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Tuesday, July 2, 2013

राबर्तो हुआरोज़ की कविता

राबर्तो हुआरोज़ की एक और कविता... 

राबर्तो हुआरोज़ की कविता  
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

खामोशी गिरती है पेड़ों से 
जैसे सफ़ेद फल, 
किसी दूसरी रोशनी की चमड़ी तले पके हुए. 

धीरे-धीरे खामोशी जमा होती जाती है जमीन पर 
और सड़क को मिटा देती है आखिरकार. 
खामोशी मिटा देती है सारी सड़कों को, 
उसी तरह जैसे रात मिटाती है, या बर्फ़. 

इसी तरह ओझल होते हैं आदि एवं अंत, 
आगमन एवं प्रस्थान, 
जो एकमेक हो जाते हैं एक इकलौते निशान में. 

खामोशी में 
एक जैसी होती हैं सारी अतियां. 
                  :: :: :: 

Tuesday, May 7, 2013

राबर्तो हुआरोज़ की कविता


राबर्तो हुआरोज़ की कविताओं के क्रम में एक और कविता... 

राबर्तो हुआरोज़ की कविता 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मैं पलटता हूँ तुम्हारी तरफ, 
बिस्तर में या जीवन में, 
और पाता हूँ कि पगली हो तुम. 

उसके बाद पलटता हूँ अपनी तरफ 
और पाता हूँ वही हाल. 

इसलिए 
भले ही हम पसंद करते हैं सयानेपन को, 
आखिरकार एक बक्से में बंद कर देते हैं हम उसे, 
ताकि अब और न आ पाए वह इस पागलपन के रास्ते 
जिसके बिना हम चल नहीं सकते साथ-साथ. 
                                         (लारा के लिए फिर से, जब हम एक-दूसरे के पास आते जा रहे हैं.) 
                             :: :: ::

Wednesday, April 17, 2013

राबर्तो हुआरोज़ की कविता

राबर्तो हुआरोज़ की 'वर्टिकल पोएट्री' से एक और कविता... 

राबर्तो हुआरोज़ की कविता 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

चीजें नक़ल उतारती हैं हमारी. 
हवा की गिरफ़्त में आया एक कागज़ 
पेश आता है किसी गिरते-पड़ते इंसान की तरह. 
आवाजें सीख जाती हैं बतियाना हमारे समान. 
हमारा आकार ग्रहण कर लेते हैं कपड़े. 

चीजें नक़ल उतारती हैं हमारी 
मगर हमारा अंत होगा 
उनकी नक़ल उतारते हुए. 
                :: :: :: 
राबर्तो ख़्वारोज़ राबर्तो ख्वारोज़ 

Friday, June 22, 2012

राबर्तो हुआरोज : गुलाब, प्यार और कविता

राबर्तो हुआरोज की एक और कविता...   

 
राबर्तो हुआरोज की कविता 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

यदि यह एक है, 
तो दो क्या होगा? 

महज एक धन एक ही नहीं है यह.  
कभी-कभी यह दो होता है 
एक बने रहते हुए भी. 
वैसे ही जैसे कभी-कभी एक 
बंद नहीं करता दो होना. 

साफ़ नहीं है यथार्थ का लेखा-जोखा 
या कम से कम परिणामों का 
हमारा वाचन. 
इसलिए हमसे छूट जाता है 
जो बीच में रहता है एक और एक के, 
जो बस भीतर होता है एक के 
छूट जाता है हमसे, 
जो होता है ऋण एक में 
छूट जाता हमसे, 
शून्य छूट जाता है हमसे 
जो हमेशा बाहर निकल जाता है या 
साथ रहता है किसी एक और किसी दो के. 

गुलाब -- क्या यह एक है? 
प्यार -- क्या यह दो है? 
कविता -- क्या यह कुछ है दोनों में से? 
               :: :: :: 

Thursday, May 31, 2012

राबर्तो हुआरोज़ : नाम

राबर्तो हुआरोज़ की एक और कविता...  

 
राबर्तो हुआरोज़ की कविता 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

नाम चीजों को निर्दिष्ट नहीं करते: 
वे उन्हें ढँक लेते हैं, गला घोंट देते हैं उनका. 

मगर चीजें तोड़ देती हैं 
अपने शब्दावरण 
और फिर से खड़ी हो जाती हैं वहां, नग्न,  
नाम से कुछ अधिक के इंतज़ार में. 

सिर्फ किसी चीज की अपनी आवाज़ ही 
बता सकती है उसके बारे में, 
आवाज़, जिसका पता न तो उस चीज को होता है न ही हमें, 
इस तटस्थता में, जो शायद ही कभी बोलती है, 
यह विपुल मौन जहां दम तोडती हैं लहरें.  
                    :: :: :: 

Saturday, April 21, 2012

राबर्तो हुआरोज़ : क्या गुलाब को लौटा देनी चाहिए अपनी पंखुड़ियाँ

राबर्तो हुआरोज़ की 'वर्टिकल पोएट्री' के सिलसिले से एक और कविता... 

 
राबर्तो हुआरोज़ की कविता 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

क्या गुलाब को लौटा देनी चाहिए अपनी पंखुड़ियाँ? 
मनुष्य को वापस कर देने चाहिए अपने प्यार?
कवि को लौटा देना चाहिए अपने शब्दों को? 
दुनिया को लौटा देने चाहिए अपने रूपाकार? 

किसने उधारी पर दिया हमें इन सारी चीजों को? 
भले ही हम नहीं जानते, 
शायद हमारी भूमिका 
उन्हें फिर से उधार दे देने की है, 
एक अनिश्चित चक्र में 
इस उधारी को घुमाते रहने की : 
पंखुड़ियों, प्यार, शब्दों और रूपाकारों को. 

उधार लेना और कभी वापस न करना, 
क्योंकि जान पड़ता है कोई है ही नहीं 
जिसे हम लौटा सकें कोई चीज.  
                    :: :: :: 

Wednesday, April 11, 2012

राबर्तो हुआरोज़ की कविता

राबर्तो हुआरोज़ की एक और कविता...   

 
राबर्तो हुआरोज़ की कविता 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

एक लमहा आता है हमेशा 
जब तुम्हें सुस्ताना होता है आदमियों से 
जैसे गुलाब सुस्ताता है माली से 
या गुलाब से सुस्ताती है फुलवारी.  

जैसे पानी सुस्ताता है पानी से 
या आकाश से आकाश. 

जैसे कोई जूता सुस्ताता है अपने पैर से 
या उद्धारक अपनी सलीब से. 

जैसे रचयिता सुस्ताता है अपनी रचना से 
या अपने रचयिता से सुस्ताती है रचना. 
                    :: :: :: 

Wednesday, March 28, 2012

राबर्तो हुआरोज़ : पोर्चिया की स्मृति में

आज प्रस्तुत है एंतोनियो पोर्चिया की स्मृति में लिखी गई राबर्तो हुआरोज़ की 'एलेवेंथ वर्टिकल पोएट्री' में संकलित यह कविता...   

 
राबर्तो हुआरोज़ की कविता 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

हर कविता हमें मजबूर करती है पिछली कविता को भूलने के लिए, 
मिटा देती है सारी कविताओं का इतिहास, 
मिटा देती है अपना इतिहास 
और यहाँ तक कि मनुष्य का इतिहास भी 
शब्दों का एक चेहरा हासिल करने के लिए 
जिसे मिटा न पाए रसातल.  

कविता का हर शब्द भी 
हमें मजबूर करता है पिछले शब्द को भूलने के लिए, 
भाषा के बहुरूपी संदूक से 
काट देता है एक पल को 
और उसके बाद पुनः भिड़ता है दूसरे शब्दों से 
एक अन्य भाषा के उदघाटन की 
अनिवार्य रस्म को पूरा करने के लिए. 

और कविता की हर खामोशी भी 
कविता के इस महान विस्मरण में  
हमें मजबूर करती है पिछली खामोशी को भूलने के लिए 
और तब तक सिमटती जाती है शब्द दर शब्द, 
जब तक कि दुबारा उभरकर वह ढँक नहीं लेती कविता को 
किसी सुरक्षा लबादे की तरह 
जो बचाए रहता है उसे किसी अन्य कथन से. 

यह अजीब नहीं है. 
गहराई से देखें तो, 
हर व्यक्ति हमें मजबूर करता है पिछले व्यक्ति को भूलने के लिए, 
मजबूर करता है सभी अन्य व्यक्तियों को भूल जाने के लिए. 

अगर कोई चीज दुबारा वही नहीं रहती, 
तो सभी चीजें अंतिम हैं. 
अगर कोई चीज दुबारा वही नहीं रहती, 
तो सभी चीजें पहली हैं. 
                                                    (एंतोनियो पोर्चिया की अमिट स्मृति में) 
                    :: :: ::

Friday, March 16, 2012

पोर्चिया की सोहबत में हुआरोज़

पोर्चिया पर राबर्तो हुआरोज़ का यह छोटा सा संस्मरण पढ़िए जो उन्होंने पोर्चिया की किताब Voices के फ्रेंच संस्करण के लिए लिखा था:  

 
किसी की सोहबत में होना : राबर्तो हुआरोज़ 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

मुझे उनके कुछ शब्द याद हैं जो उन्होंने एक दोपहर ला बोका की सड़कों पर घूमते हुए मुझसे कहे थे. यह ब्यूनस आयर्स के निर्धनतम इलाकों में से एक और उनका पसंदीदा मुहल्ला था, रंग-बिरंगे मकानों, परदेशी माहौल, पास में ही बहती नदी, जहाज़ों के सायरन और पुराने शराबघरों वाला एक इलाका जहां नाविक और गोदी के मजदूर शराब और संगीत के साथ न जाने क्या-क्या याद करने या भुलाने आया करते थे. पोर्चिया अस्पताल से लौट रहे थे, अपने एक पुराने प्यार से मिलकर जो अब बूढ़ी, बीमार और अकेली अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी थी. उन्होंने मुझे वह 'सूक्ति' सुनाई जिसे सुनाकर उन्होंने उस स्त्री को खुश करने की कोशिश की थी: 

किसी की  सोहबत में होना किसी के साथ होना नहीं होता, 
किसी के भीतर होना होता है.  

अचानक मुझे लगा --जैसा कि मुझे अक्सर उनके साथ होने पर महसूस होता था-- कि विवेक अभी पूरी तरह से मृत नहीं हुआ है, और यह कि ब्यूनस आयर्स की उस विस्मृत सी सड़क पर कोई रहस्यमय शक्ति मौजूद है जिसकी वजह से यह दुनिया अभी तक कायम है. 
                                                          :: :: :: 
राबर्तो ह्वार्रोस, राबर्तो हुआर्रोस 

Tuesday, March 13, 2012

राबर्तो हुआरोज़ : संकेतों की भाषा

राबर्तो हुआरोज़ की एक और कविता...    

 
राबर्तो हुआरोज़ की कविता 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

लिखने की कोशिश करते हुए 
हाथ का संकेत 
कभी-कभी रचना करता है विचार की, 
और रचता है बिम्ब को 
जो उसके बाद फिर चलाता है हाथ को.  

एक संकेत रचता है प्रेम को भी, 
जो बाद में रचता है दूसरे संकेतों को 
और उसके अलावा भी किसी चीज को जो छिपी होती है नीचे. 

संकेतों की स्वतंत्र भाषा 
एक सुविचारित संयोग सी जान पड़ती है 
उस सुसुप्त प्रतीक्षा को जागृत करने के लिए 
जो रहती है हर चीज की गहराई में. 

पेड़ भी एक भाषा है संकेतों की 
जहां एक होती है संयोग और पेड़ की सहापराधिता  
एक पत्ती को गिराने के लिए. 
                    :: :: :: 

Sunday, March 4, 2012

राबर्तो हुआरोज़ : सड़कें

राबर्तो हुआरोज़ की एक और कविता...  

 
राबर्तो हुआरोज़ की कविता 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

ऊपर की ओर ले जाने वाली सड़कें 
कभी नहीं पहुंचतीं वहां. 
नीचे की ओर ले जाने वाली सड़कें 
हमेशा पहुँच जाती हैं वहां तक. 

और फिर उन दोनों के बीच में भी होती हैं सड़कें. 

मगर कभी न कभी हर सड़क 
ऊपर की ओर ले जाती है या नीचे की ओर. 
                    :: :: ::

Friday, March 2, 2012

राबर्तो हुआरोज़ की कविता

राबर्तो हुआरोज़ की एक और कविता...  


राबर्तो हुआरोज़ की कविता 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

कभी-कभी ऐसा लगता है 
कि हम केंद्र में हैं किसी समारोह के.
लेकिन
कोई भी नहीं होता समारोह के केंद्र में.
समारोह के केंद्र में होता है शून्य.

मगर एक और समारोह होता है शून्य के केंद्र में.
                    :: :: :: 
राबर्तो हुआरोस राबर्तो हुआर्रोज़ राबर्टो हुआर्रोज़

Sunday, February 26, 2012

राबर्तो हुआरोज़ : मुक्त उड़ान

राबर्तो हुआरोज़ की एक और कविता...  

 
राबर्तो हुआरोज़ की कविता 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मेरे पास एक काली चिड़िया है 
इसलिए मैं उड़ सकता हूँ रात में. 
और दिन में उड़ने के लिए 
एक खाली चिड़िया है मेरे पास. 

मगर मैनें पाया 
कि वे दोनों राजी हैं 
एक ही घोंसले में रहने के लिए, 
एक ही एकांत में. 

यही कारण है कि कभी-कभी 
मैं हटा देता हूँ उनका घोंसला, 
यह देखने के लिए कि 
घर न लौट पाने पर क्या करती हैं वे. 

और इस तरह मैं समझने लगा हूँ 
एक अद्भुत कल्पना को: 
पूरी तरह मुक्त उड़ान 
बिल्कुल खुले में. 
                             (लारा के लिए, अभी भी)
               :: :: ::  
राबर्तो हुअर्रोज 

Wednesday, February 22, 2012

ज़िंदगी एक पेड़ की तस्वीर बनाती है

आज प्रस्तुत है राबर्तो हुआरोज़ की एक मशहूर कविता...  

 
राबर्तो हुआरोज़ की कविता 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

ज़िंदगी एक पेड़ की तस्वीर बनाती है 
मौत बनाती है एक और पेड़ की तस्वीर. 
ज़िंदगी एक घोंसला बनाती है 
और मौत भी कर लेती है उसकी नक़ल. 
घोंसले में रहने के लिए 
ज़िंदगी एक चिड़िया बनाती है 
और मौत भी फ़ौरन 
बना डालती है एक दूसरी चिड़िया. 

एक हाथ जिसने कुछ भी नहीं बनाया 
घूमता रहता है तस्वीरों के बीच 
और कभी-कभी इधर उधर कर देता है किसी एक को.  
मसलन : 
ज़िंदगी के बनाए हुए पेड़ पर 
ज़िंदगी की चिड़िया 
रहने लगती है मौत के घोंसले में. 

कभी-कभी 
कुछ भी न बनाने वाला हाथ 
मिटा देता है सिलसिले की एक तस्वीर को. 
मसलन : 
मौत के पेड़ पर होता है 
मौत का घोंसला 
मगर उसमें कोई चिड़िया नहीं होती. 

और कभी-कभी तो 
कुछ भी न बनाने वाला हाथ 
खुद ही बदल जाता है 
एक चिड़िया के आकार की, 
एक पेड़ के आकार की, 
एक घोंसले के आकार की, 
एक अतिरिक्त तस्वीर में. 
और तब, केवल तब 
न तो कुछ गायब होता है, न ही कुछ छूटा होता है. 
मसलन : 
मौत के पेड़ पर 
दो चिड़िया रहती हैं 
ज़िंदगी के घोंसले में. 

या ज़िंदगी के पेड़ पर 
होते हैं दो घोंसले 
और उनमें रहती है केवल एक चिड़िया.  

या एक अकेली चिड़िया 
रहती है एक घोंसले में 
ज़िंदगी के पेड़ पर 
और मौत के पेड़ पर. 
               :: :: :: 

Friday, February 17, 2012

राबर्टो जुअर्रोज़ : हर रंग छिपाता है कुछ न कुछ

राबर्तो हुआरोज़ की एक और कविता...    


राबर्टो जुअर्रोज़ की कविता 
(अनुवाद : मनोज पटेल)  

क्या छिपा होता है रंगों के पीछे? 
उनके पीछे रंग और प्रकाश की अनुपस्थिति होती है क्या? 
या फिर शायद कोई और अज्ञात रंग? 
या वहां होती होगी सिर्फ 
चीजों की एक शुरूआत जिनके बारे में हम जानते नहीं? 

क्योंकि हर रंग छिपाता है कुछ न कुछ, 
और उसे कपड़े पहनाता है आँख के लिए, 
ढालता है न गाए जाने वाले एक गीत में, 
अँधेरे में एक आश्वस्ति के तौर पर. 

लेकिन यदि कोई और रंग होता है उसके पीछे, 
तो क्या एक आँख भी होती होगी उसे देखने के लिए? 
या रंगों के पीछे कुछ नहीं होता एक आँख के सिवाय 
जो हमें देखा करती है उनके माध्यम से?   
                    :: :: :: 
राबर्तो हुअर्रोज़ 

Monday, February 13, 2012

राबर्टो जुअर्रोज़ : किसी चीज को पीना उसे समझना भी होता है

राबर्टो जुअर्रोज़ की एक और कविता...
 
 

राबर्टो जुअर्रोज़ की कविता 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

हमने भी धोखा दिया है पानी को. 

इसके लिए तो नहीं बांटी जाती बारिश, 
इसके लिए तो नहीं बहती नदी, 
इसके लिए तो नहीं ठहरता तालाब, 
इसके लिए तो नहीं है उपस्थिति समुद्र की.

हमसे फिर खो गया है सन्देश, 
खो गए हैं पानी की भाषा के 
उनमुक्त स्वर,  
उसकी मौन किन्तु सुस्पष्ट पारदर्शिता. 

पता तक नहीं लगा पाए हम 
पानी की पारदर्शिता को पीने का तरीका. 
किसी चीज को पीना उसे समझना भी होता है. 

और पारदर्शिता को समझना शुरूआत होती है 
अदृश्य को समझने की. 
                    :: :: :: 
Manoj Patel, Padhate Padhate

Sunday, February 12, 2012

राबर्टो जुअर्रोज़ : रात में लिखी जाती हैं कविताएँ

राबर्तो हुआरोज़ की एक और कविता... 

 
राबर्टो जुअर्रोज़ की कविता 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

सारे जुनूनों की तरह 
भाषा का जूनून भी, 
रात में आता है हमारे पास. 
कभी-कभी हमारे जागते में 
मगर ज्यादातर तभी जब सो रहे होते हैं हम. 

फिर हम भूलना शुरू करते हैं वे बातें 
जिन्हें लगता था कि जानते हैं हम 
और शुरू करते हैं जानना 
उन बातों को जिन्हें लगता था कि जानते नहीं. 

यही वजह है कि रात में लिखी जाती हैं कविताएँ, 
गोकि कभी-कभी रोशनी का 
भेष बदले होती हैं वे,  
और अगर दिन में लिखा जाता है उन्हें 
दिन को वे बदल देती हैं रात में.  
                    :: :: ::  
राबर्तो हुअर्रोज़ 

Saturday, February 11, 2012

राबर्टो जुअर्रोज़ : कविता और कुछ नहीं है एक प्रलाप के सिवा

राबर्टो हुआरोज़ की एक और कविता... 

 

राबर्टो जुअर्रोज़ की कविता 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

कुछ चीजें होती हैं जो इतनी ज्यादा लेती हैं जगह 
कि पसरते हुए अपने आस-पास 
आखिरकार प्रतिस्थापित कर लेती हैं खुद को.  
उन अजीब से जीवों की तरह जो बहते रहते हैं अपनी चमड़ी से 
और सिमट नहीं पाते दुबारा. 

इसी तरह कविता कभी-कभी लिखने नहीं देती मुझे. 
उस समय चपटा पड़ा रहता है लेखन 
जैसे घास किसी भारी जानवर के नीचे. 
और मुमकिन होता है सिर्फ 
घास में कुचले हुए कुछ शब्दों को बटोरना भर. 

मगर हर कविता और कुछ नहीं है एक प्रलाप के सिवा 
तारों के अनंत प्रलाप के नीचे. 
                    :: :: :: 

Friday, February 10, 2012

राबर्टो जुअर्रोज़ : किस चीज को मिटाया जाए पहले

राबर्तो हुआरोज़ की कविताओं के क्रम में एक और कविता... 



राबर्टो जुअर्रोज़ की कविता 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

किस चीज को मिटाया जाए पहले : 
परछाईं को या शरीर को, 
कल लिखे गए शब्द को 
या उस शब्द को जो लिखा गया है आज, 
बादलों से घिरे दिन को 
या साफ़ दिन को? 

तय करना ही पड़ता है एक क्रम. 
दुनिया को मिटाना सीखना 
जल्द काम आएगा हमारे खुद को मिटाने में. 
                    :: :: :: 
राबर्तो हुअर्रोज़, Manoj Patel Blog 

Wednesday, February 8, 2012

राबर्टो जुअर्रोज़ : पाठ

राबर्टो जुअर्रोज़ की एक और कविता... 

 
राबर्टो जुअर्रोज़ की कविता 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

कोई पाठ लिखना 
और अकेला छोड़ देना उसे पन्ने पर. 

उसे फिर से पढ़ने के लिए नहीं, 
उसे किसी को दिखाने के लिए नहीं, 
उसे कहीं भेजने के लिए नहीं, 
उसे पाठ के चैन से रहने देने के लिए.  

और वहां उसे पाने देना अपने पाठक को, 
जैसे सभी पाठ पा जाते हैं अपने पाठकों को. 

उस पाठ को भी जो लिखा हुआ है हमारे भीतर 
और असंभव सा लगता है कि कोई पढ़ पाएगा उसे. 
                    :: :: :: 
Manoj Patel Blog, राबर्तो हुआरोज़ 
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