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Wednesday, May 2, 2012

नाजिम हिकमत : वेरा का जागना

नाजिम हिकमत की एक और बहुत अच्छी कविता 'वेरा का जागना'.  वेरा तुल्यकोवा उनकी पांचवी पत्नी का नाम था.  

 
वेरा का जागना : नाजिम हिकमत 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

कुर्सियां सोई हुई हैं अपने पायों पर 
           मेज की ही तरह 
गलीचा लंबा पड़ा है पीठ के बल 
          अपने बेलबूटों को थामे हुए 
सो रहा है आईना 
कसकर बंद हैं खिड़कियों की आँखें 
बाहर पैर लटकाए पसरी हुई है बाल्कनी 
सामने की छत पर सोई पड़ी हैं चिमनियाँ 
          अकेशिया के फूल भी सोए हुए हैं फुटपाथ पर 
सो रहा है बादल 
          अपनी छाती पर एक सितारा लिए 
रोशनी सो रही है, भीतर और बाहर की 
तुम जग गई मेरी जान 
जाग गई कुर्सियां 
          और भागने लगीं एक कोने से दूसरे कोने 
                    मेज की ही तरह 
उठकर बैठ गया गलीचा 
          धीमे-धीमे खोलता हुआ अपना रंग 
भोर की झील की तरह जग गया आईना 
अपनी बड़ी-बड़ी नीली आँखें खोल दिया खिड़कियों ने 
बाल्कनी जाग गई 
          और समेट लिए हवा में लटके अपने पैर  
सामने की छत पर धुंआ निकलने लगा चिमनियों से 
अकेशिया के फूलों ने गाना शुरू कर दिया फुटपाथ पर 
जग गया बादल 
          और अपनी छाती के सितारे को उछाल दिया हमारे कमरे में 
जाग गई रोशनी, भीतर और बाहर की 
          तुम्हारे बालों को झिलमिलाते हुए 
                    वह फिसल पड़ी तुम्हारी उँगलियों से 
     और बाहों में भर लिया तुम्हारी निर्वसन कमर को, उन गोरे पांवो को तुम्हारे  
                                                                                                 मई 1960 
                                                                                                      मास्को 
                    :: :: :: 

Friday, April 13, 2012

नाजिम हिकमत : हिरोशिमा की बच्ची

आज फिर से नाजिम हिकमत...  

 
हिरोशिमा की बच्ची : नाजिम हिकमत 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मैं आती हूँ और खड़ी होती हूँ हर दरवाजे पर 
मगर कोई नहीं सुन पाता मेरे क़दमों की खामोश आवाज 
दस्तक देती हूँ मगर फिर भी रहती हूँ अनदेखी 
क्योंकि मैं मर चुकी हूँ, मर चुकी हूँ मैं 

सिर्फ सात साल की हूँ, भले ही मृत्यु हो गई थी मेरी 
बहुत पहले हिरोशिमा में, 
अब भी हूँ सात साल की ही, जितनी कि तब थी 
मरने के बाद बड़े नहीं होते बच्चे 

झुलस गए थे मेरे बाल आग की लपलपाती लपटों में 
धुंधला गईं मेरी आँखें, अंधी हो गईं वे 
मौत आई और राख में बदल गई मेरी हड्डियां 
और फिर उसे बिखेर दिया था हवा ने 

कोई फल नहीं चाहिए मुझे, चावल भी नहीं 
मिठाई नहीं, रोटी भी नहीं 
अपने लिए कुछ नहीं मांगती  
क्योंकि मैं मर चुकी हूँ, मर चुकी हूँ मैं 

बस इतना चाहती हूँ कि अमन के लिए 
तुम लड़ो आज, आज लड़ो तुम 
ताकि बड़े हो सकें, हंस-खेल सकें 
बच्चे इस दुनिया के. 
                    :: :: :: 

Friday, February 3, 2012

नाजिम हिकमत : पतझड़

नाजिम हिकमत की एक और कविता... 

 
पतझड़ : नाजिम हिकमत 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

धीरे-धीरे छोटे होते जा रहे हैं दिन, 
आने वाला है बरसात का मौसम. 
मेरा खुला दरवाज़ा इंतज़ार करता रहा तुम्हारा. 
                    तुम्हें इतनी देर क्यों हो गई? 

मेरी मेज पर धरी रह गई ब्रेड, नमक, और एक हरी मिर्च. 
तुम्हारा इंतज़ार करते हुए 
अकेला ही पीता रहा मैं 
और रख लिया आधी शराब बचाकर तुम्हारे लिए. 
                    तुम्हें इतनी देर क्यों हो गई? 

मगर देखो, शहद से भरा हुआ फल, 
पककर डाली पर लगा है अभी.  
अगर और देर हो गई होती तुम्हें 
अपने आप ही गिर गया होता वह जमीन पर. 
                    :: :: :: 
Manoj Patel, Parte Parte, Parhte Parhte, Padte Padte, Padhate Padhate  

Monday, January 30, 2012

नाजिम हिकमत : थ्री स्टार्क्स रेस्टोरेंट

आज फिर से पढ़ते हैं नाजिम हिकमत की एक कविता... 

 
थ्री स्टार्क्स रेस्टोरेंट : नाजिम हिकमत 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

हम मिला करते थे प्राग के थ्री स्टार्क्स रेस्टोरेंट में. 
आज मैं खड़ा हूँ आँखें बंद किए सड़क के किनारे,
          और तुम एक मौत भर की दूरी पर. 
शायद कोई थ्री स्टार्क्स रेस्टोरेंट नहीं है प्राग में 
          और बातें बना रहा हूँ मैं. 

हम मिला करते थे प्राग के थ्री स्टार्क्स रेस्टोरेंट में. 
मैं निहारा करता तुम्हारा चेहरा और गाया करता था दिल से 
          पैगम्बर सोलोमन के सबसे बेहतरीन गीत.  

हम मिला करते थे प्राग के थ्री स्टार्क्स रेस्टोरेंट में. 
आज मैं खड़ा हूँ आँखें बंद किए सड़क के किनारे, 
          और तुम एक मौत भर की दूरी पर, 
          एक टूटे हुए आईने में, उल्टी-पुल्टी और विरूपित. 

हम मिला करते थे प्राग के थ्री स्टार्क्स रेस्टोरेंट में. 
सोन्या दान्योलोवा, प्यारी दोस्त ! 
कितनी जल्दी हम भूल जाते हैं मृतकों को.
                                                         १८ अगस्त, १९५९ 
                    :: :: :: 
Manoj Patel, Blogger & Translator 

Saturday, December 17, 2011

नाजिम हिकमत : गिरती हुई पत्तियाँ

आज फिर से नाजिम हिकमत की एक कविता...

 

गिरती हुई पत्तियाँ : नाजिम हिकमत 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

पचासों हजार उपन्यासों और कविताओं में पढ़ा है 
     गिरती हुई पत्तियों के बारे में 
पचासों हजार फिल्मों में देखा है पत्तियों को गिरते हुए 
पचासों हजार बार गिरते देखा है पत्तियों को 
               गिरते, उड़ते और सड़ते 
पचासों हजार बार महसूस किया है उनकी बेजान शुश-शुश की आवाज़ 
               अपने क़दमों के नीचे, अपने हाथों और उँगलियों के पोरों पर 
मगर अब भी मैं अभिभूत हो जाता हूँ गिरती हुई पत्तियाँ देखकर 
               खासकर सड़क पर गिरती हुई पत्तियाँ  
               खासकर शाहबलूत की पत्तियाँ 
               और अगर आस-पास हों बच्चे 
               अगर निकली हो धूप 
               और कोई अच्छी खबर मिली हो मुझे दोस्ती के बारे में 
खासकर अगर दर्द न हो मेरे सीने में 
और भरोसा हो कि मुझे चाहता है मेरा प्यार 
खासकर ऐसे दिन जब मैं बेहतर महसूस करता होऊँ लोगों के बारे में 
               मैं अभिभूत हो जाता हूँ गिरती हुई पत्तियाँ देखकर  
खासकर सड़क पर गिरती हुई पत्तियाँ 
खासकर शाहबलूत की पत्तियाँ 
                                                                                ६ सितम्बर, १९६१ 
                                                                                 लीपजिग 
                    :: :: :: 
यू ट्यूब पर इस कविता का वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करें. 
manojpatel

Saturday, December 10, 2011

नाजिम हिकमत : तुम्हें प्यार करता हूँ मैं

आज फिर से नाजिम हिकमत की एक कविता...



तुम्हें प्यार करता हूँ मैं : नाजिम हिकमत 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

नीचे झुकता हूँ मैं : देखता हूँ धरती 
घास, 
कीड़े मकोड़े, 
नीले फूलों वाले नन्हे पौधे. 
तुम बसंत ऋतु की धरती की तरह हो, मेरी प्रिय,
                              तुम्हें देख रहा हूँ मैं. 

पीठ के बल लेटता हूँ : देखता हूँ आकाश, 
एक पेड़ की डालियाँ, 
उड़ते हुए सारस, 
खुली आँखों से एक स्वप्न. 
तुम बसंत ऋतु के आकाश की तरह हो, मेरी प्रिय, 
                              तुम्हें ही देखता हूँ मैं. 

रात में जला देता हूँ एक अलाव : स्पर्श करता हूँ आग,
पानी, 
वस्त्र, 
रजत.
तुम सितारों के तले जलती एक आग की तरह हो, मेरी प्रिय,
                              तुम्हें स्पर्श करता हूँ मैं. 

जाता हूँ जनता के बीच : प्यार करता हूँ जनता को, 
काम,
विचार, 
संघर्ष. 
तुम एक शख्स हो मेरे संघर्ष में शामिल,
                              तुम्हें प्यार करता हूँ मैं. 
                    :: :: :: 
Manoj Patel 

Monday, December 5, 2011

नाजिम हिकमत : तुम्हारी वजह से

आज पढ़ते हैं नाजिम हिकमत की कविता, 'तुम्हारी वजह से'...



तुम्हारी वजह से : नाजिम हिकमत 
(अनुवाद : मनोज पटेल)


तुम्हारी वजह से, खरबूजे की फांक सा हो जाता है हर एक दिन
 
                    मिट्टी की मीठी खुशबू से महकता हुआ. 

तुम्हारी वजह से, सारे फल बढ़े आते हैं मेरी तरफ 

                    जैसे कि धूप होऊँ मैं. 

तुम्हारा शुक्रिया कि मैं ज़िंदा रहा उम्मीद की शहद पर.

तुम्हारी वजह से ही धड़कता है मेरा दिल.

तुम्हारी वजह से, मेरी सबसे तनहा रातें भी 

                    मुस्कराती हैं तुम्हारी दीवार पर लगी अनाटोलियाई तस्वीर की तरह. 

अगर कहीं मेरा सफ़र ख़त्म हो अपने शहर पहुँचने के पहले ही, 

                    तुम्हारी वजह से मैं सो चुका हूँ गुलाब की एक वाटिका में. 

तुम्हारी वजह से मैनें दाखिल नहीं होने दिया मौत को, 

                    जो मुलायम कपड़ों में लिपटी  

गाना गाती दस्तक दे रही थी मेरे दरवाजे पर  

                    बुलाते हुए मुझे चिर शान्ति की ओर. 

                    :: :: :: 
Manoj Patel 

Sunday, September 18, 2011

नाजिम हिकमत : जैसे किसी बाग़ी का झंडा

नाजिम हिकमत की 'रात 9 से 10 के बीच की कविताएँ' से एक और कविता...












रात 9 से 10 के बीच लिखी गई कविताएँ - 4 : नाजिम हिकमत 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

(पत्नी पिराए के लिए)

4 दिसंबर 1945 

अपना वही कपड़ा निकालो जिसमें मैनें तुम्हें पहले पहल देखा था,
सबसे सुन्दर नजर आओ आज,
बसंत ऋतु के पेड़ों की तरह...
अपने जूड़े में वह कारनेशन लगाओ 
          जो मैनें तुम्हें जेल से भेजा था एक चिट्ठी में,
ऊपर उठाओ अपना चूमने लायक, चौड़ा गोरा माथा.
आज कोई रंज नहीं कोई उदासी नहीं --
                                                         कत्तई नहीं ! --
आज नाजिम हिकमत की बीवी को बहुत खूबसूरत दिखना है 
                                                         जैसे किसी बाग़ी का झंडा...
                               :: :: ::

Friday, September 16, 2011

नाजिम हिकमत : वर्जित चीजों की दुनिया

नाजिम हिकमत की कविता, 'नौवीं सालगिरह'












नौवीं सालगिरह : नाजिम हिकमत 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

घुटनों-घुटनों बर्फ वाली एक रात को 
शुरूआत हुई थी मेरे इस अभियान की --
खाने की मेज से खींचकर,
पुलिस की गाड़ी में लादा जाना,
फिर रेलगाड़ी से रवाना करके 
एक कोठरी में बंद कर दिए जाना.
उसका नौवां साल बीता है तीन दिन पहले.

बरामदे में स्ट्रेचर पर पीठ के बल लेटा एक आदमी 
मर रहा है मुहं बाए हुए,
कैद के लम्बे समय का दुख है उसके चेहरे पर. 


दुखद और सम्पूर्ण अकेलेपन को 
याद करता हूँ मैं,
अकेलापन जैसे किसी पागल या मृतक का :
शुरूआत में, एक बंद दरवाज़े की 
छिहत्तर दिनों की मौन अदावत,
फिर सात हफ़्तों तक एक जहाज के पेंदें में.
फिर भी मैनें हार नहीं मानी थी :
मेरा सर 
मेरे पक्ष में खड़ा एक दूसरा इंसान था.

चाहे जितनी बार वे कतारबद्ध खड़े हुए हों मेरे सामने,
मैं उनमें से ज्यादातर के चेहरे भूल गया हूँ
मुझे याद है तो सिर्फ एक लम्बी नुकीली नाक.
जब मुझे सजा सुनाई जा रही थी, उन्हें एक ही चिंता थी :
          कि रोबदार दिखें वे.
          मगर वे ऐसा दिखे नहीं.
वे इंसानों की बजाए चीजों की तरह नजर आ रहे थे :
दीवार घड़ियों की तरह, मूर्ख
व घमंडी,
और हथकड़ियों-बेड़ियों की तरह उदास और दयनीय. 
जैसे बिना मकानों और सड़कों के कोई शहर.
ढेर सारी उम्मीद और ढेर सारा दुख.
फासले बहुत कम.
चौपाया प्राणियों में सिर्फ बिल्लियाँ.

मैं वर्जित चीजों की दुनिया में रहता हूँ !
जहां वर्जित है : 
          अपनी महबूबा के गालों को सूंघना.  
जहां वर्जित है :
          अपने बच्चों के साथ एक ही मेज पर बैठकर भोजन करना.
जहां वर्जित है :
          बीच में सींखचों या किसी चौकीदार के बिना 
          अपने भाई या माँ से बात करना.
जहां वर्जित है :
          अपनी लिखी किसी चिट्ठी को चिपकाना 
          या चिपकाई हुई किसी चिट्ठी को पाना.
जहां वर्जित है :
          सोने जाते समय बत्ती बुझाना. 
जहां वर्जित है :
          चौपड़ खेलना. 
और ऐसा नहीं है कि यह वर्जित नहीं है,
          मगर जो आप छिपा सकते हैं अपने दिल में या जो आपके हाथ में है 
          वह है प्यार करना, सोचना और समझना. 

बरामदे में स्ट्रेचर पर पड़े आदमी की मौत हो गई.
वे उसे ले गए कहीं.
अब न तो कोई उम्मीद और न ही कोई दुख,
          न रोटी, न पानी,
          न आजादी, न कैद,
          न स्त्रियों की हसरत, न चौकीदार, न खटमल,
          और कोई बिल्ली भी नहीं बैठकर उसे ताकते रहने के लिए.
                  वह धंधा तो अब खलास, ख़तम.

मगर मेरा काम तो अभी जारी है :
मेरा सर जारी रखे है प्यार करना, सोचना और समझना,
मेरा नपुंसक क्रोध खाता ही जा रहा है मुझे,
और सुबह से ही टीस रहा है मेरा कलेजा...
                                                                20 जनवरी 1946 
                    :: :: :: 

Monday, September 12, 2011

नाजिम हिकमत : आप सभी को हलो

नाजिम हिकमत की कविता 'हलो'











हलो : नाजिम हिकमत 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

कैसी खुशकिस्मती है नाजिम,
कि सरेआम और बेधड़क,
तुम "हलो" कह सकते हो
तहे दिल से !

साल है 1940.
महीना जुलाई का.
दिन, महीने का पहला बृहस्पतिवार. 
समय : 9 बजे.

इतनी ही तफसील से तारीख दर्ज करो अपनी चिट्ठियों में.
हम ऎसी दुनिया में रहते हैं 
                    कि दिन, महीने और घंटे 
                    बहुत कुछ कहते हैं.

हलो, हर किसी को.

एक बड़ा, भरा-पूरा और सम्पूर्ण 
"हलो" कहना  
और फिर बिना अपना वाक्य ख़त्म किए,
                    खुश और शरारतपूर्ण मुस्कराहट के साथ 
                    तुम्हें देखना
                    और आँख मारना...

हम इतने अच्छे दोस्त हैं 
                    कि समझ लेते हैं एक-दूसरे को 
                    बिना एक भी लफ्ज़ बोले या लिखे...

हलो, हर किसी को,
हलो आप सभी को...
                    :: :: :: 

Saturday, August 6, 2011

नाजिम हिकमत : चौराहे पर लाश

नाजिम हिकमत की कविता. तस्वीर तहरीर चौक की 


बेयाजित चौराहे पर : नाजिम हिकमत 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

एक लाश पड़ी हुई है,
          उन्नीस साल के नौजवान की लाश,
          दिन दहाड़े सूरज की रोशनी में,
          और रात में सितारों के नीचे,
          इस्ताम्बुल के बेयाजित चौराहे पर.

एक लाश पड़ी हुई है,
          एक हाथ में कापी,
          और दूसरे हाथ में वह ख्वाब थामे 
          जो शुरू होने के पहले ही टूट गया, 1960 की अप्रैल में, 
          इस्ताम्बुल के बेयाजित चौराहे पर. 

एक लाश पड़ी हुई है, 
          बन्दूक से दागी गई, 
          गोली का एक जख्म 
          जैसे कोई लाल कारनेशन उसके माथे पर, 
          इस्ताम्बुल के बेयाजित चौराहे पर. 

एक लाश पड़ी रहेगी,
          बहता रहेगा उसका खून धरती पर, 
          जब तक उठ नहीं खड़ा होता मेरा वतन 
          और जबरन कब्जा नहीं कर लेता चौराहे पर 
          हथियारों और आजादी के तरानों के साथ. 
                                                                   मई 1960 
                    :: :: ::  

Thursday, July 28, 2011

नाजिम हिकमत : धंधा



आज फिर से नाजिम हिकमत की एक कविता...












धंधा : नाजिम हिकमत 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

जब सूरज की पहली किरणें पड़ती हैं मेरे बैल की सींगों पर, 
खेत जोत रहा होता हूँ मैं सब्र और शान के साथ. 
प्रेम से भरी और नम होती है धरती मेरे नंगे पांवों के तले. 

चमकती हैं मेरी बाहों की मछलियाँ, 
दोपहर तलक मैं पीटता हूँ लोहा -- 
लाल रंग का हो जाता है अन्धेरा. 

दोपहर की गरमी में तोड़ता हूँ जैतून, 
उसकी पत्तियाँ दुनिया में सबसे खूबसूरत हरे रंग की :
सर से पाँव तलक नहा उठता हूँ रोशनी में. 

हर शाम बिला नागा आता है कोई मेहमान,  
खुला रहता है मेरा दरवाज़ा 
                                        सारे गीतों के लिए.

रात में, मैं घुसता हूँ घुटनों तक पानी में, 
समुन्दर से बाहर खींचता हूँ जाल : 
मछलियाँ और सितारे उलझे हुए आपस में. 

इस तरह मैं जवाबदेह हूँ 
                                        दुनिया के हालात के लिए :
अवाम और धरती, अँधेरे और रोशनी के लिए. 

तो तुम देख सकती हो, मैं गले तक डूबा हुआ हूँ काम में,
खामोश रहो प्रिय, समझो तो सही 
बहुत मसरूफ़ हूँ तुम्हारे प्यार में. 
                    :: :: :: 

Wednesday, July 27, 2011

नाजिम हिकमत : ज़िंदगी तुम्हारे जैसी ही खूबसूरत होनी चाहिए

नाजिम हिकमत की 'रात 9 से 10 के बीच की कविताएँ' से कुछ और कविताएँ... 



रात 9 से 10 के बीच लिखी गई कविताएँ - 3 : नाजिम हिकमत 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

(पत्नी पिराए के लिए)

2 अक्टूबर 1945 

हवा बह रही है.
चेरी की एक ही डाली दुबारा कभी नहीं हिलाई जा सकती 
उसी हवा द्वारा. 
चिड़िया चहचहा रहीं हैं पेड़ों पर :
                                        उड़ान भरना चाहते हैं पंख. 
दरवाजा बंद है : 
                                        वह टूटकर खुल जाना चाहता है.
मैं तुम्हें चाहता हूँ :
ज़िंदगी तुम्हारे जैसी ही खूबसूरत होनी चाहिए 
                                        दोस्ताना और प्यारी...  
मुझे पता है कि अभी तक ख़त्म नहीं हुआ है गरीबी का जश्न 
                                        मगर वह ख़त्म हो जाएगा... 
                    :: :: :: 

5 अक्टूबर 1945 

हम दोनों जानते हैं, मेरी जान, 
उन्होंने सिखाया है हमें :
          कैसे रहा जाए भूखा और बर्दाश्त की जाए ठण्ड,
          कैसे मर जाया जाए थकान से चूर होकर 
          और कैसे बिछड़ जाया जाए एक-दूजे से. 
अभी तक हमें मजबूर नहीं किया गया है किसी का क़त्ल करने के वास्ते 
और खुद क़त्ल होने की नियति से भी बचे हुए हैं हम. 

हम दोनों जानते हैं, मेरी जान, 
उन्हें सिखा सकते हैं हम : 
          कैसे लड़ा जाए अपने लोगों के लिए 
          और कैसे -- दिन ब दिन थोड़ा और बेहतर 
                            थोड़ा और डूबकर -- 
                                                 किया जाए प्यार...   
                    :: :: :: 

6 अक्टूबर 1945 

बादल गुजरते हैं ख़बरों से लदे, बोझिल. 
अपनी मुट्ठी में भींच लेता हूँ वह चिट्ठी जो आई नहीं अभी तक. 
तुम्हारी पलकों की नोक पर टंगा है मेरा दिल, 
          दुआ देता हुआ उस धरती को जो गुम होती जा रही है बहुत दूर. 
मैं जोर से पुकारना चाहता हूँ तुम्हारा नाम : "पिराए, 
                                                                            पिराए !"
                    :: :: :: 

Friday, July 22, 2011

नाजिम हिकमत : तुम्हें याद करना खूबसूरत है

नाजिम हिकमत की 'रात 9 से 10 के बीच की कविताएँ' से कुछ कविताएँ आप यहाँ पहले पढ़ चुके हैं. आज उसी सिलसिले से कुछ और कविताएँ... 












रात 9 से 10 के बीच लिखी गई कविताएँ - 2 : नाजिम हिकमत 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

(पत्नी पिराए के लिए)

25 सितम्बर 1945 

नौ बज गए हैं. 
चौराहे का घंटाघर बजा रहा है गजर,
बंद ही होने वाले होंगे बैरक के दरवाजे. 
कैद कुछ ज्यादा ही लम्बी हो गई इस बार :
                                        आठ साल...
ज़िंदगी उम्मीद का ही दूसरा नाम है, मेरी जान.
ज़िंदा रहना भी, तुम्हें प्यार करने की तरह
संजीदा काम है.   
                    * * *

26 सितम्बर 1945 

उन्होंने हमें पकड़कर बंदी बना लिया,
मुझे चारदीवारी के भीतर,
और तुम्हें बाहर. 
मगर ये तो कुछ भी नहीं. 
इससे भी बुरा तो तब होता है 
जब लोग -- जाने या अनजाने -- 
अपने भीतर ही जेल लिए फिरते हैं... 
ज्यादर लोग ऎसी ही हालत में हैं,
ईमानदार, मेहनतकश, भले लोग 
जो उतना ही प्यार किए जाने के काबिल हैं,
जितना मैं तुम्हें करता हूँ. 
                    * * *  

30 सितम्बर 1945 

तुम्हें याद करना खूबसूरत है,
और उम्मीद देता है मुझे,
जैसे सबसे खूबसूरत गीत को सुनना 
दुनिया की सबसे मधुर आवाज़ में. 
मगर सिर्फ उम्मीद ही मेरे लिए काफी नहीं. 
अब गीत सुनते ही नहीं रहना चाहता मैं -- 
गाना चाहता हूँ उन्हें. 
                    * * * 

Tuesday, June 21, 2011

नाजिम हिकमत की दो कविताएँ


नाजिम हिकमत की दो कविताएँ... 


दुनिया का सबसे अजीब प्राणी 
 
तुम किसी बिच्छू की तरह हो, मेरे भाई,
बिच्छू की तरह 
रहते हो कायरता से भरे अँधेरे में.
तुम किसी गौरैया की तरह हो, मेरे भाई,
गौरैया की तरह 
हमेशा रहते हो हड़बड़ी में. 
तुम किसी सीपी की तरह हो, मेरे भाई,
सीपी की तरह बंद और संतुष्ट. 
और तुम डरावने हो, मेरे भाई,  
किसी सुप्त ज्वालामुखी की तरह डरावने.

एक नहीं,
पांच नहीं --
अफ़सोस की बात है कि लाखों की संख्या में हो तुम.
तुम किसी भेंड़ की तरह हो, मेरे भाई :
जब भेंड़ की खाल ओढ़े चरवाहा अपना डंडा उठाता है,
तुम झट से शामिल हो जाते हो झुण्ड में 
और लगभग गर्व से भरे दौड़ पड़ते हो बूचड़खाने की तरफ.
मेरा मतलब है कि तुम इस दुनिया के सबसे अजीब प्राणी हो --
मछली से भी ज्यादा अजीब 
जो पानी में होते हुए भी समुद्र को नहीं देख पाती.
और इस दुनिया में शोषण 
तुम्हारी ही वजह से है.
और अगर हम भूखे, थके, लहूलुहान हैं  
और पीसे जाते हैं जैसे शराब के लिए अंगूर,
यह तुम्हारी गलती है -- 
बहुत मुश्किल है मेरे लिए यह कहना,
मगर मेरे भाई, ज्यादा गलती तुम्हारी ही है. 
                                                                 1947 
                    :: :: :: 

आशावादी 

जब वह छोटा था तो उसने कभी नहीं नोचे मक्खियों के पर
न ही कभी टीन के डिब्बे बांधे बिल्लियों की पूंछ से,
माचिस की डिब्बियों में कभी नहीं बंद किया कीड़ों को,
न ही नष्ट किया कभी चींटियों की बांबी को. 
वह बड़ा हुआ तो 
ये सारी चीजें उसके साथ की गयीं. 
जब वह मृत्युशय्या पर था 
तो उसने मुझसे एक कविता सुनाने के लिए कहा,
सूरज और समुद्र के बारे में,  
परमाणु रिएक्टरों और सेटलाइटों के बारे में,
मानव जाति की महानतम उपलब्धियों के बारे में. 
                                                                 दिसंबर 1958 
                                                                                              बाकू 
                    :: :: :: 

(अनुवाद : मनोज पटेल) 

Friday, June 17, 2011

नाजिम हिकमत : मेरी पत्नी की चिट्ठी


नाजिम हिकमत की एक और बहुत अच्छी कविता...


मेरी पत्नी की चिट्ठी : नाजिम हिकमत 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

मैं 
तुमसे पहले मरना चाहती हूँ. 
क्या तुम्हें लगता है कि बाद में मरने वाला 
पा जाता है पहले मरने वाले को ?
मुझे तो ऐसा नहीं लगता. 
बेहतर होगा कि मुझे जला देना 
और रख देना अपने फायरप्लेस के ऊपर 
एक मर्तबान में. 
मर्तबान साफ़ शीशे वाला हो,
ताकि तुम देख सको मुझे भीतर...
देखो मेरी कुर्बानी :
मैनें छोड़ दिया धरती होना,
छोड़ दिया फूल होना, 
सिर्फ तुम्हारे पास बने रहने के लिए. 
और मैं राख हो गई 
तुम्हारे साथ रहने के लिए. 
फिर, जब तुम छोड़ना यह दुनिया, 
आ जाना मेरे मर्तबान में 
और हम उसमें रहेंगे साथ-साथ,
तुम्हारी राख रहेगी मेरी राख के साथ,
जब तक कि कोई नासमझ नववधू 
या कोई जिद्दी पोता 
हमें बाहर न फेंक दे...
मगर 
तब तक 
हम 
आपस में 
ऐसे मिल चुके होंगे 
कि कचरे में भी हमारे तमाम कण 
अगल-बगल ही पड़ेंगे. 
हम साथ-साथ डुबकी लगाएंगे धरती में. 
और अगर किसी दिन पानी पाकर कोई जंगली फूल 
फूट आता है धरती के उस टुकड़े से, 
तो उसकी डंठल में 
दो कलियाँ जरूर होंगी :
एक तुम होओगे 
और दूसरी मैं. 

मैं अभी 
मरने नहीं जा रही हूँ. 
अभी एक और बच्चा जनना चाहती हूँ. 
पूरी भरी हूँ मैं ज़िंदगी से 
और गर्म है मेरा खून. 
बहुत दिन ज़िंदा रहना है मुझे, बहुत दिन --
तुम्हारे साथ. 
मौत मुझे डराती नहीं, 
बस अपने क्रिया कर्म के इंतज़ाम 
मुझे कुछ सोहते नहीं. 
मगर मेरे मरने के पहले 
सबकुछ बदल सकता है. 
क्या तुम्हारे जेल से जल्दी निकलने की कोई गुंजाइश है ? 
मेरे भीतर कुछ है, जो कहता है :
शायद.
                                                                 18 फरवरी 1945 
                         :: :: :: 

Monday, June 13, 2011

नाजिम हिकमत : फिर से मृत्यु पर


नाजिम हिकमत की एक कविता... 


फिर से मृत्यु पर : नाजिम हिकमत 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

मेरी पत्नी,
जान मेरी ज़िंदगी की,
मेरी पिराए,
मैं सोच रहा हूँ मौत के बारे में,
यानी मेरी धमनियां 
सख्त हो रही हैं... 
किसी दिन 
जब बर्फ पड़ रही होगी,
या किसी रात 
या 
किसी गर्म दोपहर में,
हममें से कौन पहले मरेगा,
कैसे 
और कहाँ ?
कैसे 
और कौन सी होगी 
वह आखिरी आवाज़ जो वह मरने वाला सुनेगा,
कौन सा आखिरी रंग देखेगा वह,
यहाँ पीछे छूट जाने वाले की पहली हरकत क्या होगी, 
पहला लफ्ज़,
पहला आहार ?
क्या पता हम मरें एक-दूसरे से काफी दूर.
खबर 
चीखती हुई आएगी,
या बस इशारा करके चला जाएगा कोई 
यहाँ पीछे छूट गए को अकेला छोड़कर...    
और पीछे छूट गया वह अकेला 
गुम हो जाएगा भीड़ में.
मेरा मतलब है, यही ज़िंदगी है...
और यही सारी संभावनाएं, 
1900 के कौन से साल,
किस महीने,
किस दिन,
किस वक़्त ?

मेरी पत्नी,
जान मेरी ज़िंदगी की,
मेरी पिराए,
मैं सोच रहा हूँ मौत के बारे में,
अपनी जिंदगियों के बीतते जाने के बारे में.
मैं उदास हूँ,
शांत,
और गौरवान्वित.
जो भी पहले मरता है,
चाहे जैसे 
और चाहे जहाँ,
मैं और तुम 
कह सकते हैं कि
हमने प्रेम किया एक-दूजे से 
और प्रेम किया जनता के महानतम उद्देश्य से   
-- हम लड़े इसके लिए -- 
हम कह सकते हैं 
कि हम ज़िंदा रहे सचमुच. 
                    :: :: :: 
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