माइकल आगस्तीन के कुछ हाइकू...
माइकल आगस्तीन के कुछ हाइकू
(अनुवाद : मनोज पटेल)
हाइकू पुलिस. मैं जो हूँ
सो हूँ, कहता है हाइकू.
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टहल रहा है जंगल में.
रोको उसे--पेड़ों को बचाओ!
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बहुत सुबह जागकर
ईर्ष्यापूर्वक मैं देखता हूँ
खर्राटे मार रही अपनी तकिया को
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हमेशा के लिए मिट चुके हैं
दोनों टावर -- मगर गिद्ध
अब भी मंडराते हैं उनके इर्द-गिर्द.
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डालियों में
अटक जाने की वजह से, सूरज को
चमकना पड़ा सारी रात.
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सोफे पर अलसाया बैठा
वह कहता है अपने जूतों से
थोड़ा टहल आने के लिए.
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