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Friday, April 12, 2013

चार्ल्स सिमिक की कविता

चार्ल्स सिमिक की एक और कविता... 

बेलग्रेड की इसी सड़क पर : चार्ल्स सिमिक 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

तुम्हारी माँ ले आई थीं तुम्हें 
एक इमारत के सुलगते खंडहरों से बाहर 
और नीचे रखा था तुम्हें इस फुटपाथ पर 
झुलसे हुए चिथड़ों में लिपटी किसी गुड़िया जैसी, 
सालों बाद, जहां तुम खड़ी हो इस वक़्त 
एक बेघर कुत्ते से बतियाते हुए, 
जो आधा छिपा है एक कार के पीछे, 
उम्मीद से लबालब उसकी आँखें 
जबकि धीमे-धीमे बढ़ता है वह आगे, 
तैयार बुरे से बुरे के लिए. 
               :: :: ::

Sunday, July 8, 2012

चार्ल्स सिमिक की कविता

चार्ल्स सिमिक की एक और कविता...   

 
चार्ल्स सिमिक की कविता 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मैं रांगे से कहता हूँ 
क्यों पड़ने दिया तुमने खुद को 
एक गोली के भीतर? 
क्या तुम भूल चुके हो कीमियागरों को? 
सोने में बदलने की 
छोड़ चुके हो उम्मीद? 

कोई जवाब नहीं देता. 
रांगा. गोली. 
इस तरह के नामों के साथ 
लम्बी और गहरी होती है नींद. 
          :: :: :: 

Thursday, June 7, 2012

चार्ल्स सिमिक : एक गुमशुदा चीज का ब्यौरा

चार्ल्स सिमिक की एक और कविता...  

 
एक गुमशुदा चीज का ब्यौरा : चार्ल्स सिमिक 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

कभी कोई नाम नहीं रहा उसका, 
न ही मुझे याद है कि वह मुझे कैसे मिली. 
खोई हुई बटन की तरह 
मैं उसे लिए रहता था अपनी जेब में 
गो कि बटन नहीं थी वह. 
डरावनी फ़िल्में, 
पूरी रात खुले रहने वाले जलपानघर, 
अँधेरे बार, 
और बारिश से चिकनी हुई सड़कों पर बने 
पूलहाल. 
एक सादी और मामूली मौजूदगी थी उसकी 
जैसे कोई परछाई सपने में, 
सुई पर कोई फ़रिश्ता, 
और फिर वह गायब हो गई. 
गुजरते रहे 
बेनाम स्टेशनों के साल दर साल, 
जब किसी ने बताया मुझे कि यही है वह!
और कितना नासमझ था मैं, 
कि उतर पड़ा एक उजाड़ प्लेटफार्म पर  
जहां दूर-दूर तक नामोनिशान नहीं था किसी कस्बे का.     
                    :: :: :: 

Thursday, May 24, 2012

चार्ल्स सिमिक : बंद गोभी

चार्ल्स सिमिक की एक और कविता...  

 
बंद गोभी : चार्ल्स सिमिक 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

वह काटने ही वाली थी 
गोभी को दो हिस्सों में 
मगर मैंने उसे फिर से सोचने पर मजबूर कर दिया 
यह बताकर कि:
"बंद गोभी प्रतीक होती है रहस्यमय प्रेम की."  

या कुछ ऐसा ही कहना था किसी चार्ल्स फूरियर का, 
जिसने ऎसी ही तमाम अजब अनोखी बातें कहीं थी, 
जिसकी वजह से लोग उसे पागल कहा करते थे उसके पीठ पीछे, 

उसके बाद मैंने 
बहुत आहिस्ता से चूम लिया उसकी गर्दन के पीछे, 

उसके बाद उसने गोभी को काट दिया दो हिस्सों में 
अपने चाकू के एक ही वार से.    
                    :: :: :: 

Monday, April 2, 2012

चार्ल्स सिमिक : कबाड़खाने में

चार्ल्स सिमिक की एक और  कविता...  

 
कबाड़खाने में : चार्ल्स सिमिक 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

छोटी सी एक टोकरी बेंत की 
बीते दिनों के उन  महान युद्धों के 
तमगों से भरी हुई  
जिन्हें अब कोई याद नहीं करता. 

मैनें पलटा एक तमगा 
उस पिन को छूने के लिए 
जो चुभी होगी कभी 
उस बाँकुरे की फूली हुई छाती में. 
                    :: :: :: 

Sunday, December 18, 2011

चार्ल्स सिमिक : मिट्टी के सिपाही

आज प्रस्तुत है चार्ल्स सिमिक की यह कविता...

 

बड़ी जंग : चार्ल्स सिमिक 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

हम जंग-जंग खेला करते थे जंग के दौरान, 
मार्गरेट. बड़ी पूछ थी सिपाही वाले खिलौनों की,
मिट्टी से बने सिपाहियों की. 
रांगे वाले खिलौने शायद पिघला दिए गए थे गोलियां बनाने के लिए. 

बहुत खूबसूरत लगती थी 
वह मिट्टी की पलटन. मैं फर्श पर पड़ा 
घंटों देखा करता था उनकी आँखों में. 
मुझे याद है कि वे भी मुझे ताका करते थे ताजुब्ब से भरे.  

कितना अजीब लगता रहा होगा उन्हें 
अकड़ कर सावधान खड़े रहना 
दूध से बनी मूंछों वाले 
एक बड़े और अबूझ प्राणी के सामने. 

समय के साथ वे टूट गए, या मैनें जानबूझकर तोड़ दिया उन्हें. 
तार था उनके अंगों, उनकी छातियों के भीतर,
मगर कुछ नहीं था खोपड़ी में !
मार्गरेट, मैनें जांची थी यह बात. 

कुछ भी नहीं था खोपड़ी में... 
सिर्फ एक बांह, एक ओहदेदार की बांह, 
कभी-कभार मेरी बहरी दादी की रसोई की फर्श के 
किसी छेद से तलवार चलाती हुई.  
                    :: :: :: 
manojpatel

Tuesday, December 13, 2011

चार्ल्स सिमिक : इतवार की तरह की खामोशी

चार्ल्स सिमिक की कुछ कविताएँ आप इस ब्लॉग पर पहले भी पढ़ चुके हैं, आज प्रस्तुत है एक और कविता... 



स्मृति की छोटी पिनें : चार्ल्स सिमिक 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

एक दूकान की धूल से अटी खिड़की में 
एक पुतले पर पिनों की मदद से पहनाया हुआ था 
इतवार को पहनकर घूमने लायक बच्चे का एक सूट. 
वर्षों से बंद लग रही थी दूकान. 

एक बार मैं अपना रास्ता भूल गया था वहां 
इतवार की तरह की एक खामोशी में, 
इतवार जैसी ही दोपहर की रोशनी थी 
लाल ईंट वाले मकानों की सड़क पर. 

कैसा लगा तुम्हें वह?
मैनें यूं ही कहा.
कैसा लगा तुम्हें वह?
आज फिर मैं यह बोला नींद खुलते ही. 

अनन्त तक चली जा रही थी वह सड़क 
और रास्ते भर मैं महसूस करता रहा पिनों को 
अपनी पीठ पर चुभते हुए 
मोटे चटक कपड़े के आर-पार. 
                    :: :: :: 
Manoj Patel 

Wednesday, April 20, 2011

चार्ल्स सिमिक की कविताएँ


( 1938 में बेलग्रेड में जन्मे चार्ल्स सिमिक ने कविताओं के अलावा संस्मरण और निबंध भी लिखे हैं. कई अनुवाद भी प्रकाशित. पेरिस रिव्यू के कविता सम्पादक के रूप में कार्य करने के अतिरिक्त वे जाज़, कला और दर्शन जैसे विषयों पर भी कलम चलाते रहे हैं. अन्य पुरस्कारों के साथ ही वे 1990 में पुलित्ज़र पुरस्कार से भी सम्मानित किए जा चुके हैं. प्रस्तुत हैं उनकी कविताएँ  - Padhte Padhte )











कुछ अज्ञेय 
क्या वह ताजी सिंकी ब्रेड की सुगंध में थी 
सड़क पर मुझसे मिलने चली आई थी जो ?
या अर्ध-निर्लिप्त नेत्रों वाली उस लड़की के चेहरे में 
अपनी सफ़ेद ड्रेस ले जा रही थी जो धुलाई वाले के यहाँ से ?

जलकर काले पड़े उस मकान का दृश्य था 
जहां गया था मैं काम की तलाश में कभी ?
पर्चियां बाँट रहा वह बिना दांतों वाल वृद्ध था 
धंधा समेट रहे एक वस्त्र भण्डार के बारे में ?

या  बच्चा गाड़ी धकेलती वह औरत थी 
ओझल होती हुई मोड़ पर, जिसके पीछे भागा था मैं ?
मानो उस गाड़ी में सोया बच्चा परिचित रहा हो मेरा,
और इस व्यस्त सड़क पर अकेला पाया हो उसने मुझे

समझ नहीं पाता ठीक-ठीक, महसूस होता है ऐसे इंसान की तरह 
लम्बी बीमारी से उठकर निकला हो जो पहली बार,
दुनिया को देखता है अपने दिल से 
और फिर वापस भागता है घर को अपने अनुभव भुलाने के लिए.     
                                   * *

तरबूज 
फलों के ठेले पर धरे हुए 
हरे बुद्ध 
हम खाते हैं हँसी 
और थूक देते हैं दांत.
                                  * *

दिसम्बर 
गिर रही है बर्फ 
और घूम रहे हैं बेघर बंजारे 
कन्धों से लटकाए हुए 
विज्ञापन पट 

एक दुनिया के खात्मे का 
एलान करता हुआ 
और दूसरा स्थानीय नाई की दूकान की दरों का. 
                                  * *

सबसे महत्वपूर्ण पल 
लाचार होता है एक चींटा 
सर पर आ खड़े एक जूते के विरुद्ध,
और बस एक पल होता है उसके पास 
इक्का-दुक्का रोशन ख्यालों के लिए, 
काला जूता चमकता हुआ 
वह देख सकता है इसमें 
अपना विरूपित अक्स, 
शायद बढ़ा हुआ 
एक भीमकाय डरावने चींटे के रूप में 
हिलाता हुआ अपने हाथ-पैर 
धमकाने के अंदाज में ?

जूता हिचकिचा रहा हो शायद 
कुछ देर कुछ शक करता हुआ,
जाले बटोरता,
या ओस ? 
हाँ, और जाहिरन न. 
                                     * *

(अनुवाद : मनोज पटेल)
Charles Simic Poems in Hindi Translation 
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