नाजिम हिकमत की एक और बहुत अच्छी कविता 'वेरा का जागना'. वेरा तुल्यकोवा उनकी पांचवी पत्नी का नाम था.
वेरा का जागना : नाजिम हिकमत
(अनुवाद : मनोज पटेल)
कुर्सियां सोई हुई हैं अपने पायों पर
मेज की ही तरह
गलीचा लंबा पड़ा है पीठ के बल
अपने बेलबूटों को थामे हुए
सो रहा है आईना
कसकर बंद हैं खिड़कियों की आँखें
बाहर पैर लटकाए पसरी हुई है बाल्कनी
सामने की छत पर सोई पड़ी हैं चिमनियाँ
अकेशिया के फूल भी सोए हुए हैं फुटपाथ पर
सो रहा है बादल
अपनी छाती पर एक सितारा लिए
रोशनी सो रही है, भीतर और बाहर की
तुम जग गई मेरी जान
जाग गई कुर्सियां
और भागने लगीं एक कोने से दूसरे कोने
मेज की ही तरह
उठकर बैठ गया गलीचा
धीमे-धीमे खोलता हुआ अपना रंग
भोर की झील की तरह जग गया आईना
अपनी बड़ी-बड़ी नीली आँखें खोल दिया खिड़कियों ने
बाल्कनी जाग गई
और समेट लिए हवा में लटके अपने पैर
सामने की छत पर धुंआ निकलने लगा चिमनियों से
अकेशिया के फूलों ने गाना शुरू कर दिया फुटपाथ पर
जग गया बादल
और अपनी छाती के सितारे को उछाल दिया हमारे कमरे में
जाग गई रोशनी, भीतर और बाहर की
तुम्हारे बालों को झिलमिलाते हुए
वह फिसल पड़ी तुम्हारी उँगलियों से
और बाहों में भर लिया तुम्हारी निर्वसन कमर को, उन गोरे पांवो को तुम्हारे
मई 1960
मास्को
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