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Tuesday, May 22, 2012

इतवार का अखबार

डाना ज्वायूह की एक और कविता...  

 
इतवार का अखबार : डाना ज्वायूह 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

इतवार के अखबार में कुछ तलाशते हुए 
संयोगवश पलट दिया मैंने स्थानीय शादियों वाला पन्ना, 
फिर भी गौर नहीं किया था तस्वीर पर 
जब तक तुम्हारा नाम न दिख गया सुर्ख़ियों के बीच. 

और तुम थी वहां, लगभग वैसी की वैसी दिखती, 
लम्बे बाल अभी तक, गोकि अब अर्से से चलन में नहीं रहे ऐसे बाल, 
अब भी वही रूखा गंभीर चेहरा बनाए 
जिसे मुस्कराहट कहा करती थी तुम. 

मुझे लगा जैसे आमने-सामने बैठे हों हम. 
पेट में मरोड़ होने लगी मेरे, पूरी खबर पढ़ गया मैं. 
वह बहुत कुछ बताता था दोनों परिवारों के बारे में, 
मगर तुम्हारे बारे में बहुत कम.  

आखिरकार पूरा पढ़ने के बाद अखबार नीचे फेंक दिया मैंने, 
ईर्ष्या का मारा, जलता हुआ मेरा दिमाग, 
इस शख्स से नफरत करता हुआ, इस अजनबी से जिससे प्रेम करती थी तुम, 
नफरत करता हुआ इस छपे हुए नाम से.  

फिर भी उसे काटकर निकाल लिया मैंने 
किसी किताब में रख देने के लिए, ऎसी किसी चीज की तरह 
जिसे फिर इस्तेमाल करना हो मुझे, 
रद्दी का एक टुकड़ा, मैं जानता था कि दुबारा नहीं पढ़ूंगा 
मगर सह नहीं सकता था खोना भी उसे. 
                    :: :: :: 

Monday, May 21, 2012

जैसे कोई भूला-बिसरा प्यार

डाना ज्वायूह (जन्म: २४ दिसंबर १९५०) अमेरिकी लेखक, आलोचक और कवि हैं. पूर्णकालिक लेखक बनने के लिए उन्होंने एक कम्पनी के ऊंचे पद से इस्तीफा दे दिया था. जनवरी २००३ से जनवरी २००९ तक वे नेशनल एन्डाउमेंट फार आर्ट्स के चेयरमैन भी रह चुके हैं.  कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके डाना के तीन कविता-संग्रह प्रकाशित हैं.  


हमें याद करने का शुक्रिया : डाना ज्वायूह 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

खराब हो रहे हैं गलती से यहाँ भेजे गए फूल, 
एक ऐसे नाम की तरफ से जिसे कोई नहीं जानता 
हमें क्या करना चाहिए? 
हमारी पड़ोसन कहती है कि वे उसके लिए नहीं हैं, 
और किसी का जन्मदिन भी नहीं नजदीक. 
हमें किसी को शुक्रिया कहना चाहिए इस चूक के लिए. 
हममें से किसी का चक्कर तो नहीं चल रहा किसी से? 
पहले तो हम हँसे और फिर ताज्जुब करने लगे. 

सबसे पहले मुरझाने वाला था आइरिस 
अपनी प्यारी और देर तक टिकने वाली 
सुगंध में ढंका. गुलाब 
एक-एक कर गिराते गए पंखुड़ियां, 
और अब सूख रही हैं फर्न भी. 
किसी अंत्येष्टि सा महक रहा है कमरा, 
मगर वे पड़े हैं वहां, घर जैसा महसूस करते, 
किसी छोटे-मोटे अपराध का आरोप सा लगाते हमपर, 
जैसे कोई भूला-बिसरा प्यार, और हम फेंक नहीं सकते 
कोई तोहफा भी, जो कभी हमारे पास रहा ही नहीं.      
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