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Sunday, October 2, 2011

सर्गोन बोउलुस : युद्ध की सन्तान

आज सर्गोन बोउलुस की एक और कविता...













युद्ध की सन्तान : सर्गोन बोउलुस
(अनुवाद : मनोज पटेल)

(एक इराकी बच्ची के लिए जो युद्ध के दौरान पैदा हुई 
और मर गई)

वह बच्ची आई 
जो लापता हो गई थी युद्ध में 
गलियारे के आखिरी सिरे पर खड़ी थी वह 
एक मोमबत्ती लिए हुए 
वह मुझे दिखती है  
हर सुबह जागते ही 
इंतज़ार करती होती है 
यथार्थ की दीवार से मेरे टकराने का.

समझदारी के आतंक से फैली हुई 
उसकी आँखों में धीरज है, 
पहाड़ी कांटेदार झाड़ियों के बीच 
जहां मेरे ख़याल भटकते हैं रात में 
मेरे हाथ तोड़ सकते हैं उसकी बेड़ियाँ 
मेरी आवाज़ खड़े कर सकती है सवाल, 
हत्यारे या फिर खुदा के प्रति, 
सवाल जिनके जवाब उस बच्ची को मालूम हैं...

कितने दिनों से चल रहा है यह युद्ध, बेटी ?
कितनी रातें बीत चुकी हैं, किस कुँए के तल पर ?
दुख का कितना अनंतकाल, कितनी दिशाओं से ?
चार सितारा जनरल ने क्या किया होता अगर उन्होंने 
उसकी बच्ची को एक भी दिन दूध से वंचित रखा होता ?

बच्ची कहती है :
वे एक जहाज पर लेते गए मेरे परिवार को 
दूसरी दुनिया की तरफ 
मुझे पता था कि वे मुझे छोड़ जाएंगे 
अकेला, इस तट पर 
मुझे पता था...
                    :: :: :: 
Manoj Patel Translations, Manoj Patel Blog 

Thursday, July 28, 2011

सर्गोन बोउलुस की दो कविताएँ


इराक़ी कवि सर्गोन बोउलुस की यह दो कविताएँ भी देखें... 


यह वह मालिक है जो..

यह 
वह मालिक है जो 
अमेरिका से आया है 
दज़ला 
और फ़रात नदियों 
का 
पानी पीने के लिए.

यह 
बहुत प्यासा मालिक है 
जो पी जाएगा 
हमारे कुओं का 
सारा तेल,
और 
जहरीला कर देगा 
हमारी सारी नदियों को.

यह 
बहुत भूखा मालिक है 
जो लील जाएगा 
हमारे 
बच्चों को,
हजारों हजार की 
तादाद में.

यह 
वह मालिक है जो 
आया है 
दज़ला 
और फ़रात नदियों से 
खून पीने के लिए.  
                 :: :: :: 

रोशनदान 

अगर तुम रोशनदान 
नहीं खोलोगे, कबूतर नहीं आएगा 
तुम्हारे कमरे में.
पानी नहीं जानता 
हालिया सूखे की 
वजहों को,
पानी की इफरात के 
तमाम सबूतों के बावजूद 
दरारें 
पड़ी हुई हैं 
पृथ्वी पर. 
खामोशी एक खोल है 
जो तब तक नहीं खोलेगी खुद को 
जब तक कि तुम्हें नहीं पता होगा 
गुलाब कैसे खिलता या मुरझाता है.
मेज पर एक कलम,
एक कापी जो लेखक की खोपड़ी में 
फड़फड़ाती और खुलती है 
किसी गीशा के पंखे की तरह; 
और कविता 
गुम हो सकती है 
अगर तुम नहीं पा जाते अदृश्य धागा. 
और किस्सागो 
शायद कभी न जान पाए 
क्या कुछ कह सकती है 
कहानी. 
                 :: :: :: 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

Wednesday, June 22, 2011

सर्गोन बोउलुस : चिट्ठी मिली


सर्गोन बोउलुस की एक और कविता...


चिट्ठी मिली : सर्गोन बोउलुस 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

तुमने बताया 
कि तुम्हारे लिखते समय 
बम बरस रहे हैं,
छतों के इतिहास 
और मकानों के नामोनिशान मिटाते हुए. 

तुमने कहा :
मैं तुम्हें यह चिट्ठी लिख रहा हूँ 
जबकि उन्हें ख़ुदा ने इजाज़त दे रखी है 
मेरी तक़दीर लिखने की ;
इसी बात पर मुझे शंका होती है उसके ख़ुदा होने में. 

तुमने लिखा :
मेरे शब्द, गोलियों की बरसात से डराए जा रहे प्राणी हैं. 
इनके बिना मैं ज़िंदा नहीं रह पाऊंगा. 

"उनके" चले जाने के बाद, मैं उन्हें फिर से पा लूंगा 
उनकी सारी पवित्रता के साथ जैसे मेरी सफ़ेद पलंग 
वहशियों की अंधेरी रात में. 

हर रात, मैं चौकस रहता हूँ अपनी कविता में सुबह तलक. 

फिर तुमने कहा :
मुझे एक पहाड़ की जरूरत है, एक शरण स्थल की. मुझे दूसरे इंसानों की जरूरत है.

और तुमने चिट्ठी भेज दिया. 
                    :: :: :: 

Sunday, June 19, 2011

सर्गोन बोउलुस : आखिर चाहती क्या है लाश


इराकी कवि सर्गोन बोउलुस का परिचय और उनकी एक कविता आप इस ब्लॉग पर पहले ही पढ़ चुके हैं. आज उनकी एक और कविता...  


लाश : सर्गोन बोउलुस 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

वे यातना देते रहे लाश को 
सुबह तक 
जब तक कि मुर्गा विरोध में उठ खड़ा नहीं हो गया. 
उन्होंने कीलें ठोकीं उसकी देंह में.
बिजली के तारों के कोड़े मारे 
और लटकाए रखा उसे पंखे से. 

आखिरकार जब 
थक कर सुस्ताने लगे यातना देने वाले, 
लाश ने अपनी छोटी उंगली हिलाई,
और अपनी जख्मी आँखों को खोलकर 
धीरे से कुछ कहा. 

क्या वह पानी मांग रही थी ?
या शायद रोटी ?
वह उन्हें बुरा-भला कह रही थी 
या और सताने के लिए ?

आखिर चाहती क्या है लाश ?
                    :: :: :: 

Monday, June 13, 2011

सर्गोन बोउलुस : एक पुड़िया मिट्टी


ईराकी असीरियाई कवि सर्गोन बोउलुस (1944 - 2007) का जन्म पश्चिमी ईराक के गाँव हब्बानिया में हुआ था. उन्होंने कम उम्र में ही कविताएँ लिखना शुरू कर दिया था और 1961 में उनकी सोलह कविताएँ बेरूत की एक प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित हुईं और बताते हैं वे बगैर पासपोर्ट, बगैर एक भी दीनार लिए पैदल ही बेरुत के लिए चल पड़े. उनके पास और कुछ नहीं सिर्फ शेक्सपियर के किंग लीयर का एक अनुवाद था. जैसे-तैसे वे लेबनान पहुंचे जहां कुछ समय बाद उन्हें कोई कागजात न होने के कारण गिरफ्तार कर लिया गया. वे इस शर्त पर रिहा किए गए कि उन्हें बेरुत छोड़ना होगा. रिहा होने के बाद 1968 में वे अमेरिका चले गए. 2007 में उनका निधन हो गया.   


एक पुड़िया मिट्टी : सर्गोन बोउलुस 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

हार जैसी दिखने वाली कोई चीज 
जो भविष्यवक्ता 
उम मुहम्मद नाम की स्त्री की 
पतली गरदन से झूलती रहती है 
और कुछ नहीं 
बस काले चमड़े की एक छोटी सी पुड़िया है. 

उसने बताया 
कि पुड़िया में 
उसकी मातृभूमि की थोड़ी सी मिट्टी है. 
वह  अम्मान के 
हशीमिया चौराहे की 
एक पत्थर की बेंच पर बैठी थी,
हजारों अन्य लोगों की तरह 
किसी भी देश के 
वीजा के इंतज़ार में. 

उसने कहा कि 
उसे पता है सरहद पार करने के बाद 
दुबारा इस मिट्टी को देखना 
उसके नसीब में नहीं होगा. 

इसलिए इसे ढोएगी वह 
एक जुए की तरह 
जहां भी वह जाए.
जहां भी वह जाए  
अपने साथ लिए रहेगी वह 
मिट्टी की काली पुड़िया.  
                    :: :: :: 
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