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Thursday, March 14, 2013

माइकल आगस्तीन के कुछ हाइकू


माइकल आगस्तीन के कुछ हाइकू... 

माइकल आगस्तीन के कुछ हाइकू  
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

तुम हाइकू नहीं हो! कहती है 
हाइकू पुलिस. मैं जो हूँ 
सो हूँ, कहता है हाइकू. 
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बेस्टसेलिंग लेखक 
टहल रहा है जंगल में. 
रोको उसे--पेड़ों को बचाओ! 
:: :: :: 

बहुत सुबह जागकर 
ईर्ष्यापूर्वक मैं देखता हूँ 
खर्राटे मार रही अपनी तकिया को 
:: :: :: 

हमेशा के लिए मिट चुके हैं 
दोनों टावर -- मगर गिद्ध 
अब भी मंडराते हैं उनके इर्द-गिर्द. 
:: :: :: 

डालियों में 
अटक जाने की वजह से, सूरज को 
चमकना पड़ा सारी रात. 
:: :: :: 

सोफे पर अलसाया बैठा 
वह कहता है अपने जूतों से 
थोड़ा टहल आने के लिए. 
:: :: :: 

Monday, February 25, 2013

माइकल आगस्तीन की दो कविताएँ

माइकल आगस्तीन (1953) की दो कविताएँ...  








माइकल आगस्तीन की दो कविताएँ 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

शहर का बाहरी हिस्सा, शाम लगभग 7:00 बजे 

शादीशुदा जोड़े 
सिटकिनी लगाकर बंद कर लेते हैं 
अपने अलग-थलग खड़े घरों को. 

बाहर 
धुंधलाई शाम में 
घात लगाए बैठे हैं तलाक के वकील. 
                  :: :: :: 

समुद्र में समाधि 

हवा के एक झोंके ने  
पलट दिया है नाव को. 
डूब गया है 
मातम करने वालों का पूरा झुण्ड. 

सिर्फ अस्थिकलश 
तैर रहा है. 
                  :: :: :: 

Saturday, February 16, 2013

माइकल आगस्तीन : इंटरसिटी

माइकल आगस्तीन (1953) की एक लघुनाटिका...   














इंटरसिटी : माइकल आगस्तीन 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

समय : 20 मिनट विलम्ब से 
स्थान : बाज़िल और फ्रैंकफर्ट के बीच 

ट्रेन के एक डिब्बे में दो महानुभाव बैठे हुए हैं. कम उम्र वाला शख्स एक किताब में डूबा हुआ है. अधिक उम्र वाला व्यक्ति खिड़की के बाहर देखता है 

अधिक उम्र वाला  काश तुम्हें पता होता कि तुम कितना कुछ गँवा रहे हो! 

कम उम्र वाला  खलल से खीझते हुए  क्या मतलब है आपका? 

अधिक उम्र वाला  वह सब जो तुम गँवा रहे हो! अगर तुम्हें एहसास होता! 

कम उम्र वाला  मैं पढ़ रहा हूँ. 

अधिक उम्र वाला  बिल्कुल ठीक! और साथ ही साथ तुम वास्तविकता का बहुत कुछ गँवा भी रहे हो. 

कम उम्र वाला  बकवास! 

अधिक उम्र वाला  उकसाता हुआ  तुम्हारी किताब में ऐसा क्या ख़ास है, ज़रा बताओ तो? 

कम उम्र वाला  यह ट्रेन के एक डिब्बे में बैठे दो लोगों की कहानी है जिनमें से एक नौजवान है और दूसरा बुजुर्ग. नौजवान आदमी एक किताब पढ़ता होता है कि तभी खिड़की से बाहर देखता अधिक उम्र वाला व्यक्ति यह दावा करता है कि वह वास्तविकता का बहुत कुछ गँवा रहा है. इस पर कम उम्र वाला किताब की कहानी को संक्षेप में बुजुर्गवार को सुनाता है जो क्रोधित होकर चिल्लाते हैं: तुमने मुझे बेवकूफ समझ रखा है क्या! 

अधिक उम्र वाला  क्रोधित होकर  तुमने मुझे बेवकूफ समझ रखा है क्या! 

 कम उम्र वाला   बिना विचलित हुए  एक मिनट, एक मिनट -- उसके बाद इसमें लिखा हुआ है कि इसके पहले कि कम उम्र वाला अपनी किताब फिर से पढ़ना शुरू कर पाता, अचानक पर्दा गिरता है...    

अचानक 
                                                              पर्दा गिरता है 
                                                                   :: :: ::

Tuesday, January 29, 2013

माइकल आगस्तीन की कविताएँ


जर्मन कवि माइकल आगस्तीन (1953) रेडियो रेमेन के लिए एक पाक्षिक कविता कार्यक्रम की मेजबानी और साप्ताहिक रेडियो डाक्यूमेंट्री का सम्पादन करते हैं. उनकी कविताएँ तथा रेखाचित्र दुनिया भर की कई साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं और कई कविता संग्रहों के साथ-साथ उनकी कई आडियो बुक्स भी प्रकाशित हो चुकी हैं. उनकी किताबों के अनुवाद अर्जेंटीना, पोलैंड, आयरलैण्ड, इंग्लैण्ड, इटली और ग्रीस में प्रकाशित हो चुके हैं. वे खुद भी कविताओं तथा नाटकों के अनुवाद में सक्रिय रहे हैं तथा कई अंतर्राष्ट्रीय कविता महोत्सवों में कविता पाठ कर चुके हैं. 1984 में आयोवा विश्वविद्यालय के अंतर्राष्ट्रीय लेखन कार्यक्रम के सदस्य रहे आगस्तीन को कई पुरस्कारों से भी नवाजा जा चुका है. फिलहाल वे रेमेन में अपनी पत्नी सुजाता भट्ट और पुत्री जेनी के साथ रहते हैं. उनकी कवयित्री पत्नी सुजाता भट्ट भारतीय मूल की हैं और उनकी कविताओं, लघु कथाओं तथा लघु नाटिकाओं का अंग्रेजी अनुवाद उन्होंने ही किया है जो 'Mickle makes Muckle' के नाम से प्रकाशित है. 

आगस्तीन की कविता, 'कविताओं के बारे में कुछ सवाल' से कुछ अंश आप इस ब्लॉग पर पहले पढ़ चुके हैं. आज प्रस्तुत है इनकी दूसरी क़िस्त. आपसे यह बताते हुए भी बड़ी प्रसन्नता हो रही है कि कवि आगस्तीन ने इस नाचीज को अपनी कविताओं, लघुकथाओं तथा लघु नाटिकाओं के अनुवाद की अनुमति प्रदान कर दी है. 













कविताओं के बारे में कुछ सवाल : माइकल आगस्तीन 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

कौन से शब्द 
आज तक 
नजर नहीं आए हैं 
किसी कविता में? 
 :: :: ::

अगर 
कोई कविता-संग्रह 
रखा जाए तराजू पर 
और वह वजन बताए 300 ग्राम, 
तो यह वजन 
कागज़ का होगा 
या कविताओं का?
 :: :: ::

क्या उड़ जाती हैं कविताएँ 
अगर खुली छोड़ दी जाए किताब 
लंबे समय तक? 
 :: :: ::

क्या कविताएँ इन्कार कर सकती हैं 
गवाही देने से? 
 :: :: ::

कौन सी चीज याद रखती हैं 
यादगार कविताएँ? 
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क्या डूबते हुए लोगों को 
फेंक कर पकड़ानी चाहिए कविताएँ? 
 :: :: ::

क्या संकटग्रस्त इलाकों में 
तैनात किया जाना चाहिए 
कविताओं को? 
 :: :: ::

Monday, January 21, 2013

माइकल आगस्तीन : बूट स्ट्रेचर

जर्मन कवि माइकल आगस्तीन (1953) की 'कविताओं के बारे में कुछ सवाल' की पहली क़िस्त आप यहाँ पढ़ चुके हैं. उसकी अगली क़िस्त के पहले उनकी यह युद्ध विरोधी कविता...  


बूट स्ट्रेचर : माइकल आगस्तीन 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

और वह जूता, जिसे फैलाया गया था एक सांचे से? 
क्या हुआ उसके साथ? 
अच्छा, वह पड़ा हुआ है आवश्तेथ की 
समर भूमि पर, वहीं पड़ा हुआ है वह 
आवश्तेथ में. 
और वह पैर, जो अटका हुआ था उस जूते में, 
जिसे फैलाया गया था एक सांचे से, 
कहाँ है वह पैर? 
अभी तक अटका हुआ उसी जूते में 
जो पड़ा हुआ है आवश्तेथ की समर भूमि पर, 
वहीं अटका हुआ है वह पैर. 
और वह इंसान कहाँ है 
जिसका पैर अटका हुआ है उस जूते में 
जिसे फैलाया गया था एक सांचे से, 
और जो अब भी पड़ा हुआ है 
आवश्तेथ की समर भूमि पर? 
वह धरती के नीचे है 
जहाँ पास में ही पैदा होते हैं शलजम. 
वहां अटका हुआ है वह इंसान! 
(और वह सिर्फ एक जूता पहने हुए है.) 
                 :: :: :: 
बूट स्ट्रेचर : जूतों को सही आकार में रखने या उन्हें फैलाने के लिए उनके अंदर रखा जाने वाला एक उपकरण. 

Wednesday, January 16, 2013

माइकल आगस्तीन : कविताओं के बारे में कुछ सवाल

आज मिलते हैं जर्मन कवि माइकल आगस्तीन (1954) से. आगस्तीन ने कविताओं के बारे में कुछ सवाल' उठाए हैं. ये सवाल बड़े मौजूं हैं और फिलहाल यहाँ उनकी पहली क़िस्त प्रस्तुत की जा रही है. जर्मन से अंग्रेजी अनुवाद उनकी पत्नी, भारतीय कवयित्री सुजाता भट्ट ने किया है... 
कविताओं के बारे में कुछ सवाल : माइकल आगस्तीन 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

कितनी लागत आती है 
एक कविता को 
पैदा करने में? 
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कौन सी कविता 
अपने रचयिता के बारे में ज्यादा बताती है: 
उसकी पहली या उसकी आखिरी कविता? 
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प्रति माह कितनी कविताओं की जरूरत पड़ती है 
चार लोगों के 
एक औसत परिवार को 
गुजारा चलाने के लिए? 
 :: :: :: 

क्या होता है 
कविता का 
विलोम? 
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क्या कविताएँ 
जान फूंक सकती हैं मुर्दों में? 
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क्या स्व-परागण से 
फलती-फूलती हैं फूलों से सम्बंधित कविताएँ 
या उन्हें जरूरत पड़ती है हमेशा 
भौरों से सम्बंधित किसी कविता की? 
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क्या प्रेम कविताएँ 
बंधी होती हैं किसी एक से 
या अंतरणीय होती हैं वे? 
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कितने दिन 
ज़िंदा रह सकता है 
कोई इंसान 
कविताओं के बिना? 
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