ताकती रहती है आँखें फाड़ कर.
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माफी चाहती हूँ...
अनजाने,
और अनचाहे,
मेरी हवाओं ने
झकझोर दिया तुम्हारी डालियों को
और गिरा दिया
तुम पर अभी तक खिला
इकलौता फूल.
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उसके पास दो स्त्रियाँ हैं :
एक सोती है उसके बिस्तर पर,
और दूसरी
उसके ख़्वाबों के बिस्तर पर.
उसके पास उससे प्यार करने वाली दो स्त्रियाँ हैं :
एक बूढ़ी हो रही है उसके बगल में,
दूसरी उसे पेश करती है अपनी जवानी
और फिर कुम्हला जाती है.
उसके पास दो स्त्रियाँ हैं :
एक उसके घर के दिल में,
और दूसरी उसके दिल के घर में.
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